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मजन्ना तो मेरे बकरे का नाम है।

Posted: 24 जुलाई 2009
हाथ की दस अगुलियो मे दस चक्र थे 
आचार्य भिखणजी के

कटालिया (मारवाड) के कमधज (राठोड वन्शी क्षत्रिय) वखतसिहजी अधिकारी थे। स्वामीजी के पिता का नाम शाह बल्लुजी और माता का दीपाबाई था। वे जाति से ओसवाल (जैन) थे। भिक्षु जब गर्भ मे आये तब उनकि माता ने तेजस्वी सिह का स्वप्न देखा था। स्वामी जी का जन्म मूल नक्षत्र के चोथे पाये मे हुआ।

उनकी जन्म कुण्डली का विवरण गाथाओ मे इस तरह है-
"मीन लग्न, लग्नेतमगुरु रे, तृतीय भ्रृगु पचम रवि बुध्द।
भोम छठे शिखि सप्त मे रे लाल, दशमे चन्द्र एकादशम शनि शुध्द।
मूल ऋष्य तूर्य पाद मे रे, हरष्यो सहु परिवार ।
भीखण नाम दियो भलो रे लाल, कर उत्सव विस्तार॥" (शासन प्रभाकर ढा२ गा १४-१५ शासन समुन्द्र ६९)

शाह बल्लुजी ने दो बार शादी की। प्रथम पत्नि का नाम लाछडदे था। उनके पुत्र होलोजी थे। प्रथम पत्नि का वियोग होने पर बल्लुजी ने दुसरी बार शादी दिपादे(दिपाजी)से की। उनके पुत्र भिखणजी थे। बल्लुशाह कि मृत्यु के बाद होलोजी अलग रहने लगे। भिखणजी माता दीपादे के साथ रहने लगे।
स्वामी जी का शरीर दीर्घ,वर्ण श्याम, आखे लाल,और गति श्रेष्ट हाथी के समान थी।
अनेक सामुद्रिक शुभ लक्षण थे।

सवतः१८४८ मे आचार्य भिखणजी जयपुर पधारे। उस समय वहा के समुन्द्र - शास्त्र- वेता पडित देवकीनन्दनजी बोहरा (ब्राह्मण) ने स्वामीजी के विलक्षण शरीर को देखा ओर कहा-
जीवणा पग मे उडद रेखा। (बाया पैर)
जीवणा हाथ मे मच्छ के आकारे रेखा
पोहचा ऊपर नीन रेखा मणिबन्ध की जीवणा हाथ मे
हाथ की दस अगुलियो मे दस चक्र
गुदी नाड री तिण मे तीन रेखा लम्बी
लिलाट मे तीन रेखा लम्बी
कान उपर बाल
पेट के उपर तीन रेखा बराबर की
पेट के उपर धजा को आकार


नोट- अर्थ है  उप‍रोक्त शुभ लक्ष्णो वाले व्यक्ति का दो हजार वर्षो तक नाम रहे।(शा,स ७०-७१)
स्वामीजी बचपन से ही बडे निपुण और कुशाग्र बुध्दि के धनी थे। महाजनी हिसाब मे बहुत दक्ष थे । पचायत आदि के कार्य इतने चातुर्य से करते कि जिसका पुर जन पर अच्छा प्रभाव था।


"मजन्ना तो मेरे बकरे का नाम है।
स्वामीजी के गृह्स्थ वास की घटना है कि एक बार कटालिया ग्राम मे किसी व्यक्ति के गहनो कि चोरी हो गई। तब उनके पास के गाव बोरनदी से एक अन्धे कुम्हार को बुलाया गया। वह कुम्हार कहा करता था कि मेरे शरीर मे देवता आते है। अतः उसे गहना चुराने वाले का नाम बताने के लिये बुलाया गया। कुम्हार दिन मे स्वामी जी के पास आया और इधर- उधर की बाते कर चोरी के प्रसग को छेडते हुए पुछने लगा -"यहा किस पर सन्देह किया जाता है? स्वामीजी ने उसकी ढ्ग बिधा को समझ गये और बोले --"सन्देह तो मजन्ने पर किया जाता है।" रात को चोरी वाले घर लोग एकत्रित  हुए। वह कुम्हार भी आया। उसे पुछा गया कि गहने किसने चुराये है ? तब अपने पुर्व निश्चय के अनुसार शरीर को अकडाता हुआ बोला -"डाल दे रे डाल दे गहने डाल दे," मगर  इस तरह कहने से गहने कोन डालता।लोगो ने चोर का नाम बताने के लिये कहा तब वह तडकता हुआ बोला-"चोर मजन्ना है, उसी ने गहने चुराए है।"

