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बिखरते परिवार , टूटता समाज और दम तोड़ते रिश्ते.!

Posted: 14 जून 2022

 🖊️🖊️आज चिंता का विषय है🖊️🖊️ 


शादी के लिए 25 से ज्यादा उमर का ना होने दें

इस तथ्य को थोड़ा गहराई से पढिये ।

जरा सोचिए आज ये सब क्यों हो रहा है.?

👉 एक कटु सत्य..!!!


आजकल माँ-बाप भी जरूरत से ज्यादा लडकियों के घर में हस्तक्षेप करके उसका घर खराब करते हैं!


यह मत भूलो कि शादी के बाद असली माँ बाप उसके सास ससुर होते हैं।


आज जो हालात हैं उसके जिम्मेदार कौन है..?


सर्वाधिक ये आधुनिक शिक्षा के नाम पर संस्कार विहीन बच्चे। 

रिश्ते तो पहले होते थे। अब रिश्ते नही सौदे होते हैं।


किसी भी माँ बाप मे अब इतनी हिम्मत शेष नही बची कि बच्चों का रिश्ता अपनी मर्जी से कर सकें।

पहले खानदान देखते थे। सामाजिक पकङ और सँस्कार देखते थे और अब ....


मन की नही तन की सुन्दरता , नौकरी , दौलत , कार , बँगला। 

लङके वालो को लङकी बङे घर की चाहिए ताकि भरपूर दहेज मिल सके और लङकी वालोँ को पैसे वाला लङका ताकि बेटी को काम करना न पङे।


नौकर चाकर हो। परिवार छोटा ही हो ताकि काम न करना पङे और इस छोटे के चक्कर मे परिवार कुछ ज्यादा ही छोटा हो गया है।

दादा दादी तो छोङो , माँ बाप भी बोझ बन गये हैं। आज परिवार सिर्फ़ मतलब के लिए रह गया.!!

                

परिवार मतलब पति पत्नी और बच्चे बस। जब परिवार इतना छोटा है तो फिर समाज को कौन पूछता है..?

लङका चाहे 20 हजार महीने ही कमाता हो। व्यापारी लङका भले ही दो लाख महीने कमाता हो पहली पसंद नौकरीपेशा ही होगा।


इसका कारण केवल ये है कि नौकरी वाला दूर और अलग रहेगा। नौकरी के नाम पर फुल आजादी मिलेगी , काम का बोझ भी कम। आये दिन होटल मे खाना घूमना।


नौकरीपेशा वालों का समाज से सम्बन्ध भी कम ही मिलेगा ऐसे मे समाज का डर भी नही।


सँयुक्त और बङा परिवार सदैव अच्छा होता है। पाँच मे तीन गलत होंगे तो दो तो सही होंगे क्योंकि पाँचो उँगलियाँ बराबर नही होती। लेकिन एक ही है तो सही हो या गलत भुगतो। 


पहले रिश्तों में लोग कहते थे कि मेरी बेटी घर के सारे काम जानती है और अब....

हमने बेटी से कभी घर का काम नहीं कराया यह  कहने में शान समझते हैं।


आये दिन बायोडाटा ग्रुप खुल रहे हैं। उम्र मात्र 30 से 40 साल। एजुकेशन भी ऐसी कि  क्या कहना..

कई डिग्री धारक रोज सैकङों लङके और लङकियों के बायोडाटा आ रहे हैं लेकिन रिश्ते नही हो रहे हैं। इसका कारण एक ही है..


इन्हें रिश्ता नहीं बेहतर की तलाश है। रिश्तों का बाजार सजा है गाङियों की तरह। शायद और कोई नयी गाङी लांच हो जाये। इसी चक्कर मे उम्र बढ रही है। 

अब तो और भी बायोडाटा ग्रुप बन रहे हैं।

तलाकशुदा ग्रुप

विधवा विधुर ग्रुप 

अजीब सा तमाशा हो रहा है। अच्छे की तलाश में सब अधेङ हो रहे हैं।


अब इनको कौन समझाये कि एक उम्र में जो चेहरे में चमक होती है वो अधेड होने पर कायम नही रहती , भले ही लाख रंगरोगन करवा लो ब्युटिपार्लर में जाकर।


एक चीज और संक्रमण की तरह फैल रही है। नौकरी वाले लङके को नौकरी वाली ही लड़की चाहिये। 


अब जब वो खुद ही कमायेगी तो क्यों तुम्हारी या तुम्हारे माँ बाप की इज्जत करेगी.?

खाना होटल से मँगाओ या खुद बनाओ

बस यही सब कारण है आजकल अधिकाँश तनाव के

एक दूसरे पर अधिकार तो बिल्कुल ही नही रहा। उपर से सहनशीलता तो बिल्कुल भी नहीं। इसका अंत आत्महत्या और तलाक।


घर परिवार झुकने से चलता है , अकङने से नहीं.।

जीवन मे जीने के लिये दो रोटी और छोटे से घर की जरूरत है बस और सबसे जरुरी आपसी तालमेल और प्रेम प्यार की लेकिन.....

आजकल बड़ा घर व बड़ी गाड़ी ही चाहिए चाहे मालकिन की जगह दासी बनकर ही रहे।

एक गरीब अगर प्यार से रानी बनाकर भी रखे तो वो पहली पसंद नही हो सकती। नौकरी पसँद वालों को इतना ही कहूँगा कि अगर धीरुभाई अंबानी भी नौकरी पसँद करता तो आज लाखों नौकर उसके अधीन नही होते।


सोच बदलो.... 

माँ बाप भी आजकल जरुरत से ज्यादा लङकियों के घर मे हस्तक्षेप करके उसका घर खराब करते हैं।

मत भूलो शादी के बाद उसके असली माँ बाप उसके सास ससुर होते हैं। आपके घर तो बस मेहमान थी।


कई सास बहू के सामने बेटी की तारीफ करके अपना खुद का घर खुद खराब करती हैं। बेटी कभी भी बहू नही बन सकती। बेटी की चाहत खून के रिश्ते के कारण है लेकिन बहू अजनबी होकर भी आपकी गृहलक्ष्मी भी है , नौकरानी भी है और कुल चालक भी और आपके और आपके बेटे के मध्य सेतु भी। बहू खुश तो परिवार खुश अन्यथा....


आजकल हर घरों मे सारी सुविधाएं मौजूद हैं.... 

कपङा धोने की वाशिँग मशीन 

मसाला पीसने की मिक्सी

पानी भरने के लिए मोटर 

मनोरंजन के लिये टीवी 

बात करने मोबाइल 

फिर भी असँतुष्ट... 


पहले ये सब कोई सुविधा नहीं थी। पूरा मनोरंजन का साधन परिवार और घर का काम था , इसलिए फालतू की बातें दिमाग मे नहीं आती थी।

न तलाक न फाँसी 

आजकल दिन मे तीन बार आधा आधा घँटे मोबाइल मे बात करके , घँटो सीरियल देखकर , ब्युटिपार्लर मे समय बिताकर। 

मैं जब ये जुमला सुनता हूँ कि घर के काम से फुर्सत नही मिलती तो हंसी आती है। लड़कियों के लिये केवल इतना ही कहूँगा कि पहली बार ससुराल हो या कालेज लगभग बराबर होता है। थोङी बहुत अगर रैगिँग भी होती है तो सहन कर लो।


कालेज मे आज जूनियर हो तो कल सीनियर बनोगे। ससुराल मे आज बहू हो तो कल सास बनोगी।

समय से शादी करो। स्वभाव मे सहनशीलता लाओ। परिवार में सभी छोटे बङो का सम्मान करो। ब्याज सहित वापिस मिलेगा। 


आत्मधाती मत बनो। जीवन मे उतार चढाव आता है। सोचो समझो फिर फैसला लो। बङो से बराबर राय लो। उनके द्वारा बताए अनुभव पर पूरा विश्वास रखो।


समाज के लोगों से बस इतना ही निवेदन है कि समाज मे सही उम्र मे शादी हो। उस दिशा मे काम करें। कम खर्चीली हो। धनी सेठ करोङो रुपए बेवजह शादी मे लुटा देते हैं , उनके अनुसरण मे गरीब पिसते हैं।

🙏निवेदक 🙏

अखिल भारतीय जैन महासंघ


सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

प्राचीन जैन बायोलोजी:-

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 प्राचीन जैन बायोलोजी:-


1892 में Dmitry Ivanousky रशियन साइंस्टिस्ट ने बीमार तंबाकू के झाड़ का रस फिल्टर करके स्वस्थ प्लांट में डाला तो स्वस्थ प्लांट भी बीमार हो गया,तभी से दुनिया को वायरस के बारे में पहली बार पता चला लेकिन....


जैन धर्म में वायरस और बैक्टीरिया के बारे में 2500 साल प्राचीन जीवाभिगम और जीवविचार जैसे कई सूत्रों में वर्णन मिलता है-


1- परमात्मा महावीर के निर्वाण पर सूक्ष्म बैक्टीरिया उत्पन्न होने से साधु-साध्वियों ने अन्न-जल का त्याग कर दिया था।


2- "भद्रबाहुसंहिता" में भी भद्रबाहु स्वामी ने 2000 साल पहले बताया कि महामारी के वक्त संक्रमित व्यक्ति के स्पर्श किए हुए किसी भी वस्तु या लोहे आदि को ना छूए।


3- 17 वे तीर्थंकर कुंथूनाथस्वामी के जन्म के समय कुंथू अथार्त सूक्ष्म जीवो की रक्षा की बात कही गई है।


4-स्त्रिया मासिक धर्म में होती है तब उनके शरीर से निकलने वाली अशुद्धि और पसीने में भी हानिकारक वायरस होते हैं इसीलिए महिलाएं मासिक धर्म के समय self quarantined रहती है।


4- dead body में भी वायरस उत्पन्न होने से डेडबोडी का स्पर्श करने के बाद नहाने और सूतक के नियमों का पालन किया जाता है,जैनधर्म में डेडबोडी का अग्निसंस्कार किया जाता है क्योकि यदि कोरोना जैसे वायरस से ग्रसित मृतशरीर को दफना दिया जाए तो उसके दुष्परिणाम से नए रोग उत्पन्न हो सकते हैं।


 5-प्रभु महावीर ने कहा है-"जहा अंधकार होता है वहां जीवो की उत्पत्ति ज्यादा होती है", इसीलिए सूक्ष्म जीवो की रक्षा के लिए जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन निषेध है। और जब सूर्य की किरणों से सूर्योदय के 48 मिनट के बाद जीवों की उत्पत्ति रुक जाती है तब जैन लोग नवकारशी(दिन का पहला अन्न-जल ग्रहण करना) करते हैं।


5-कंदमूल‌ भी जमीन के नीचे अंधेरे में उगने के कारण उसके कण-कण में अनंत  जीव होते हैं(जैसे एक बीज=एक जीव, वैसे कंदमूल का एक कण=अनंत जीव) जिसकारण जैनधर्म में कंदमूल खाना निषेध है।


6- सूर्यग्रहण के वक्त भी अन्न-पानी ग्रहण करना निषेध कहा गया है वास्तव में सूर्य ग्रहण के कारण अंधकार होने से सूक्ष्म वायरस आदि जीवो की रक्षा हेतु अन्न-जल का त्याग करने को कहा गया है क्योंकि वायरस भोजन में मिलने पर रोग भी उत्पन्न कर सकते हैं।