घर के मालिक ने कहा-"मजन्ना तो मेरे बकरे का नाम है।उस पर झुठा आरोप क्यो लगाते हो ? यह सुनकर लोग उसके प्रपन्च को समझ गये।स्वामी जी ने दिन मे कुम्हार से हुई बात को सुनाते हुऐ कहा-" तुम लोगो कि बुध्दि कहा गई है जो आखो वाले से चुराये गये गहनो का पत्ता इस अन्धे आदमी से लगाते हो। अतः वे कैसे मिल सकेगे।" इस तरह स्वामी भिखणजी ने कुम्हार की पोल खोल कर सारे गाव को उसके दम्भ से बचा लिया।

तेरे घर गाय है ?"

Posted: 12 जुलाई 2009

धर्म का मूल स्वरुप। धर्म अधर्म क्या है?
तत्व यह है आचार्य भिक्षु ने धर्म का वह स्वरुप बतलाया जो मोलिक (original) है. धर्म की दुनिया की परिभाषा उससे भिन्न है। स्वामी जी ने बहुत सीधे शब्दो मे कहा- 
"व्रत (त्याग) धर्म है अव्रत (भोग) अधर्म है। अहिन्सा धर्म है हिन्सा अधर्म है। हर्दय परिवर्तन धर्म है। दण्ड प्रयोग अधर्म है। वीतराग की आज्ञा मे धर्म है, अनआज्ञा अधर्म है। अपरिग्रह धर्म है, परिग्रह अधर्म है। असयति (ससारी) जीवो को जीने की इच्छा रखना राग है, उनके मरने की इच्छा द्धेष और उनके ससार समुन्द्र से तैरने की कामना करना वीतराग देव का धर्म है।"

सार स़क्षेप कहे तो बस यही जैन तेरापन्थ है।

वैदिक दर्शन की आधार-भूमि समाज रही है। यहा धर्म के मायने कर्तव्य है, पाप के माने अकर्तव्य है
जैन दर्शन की पृष्टभूमि है आत्मा। यहा पाप का मायने है बन्धन धर्म के माने है मुक्ति, आत्मा-विशुद्धि का मार्ग है।
आचार्य भिक्षु स्वामी  का समग्र दर्शन विशुद्ध महावीर का दर्शन है।

तत्व यह है कि धर्म -  ब्रहृमचर्य -  परस्त्री मात-बहिन है, परपुरुष पिता-भाई है-यह पवित्रसकल्प ही शील है, सतीत्व है, धर्म है, लोक-जीव का आदर्श होकर भी पति-पत्नी का स्नेह समर्पण ही अगर मुक्ति-पथ है तो महावीर-बुद्ध से लेकर लाखो-लाखो ऋषिमुनियो ने उसे क्यो त्यागा।

तर्क का माध्यम
 
भ्रमित किशानो ने आकर आचार्य भिखु से पुछा-‘ महाराज! हम खेती करते है, वह धर्म है या पाप ?
आचार्य ने उनके मानस को पढते हुए प्रसग बदलकर पूछा-‘चोधरियो! कभी हल बन्द भी रखते हो ?‘
किसान बोले-‘महारज! एकादशी, अमावस को बन्द रखते है।"
क्यो ?- आचार्य भिखु ने अगला प्रशन किया।"
इसलिए कि सदा धरती का पेट फ़ाडते है तो दो दिन विश्राम भी दे- किसानो का उत्तर था।
अब तुम ही सोच लो कि धर्म है तो बन्द क्यो रखते हो ?"
सन्त भिखणजी शादी करना, खेती करना, भिख देना, कुऎ खुदवाना,बान्ध बधवाना, या व्यवसाय इत्यादी मे धर्म नही माना।
यह सभी तो जन-जीवन की प्राथमिक अपे़क्षा है. पारस्परिक सेवा सहयोग सामाजिक जीवन की दाल रोटी है।

तात्पर्य कि इस प्रकार की प्रव्रतिया जीवन की आवश्यकताए है। किन्तु हिन्सा, परिग्रह, ममता, एवम भोग आत्मा के लिए तो बन्धन ही है।

स्वामीजी ने कभी नही कहा कि मत दो, मत करो। लोक-जीवन मे जीते किसी को कर्तव्य से विमुख करना तो बडा पाप है। दुध तो निकाल लो पर हरी घास मत डालो। पानी तो भर लो पर कुऒ मत खुदओ।  सेना का सहयोग तो लो पर युद्ध मे सहयोग मत करो- ऐसा कहना या करना तो क्रूरता, कृतध्नता, स्वार्थ एवम देश द्रोह को पोषण देता है। तेरापन्थ का तो यह मन्तव्य है कि सत्य को सत्य समझो।
बन्धन को बन्धन एवम मुक्ति को मुक्ति समझो।

तेरे घर गाय है ?"घटना-प्रसग

काफ़रला गाव कि घटना-प्रसग है। साधु भिक्षा के लिए गए। एक जाट के घर आटे का घोवन था।  
साधुओ ने उसकी याचना की।
जाट्नी ने इन्कार कर दिया।
उसका तर्क था-जो व्यक्ति जैसा देता है, वह वैसा ही आगे पाता है। "मै यदि यह आटे का घोवन दू तो मुझे भी आगे धोवन ही मिलेगा
चूकि मै धोवन पी नही सकती।"

सन्तो ने उसे काफ़ी समझाने का प्रयास किया पर वह नही समझी।
अन्तत: सन्त खाली जोलि लोट आए। और सारी बात स्वामीजी (आचार्य भिक्षु) को कह सुनाई।

स्वामीजी सन्तो के साथ उसी जाटनी के धर पहुचे
टे का धोवन की याचन करने पर उसने (जाट्नी) अपना पुर्व तर्क देते हुए पानी बहराने से मना कर दिया।

स्वामीजी ने जाटनी से पुछा-तेरे घर गाय है ?"

हॉ, है.‘ - बहिन ने स्वीकृतिसूचक सिर हिलाते हुए कहा।"

तू उसे क्या खिलाती है?

घास चारा आदि।

वह क्या देती है ?

दूध।"

तब स्वामीजी ने उसके तर्क पर सवालिया चिन्ह लगाते हुए कहा-" अब तू ही बता, जैसा दिया जाता है वैसा कहा मिलता है ?

देख, जिस गाय को चारा,घास देने से दूध की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार सन्तो को आटे का घोवन आदि कुछ भी देना महान लाभ का हेतु है।

जाटनी की मोटी बुद्धि ने इस बात को जल्द से ग्रहण कर लिया। वह समाहित हो गई। उसने तत्काल घोवन का बर्तन हाथो से उठाया और स्वामीजी से लेने का निवेदन किया, स्वामीजी ने पात्र मे जल ग्रहण किय़ा और अपने स्थान पर आ गए.
इन्ह तार्कीक बातो  से तेरापन्थ के आधप्रवर्तक आचार्य भिक्षु स्वामी  मे समझाने की कला थी ऐसा आभास होता है।

'साध-साध रो गिलो रे, ते आप-आप रो मत! सुणजो रे शहर रा लोका, ए तेरापन्थी तन्त॥'

Posted: 02 जुलाई 2009
तेरापन्थ के आध-पुरुष स्वामी भिखणजी एक सत्य- सधायक एवम सिद्धान्तनिषठ आचार्य थे। स्वामीजी एक उत्सकृष्ठ सन्त थे। उनकी उत्सकृष्ठता का मूल कारण था आचार और विचार विषयक विशुद्धि की पुर्ण जागरुकता. आचार्य भिक्षु के बारे मे बहुत ग्रन्थ लिखे गये । पर अनलिखा बहुत अधिक है। आचार्य भिक्षु के जीवन और दर्शन पर अनेक दृष्टियो से शोध कार्य किया जा सकता है। उनके साहित्य पर विशेष अनुसधान किया जा सकता है। पी.एच.डी. और डी.लिट्ट करने वालो के लिए यह एक आगाध समुन्द्र है। इसमे से जितने रत्न बटोरे जाऎ कम है। मै कई दिनो से भि़क्षु  दर्शन को पढ रहा हू। मैने पाया तेरापन्थ के आघ पुरुष स्वामी भिखणजी का दर्शन इतना व्यवस्थित, सुसगन्त,और वैग्यानिक है। जिसने उनको महान दार्शनिको की पक्ति मे ला खडा कर दिया है. 
अपेक्षा इस बात की है कि उनको आधुनिक परिप्रेक्ष्य मे नये सन्दर्भो के साथ प्रस्तुती दी जाए।  