7- अनंत तारामंडल में चंद्र की गति के अनुसार विशाखा रोहिणी आदि 27 नक्षत्र को माना गया है,22 जून पर आद्रा नक्षत्र शुरू होने पर मौसम आद्र हो जाता है जिसके कारण आम जैसे गीले फलों में बैक्टीरिया उत्पन्न होने शुरू हो जाते हैं   इसलिए जैन लोग 22 जून के बाद आम जैसे फलों का त्याग करते हैं।


8- जैन शास्त्रो अनुसार पानी से ही जीवो की उत्पत्ति होती है इसीलिए जैन धर्म में बासी भोजन का त्याग करने को कहा है, लेकिन वैफर,खाकरा या कोई भी सुखी वस्तु जिसमें पानी का अंश ना हो वह दूसरे दिन भी खाई जा सकती है।


9- जैन शास्त्रों अनुसार दही को जैविक नहीं बल्कि रासायनिक प्रक्रिया से जमाना चाहिए,जिसके लिए नींबू की कुछ बूंदे चांदी,संगमरमर,सुखी लाल मिर्च या सूखे नारियल के टुकड़े पर डालकर हल्के गर्म दूध में मिलाकर जैन रासायनिक विधि से दही जमाया जाना चाहिए।

जैन शास्त्रों में कहा है कि 2 रात के बाद रासायनिक पद्धति से जमाये गये दही में भी जैविक प्रक्रिया शुरू हो जाती है इसलिए 2 रात के बाद का दही खाना जैन धर्म में निषेध हैं।


10-द्विदल- दाल,चने आदि जिनके दाने के दो दल होते हैं वे द्विदल कहलाते हैं, कच्चे दूध,दही में द्विदल का आटा मिक्स किया जाए तो तुरंत ही दो इन्द्रिय वाले जीव उत्पन्न हो जाते हैं। इसीलिए जैन लोग कड़ी बनाते वक्त दही या छाछ को पहले गर्म करते हैं और फिर उसमें बेसन डालते हैं। ताकि जीवोत्पत्ति ना हो।


11- जैन शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य के वात्त,पित्त,मल,मूत्र,थूंक,पसीना वीर्य आदि 48 मिनट में ना सूखे तो उसमें असंख्य समुर्च्छिम सूक्ष्म मनुष्य जीवों की उत्पत्ति होती है।ये अतिसूक्ष्म जीव शुक्राणु की तरह होते हैं,

उनके सिर में आंख,कान,नाक, मुंह,स्पर्श पांचो इंद्रियां होती है,मात्र शरीर की जगह पूंछ होती है,

 इसीलिए जैन साधु इन सूक्ष्म जीवो की रक्षा के लिए स्नान ना करना आदि नियम पालन करते हैं,आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी लैब टेस्ट में यह जैन विज्ञान को 100% सही सिद्ध किया है।


12- जैनशास्त्रों अनुसार शहद,बटर(मक्खन),मांस(meat),शराब ये चारों महाविगई है जिनके प्रत्येक कण में प्रतिपल असंख्य दो इन्द्रिय वाले जीव (जिनके पास शरीर के साथ मात्र भोजन के लिए मुंह है,बाकि आंख,कान,नाक नही है ) ऐसे सूक्ष्म जीवो की उत्पत्ति होती रहती है।

मांसाहार में मात्र एक बडे पंचेन्द्रिय जीव की ही हत्या नहीं होती बल्कि मांस कच्चा हो या पक्का उसमें असंख्य सुक्ष्म दो इंन्द्रिय वाले जीव जिन्हें हम बैक्टीरिया कहते हैं प्रतिपल उत्पन्न होते रहते हैं,मांसभक्षण से उन असंख्य जीवो की भी हत्या होती है।


13-WHO report के अनुसार नोनवेज के कारण 159 अलग-अलग प्रकार की बीमारियों का खतरा रहता है। जिनमें heart disease,B.P.,kidney, strock,आदि मुख्य हैं।


14-   covid,sarc जैसे कई वायरस nonveg से ही पैदा हुए हैं,E.coli & BSE वायरस बीफ याने कि गाय के मांस से, trichinosis पोर्क याने कि सुअर के मांस से, salmonella चिकन से,scrapie मटन याने कि बकरे के मांस से एसे कई जानलेवा वायरस की उत्पत्ति का कारण nonveg ही है।


15- वैज्ञानिकों को यह 1679 में ही पता चला है कि butterfly के अंडे पहले caterpillar यानी की कानखजूरे या ईयल की तरह विकसित होते हैं, बाद में उनके पंख आने पर वे butterfly बन जाते हैं। लेकिन प्राचीन जैन शास्त्रों में लिखा है कि भ्रमर के डर से उसका ध्यान करते हुए ईयल खुद भ्रमर बन जाती है,जो इस वैज्ञानिक तथ्य को तो सिद्ध करता ही है,साथ ही जैनविज्ञान का साइकोलॉजी अप्रोच को भी सिद्ध करता है।


जैन धर्म में एकिन्द्रिय जीव से लेकर पांच इंन्द्रिय वाले मनुष्य तक के समस्त जीवों की मन,वचन,काया से अहिंसा का पालन करने को कहा. गया है।

जैन धर्म अनुसार अहिंसा ही परम धर्म है।

जैन धर्म अनुसार आत्मा ही ब्रह्म है।


सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

त्रिवर्ग सिद्धान्त

Posted: 27 दिसंबर 2009
धर्म, अर्थ (सम्पति), काम (इच्छा)
धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थो धर्म एव च।
अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थिति॥
परित्यजेदर्थकामो यो स्याता धर्म वर्जितो।

कुछ लोगो का कहना है कि कल्याण एव सुख्-सन्तोष की प्राप्ति के लिऍ धर्म और श्रेयस्कर है, अन्य लोगो का मानना है कि अर्थ और काम ही अति उत्तम है और कुछ अन्य लोगो का कहना है कि धर्म सर्वोत्तम है। ऐसे भी लोग है जिनके अनुशार केवल अर्थ ही सन्तोष प्रदान कर सकता है।
लेकिन सही विचार यह है कि धर्म, अर्थ और काम (त्रिवर्ग) के समन्वय से ही सुख की प्राप्ती हो सकती है। और इसी मे सबका कल्याण है।
परन्तु धर्म विरुद्ध ऐश्वर्य (अर्थ) और इच्छा (काम्) का हमेशा त्याग करना चाहिए
(मनु -२२२४-४-१७६)
धर्म बुरे विचारों का नाश करता है .

धर्मेण पापमपनुदति !
धर्म सर्व प्रतिष्टितम!
तस्माद्धर्मा परमा वदन्ति!!


सभी धर्म पर निर्भर है इसलिए धर्म सर्वोत्तम है. (महानारायण उपनिषद्)

मन के अरिषडवर्ग  निरोधक -अर्थात धर्म , मन के छ: शत्रुओ का विनाशक 

काम         क्रोध       लोभ           मोह             मद       मात्सर्य 
(इच्छा)    (कोप)    (लालच)     (आसक्ति )    (अहंकार)    (इर्ष्या )


बाल्यावस्था से ही धर्म की शिक्षा देने से अनैतिक विचारों / कार्यो कों नियंत्रण में रखने  की आतंरिक शक्ति प्राप्त होती है. केवल इसी प्रकार से ही धर्मचारण करने वाले नागरिको की संख्या बढाई जा सकती है.
आज सभी समस्याओं का एकमेव समाधान केवल यही है.

घर्म क्या है ?"

Posted: 26 दिसंबर 2009

"धर्म" सस्कृत भाषा का शब्द है, अर्थ अत्यंत व्यापक है किसी अन्य भाषा में धर्म का समानार्थक शब्द मुझे देखने को नहीं मिला.

जब मुझे किसी ने एक सभा में पूछा कि -"घर्म क्या है ?" मेरा मानना है कि मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में न्यायसंगत आचरण की संहिता को घर्म कहा गया है.


"अभ्युदय- नि:श्रेयसे साघनत्वेना धारयति - इति धर्म:!
जो इस ससार में सभी का सुख और योगक्षेम करे तथा परलोक में शान्ति एवं आनंद प्रदान करे, वही धर्म है. (विधारान्य)

धार्णाद धर्म इतयाहुर्धर्मो धारयते प्रजा:
यत स्याद धारणसंयुक्त स धर्म इति निश्चय :!!

धर्म समाज को धारण एवं उसका पोषण करता है. धर्म सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखता है. धर्म मानव समाज का योगक्षेम करता है उसकी प्रगति में सहायक बनाता है. सभी उद्देश्यों को पूर्ण करने वाला निश्चय ही धर्म है.
जो समाज को स्थायित्व प्रदान करे एव उसके विकास में सहायक होता है तथा मानव का कल्याण एव योगक्षेम करता है वही धर्म है.. (भारत का सर्वोच्चा न्यायालय १९९६(९) एम्.सी.सी. ५४८ पैरा ५९ से ७९ )

तादृशो$यमनुप्रश्नो यत्र धर्मः सुदुर्लभ:।
दुष्कर: प्रतिसख्यातुम तत्केनात्र व्यवस्यति ॥
    प्रभवार्थाय भूताना धर्मप्रवचनम कृतम।
    यः स्यत्प्रभवसयुक्त: स धर्म इति निश्चित :॥

धर्म का अर्थ क्या ? इस प्रश्न का उत्तर देना आसान नही है . सभी जीवो के उत्थान में साहयक है वही धर्म अर्थात जो सभी जीवो का कल्याण कर सकता है वही निशिचत रूप से धर्म है.

स हि नि: श्रेयसेन पुरुषं संयुनत्तिती प्रतिजानीमेह ।
तदभिधीयते -
वेदों के अनुशार सभी जीवो की अत्याधिक भलाई में जो सहायक है - वही धर्म है.

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित:!
तस्माद्वर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतो$वघित!!

यदि हम धर्म रक्षा करते है तो धर्म हमारी रक्षा करेगा. यदि धर्म का नाश होता है तो हमारा भी नाश होगा . अत: धर्म का नाश नहीं होना चाहिए ताकि उसके फलस्वरूप हमारा भी नाश न हो.


अंहिसा सत्यमस्तेयं शोच्मिन्द्रियनिग्रह:!
एतं सामासिकं धर्म !

अंहिसा( हिंसा न करना), सत्य (सच बोलना) , अस्तेय (अवैध रूप से धन न कमाना ), शोच (अंतरंग तथा बहिरंग शुद्धि ), और इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को संयम में रखना ) यह धर्म के पाच सामान्य नियम है जिसका हम सभी को पालन करना चाहिए.

धर्म भी बुद्धि का विषय है ? ? ?

Posted: 09 अक्टूबर 2009
मानवीय एकता भेद-बुद्धि के नीचे दब सी गयी है।

धर्म को देखने के लिए श्रद्धा की ऑख चाहिए।

क्या धर्म बुद्धिगम्य है ?