स्थानकवासी सम्प्रदाय के आचार्य रघुनाथजी के शिष्य सन्त भिखणजी (आचार्य भुक्षु) ने विक्रम सवत 1817 मे तेरापन्थ का प्रवतन किया। आचार्य भुक्षु ने आचार्-शुद्धि और सगठन पर बल दिया। एकसूत्रता के लिए अनेक मर्यादाओ का निर्माण किया, शिष्यप्रथा (चेले बनाना) को समाप्त कर दी। कम समय मे तेरापन्थ धर्म मे एक आचार्य, एक आचार, एक विचार के लिऐ प्रसिद्ध हो गया।कुछ तथ्य वर्तमान समाज के पथ-दर्शक बन गए है।

इसके पुर्व मे मैने आचार्य भिक्षु  के जन्म परिवार के बारे मे  बताया था। पढने के लिए यहा किल्क करे


गवान महावीर ने कहा- 'सच्चम भयवम'-सत्य भगवान है। स्वामीजी (आचार्य भुक्षु) ने उक्त कथन को अपने जीवन मे साकार रुप प्रदान किया। उन्होने सत्य को भगवान माना और एक भक्त के समान उसके प्रति समर्पित होकर रहे। सत्य की अपराजेयता ही स्वामीजी की अपराजेयता बन गई। लोगो ने स्वामीजी के विरुद्ध आक्रोश, आक्षेप, एवम परिषहो के पहाड खडे कर दिये। शारीरिक उत्पीडन तो किया ही गया, मार डालने तक की धमकिया दी गई। इतना सब कुछ करके भी वे उन्हे सत्य मार्ग से क्षण के लिए भी विचलित नही कर पाये।

मुझे गुप्ताजी की दो पक्तिया याद आ रही है जो आचार्य भुक्षु को भी हुबोहु रुपायित करती है।

राम तुम्हारा नाम स्वय काव्य है।

कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है॥

क्रान्ति का नामकरणः-

बात यो हुई कि जोधपुर राज्य के दीवान फतहमलजी सिघी घूमते हुए बाजार मे आए तो उन्होने देखा कि कई श्रावक दुकान मे सामायिक-पोषध किये बैठे है। आश्चर्य के साथ पुछ बैठे- 'आज स्थानक को छोड बाजार मे धर्मौपासना कैसे ?  श्रावक बोले- 'हमारे गुरु सन्त भिखणजी ने आचार्य रघुनाथजी से सम्बन्ध विच्छेद कर दिया है और वे एक क्रान्ति के मार्ग पर चल पडे है।' दीवानजी और उत्सुकता से बोले - अरे! क्यो ?'
 श्रावक बोले-'लम्बी बात है, कभी समय होगा तब.......................॥'
दीवानजी कहे "थिरता" अब ही मुझे समय है, तुम अभी बताओ।'
जैसे नियति से प्रेरित हो दीवानजी बोले। वरना तेरापन्थ नाम कैसे निकलता ?
कैसे उसे अर्थ मिलता ? कैसे भविष्य आशावान बनता ? कारण यह कि "सन्त" ने तो मात्र यही सोचकर अभिनिष्क्रम किया था कि साधना करुगा या समाधि व‍रुगा। उन्ही के शब्दो मे -
"म्है उणा ने छोडी निसरया जद..... या न जाणता, म्हारोमारग जमसी, म्हामे यू दीक्षा लेसी ने श्रावक-श्राविका हुसी,जाण्यो आत्मारा कारज सारस्यॉ,मर पुरा देस्या.................।"