धर्म बुद्धि से सर्वथा गम्य नही है। तो सर्वथा अगम्य भी नही है।

धर्म के निमित कारणो को धर्म कह देते है।

मनुष्य मे धर्म भावना जितनी दुर्बल होती है उसमे भेद-बुद्धि उतनी ही प्रबल होती है।


बुद्धिमान व्यक्ति श्रद्धालु नही हो सकता। और श्रद्धा के साथ बुद्धि के साथ अवस्थान नही हो सकता है। धर्म को देखने के लिए श्रद्धा की ऑख चाहिए। बुद्धि की ऑख कभी धर्म को नही पहचान सकती इस बात को सुनकर अवश्य विस्मित होगे कि धर्म भी बुद्धि का विषय है।
साधना एवम बुद्धि मे दुरी है। साधना के परिपार्श्व मे सिन्द्धान्त बनते है। बुद्धि उन सिद्धान्तो को ऊचाई तक पहुचने से पहले ही थककर अपना भाग्य श्रद्धा के हाथो सोप देती है। इसलिए धर्म के साथ श्रद्धा का अनुबन्धन झोडा जाता है। यह बहुत बडा सत्य है। पर वे लोग इस सत्य को कैसे समझ सकते है, जो श्रद्धा से खाली है। उनके लिऍ यह प्रशन महत्व का है कि क्या धर्म बुद्धिगम्य है ?
धर्म बुद्धिगम्य है, यह बात शत-प्रतिशत सही नही है तो  यह बात शत-प्रतिशत सही नही है कि धर्म बुद्धिगम्य नही है । उन दो छोरो के बीच मे प्राप्त होने वाला तथ्य यह है कि धर्म बुद्धि से सर्वथा गम्य नही है। तो सर्वथा अगम्य भी नही है। बुद्धि की अपनी सीमाऐ है और धर्म की अपनी सीमाऐ है।

कुछ लोग मानते है कि धर्म का फल परलोक मे मिलेगा। मिलता होगा मै नही जानता। किन्तु जिसका इस लोक मे कोई फल नही है, उसका फल परलोक मे कैसे मिलेगा ? भविश्य कभी भी वर्तमान की अपेक्षा नही करता। हम वर्तमान को उज्जवल बनाकर ही भविष्य को उज्जवल बना सकते है। धर्म का  फल क्या है ?  यह सम्पदा और ऐश्वर्य जो है वह धर्म का फल नही है,यह परिश्रम का फल है। अपने अपने कृत कर्मो का फल है। पर धर्म का फल नही है। धर्म का फल है शान्ति, धर्म का फल है पवित्रता, धर्म का फल है सहिष्णुता और धर्म का फल है प्रकाश।हम बहुत बार धर्म के निमित कारणो को धर्म कह देते है। किन्तु वस्तुतः उन्हे साम्प्रदायिकता विधि विधान कहना चाहिऍ, शाश्वत धर्म नही है। शाश्वत धर्म जो है, वह सबके लिऐ, सब स्थितियो मे , सदा, सर्वदा एक ही हो सकता है। इसलिए उसमे व्यक्ति, जाति, वर्ग, लिन्ग, वर्ण, देश और काल का कोई अन्तर नही हो सकता है।
मनुष्य मे धर्म भावना जितनी दुर्बल होती है उसमे भेद-बुद्धि उतनी ही प्रबल होती है। जातीयता के कारण के कारण हिन्दु और मुसलमान और वर्ण भेद के कारण काले और गोरे इस प्रकार विभक्त हो गऐ है कि मानवीय एकता भेद-बुद्धि के नीचे दब सी गयी है।  रुसी भी आदमी है और अमेरिकन भी आदमी है। पर राष्ट्रीय सकुचितता के कारण उनकी यह बुद्धि आहत-सी हो गई है कि मनुष्य मनुष्य एक है। यह सारा भेद अधर्म है, अनध्यात्म  से प्राप्त होता है इस सकट का एकमात्र प्रतिकार अध्यात्म या धर्म ही है। इस तथ्य को बुद्धिगम्य किये बिना सारा बुद्धि वाद खतरे मे पड जाऐगा।

आचार्य तुलसी ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

"अरहन्त" नाम लगते ही "शीतल तेजोलेश्या"-"शान्ति की मिसाइल" बनी परमाणु पनडुब्बी । हमे गर्व है कि भारत कि सामरिक रक्षा मे अरिहन्त देव के सन्देशो को अपनाया गया।

Posted: 27 जुलाई 2009
 "अरिहन्त" शान्ति की मिशाईल का प्रतिक बनेगा इसका हम स्वागत करे- प्रभु यह तेरापन्थ

प्रधानमन्त्री श्री मनमोहनसिह ने  परमाणु पनडुब्बी "अरिहन्त"  का कल मुम्बई मे लोकार्पण कर ढाई दशको का सपना भारतीय वैज्ञानिको का साकार किया। "अरिहन्त" के नाम को लेकर एक जैन मुनि ने इसलिए विरोध किया क्यो कि  "अरिहन्त" जैन धर्म के प्रथम देव माने गये है, और जैन धर्म अहिन्सा मे विश्वास करता है। तो आज इस लेख का मकसद साफ है कि हमे लकिर का फकिर नही बनके "अरिहन्तो" द्वारा बताई गई समग्र "अहिन्सा" के मुल रुप को समझना होगा। देश की सरहदो की, नागरीको की  रक्षा मे उठाए गए किसी भी कदम को अहिन्सा नही माने। अर्हतो का एवम आचार्य महाप्रज्ञजी का मत इस और है। यह एक लोकिक व्यव्स्था है। भगवान कृष्ण ने महाभारत के युद्ध को "राजधर्म" ही बताया था। 
आज मै आपके सामने 'अर्हत' कोन थे ? परमाणु पनडुब्बी पर "अरिहन्तके नाम के पिछे भारतीय वैज्ञानिको का मकसद  क्या है ?
'जैन तीर्थकरो'  के नाम लिखना अर्थात भगवान महावीर-'दर्शन के 'सार; को विज्ञानिको ने अपनाया, एवम मिशाइल मेन डॉ अबदुल कलाम एवम जैन तेरापन्थ के आचार्य श्री महाप्रज्ञ की बातचीत, यह तीनो बातो को क्रमश पढने के बाद हम समझ पाएगे की भले ही "अरिहन्त",
परमाणु, पनडुब्बी है,  इस पर "अरहन्त" नाम लगते ही "शीतल तेजोलेश्या" - "शान्ति की मिसाइल" बन गई। हमे गर्व होना चाहिए की भारत कि सामरिक रक्षा मे अरिहन्त देव के सन्देशो को अपनाया गया।
 "अरिहन्त"  नाम से इस बात के स्पष्ट सकेन्त है की हमारा (भारत) मकसद साफ है यह पण्डुब्बी विश्व मे शान्ति एवम सअस्तित्व का मार्ग को प्रसस्त करेगी। हमारे अरिहन्त देवो के मतो एवम विचारो को देश और दुनिया मे प्रतिकात्मक दर्शन के लिए भारत की  परमाणु पनडुब्बी "अरिहन्त" अपने लक्ष्यो के लिए सफल होगी। शायद यह अणुबम के जनक डॉक्टर अबदुल कलाम व आचार्य महाप्रज्ञ कि वार्तालाप का सात्विक रुप  की साकार प्रतिक्रिया.........
"शान्ति की मिसाइल" या भगवान महावीर द्वारा गोशाला को बचाने  के लिए छोडे गए "शीतल तेजोलेश्या" की शुरुआत भर का प्रतिक है। हमे गर्व  होता है की जैनो के तीर्थकर जिन्हे हम 'अरिहन्त' के नाम से पुकारते है इस विश्व शान्ति के प्रतिक के रुप मे यह परमाणु पनडुब्बी "अरिहन्त" भारत का शान्ति सन्देस का  दुनिया भर मे प्रतिनिधित्व करेगी।
"अर्हत" जैन धर्म के मुख्य धुरी होते है।

"णमो अरिहन्ताणम",  अर्थात अरिहन्तो को नमन।  जैन धर्म मे सर्वथा कर्ममुक्त आत्म-शक्ति- सम्पन्न विभूति सिद्ध है। जैन साधना पद्धति का चरम लक्ष्य सिद्धत्व प्राप्ति है। "अर्हत" जैन धर्म के मुख्य धुरी होते है। वे चार कर्म का क्षय कर सर्वज्ञ की भुमिका पा लेते है। अर्हत जन-कल्याण के महनीय उपक्रम के मुख्य सवाहक होते है। उनके द्वारा बोले गए हर बोल छदमस्थ मुनियो व धर्म शासन के लिए पथ-दर्शक बन जाते है। इसी वजह स "नमस्कार महामत्र" मे "अर्हतो" को सिद्धो की अपेक्षा (सम्पुर्ण आत्म-उज्ज्वलता होने पर भी) पहले नमस्कार किया गया है। अर्हत, तीर्थकर, जिन,आदि पर्यायवाचीशब्द है। सर्वज्ञ व तीर्थकर मे आत्म-उपलब्धि की दृष्टी से कोई अन्तर नही है। दोनो केवल ज्ञान व केवल दर्शन को सम्प्राप्त है। फिर भी कुछ मोलिक अन्तर है
तीर्थकर पहले पद मे होते है  सर्वज्ञ पॉचो पदो मे होते है। तीर्थकर शब्द जैन साहित्य का पारिभाषिक शब्द है। जैन आगमो मे इसका प्रचुर मात्रा मे  उल्लेख हुआ है। जो तीर्थ का कर्ता होता है उसे तीर्थकर कहते है। जो ससार -समुन्द्र से तिरने मे योगभूत बनता है वह तीर्थ अर्थात प्रवचन होता है। उस प्रवचन को साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका धारण करते है। उपचार से इस चतुर्विध सघ को भी तीर्थ कहा गया है।  इसके निर्माता को तीर्थकर कहा जाता है। जिनके तीर्थकर नामकर्म का उदय होता है वे तीर्थकर बनते है। इन्हे जैन धर्म की भाषा मे अर्हत देव कहा गया। तीर्थकर अहिसा,सत्य,आदि रुप धर्म की प्ररुपणा करते है। तीर्थकर १२ विशेष गुणधारी होते है।
कुल चोबीस तीर्थकर हुए है।
आचार्य महाप्रज्ञ ने डॉ, कलाम को "शान्ति की मिसाइल" बनाने की प्रेरणा दी"


नई दिल्ली मे ४ नवम्बर १९९९९ मे अणु वैज्ञानिक श्री डॉ अब्दुल कलाम ने आचार्य महाप्रज्ञजी के प्रथम बार दर्शन किये।
वैज्ञानिक डॉ,वाई एस राजन, डॉ, सेल्वमुर्ति, श्री एम पी लेले आदि कलाम के साथ थे। उसी वार्तालाप मे आचार्य महाप्रज्ञ ने डॉ, कलाम को "शान्ति की मिसाइल" बनाने की प्रेरणा दी"
१३ अगस्त २००२ को राष्ट्रपति डॉ, अब्दुल कलाम एक बार फिर आचार्यप्रवर के दर्शनार्थ आए।


वार्तालाप का कुछ भाग-:
 आचार्य श्री -" आज भय का वातावरण बन गया है। अणु अस्त्रो का प्रयोग मनुष्य के लिए चिन्ता का विषय है। क्या ऐसी कोई शक्ति है, जिससे उसका प्रयोग न हो पाए ?"

डॉ, कलाम -" अणु अस्त्रो के प्रयोग को रोकने की शक्ति नही है। इस स्थिति मे उन्हे विरोधि तत्व से नष्ट कर सकते है।"
 
आचार्य श्री-" महावीर के समय का प्रसग है । वैश्यायन बाल तपस्वी था। उसे "तेजोलब्धि" प्राप्त थी। उसने गोशालक को मारने के लिए तेजोलेश्या का प्रयोग किया। भगवान महावीर ने देखा- गोशालक को जलाने के लिए तेजोलेश्या का प्रयोग किया जा रहा है। महावीर ने तत्काल "शीतल तेजोलेश्या" का प्रयोग किया उष्णतेजोलेशिया समाप्त हो गई।" विज्ञान ने "विध्वसक एटम बम" का निर्माण किया है। क्या आज विज्ञान विध्वसक एटम बम को निरस्त करने के लिए "शीतल एटमबम"  का निर्माण कर सकता है ?"

डॉ, कलाम -" ( विस्मय-विमुग्ध होते हुए) आचार्य श्रीजी ! आप क्या कह रहे है ?"

आचार्य श्री -"! विनाशक एटम बम का निर्माण अनेक देशो ने कर लिया है। भारत को शान्ति का एटम बम का, शान्ति की मिसाइल का निर्माण करना चाहिए। क्या आप कर सकते है ?"

राष्ट्रपतिजी -"(श्रद्धा भरे स्वर मे) आचार्यश्री!  यह अपुर्व कन्सेप्ट है। केवल भारत ही यह कार्य कर सकता है। महावीर, बुद्ध,और गान्घी का देश आध्यात्मिक रुप से मजबुत हो जाए तो हम इस मिशन को स्टार्ट कर सकते है।" 
इन फोटुओ को भी चटका लगाकर देखे

जैन कोन ?

Posted: 22 जुलाई 2009
जैन घर्म
 
बडे ही सरल ढग से प्रशनो के माध्यम से बालको को जैन  कोन ? पर समझाने कि कोशिश की
प्रशनः- तुम कोन हो ?
उत्तरः- हम जैन है।

प्रशनः- तुम्हारा धर्म कोनसा है ?
उत्तरः- हमारा धर्म जैन धर्म है।

प्रशनः- जैन धर्म किसको कहते है?
उत्तरः- जो जिन देवो ने बताया उसे जैन कहते है।

प्रशनः- जिन देवो ने क्या सिखाया ?
उत्तरः- किसी को दुख न दो। सदा सच्च बोलो।लोभ लालस मे मत पडो।सबके साथ प्रेम से रहो।

प्रशनः-जिन देव कोन होते है ?
उत्तरः- जो मन के विकारो को जीतते है।किसी भी तरह का कपट नही करते है, वे महान आत्माऐ जिन कहलाती है।

प्रशनः-ऐसे जिन कोन हुऐ है?
उत्तरः- भगवान ऋषभदेवजी, पार्शवनाथजी, महावीर आदि।

जैन कोन है ?
जैन वह है जो मन के विकारो को जीतने की कोशिश करता है तथा जो सदा भले काम करता है।


भले काम कोनसे है ?
1 किसी भी जीव को दु:ख नही देना
2 किसी जीव की हत्या नही करना।
3 किसी को गाली नही देना।
4 झुठ नही बोलना।
5 चोरी नही करना।
6 सबके साथ अच्छा व्यवहार रखना।
7 सबके साथ प्रेम का वर्ताव करना।
8 क्रोध नही करना।
9 किसी से लडाई,झगडा ना करना आदि आदि कोई काम है।


जैन को क्या करना चाहिऐ ?

1 समय निकाल कर ज्यादा से ज्यादा समय सामायिक सवर मे लगाना चाहिऐ।
2 प्रतिक्रमण करना चाहिऐ।
3 पन्च परमेष्ठी का ध्यान करना चाहिऐ।
4 देव गुरु धर्म पर श्रद्धा रखनी चाहिऐ।
5 सभी धर्मो को सम्मान आदर से देखना , एवम अनेकान्तवाद को अपनाना चाहिऐ।
6 अपने से बडो का आदर एवम छोटो को स्नेह करना चाहिए।
7 अपने पास जो है बॉट कर खाना चाहिऐ
8 रोगियो व दु:खी व्यक्तियो कि सेवा मे मन को लगाना चाहिए।

 जैन धर्म मे जन्म से अधिक कर्म को महत्व दिया गया है। भले ही कोई व्यक्ती किसी जैनपरम्परा वाले परिवार मे जन्म लिया हो । व्यक्ति के कर्म- बताये गये है- होने चाहीऐ तभी वह सही मायने मे जैन है। इसलिऐ जैन तेरापन्थ धर्म सध मे कर्मणा जैनो के हजारो परिवार है, जैसे सरदार,सिन्धी, राजपुत, हरिजन, मुस्लमान,अग्र्वाल, सहित विभिन्न परम्पारो के सैकडो परिवार जैन धर्म को अपने व्यहवारिक जीवन मे अपना रखा है।
देखे एक ब्रिटेनी बच्चा कैसे नमकार महामन्त्र को बोल रहा है.

हिंसा मत करो, झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, व्यभिचार मत करो, और परिग्रह मत रखो।

Posted: 10 जून 2009
हमने तत्व-ज्ञान -जीव तत्व - अहिंसा - के बारे मै पढा आज हम इससे आगे ज्ञानसात करेगे।























[photo by लावण्यम्` ~अन्तर्मन्`]
जैन दर्शन
श्रावक-धर्म -
मुख्य व्रत पांच हैं-अहिंसा, अमृषा, अस्तेय, अमैथुन और अपरिग्रह। इसका अर्थ है हिंसा मत करो, झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, व्यभिचार मत करो, और परिग्रह मत रखो। इन व्रतों के स्वरूप पर विचार करने से एक तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इन व्रतों के द्वारा मनुष्य की उन वृत्तियों का नियंत्रण करने का प्रयत्न किया गया है, जो समाज में मुख्य रूप से वैर-विरोध की जनक हुआ करती हैं। दूसरी यह बात ध्यान देने योग्य है कि आचरण का परिष्कार सरलतम रीति से कुछ निषेधात्मक नियमों के द्वारा ही किया जा सकता है। व्यक्ति जो क्रियाएं करता है, वे मूलतः उसके स्वार्थ से प्रेरित होती हैं। उन क्रियाओं में कौन अच्छी है, और कौन बुरी, यह किसी मापदंड के निश्चित होने पर ही कहा जा सकता है। हिंसा, चोरी, झूठ, कुशील और परिग्रह, ये सामाजिक पाप ही तो हैं। जितने ही अंश में व्यक्ति इनका परित्याग करेगा, उतना ही वह सभ्य और समाज-हितैषी माना जायगा; और जितने व्यक्ति इन व्रतों का पालन करें, उतना ही समाज शुद्ध, सुखी और प्रगतिशील बनेगा। इन व्रतों पर जैन शास्त्रों में बहुत अधिक भार दिया गया है, और उनका सूक्ष्म एवं सुविस्तृत विवेचन किया गया है; जिससे जैन शास्त्रकारों के वैयक्तिक और सामाजिक जीवन के शोधन के प्रयत्न का पता चलता है। उन्होंने प्रथम तो यह अनुभव किया कि सब के लिये सब अवस्थाओं में इन व्रतों का एकसा परिपालन सम्भव नहीं है; अतएव उन्होंने इन व्रतों के दो स्तर स्थापित किये-अणु और महत् अर्थात् एकांश और सर्वांश। गृहस्थों की आवश्यकता और अनिवार्यता का ध्यान रखकर उन्हें इनका आंशिक अणुव्रत रूप से पालन करने का उपदेश किया; और त्यागी मुनियों को परिपूर्ण महाव्रत रूप से। इन व्रतों के द्वारा जिस प्रकार पापों के निराकरण का उपदेश दिया गया है, उसका स्वरूप संक्षेप में निम्न प्रकार है।

जैन धर्म और कला -

हुधा कहा जाता है कि जैन धर्म ने जीवन के विधान-पक्ष को पुष्ट न कर निषेधात्मक वृत्तियों पर ही विशेष भार दिया है। किन्तु यह दोषारोपण यथार्थतः जैन धर्म की अपूर्ण जानकारी का परिणाम है। जैन धर्म में अपनी अनेकान्त दृष्टि के अनुसार जीवन के समस्त पक्षों पर यथोचित ध्यान दिया गया है। अच्छे और बुरे के विवेक से रहित मानव व्यवहार के परिष्कार के लिये कुछ आदर्श स्थापित करना और उनके अनुसार जीवन की कुत्सित वृत्तियों का निषेध करना संयम की स्थापना के लिये सर्वप्रथम आवश्यक होता है। जैन धर्म ने आत्मा को परमात्मा बनाने का चरम आदर्श उपस्थित किया; उस ओर गतिशील होने के लिये अपने कर्म-सिद्धान्त द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को पूर्णतः उत्तरदायी बनाया और प्रेरित किया; तथा व्रत-नियम आदि धार्मिक व्यवस्थाओं के द्वारा वैयक्तिक, सामाजिक व आध्यात्मिक अहित करने वाली प्रवृत्तियों से उसे रोकने का प्रयत्न किया। किन्तु उसका विधान-पक्ष सर्वथा अपुष्ट रहा हो, सो बात नहीं। इस बात को स्पष्टतः समझने के लिये जैनधर्म ने मानव जीवन की जो धाराएं व्यवस्थित की हैं, उनकी ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। मुनिधर्म के द्वारा एक ऐसे वर्ग की स्थापना का प्रयत्न किया गया है जो सर्वथा निःस्वार्थ, निःस्पृह और निरीह होकर वीतराग भाव से अपने व दूसरों के कल्याण में ही अपना समस्त समय व शक्ति लगावे। साथ ही गृहस्थ धर्म की व्यवस्थाओं द्वारा उन सब प्रवृत्तियों को यथोचित स्थान दिया गया है, जिनके द्वारा मनुष्य सभ्य और शिष्ट बनकर अपनी, अपने कुटुम्ब की, तथा समाज व देश की सेवा करता हुआ उन्हें उन्नत बना सके। दया, दान व परोपकार के श्रावकधर्म में यथोचित स्थान का निरूपण जैन-चारित्र के प्रकरण में किया जा चुका है। जैन परम्परा में कला की उपासना को जो स्थान दिया गया है, उससे उसका यह विधान पक्ष और भी स्पष्ट हो जाता है।








धर्म वही है जिसमें अहिंसा को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो:-जैन दर्शन

Posted: 05 जून 2009

कल हमने तत्व-ज्ञान -जीव तत्व - के बारे मै पढा आज हम इससे आगे अपने ज्ञानसात करेगे।
जैन दर्शन