दीवानजी की जिज्ञासा पर श्रावको ने उन्हे सविस्तार बताया -
"महाव्रती जैन साधु के लिऐ अपने निमित बनाया गया भोजन,मकान,आदि ग्रहण करना आधाकर्मी दोष है। कारण कि पृथ्वी,पानी, अग्नि, वनस्पति, आदि मे सूक्ष्म हिन्सा भी करने, कराने व अनुमोदन का त्याग होता है। आज साधुओ की प्रेरणा से उनके अपने अपने स्थानक ( धर्मशालाए- आश्रम) बनते है। वे साधु नित्यपिण्ड,आधाकर्मी, आदि दोषयुक्त आहार-पानी लेते है। साधु की अपनी हर वस्तु नित्य प्रतिलेखनीय है, उसके बावजूद वे पुस्तक-पन्ने आदि महिनो एक जगह रखकर चले जाते है। चेलो के लालस मे माता-पिता की बिना आज्ञा हर किसी को दीक्षा दे दी जाती है।यह प्रकट रुप मे तीसरे महाव्रत का भग है। ( साधु पॉच महाव्रत धारी होते )

इस प्रकार के अनेक आचार-दोषो के अलावा लोकोपकार के अनेक हिन्सा-परिग्रह से जुडे कार्यो मे कही धर्म, कही मिश्र तो कही पुण्य की उनकी स्थापनाओ ने भगवान महावीर के मार्ग को ही उलट दिया है। इन्ह सभी कारणो से सन्त भिखणजी ने अपने सहवृति विचारो वाले साधुओ के साथ सम्पुर्ण क्रान्ति का मार्ग ग्रहण किया है।"

उल्लासित मन से दीवानजी ने जोधपुर के श्रावको से फिर पुछ बैठे-" तुम कितने श्रावको ने इस धर्म को स्वीकार किया है ?" श्रावको ने अपनी सख्या 'तेरह' बतालाई, तब उन्होने अगला प्रशन और किया-"साधु कितने है ?" परमार्थी सन्त भिखणजी आदि भी 'तेरह' ही है।' श्रावक बोले।

पवित्र भाव धारा मे बहते दीवान सिधीजी के मुह से फिर बोल फुट पडे-वाह! यह भी अच्छा योग मिला- तेरा-तेरा (तेरह-तेरह)।'
दीवानजी के मुह से इतना सब कुछ सुन पास खडे सेवक कवि ने तुक्का ही जोड दिया-

'साध-साध रो गिलो रे, ते आप-आप रो मत!
सुणजो रे शहर रा लोका, ए तेरापन्थी तन्त॥'

सन्त के सत्य मार्ग का एक अनचीता नामकरण हो गया।

दीवान जी समय को सार्थक कर गये किन्तु विरोधी लोगो को एक मजाक मिल गया-' "अरे! तेरा! तेरिया! बाईस मे से नो गए तो......।" सन्त भिखणजी उस समय मारवाड के काठा (सीमान्त) प्रदेश मे विहार कर रहे थे। उनके पास जब यह शब्द पहुचा तो महावीर को परम वन्दना के साथ उसे अलोकिक ही अर्थ मिल गया -
" हे प्रभो! यह तेरा पथ।" भाव विभोर सन्त भिखणजी बोले-" प्रभो! मै तो आपके  ही पथिक हू। आपके वचन ही मेरी जीवन थाती है। आपके चरणो मे ही मेरा सर्वस्व समर्पित है।

सन्त भिखणजी ने जो धर्म क्रान्ति का जो बीज बोया था वो वृक्ष आज तेरापन्थ के दशम आचार्य   श्री महाप्रज्ञजी जे  नेतृत्व मे इतना गहरा फैल गया है कि तेरह साधु के १००० साधु-साध्वीया, एवम तेरह श्रवको से करोडो श्रावक परे विश्व भर मे महावीर, भिक्षु, गान्धी दर्शन को फैला रहे है।


हे प्रभु यह तेरापथ हिन्दि ब्लोग का उदभव भी महान विचारक दार्शनिक, महामना आचार्य भिखजी, (भिक्षु/स्वामीजी/सन्त ) के विचारो से दुनिया मे