अहिंसा -
जीव-जगत् में एक मर्यादा तक अहिंसा की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। पशु-पक्षी और उनसे भी निम्न स्तर के जीव-जन्तुओं में अपनी जाति के जीवों को मारने व खाने की प्रवृत्ति प्रायः नहीं पाई जाती। सिंह, व्याघ्रादि हिंस्र प्राणी भी अपनी सन्तति की तो रक्षा ही करते हैं; और अन्य जाति के जीवों को भी केवल तभी मारते हैं, जब उन्हें भूख की वेदना सताती है। प्राणिमात्र में प्रकृति की अहिंसोन्मुख वृत्ति की परिचायक कुछ स्वाभाविक चेतनाएं पाई जाती हैं, जिनमें मैथुन, संतानपालन, सामूहिक जीवन आदि प्रवृत्तियां प्रधान हैं। प्रकृति में यह भी देखा जाता है कि जो प्राणी जितनी मात्रा में अहिंसकवृत्ति का होता है, वह उतना ही अधिक शिक्षा के योग्य व उपयोगी सिद्ध हुआ है। बकरी, गाय, भैंस, घोड़ा, ऊंट, हाथी आदि पशु मांसभक्षी नहीं हैं, और इसीलिये वे मनुष्य के व्यापारों में उपयोगी सिद्ध हो सके हैं। यथार्थतः उन्हीं में प्रकृति की शीतोष्ण आदि द्वन्द्वात्मक शक्तियों को सहने और परिश्रम करने की शक्ति विशेष रूप में पाई जाती है। वे हिंस्र पशुओं से अपनी रक्षा करने के लिये दल बांध कर सामूहिक शक्ति का उपयोग भी करते हुए पाये जाते हैं। मनुष्य तो सामाजिक प्राणी ही है; और समाज तबतक बन ही नहीं सकता जबतक व्यक्तियों में हिंसात्मक वृत्ति का परित्याग न हो। यही नहीं, समाज बनने के लिये यह भी आवश्यक है कि व्यक्तियों में परस्पर रक्षा और सहायता करने की भावना भी हो। यही कारण है कि मनुष्य-समाज में जितने धर्म स्थापित हुए हैं, उनमें, कुछ मर्यादाओं के भीतर, अहिंसाका उपदेश पाया ही जाता है; भले ही वह कुटुंब, जाति, धर्म या मनुष्य मात्र तक ही सीमित हो। भारतीय सामाजिक जीवन में आदितः जो श्रमण-परम्परा का वैदिक परम्परा से विरोध रहा, वह इस अहिंसा की नीति को लेकर। धार्मिक विधियों में नरबलि का प्रचार तो बहुत पहिले उत्तरोत्तर मन्द पड़ गया था; किन्तु पशुबलि यज्ञक्रियाओं का एक सामान्य अंग बना रहा। इसका श्रमण साधु सदैव विरोध करते रहे। आगे चलकर श्रमणों के जो दो विभाग हुए, जैन और बौद्ध, उन दोनों में अहिंसा के सिद्धान्त पर जोर दिया गया जो अभी तक चला आता है। तथापि बौद्धधर्म में अहिंसा का चिन्तन, विवेचन व पालन बहुत कुछ परिमित रहा। परन्तु यह
सिद्धान्त जैनधर्म में समस्त सदाचार की नींव ही नहीं, किन्तु धर्म का सर्वोत्कृष्ट अंग बन गया। अहिंसा परमो धर्मः वाक्य को हम दो प्रकार से पढ़ सकते हैं-तीनों शब्दों को यदि पृथक्-पृथक् पढ़ें तो उसका अर्थ होता है कि अहिंसा ही परम धर्म है; और यदि अहिंसा-परमो को एक समास पद मानें तो वह वाक्य धर्म की परिभाषा बन जाता है, जिसका अर्थ होता है कि-
धर्म वही है जिसमें अहिंसा को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो। समस्त जैनाचार इसी अहिंसा के सिद्धान्त पर अवलम्बित है; और जितने भी आचार सम्बन्धी व्रत-नियमादि निर्दिष्ट किये गये हैं, वे सब अहिंसा के ही सर्वांग परिपालन के लिये हैं। इसी तथ्य को मनुस्मृति (२, १५९) की इस एक ही पंक्ति में भले प्रकार स्वीकार किया गया है-
अहिंसयैव भूतानां कार्य श्रेयोऽनुशासनम्।
क्रमवार १०जुन को २००९

जैन-दर्शन का परिचय संक्षेप

Posted: 04 जून 2009



















तत्व-ज्ञान -
मस्त जैन-दर्शन का परिचय संक्षेप में इस प्रकार दिया जा सकता है। विश्व के मूल में जीव और अजीव ये दो मुख्य तत्व हैं। इनका परस्पर संपर्क पाया जाता है, और इस संपर्क के द्वारा ऐसे बन्धनों या शक्तियों का निर्माण होता है, जिनके कारण जीव को नाना प्रकार की दशाओं का अनुभव होता है। यदि यह संपर्क की धारा रोक दी जाय, और उत्पन्न हुए बन्धनों को जर्जरित या विनष्ट कर दिया जाय, तो जीव अपनी शुद्ध, बुद्ध व मुक्त अवस्था को प्राप्त हो सकता है। ये ही जैन दर्शन के सात तत्व हैं, जिनके नाम हैं-जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष। जीव और अजीव, इन दो प्रकार के तत्वों का निरूपण जैन तत्वज्ञान का विषय है। आस्रव और बंध का विवेचन जैन कर्म-सिद्धान्त में आता है, और वही उसका मनोविज्ञान-शास्त्र है। संवर और निर्जरा चारित्र विषयक हैं, और यही जैन धर्म गत आचार-शास्त्र कहा जा सकता है, तथा मोक्ष जैन-धर्मानुसार जीवन की वह सर्वोत्कृष्ट अवस्था है जिसे प्राप्त करना समस्त धार्मिक क्रिया व आचरण का अन्तिम ध्येय है। यहां जैन दर्शन की इन्हीं मुख्य शाखाओं का क्रमशः परिचय व विवेचन करने का प्रयत्न किया जाता है।

जीव तत्व -
संसार में नाना प्रकार की वस्तुओं और उनकी अगणित अवस्थाओं का दर्शन होता है। दृश्यमान समस्त पदार्थों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-चेतन और अचेतन। पदार्थों की चेतनता का कारण उनमें व्याप्त, किन्तु इन्द्रियों के अगोचर, वह तत्व है, जिसे जीव या आत्मा कहा गया है। प्राणियों के अचेतन तत्व से निर्मित शरीर के भीतर, उससे स्वतंत्र इस आत्मतत्व के अस्तित्व की मान्यता यथार्थतः भारतीय तत्वज्ञान की अत्यन्त प्राचीन और मौलिक शोध है, जो प्रायः समस्त वैदिक व अवैदिक दर्शनों में स्वीकार की गई है, और यह मान्यता समस्त भारतीय संस्कृति में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सुप्रतिष्ठित पाई जाती है। केवल एकमात्र चार्वाक या बार्हस्पत्य दर्शन ऐसा मिलता है जिसमें जीव या आत्मा की शरीरात्मक भौतिक तत्वों से पृथक् सत्ता नहीं मानी गई। इस दर्शन के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, जैसे जड़ पदार्थों के संयोग-विशेष से ही वह शक्ति उत्पन्न होती है, जिसे चैतन्य कहा जाता है। यथार्थतः प्राणियों में इन जड़ तत्त्वों के सिवाय और कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो कोई अपनी पृथक् सत्ता रखती हो, प्राणियों की उत्पत्ति के समय कहीं अन्यत्र से आती हो, अथवा शरीरात्मक भौतिक संतुलन के बिगड़ने से उत्पन्न होनेवाली अचेतनात्मक मरणावस्था के समय शरीर से निकलकर कहीं अन्यत्र जाती हो। इस दर्शन के अनुसार जगत् में केवल एकमात्र अजीव तत्व ही है। किन्तु भारतवर्ष में इस जड़वाद की परम्परा कभी पनप नहीं सकी। इसका पूर्णरूप से प्रतिपादन करनेवाला कोई प्राचीन ग्रन्थ भी प्राप्त नहीं हुआ। केवल उसके नाना अवतरण व उल्लेख हमें आत्मवादी दार्शनिकों की कृतियों में खंडन के लिये ग्रहण किये गये प्राप्त होते हैं; तथा तत्वोपप्लवसिंह जैसे कुछ प्रकरण ऐसे भी मिलते हैं, जिनमें इस अनात्मदर्शन की पुष्टि की गई है।
बौद्धदर्शन आत्मवादी है या अनात्मवादी, यह प्रश्न विवादग्रस्त है। बुद्ध के वचनों से लेकर पिछले बौद्धाचार्यों की रचनाओं तक में दोनों प्रकार की विचारधाराओं के पोषक विचार प्राप्त होते हैं। इसमें एक ओर आत्मवाद अर्थात् जीव की सत्ता की स्वीकृति को मिथ्यादृष्टि कहा गया है; जीवन की प्रधारा को नदी की धारा के समान घटना-प्रवाह रूप बतलाया गया है; एवं निर्वाण की अवस्था को दीपक की उस लौ की अवस्था द्वारा समझाया गया है, जो आकाश या पाताल तथा किसी दिशा-विदिशा में न जाकर केवल बुझकर समाप्त हो जाती है।
यथा-दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम्।
दिशं न कांचित् विदिशं न कांचित् स्नेहक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ।।
जीवो तथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम्।
दिशं न कांचित् विदिशं न कांचित् क्लेशक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ।।
दूसरी ओर यह भी स्वीकार किया गया पाया जाता है कि जीवन में ऐसा भी कोई तत्व है जो जन्म-जन्मान्तरों में से होता हुआ चला आता है; जो शरीररूपी घर का निर्माण करता है; शरीर-धारण को दुःखमय पाता है, और उससे छूटने का उपाय सोचता और प्रयत्न करता है; चित्त को संस्कार रहित बनाता और तृष्णा का क्षय कर निर्वाण प्राप्त करता है; यथा-
अनेक-जाति-संखारं संधाविस्सं अनिब्बिसं।
गहकारकं गवेसंतो दुक्खा जाति पुनप्पुनं ।।
गहकारक दिट्ठोसि पुन गेहं न काहिसि।
सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसंखितं।
विसंखारगतं चित्तं तण्हा मे खयमज्झगा ।।

(धम्मपद, १५३-५४)
यहां स्पष्टतः भौतिक शरीर के अतिरिक्त आत्मा जैसे किसी अन्य अनादि अनन्त तत्व की स्वीकृति का प्रमाण मिलता है।

जैनधर्म "कभी किसी संकुचित दृष्टि का शिकार नहीं बना।"

Posted: 03 जून 2009
मैं समझता हूं इसी धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण से प्रेरित होकर परिषद् ने मुझे इन व्याख्यानों के लिये आमंत्रित किया है, और उसी दृष्टि से मुझे जैनधर्म का भारतीय संस्कृति को योगदान विषयक यहां विवेचन करने में कोई संकोच नहीं। ध्यान मुझे केवल यह रखना है कि इस विषय की यहां जो समीक्षा की जाय, उसमें आत्म-प्रशंसा व परनिंदा की भावना न हो,

जैनधर्म अपनी विचार व जीवन संबंधी व्यवस्थाओं के विकास में कभी किसी संकुचित दृष्टि का शिकार नहीं बना। उसकी भूमिका राष्ट्रीय दृष्टि से सदैव उदार और उदात्त रही है। उसका यदि कभी कहीं अन्य धर्मों से विरोध व संघर्ष हुआ है तो केवल इसी उदार नीति की रक्षा के लिये। जैनियों ने अपने देश के किसी एक भाग मात्र को कभी अपनी भक्ति का विषय नहीं बनने दिया। यदि उनके अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर विदेह (उत्तर बिहार) में उत्पन्न हुए थे, तो उनका उपदेश व निर्वाण हुआ मगध (दक्षिण बिहार) में। उनसे पूर्व के तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म हुआ उत्तरप्रदेश की बनारस नगरी में; तो वे तपस्या करने गये मगध के सम्मेदशिखर पर्वत पर। उनसे भी पूर्व के तीर्थंकर नेमिनाथ ने अपने तपश्चरण, उपदेश व निर्वाण का क्षेत्र बनाया भारत के पश्चिमी प्रदेश काठियावाड को। सब से प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ का जन्म हुआ अयोध्या में और वे तपस्या करने गये कैलाश पर्वत पर। इस प्रकार जैनियों की पवित्र भूमि का विस्तार उत्तर में हिमालय, पूर्व में मगध, और पश्चिम में काठियावाड तक हो गया। इन सीमाओं के भीतर अनेक मुनियों व आचार्यों आदि महापुरुषों के जन्म, तपश्चरण, निर्वाण आदि के निमित्त से उन्होंने देश की पद पद भूमि को अपनी श्रद्धा व भक्ति का विषय बना डाला है। चाहे धर्मप्रचार के लिये हो और चाहे आत्मरक्षा के लिये, जैनी कभी देश के बाहर नहीं भागे। यदि दुर्भिक्ष आदि विपत्तियों के समय वे कहीं गये तो देश के भीतर ही, जैसे पूर्व से पश्चिम को या उत्तर से दक्षिण को। और इस प्रकार उन्होंने दक्षिण भारत को भी अपनी इस श्रद्धांजलि से वंचित नहीं रखा। वहां तामिल के सुदूरवर्ती प्रदेश में भी उनके अनेक बड़े बड़े आचार्य व ग्रंथकार हुए हैं, और अनेक स्थान उनके प्राचीन मंदिरों आदि के ध्वंसों से आज भी अलंकृत हैं। कर्नाटक प्रांत में श्रवणबेलगोला व कारकल आदि स्थानों पर बाहुबलि की विशाल कलापूर्ण मूर्त्तियाँ आज भी इस देश की प्राचीन कला को गौरवान्वित कर रही हैं। तात्पर्य यह कि समस्त भारत देश, आजकी राजनैतिक दृष्टिमात्र से ही नहीं, किंतु अपनी प्राचीनतम धार्मिक परम्परानुसार भी, जैनियों के लिये एक इकाई और श्रद्धाभक्ति का भाजन बना है। जैनी इस बात का भी कोई दावा नहीं करते कि ऐतिहासिक काल के भीतर उनका कोई साधुओं या गृहस्थों का समुदाय बड़े पैमाने पर कहीं देश के बाहर गया हो और वहां उसने कोई ऐसे मंदिर आदि अपनी धार्मिक संस्थायें स्थापित की हों, जिनकी भक्ति के कारण उनके देशप्रेम में लेशमात्र भी शिथिलता या विभाजन उत्पन्न हो सके। इसप्रकार प्रान्तीयता की संकुचित भावना एवं देशबाह्य अनुचित अनुराग के दोषों से निष्कलंक रहते हुए जैनियों की देशभक्ति सदैव विशुद्ध, अचल और स्थिर कही जा सकती है।
जैनधर्म मूलतः आध्यात्मिक है, और उसका आदितः सम्बन्ध कोशल, काशी, विदेह आदि पूर्वीय प्रदेशों के क्षत्रियवंशी राजाओं से पाया जाता है। इसी पूर्वी प्रदेश में जैनियों के अधिकांश तीर्थंकरों ने जन्म लिया, तपस्या की, ज्ञान प्राप्त किया और अपने उपदेशों द्वारा वह ज्ञानगंगा बहाई जो आजतक जैनधर्म के रूप में सुप्रवाहित है। ये सभी तीर्थंकर क्षत्रिय राजवंशी थे। विशेष ध्यान देने की बात यह है कि जनक के ही एक पूर्वज नमि राजा जैनधर्म के २१ वें तीर्थंकर हुए हैं। अतएव कोई आश्चर्य की बात नहीं जो जनक-कुल में उस आध्यात्मिक चिंतन की धारा पाई जाय जो जैनधर्म का मूलभूत अंग है।
यह भी देखे

जैन समाज बाल दीक्षा किसी प्रकार का अपराध नही है- मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रट

Posted: 10 मई 2009















कल से आगे कि कडी देखे जैन बाल-दीक्षा पर भारतीय कानुन ने क्या कहॉ ?...उत्सक प्रशनकारीयो के लिऐ समाधान है यह, ताकी वे समझे,  अपने धर्म के साथ साथ दुसरो कि आस्था का सम्मान करे। अपने साथ-साथ मित्रो का सम्मान करे, मित्र धर्म का पालन करे। आमन्त्रित मेहमान का स्वागत कैसे करे ?...  यह मनुष्य जीवन मे शायद सिखने सीखाने वाली बात नही है। जैन धर्म के साथ सभी धर्म आदरणीय है..... सम्मान रुप से आस्था के बिन्दु है। इसके लिऐ हमे उन्हे पढना होगा समझना होगा। तभी हम सभी खुश रह सकते है और दुसरो के भरोसे के लायक बन सकते है- गीतासार


२१ अगस्त २००७ सभी प्रतिषठित पत्रो के मुखपृष्ठ पर बाल दीक्षा विरोधि याचिका खारिज करने का समाचार प्रमुखता से छपा था।  जी टीवी, आज-तक आदि, चैनलो ने भी इसे प्रमुखता से प्रसारित किया। इस सन्दर्भ मे आचार्य श्री महाप्रज्ञ का विशेष साक्षात्कार राजस्थान-पत्रिका के सम्पादक मिलापजी कोठारी ने लिया. उसे सन्दर्भ के तोर पर यहॉ उद्धृत किया जा रहा है।
" मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रट उदयपुर जिला गोगुन्दा स्थित सेमड गॉव मे जैन समाज के चार बालको को दीक्षा देने के मामले की सुनवाई पुरी करते हुऐ अपने फैसले मे कहा-" बाल दीक्षा किसी प्रकार का अपराध नही है। ।" इस फैसले के साथ ही अदालत ने वाद को खारिज कर दिया। 
और आरोपित किए गए पक्ष को छूट दि है कि वह वाद दायर करने वाले अधिवक्ताओ के खिलाफ कार्वाही करने के लिऐ स्वतन्त्र है।"

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रट श्री बृजेन्द्र कुमार ने १४ से १५ पृष्ठ के अपने फैसले मे कहा-
"जैन धर्म मे बालको को दीक्षा दिलवाना किशोर न्याय अधिनियम या अन्य किसी भी भारतीय कानुन के तहत अपराध नही है, बल्कि यह पुर्णतया जैन धर्म कि  परिपाटि है। प्रत्येक नागरिक को भारतीय सविधान के अनुच्छेद २५ के तहत अपने धर्म को मानने और धार्मिक कार्य करने का मुल अधिकार प्राप्त है। कोई भी कानुन या व्यक्ती उसे रोक नही सकता है।"

न्यायलय ने अपने निर्णय से सविधान के प्रावधानो एव उच्च न्यायालय , सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टान्तो की व्याख्या करते हुऐ  यह निर्णय किया-
"किसी के घर जाकर भोजन लेना-यह जैन धर्म मे भोजन ग्रहण करनी करने की धार्मिक परिपाटि है। इसे भिक्षावृति कहने से जैन धर्मावलम्बियो का अपमान होता है। जैन आचार्यो के सरक्षण  मे बच्चो को भेजना किसी भी प्रकार से बच्चो को लावारिस छोड देने कीश्रैणी मे नही आता॥"


दीक्षा भारतीय सस्कृति का प्राणतत्व है। वह आदिकाल से चली आ रही है। जब प्रबल वैराग्य हो जाऐ तभी दीक्षा ली जा सकती है। इससे आयु का कोई बन्धन नही होता।

न्यायाधीश ने यह माना- परिवादी पेशे से वकील है। उनकी विधिक एवम नैतिक जिम्मेदारी थी कि वे वाद दायर करने से पुर्व जैन धर्म एवम जैन साहित्य का अध्यन करते। उनके द्वारा बिना पुर्व सावधानी वाद पेश करने से स्पष्ट है कि उक्त अधिवक्ताओ ने स्वय को प्रचारित प्रसारित करने कि मशा रखी।

उल्लेखनीय है  २ मई २००७ को सेमड (राजस्थान) मे चार बालको कि दीक्षा सम्पन्न हुई थी। अधिवक्ता हुकुमराज सिह राणावत एवम कन्हैयालाल टॉक ने बालको के माता पिता, नाना, आचार्य महाप्रज्ञ, युवाचार्य मुदितकुमारजी, साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभाजी एवम जैनसभा सेमड के पदाधिकारीओ को मुल्जमी बताते हुऐ फोजदारी प्रकरण पेश किया था श्री श्वेताम्बर तेरापथी महासभा ने तेरापन्थ समाज की और से वरिष्ट अधिवक्ता श्री कन्हैयालालाजी चोरडीयॉ को पैरवी के लिऐ अपनी और से वकील नियुक्त किया था।


बाल दीक्षा पर  शायद और अधिक कुछ लिखने कि जरुरत महसुस नही होती है। क्यो कि भारतीय कानुन, भारतीय प्रशासन, भारतिय सस्कृती इसबात कि ठोस पैरवी करती है कि बस और नही ।

मैने श्री रुपेशजी के सावलो का समाधान इमनदारी से पेश करने कि कोशिश कि है जिसमे सारे ही ठोस सन्दर्भो के साथ भारतीय न्यायालय के फैसले को भी मेरे अन्य जैन- अजैन जिज्ञासुओ के लिऐ पेश किया।

जय जिनेन्द्र

जैन बाल दिक्षा के ओचित्य पर आज डा.रूपेश श्रीवास्तव का सवाल

Posted: 09 मई 2009












डा.रूपेश श्रीवास्तव ने एक प्रशन भेजा।

प्रशन:- हाल ही में उठे बच्चों को बचपन में ही दीक्षा देने के कानूनी विवाद का संदर्भ लेकर अवश्य लिखिये प्रतीक्षा रहेगी
महामहीम आचार्य महाप्रज्ञ के  सन्देश
महामहिम राष्ट्रपति डॉ,कलाम के पुछे बाल मुनि के प्रशन उत्तर के हवाले
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रट उदयपुर  के ऐतिहासिक फैसेले को लोगो कि जानकारी के लिऐ, माध्यम बनाया गया इसका प्रसारण "हे प्रभू यह तेरापन्थ" द्वारा प्रसारित एवम डॉ रुपेश श्री वास्तव एवम अन्य मित्रो के सवाल एवम उसके समाधान हेतू -आभार
जय जिनेन्द्र


इस पर सबसे पहले हम महामना आचार्य महाप्रज्ञजी के विचार आम जन के समाधान हेतु प्रसारित कर रहे है।
आचार्य महाप्रज्ञ -"बाल दीक्षा या वृद्ध दीक्षा के विचार अलग अलग है, अनुभव अलग है। विचार तो यह है कि छोटा बालक क्या समझता है ? क्या दीक्षा लेगा ? अनुभव यह कहता है कि दीक्षा के लिये जो समय चाहिऐ वह शायद बालक मै अच्छी होती है। बूढे मे कमजोर होती है क्यो कि मै देख रहा हू कि हमारी (तेरापन्थ घर्म सघ) आचार्य परम्परा मे आचार्य तुलसी ११-१२ वर्ष मे दीक्षित हुये। मै साढे दस वर्ष की अवस्था मे दीक्षित हुआ। हमारे पुज्य गुरुवर कालुगुणी जी भी १०-१२ मे दीक्षित हुऐ। आचार्य मघवागणी, एवम चोथे आचार्य जयचार्यजी भी जो शक्ती शाली आचार्य हुऐ  नो वर्ष कि आयु मे दीक्षा ली। तो अनुभव यह है केवल बोद्धिक दृष्टि से देखते है तो कहते है छोटा बालक  क्या समझताहै,,,,, दुसरा तर्क यह भी है वैदिक आचार्यो ने, जैन आचार्यो ने दिया है कि कपडे को मैला करके धोने की अपेक्षा कपडे को मेला ही न करे,गन्दा भी न बने तो रागात्मक सस्कार एक युवा है, बडी अवस्था मे है, रागात्मक सस्कार बढ गऐ तो उन्हे तोडना बहुत मुश्किल है। जिनके नही बढे वे तो अलिप्त है। अनुभव और परम्परा के तो अलग - अलग बयान है तथा बोद्धिक ता के स्थर पर सोचने वाले अलग बोलते है ये तो अपना स्तर है।"
आचार्य महाप्रज्ञ  (प्रज्ञा कि यात्रा)