पहुचाने का छोटा सा प्रयास है।



नोट:- आगे हम पढेगे      
ॐ भिक्षु जय भिक्षु के नाम मे कोन सी शक्ति है कि बिमार व्यक्ति ठीक हो जाता है। अन्धे को रोशनी मिल जाती है। कई आस्था के चमत्कार  एवम आचार्य भिक्षु कि तार्किक शक्ति से भी अवगत कराऐगे। आप पढना नही भुले शायद कोई वाक्य शब्द आपके हमारा जीवन परम वैभव कि अनुभूती करे।


ॐ भिक्षु जय भिक्षु  समाधी स्थल सिरियारि पाली (राजस्थान) मन्त्र का विडियो  देखे।

राजा तो एक देच्च में पुजा जाता है। तेरा बेटा तो साधु बन कर सारे जगत का पुज्य बनेगा। और सिंह कि तरह गुजेगा।

Posted: 24 जून 2009
  आचार्य भिक्षु
 
  आचार्य भिक्षु
 तेरापंथ के प्रवर्तक आचार्य भिक्षु श्रमण परंपरा के महान संवाहक थे। उनका जन्म वि. स. 1783 आषाढ़ शुक्ला त्रयोदच्ची को कंटालिया (मारवाड़) में हुआ। उनके पिता का नाम शाह बल्लुजी तथा माता का नाम दींपा बाई था। उनकी जाति ओसवाल तथा वंच्च सकलेचा था। आचार्य भिक्षु का जन्म-नाम भीखण था। प्रारंभ से ही वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। तत्कालीन परंपरा के अनुसार छोटी उम्र में ही उनका विवाह हो गया। वैवाहिक जीवन से बंधे जाने पर भी उनका जीवन वैराग्य भावना से ओतप्रोत था। धार्मिकता उनकी रगरग में रमी थी। पत्नी भी उन्हें धार्मिक विचारों वाली मिली। पति-पत्नी दोंनो ही दिक्षा लेने के उद्यत हुए, किंतु नियति को शायद यह मान्य नहीं था। कुछ वर्षो के बाद पत्नी का देहावसान हो गया। भीखणजी अकेले ही दिक्षा लेने को उद्यत हुए, पर माता ने दीक्षा की अनुमति नहीं दी। तत्कालीन स्थानकवासी संप्रदाय के आचार्य श्री रघुनाथ जी के समझाने पर माता ने कहा - महाराज! मैं इसे दीक्षा की अनुमति कैसे दे सकती हूं क्योंकि जब यह गर्भ में था तब मैंने सिंह का स्वप्न देखा था। उस स्वप्न के अनुसार यह बडा होकर किसी देश का राजा बनेगा। और सिंह जैसा प्रकृमि होगा। आचार्य रघुनाथ जी ने कहा बाई यह तो बहुत अच्छी बात है। राजा तो एक देश में पुजा जाता है। तेरा बेटा तो साधु बन कर सारे जगत का पुज्य बनेगा। और सिंह कि तरह गुजेगा। इस प्रकार आचार्य रघुनाथ जी के समझाने पर माता ने सहर्ष दिक्षा की अनुमति दे दी। वि.स. 1808 मार्गच्चीर्ष कृष्णा बारस को भीखणजी ने आचार्य रघुनाथजी के पास दीक्षा ग्रहण की। संत भीखण जी की दृष्टि पेनि और मेघा सूक्षमग्राही थी। तत्व की गहराई में पैठना उनकी लिए स्वाभाविक बात थी। थोड़े ही वर्षो में वे जैन शास्त्रों के पारगामी पंडित बन गये।
       वि.स.1815 के आस पास संत भीखणजी के मस्तिष्क में साधु वर्ग के आचार विचार संबन्धि च्चिथिलता के प्रति एक क्रांति की भावना पैदा हुई। उन्होंने अपने क्रांति पूर्ण विचारों को आचार्य रघुनाथजी के सामने रखा। दो वर्ष तक विचार विमर्च्च होता रहा। जब कोई संतोषजनक निर्णय नहीं हुआ तब विचार भेद के कारण वि.स. 1817 चैत्र शुक्ला नवमी को कुछ साधुओं सहित बगड़ी (मारवाड़) में उनसे पृथक हो गये। उनकी धर्म क्रांति का विरोध हुआ। चुकि उस समय पुज्य रघुनाथ जी का प्रभाव प्रबल था। इस लिए लोगो ने भीखणजी का असहयोग किया। ठहरने के लिए स्थान नहीं दिया। वहां से विहार किया। गांव के बाहर आये कि तेज आंधी आ गई। इतो व्याघ्रस्ततस्तटी वाली कहावत घटित हो गई। पीछे गांव में जगह नहीं, आगे आंधी ने रास्ता रोक लिया। इस लिए उन्होंने पहला पडाव गांव के बाहर शमच्चान में जैतसिंहजी की छतरियों में किया। आज भी वे छतरीयां विद्यमान है।
       संघबहिष्कार के साथ ही आचार्य भीक्षु पर जैसे विरोधों के पहाड टुट पडे। पर वे लोह पुरूष थे। विरोधे के सामने झुकना उन्होंने सिखा नहीं था। वे सत्य के महान उपासक थे। सत्य के प्राण न्यौछावर करने के लिए वे तत्‌पर थे। उन्ही के मुख से निकले हुए शब्द आत्मा राकारज सारस्यां मर पुरा देस्यां, सत्य के प्रति आगद्य संपूर्ण के सुचक है। वे महान आत्मबलि वे जीवन में सुध साधुता को प्रतिष्ठित करना चाहते थे।