दिनाक १४ फरवरी २००३ को भारत के महामहिम राष्ट्रपति डॉ,कलाम ने तेरापन्थ भवन कान्दिवली मे अचार्य महाप्रज्ञजी के दर्शन किऐ। मुम्बई हवाई अड्डे से सिधे आचरप्रवर के चरणो मे पहुचे। आचार्य श्री से वार्तालाप समाप्त हुई राष्ट्रिपती जैसे ही खडे हुऐ , अनेक बाल मुनि कक्ष मे आ गये। राष्ट्रपति  महोदय  बाल मुनियो के बीच मे चले गये। मुनि मुदित, मुनि महावीर,मुनि मनन, आदि प्रसन्न चेहरो पर दृष्टिपात करते हुए राष्ट्रपति ने बाल मुनियो से पुछा कि-" आप प्रसन्न रहते है। आपकी प्रसन्नता का रहस्य क्या? " बाल मुनि मनन कुमारजी ने कहा-" कि मै साधू हू इसलिऐ प्रसन्न हू।" बाल मुनि मनन कुमारजी  ने कहा-" यह आचार्यवर के आशीर्वाद का फल है।" बाल मुनि के इस उत्तर राष्ट्रपति  महोदय  प्रभावित हुऐ। और एक अग्रेजी कविता भी सिखाई। १४ फरवरी को तेरापन्थ भवन शाम को आऐ राष्ट्रपति  महोदय   १५ फरवरी तक यही रुके।

कल आप पढे इसका भारतीय कानुनी पहलू क्रमश: कल भी जारी॥

जैन हिन्दु है? - हिन्दु शब्द देश या राष्ट्र का वाचक है। वह किसी धर्म का वाचक नही है।

Posted: 26 अप्रैल 2009


कुछ जैन प्रेमियो ने जिज्ञासा जाताई थी जैन धर्म के बारे मे। लगता है सात्विक मन से कुछ प्रशन रखे थे जैन परम्परा को एवम जैन धर्म हिन्दू धर्म से अलग कैसे ? के बारे मे जानने को इच्छुक लगे।

दोस्तो पुर्णतया जानना चाहते होगे कि जैन धर्म क्या है ? उसके मत क्या है? यह सभी जानने के लिऐ आपको और हमको इतिहास के ज्ञान कि जरुरत पडेगी अथवा शास्त्रार्थ कि, और उसके लिऐ आपको और हमे महापुरुषो कि चरण मे जाना होगा।

हमारे अजिज मित्र से, उनके एक मित्र ने उनसे कुछ प्रशन पुछे थे वो सवालो का समाधान हे प्रभु से चाहते है, हालाकि यह आलेख इससे पुर्व हमारे सहवर्ती ब्लोग मुम्बई टाईगर पर प्रसारीत हो चुका है। उसे फिर से हे प्रभु पर प्रसारीत करने का मुल कारण यह सवेदनपुर्व सवाल था और तथ्यो से फिर से अवगत कराना।

क्या जैन हिन्दु है?

धुनिक युग मे धर्म का वर्गीकरण सनातन, वैष्णव, जैन्, बोद्ध,शैव,शाक्त, आदि रुपो मे रहा। हिन्दु धर्म कि व्याख्या वैदिक धर्म के रुप मे की गई, तब जैन, बोद्ध्,शैव्,सिख आदि उस धारा से भिन्न हो गऐ।

हिन्दु शब्द अगर राष्ट्र और जातिवाचक रहे तो जैन, बोद्ध,आदि सभी हिन्दु शब्द के द्वारा वाच्य हो सकते है। किसी के सामने कोई उलझन नही होनी चाहिए।

आचार्य श्री तुलसी ने एक बार कहा था -"हिन्दुस्थान मे रहने वाला प्रत्येक नागरिक हिन्दु है। धर्म और महजब कि दृष्टि से भले ही वह ईसाई हो, इस्लाम का अनुयायी हो,पारसी अथवा और कोई भीहो।

"हिन्दु धर्म"इस शब्द ने हिन्दुत्व को सकुचित बना दिया है।

आचार्य श्री तुलसी से पुना के कुछ पण्डितो ने पुछा-"जैन हिन्दु है या नही?'

आचार्य श्री ने उत्तर मे कहा-" यदि आप हिन्दु का अर्थ वैदिक परम्परा का अनुयायी से करते है तो जैन हिन्दु नही है और यदि आप हिन्दु का अर्थ राष्ट्रीयता से है तो जैन हिन्दु है।"


हे प्रभु यह तेरापंथजी,

"मेरे एक मित्र द्वारा पुछा गया-" तीन छोटे सवाल जो कि मुझसे करे गए थे परन्तु मेरे पास उत्तर नहीं था अब आपसे जान सकता हूं---
. भारत के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दस जैन क्रान्तिकारियों के नाम बताइये।
.मुसलमान कुरान शरीफ़,हिन्दू भगवदगीता, क्रिस्तान बाइबिल की अदालतमें सत्य बोलने के लिये शपथ लेते हैं जैन किस ग्रन्थ की शपथ लेते हैं यदि भगवदगीता की ही शपथ लेते हैं तो क्यों हिंदुओं से अलग मानते हैं खुद को?
.www.jagathitkarni.org नामक वेबसाइट चलाने वाले क्या कह् रहे हैं और कोई इनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं करवाता? मेहरबानी करके इन शंकाओं का समाधान करें।"


१. पहली बात का जवाब=" स्वाधीनता संग्राम से जुड़े दस जैन क्रान्तिकारियों के नाम जिसने आपसे पुछा उसके पिछे उनकी भावना क्या रही होगी ? यह मै नही जानता हू। ना ही इस बात से यह साबीत होता है कि जैन जाती में डरपोक किस्म के लोग है। और लोगो को ऐसा प्रशन करने कि आवश्यकता ही क्यो पडी ? समझ के परे है

चुकि मै जैन हू सत्य अहिसा, अस्तेय सयम्, सेवा के सिद्धान्तो कि पालना करता हू इसलिऐ मेरा फर्ज होता है जिन लोगी ने भी आपसे इसे सवाल किए उनको अच्छे मन से सन्तुष्ट करु।

सैकडो जैनी है जिन्होने स्वाधीनता संग्राम मे जेल भी गऐ और बलिदान भी दिया। गुजरात महाराष्ट्र्, राजस्थान्, मध्यप्रदेश बिहार अन्य क्षैत्रो से जैनी लोगो ने स्वाधीनता संग्राम मे हिस्सा लिया। पुरुषो को छोडो महिलाओ ने भी इस मे भाग लिया।

रिषब दास राकॉ ( कई जैल यात्राऐ एवम मात्मा गान्धी विनोबा के साथ कई वर्ष रहे,) रमणीक् मेहता, (तीन बार जैल) अमर शहिद हुकमिचन्द जैन ने (बिहार हिसार के कानुगा परिवार से ) १८५७ कि क्रान्ति मे तात्या टोपे के साथ कुद पडे। १८ जनवरी १८५८ को लालाजी को फॉसी पर लटका दिया। अग्रेजो कि कृरता तो देखिऐ लालाजी के भतिज फकिरचन्दजी जैन जिसे अदालत ने रिहा कर दिया था उसे भी पकडकर फॉसी दे दी गई। लाला हुकमिचन्द के नाम से हासी मे एक पार्क भी बनाया है।

अमर शहीद अमरचन्द बॉठीयॉ (तत्कालिन गवालियर राज्य के कोषा अध्यक्ष) रानी लक्ष्मीबाई कि क्रान्ति सेना मे शामिल हुऐ।२२ जून १८५८ को ग्वालियर मे ही अग्रेजो ने राष्ट्र द्रोह का सवाग रचके भिड भरे सर्फा बाजार मे पेड से लटकाकर अमरचन्द बॉठीयॉ को फॉसी दे दी। इस तरह मोहन राज जैन ( बाली पुर्व विधायक्) मुलचन्द डागा ( २ बार सॉसद पाली से ) सहीत हजारो जैन लोगो है से इस लडाई मे शामिल हुऐ थे।

"जैन ही क्यो पुरा देश ईस लडाई मे भाग लिया। जिन्होने किसी न किसी रुप मे स्वाधीनता संग्राम मे अपना योगदान दिया, जैल गये, फॉसी पर लटक गऐ, ऐसे महान सपुतो को मै और पुरा देश सलाम

करता है ।"


. आपके दुसरे सवाल का जवाब इस तरह से दुगा- भारत का अन्य देश के साथ युद्ध हो रहा हो भारत कि जीत हो जाती है पुरा देश खुशी से झुमता है तब आप कहते हो -

" आपभी ( जैन्, सिख, इसाई) खुश लगते हो, तो हिन्दु क्यो नही बन जाते ?

भाईसाहब -"इस खुसी में अर्थ राष्ट्रीयता से है......

अरे भाई गीता जब रची गई उसमे कोई हिन्दु या जैन का उलेख नही है, भगवतगीता मे जो कहा गया वो हे "सर्वे जना: सुखिना भवन्तु" सभी सुख से रहे यही मुल मन्त्र का जैनो मे अर्थ दिया गया-

"जियो और जिने दो"

"बाकी इसका सम्पुर्ण ज्ञान ससार के महान विदुषक, ज्ञाता धाता, महान सन्त ७८ वर्षो से साधुत्व का पालन करने

वाले महान योगी पुरुष आचार्य महाप्रज्ञ जी के विचार भी लोगो को पढने चाहीऐ तब साफ हो जाता है"


जैन कोन ?