वि. स. 1817 आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को केलवा(मेवाड़) में बारह साथियों सहित उन्होंने शास्त्र सम्मत दीक्षा ग्रहण की। यही तेरापंथ स्थापना का प्रथम दिन था। इसी दिन आचार्य भीक्षु के नेतृत्व में एक सुसंगठित साधु संघ का सूत्र पात हुआ और वह संघ तेरापंथ के नाम से प्रखयात हो गया।
       वि.स.1817 से लेकर वि.स. 1831 तक पन्द्रह वर्ष का जीवन आचार्य भीक्षु का महान संघ संघर्षमय रहा। यहां तक कहा जाता है कि उन्हें पांच वर्ष पेट भर आहार बहुत कम मिलता। कभी मिलता कभी नहीं भी मिलता। इस महान संघर्ष की स्थति में आचार्य भीक्षु ने कठोर साधना, तपस्या, शास्त्रों का गंभीर अध्यन एवं संघ की भावी रूप रेखा का चिंतन किया।
       वि.स.1832 में आचार्य भिक्षु ने अपने प्रमुख शिष्य भारमल जी को अपना उतराधिकारी घोषित किया। उसी समय संघीय मर्यादाओं का भी निर्माण किया। उन्होंने पहला मर्यादा पत्र इसी वर्ष मार्ग शीर्ष कृष्णा सप्तमी को लिखा। उसके बाद समय समय पर नई मर्यादाओं के निमार्ण से संघ को सुदृढ करते रहे। उन्होंने अन्तिम मर्यादा पत्र लिखा स.1859 माद्य शुक्ला सप्तमी को। 
एक आचार्य में संघ की शक्ति को केन्द्रित कर उन्होंने सुदृढ संगठन की निव डाली। इससे अपने अपने शिष्य बनाने की परंपरा का विच्छेद हो गया। भावी आचार्य के चुनाव का दायित्व भी उन्होंने वर्तमान आचार्य को सौंपा। आज तेरापंथ धर्म संघ अनुच्चासित मर्यादित और व्यवस्थित धर्म संघ है, इसका श्रेय आचार्य भिक्षु कृत इन्हीं मर्यादाओं को है।
       आचार्य भिक्षु ने अपने मौलिक चिंतन के आधार पर नये मूल्यों की स्थापना की। हिंसा व दान-दया संबंधी उनकी व्याख्या सर्वथा वैज्ञानिक कही जा सकती है।
       आचार्य भिक्षु की अहिंसा सार्वभौमिक क्षमता पर आधारित थी। बडों के लिए छोटो की हिंसा और पंचेन्द्रिय जीवों की सुरक्षा के लिए एकेन्द्रिय प्राणीयों का हनन आचार्य भिक्षु की दृष्टि में आगम समस्त नहीं था।
       अध्यात्म व व्यवहार की भूमिका भी उनकी भिन्न थी। उन्होंने कभी ओर किसी भी प्रसंग पर दोंनो को एक तुला से तोलने का प्रयत्न नहीं किया। उनके अभिमत से व्यवहार व अध्यात्म को सर्वत्र एक कर देना घी ओर तम्बाकू के सम्मिश्रण जैसा अनुपादय है।
       दान दया के विषय में लैकिक एवं लौकतर भेद रेखा प्रस्तुत कर आचार्य भिक्षु ने जैन समाज में प्रचलित मान्यता के समक्ष नया चिंतन प्रस्तुत किया। उस समय समाजिक समान का माप दण्ड दान दया पर अवलंबित था। सर्वर्गोपलब्धि और पुण्योपलब्धि की मान्यताएं भी दान दया के साथ जुडी हुई थी। आचार्य भिक्षु ने लौकिक दान दया की व्यवस्था को कर्तव्य व सहयोग बता कर मौलिक सत्य का उद्घाटन किया। साधय साधन के विषय में भी उनका दृष्टिकोण स्वष्ट था। उनके अभिमत से सुध साधन के द्वारा ही सुध साधय की प्राप्ती सम्भव है। उन्होंने कहा रक्त से सना वस्त्र कभी रक्त से शुद्ध नहीं होता। वैसे ही हिंसा प्रधान प्रवृति कभी अध्यात्म के पावन लक्ष्य तक नहीं पहुचा सकती।
       आचार्य भिक्षु एक कुशल विधिवकता होने के साथ साथ एक सहज कवि और महान साहित्यकार थे। उन्होंने राजस्थानी भाषा में लगभग 38000 पद्यों की रचना कर जैन साहित्य को समर्ध किया। आचार्य भिक्षु की साहित्य रचना का प्रमुख विषय सुध आचार का प्रतिपादन, तत्व दर्च्चन का विच्चलेषण एवं धर्म संघ की मौलिक मर्यादाओं का निरूपर्ण था। उनकी रचनाओं में प्राचीन वेराग्य में आख्यान भी निबद्ध है। आचार्य भिक्षु ने कभी कवि बनने का प्रयत्न नहीं किया और न कभी उन्होंने भाषा शास्त्र, छनद शास्त्र, अलंकार शास्त्र एवं रस शास्त्र का प्रच्चिक्षण ही प्राप्त किया पर उनके द्वारा रचे गये पद्यों में रस, अनुप्रयास और अलंकारों के प्रायोग पाठक को मुगध कर देते है। आचार्य भिक्षु के साहित्य को पठ कर आधुनिक विद्वान उन्हें हिगल ओर काण्ट की तुला से तोलते है।
       आचार्य भिक्षु जब तक जिए, जयोति बनकर जिए। उनके जीवन का हर पृष्ठ पुरुषार्थ की गौरवमयी गाथाओं से भरा पड़ा है।
       आचार्य भिक्षु के शासन काल में 49 साधु और 56साध्वियां दीक्षित हुई। वि.स. 1860भाद्रव शुक्ला त्रयोदच्ची के दिन सिरियारी (मारवाड़) में उन्होंने समाधि मरण प्राप्त किया। उस समय उनकी आयु 77 वर्ष की थी।