"आज जिस भूख खण्ड का नाम हिन्दुस्थान है, प्राचीन काल मे उसे भारत या भारतवर्ष कहा जाता था।
ऋषभपुत्र भरत
के नाम पर भारत नामकरण हुआ। पारस (वर्तमान ईरान्) आदि मध्य एशियाई देशो के सम्पर्क के कारण इसका नाम हिन्दु देश प्रचलित हुआ।
आचार्य कालक ने कहा- " आओ ! हम हिन्दु देश चले-एहि हिन्दुकदेशम वच्चामो। "
यह निशीथ चूर्णि का प्रयोग है। भारतीय साहित्यो के उलेखो मे यह सबसे प्राचीन है। पारसी सम्राट द्वारा महान(छठी शताब्दी ई,पू,) के अभिलेखो मे सिन्धु प्रदेशो के लिऐ हिन्दु शब्दो का प्रयोग मिलता है। जैसे राजस्थान आदि कुछ प्रदेशो मे "स" का उच्चारण "ह" किया जाता है वैसे प्राचीन फारसी बोली मे भी "स" का उच्चारण "ह्" होता था। फारसी लोग "सप्तसिन्धु" का उच्चारण हप्तहिन्दु" कहते थे।

मुल प्रकृति के अनुशार हिन्दु शब्द देश या राष्ट्र का वाचक है।

वह किसी धर्म का वाचक नही है।

भारत मे धर्म की दो धाराये प्रवाहित रही - श्रमणऔर वैदिक। श्रमण परम्परा का तन्त्र क्षत्रियो के हाथ था, वैदिक परम्परा का सुत्र धार ब्राहृमणो वर्ग था। साख्य, जैन, बोद्ध और आजिवक- ये सभी श्रमण परम्परा के धर्म है। मीमास, वेदान्त-ये वैदिक परम्परा के धर्म है। हिन्दु नाम का कोई भी प्राचीन धर्म नही है। मुसलमानो के आगमन के बाद हिन्दु और मुसलमान पक्ष और प्रतिपक्ष बन गये। प्राचीन काल मे श्रमण ब्राहृण पक्ष प्रतिपक्ष हुआ करते थे। इसका उल्लेख सस्कृत व्याकरणकारो ने उल्लेखित किया है। एक श्रमण ब्राहृण धर्म मे दिक्षित हो जाता है और एक ब्राहृण श्रमण धर्म मे दिक्षित हो जाता, उसे कोई जाति परिवर्तन नही होता।

प्रस्तुत है आचार्य महाप्रज्ञ जी के विचार

(पुस्तक लोकतन्त्र - नया व्यक्ती नया समाज }

पका ३. सवाल www.jagathitkarni.org नामक॥॥॥॥॥।

www.jagathitkarni.org के बारे मे चर्चा करना हमारा लक्ष्य नही।

आपका आभार मेरे मित्र , जहॉ तक हो सका मेने समाधान कि कोशिश कि अगर भुल चुक हुई हो तो क्षमा करे।





समन्दर पार: जैन धर्म की जय जयकार

Posted: 22 अप्रैल 2009

हम जैन तीर्थंकरो के विदेश विहार कि बात कि थी आज हम श्रावको के विदेश प्रवास पर चर्चा करने जा रहे है।

गत बीस वर्षो से जैन धर्म का प्रसार-पचार एवम प्रभावना के कार्यक्रम पूरे विश्व मे जोर शोर से व बडे ही सुन्दर ढग से हो रहे है। इसके दो मुख्य कारण जो ज्ञात हो रहे है वे है- एक तो वहॉ के लोगो मे भारतीय सस्कृति कि पुर जोर मॉग, दुसरा कारण प्रवासी भारतीयो की एकरुपता एवम प्रभावशाली कार्यशैली। विदेशो मे बसने वाले जैनो मे साम्प्रदायिकतावाली भावनाऐ नही है। तेरापन्थ, दिगम्बर, मुर्तिपुजक, स्थानकवासी, श्रीमद राजचन्द्र सभी मिल जुलकर जैन धर्म का मान सम्मान बढा रहे । अपितु अपने अपने ढग से साधना भी कर रहे है। ब्रिटेन, अफ्रिका, कनाडा, जर्मनी, बेलजियम, अमेरिका, सहित युरोप के कई देशो मे अप्रवासी भारतीय जैन रहते है। अकेले पुरे ब्रिटेन मे लगभग ४५००० जैनो कि बस्ती है। मोबासा, नैरोबी, तथा जापान के कोबा शहर और ब्रिटेन के लेस्टर मे शिखरबन्द जैन मन्दिर है। लेस्टर मे चार हिन्दु मन्दिर्, छ मस्जिद, और गुरुद्वारा भी है। "विश्व जैन कॉग्रेस", "जैन समाज," 'युरोप,एवम जैन,' "सोश्यल ग्रुप फडरेशन्", "वर्ल्डफोरम ऑफ जैन्स" सहीत कई सस्थाऐ कार्यरत है। उत्तरी अमेरिका, केलिफोनिया मे भी जैनो का अच्छा प्रसार और पभाव है। यह तो हूई बडी-बडी सस्थाओं कि बात। विशेष आज दो ऐसे कार्यकर्ताओ से मिलवाना चाहता हू , जिनका मै फैन हू। दोनो ही अपने अपने क्षैत्र मे एक सख्सीयत रखते है। और जैन समाज से सम्बन्ध रखते है। अपने अपने ढग से अपनी सेवाऐ समाज परिवार और सगंठ्न को दे रहे है। ,

ईसी कडी मे सबसे पहले है:-लावण्याजी





लावण्याजी किसी परिचय कि मोहताज नही है वे भारत के महसुर कविवर पँडित नरेद्रजी शर्मा कि बेटी है।
आपकी माताजी का नाम श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा हैं।
पँडित नरेद्रजीजी शर्मा फिल्म सत्यम शिवम सुन्दरम के गीतकार है।
डा. हरिवँश राय बच्चन के सहयोगी मित्र थे। शर्माजी ने राम चरित मानस पर गायक मुकेश के साथ काम किया। लावण्या जी १२ वर्ष कि थी, तभी से महसुर गायक मुकेशजी को जानती थी।
लता मगेशकर तो एक बार लावण्याजी को विदेशी कपडो मे देखा तो लता दीदी ने नाराज होकर लावण्याजी से कह
दिया पुरी विदेशी हो गई लावण्या। लावण्याजी को साडीयों का शोक है। लावण्याजी को मुकेशजी का यह गाना
"मेरे मेहबुब मेरे मेहबुब तू है तो दुनिया कितनी हसी है" बहुत पसन्द है।
स्व।पँडित नरेन्द्र शर्मा तथा अन्य कर्मठ साथियोँ की मेहनत से लगाया ये "विविध ~ भारती" रेडियो स्टेसन आज बडा पेड बन चुका है। डा। हरिवँश राय बच्चन को ताऊजी, उनकी धर्मपत्नी को "तेजी आँटी, लताजी, को दीदी, कृष्णा, राज कुपर को अकल-आन्टी पुकारने वाली लावण्याजी स्वय कविकार है।
उनकी कविता-पुस्तक "पिडघा उठा प्रवासी" भी प्रकासित हुई है। लावण्याजी का बच्चपन मुम्बई के खार बान्द्रा ईलाके मे बीता।
लावण्याजी का विवाह जैन परिवार के दिपकजी से हुआ अब दोनो ही उत्तरी अमेरिका मे कई वर्षो से प्रसन्नता से रह रहे है। दीपकजी १९७४ से लेकर १९७६ तक एन्जीलीस शहर मेँ रहा करते थे.दीपकजी अपनी उच्च शिक्षा इसी अमेरीकि शहर मे रहकर पूरी की।
लावण्याजी दो हिन्दि ब्लोग कि मोडर्टर है-लावण्यम्` ~अन्तर्मन्`और अन्तर्मन........
मैने देखा है कि लावण्याजी जो ब्लोग लिखती है, अपनी सन्तुष्टि के लिऐ, अपने लिऐ लिखती है।जबकी ओर लोग, लोगो के लिऐ औरो के लिऐ लिखते है।
हे-प्रभु, पर लावाण्याजी का परिचय कि एक मुख्य वजह थी कि वो जैन धर्म के सम्बन्ध मे Sunday, April 12, 2009
ये देस है या परदेस है ! नाम से उन्के ब्लोग पर पोस्ट छपी थी। आप देखे लिन्क पर किल्क करे।
आप भी शायद जानते होंगें " नवकार मंत्र " के बारे में ,
ये जैन धर्म का पवित्र मंत्र है।
आप भी सुनिए ....आवाज़ है श्री लता जी की ... (साभार-लावण्या-अन्तर्मन)
आप यहॉ चटका लगाऐ और देखे लावण्याजी के चित्रो को।




आज हमारे दुसरे मेहमान से मिलिऐ:- डा. पंकज जॆन



डा। पंकज जैन
अगस्त २००९ से हिन्दी, संस्कृत ऒर जैन धर्म के नये कोर्स नोर्थ केरोलिना विश्वविद्यालय, यू.एस.ए। में पढाएंगे जहां वे अगस्त २००८ से विदेशी भाषा तथा साहित्य के विभाग में कार्यरत हॆं।
ये विषय इन्टर्नेट पर भी उपलब्ध होंगे ताकि विश्व में कहीं से भी इन्हें पढा जा सके.
इससे पूर्व वे न्यू जर्सी में भी हिन्दी, संस्कृत तथा अन्य भारतीय विषय पढा चुके हॆं जबकि वे अपनी पी.एच.डी. पूरी कर रहे थे. हालांकि वे अमेरिका में हज़ारों कम्प्यूटर इन्जीनियर्स की तरह आए थे, उन्होंने अपना करियर बदलकर भारतीय धर्म व संस्कृत में पहले कोलम्बिया विश्वविद्यालय से मास्टर्स तत्पश्चात आयोवा से २००८ में पी.एच.डी. हासिल की. वर्तमान में, वे नोर्थ केरोलिना विश्वविद्यालय में प्राथमिक हिन्दी, हिन्दी फ़िल्में, हिन्दू धर्म तथा
हिन्दी-उर्दू साहित्य पढा रहे हॆं.
डा. पंकज जैन के अनुसार, “भारत ऒर चीन के प्रति आजकल बहुत रुचि बढ रही हॆ. भारत की आर्थिक तथा तकनीकी प्रगति, योग, तथा हिन्दी फ़िल्मों के कारण भारतीय विषयों में विद्यार्थियों की संख्या पहले से कहीं ज़्यादा हॆ.”उनके जैन धर्म के कोर्स का नाम हॆ: “महावीर से महात्मा गांधी तक: भारत की अहिंसक जैन परम्पराएं”. इसमें जैन इतिहास, पूजा पद्धतियां, जैन दर्शन तथा कर्म सिद्धान्त, जैन समाज, गांधीजी, डा. मार्टिन लूथर किंग तथा अहिंसा का समसामयिक महत्त्व आदि पढाया जायेगा.
संस्कृत के कोर्स में वर्णमाला से लेकर संज्ञा, धातु, लकार, प्रत्यय, उपसर्ग, सन्धि, समास तथा व्याकरण के अन्य सिद्धान्त पढाये जायेंगे. रामायण की कथा भी सम्मिलित की जायेगी. डा. जॆन के अनुसार, “संस्कृत, ग्रीक, तथा लॆटिन प्राचीनतम इंडो-युरोपीयन भाषाएं कहीं जातीं हॆ, तीनों में अनेक समानताएं हॆ
तथा उनका तुलनात्मक अध्ययन विशेषकर लाभप्रद होगा.”
पंकज का जन्म राजस्थान में हुआ था तथा वे कर्नाटक, मुम्बई तथा हॆदराबाद में भी रह चुके हॆं.

उनकी पत्नी सोनिया एक चित्रकार हॆं तथा भारतीय कला प्रदर्शनी तथा दीर्घा चलाती हॆं. उनके दो पुत्र हॆं.
हिन्दी, संस्कृत ऒर जॆन धर्म के नये कोर्स उनकी वेब साइट पर उपलब्ध हॆं: www.IndicUniversity.org




विशेष डॉ, रुपेशजी ने
"ईसवी पुर्व जैन धर्म विदेशो मे'"
अपनी कुछ जिज्ञासा जैन धर्म के बारे मे रखी थी।
"हे प्रभु" उनकी जिज्ञासाओ का समाधान अपने सहयोगी ब्लोग
मुम्बई टाईगर
पर दे रहे है। आप सभी से अनुरोध है यहॉ से वहॉ पहुचे। पढे। आभार।