धर्मं क्रान्ति का सूत्रपात्र

Posted: 07 नवंबर 2008
प्रथम आचार्य श्री भिक्षुगणी का शासनकाल।


महामना श्री भिक्षु के, युग मे ऋषि उनचास।
इष्ट देव स्मृति कर लिखु, उन सब का इतिहास॥
आचार्य भिक्षु ने सवत १८१६ शुक्ला को स्थानकवासी सम्प्रदाय से पृथक होक धर्म क्रान्ति का सूत्रपात्र किया। नई दीक्षा ग्रहण के पूर्व स्वामीजी आदि १३ ही साधु राजनगर मे एकत्रित हुए। वहा सभी ने नई दीक्षा लेने का निर्णय किया। छोटे-बडो का क्रम पहले की तरह ही रखा। सब मे रुपचन्दजी बडे रहे। स्वामीजी को आचार्य के रुप मे स्थापित किया। सबको पुन:
पच-महाव्रत स्वीकार करने का निर्देश दिया गया।
कटालिया (मारवाड) के कमधज (राठोड वन्शी क्षत्रिय)वखतसिहजी अधिकारी थे। स्वामीजी के पिता का नाम शाह बल्लुजी और माता का दीपाबाई था। वे जाति से ओसवाल (जैन) थे। भिक्षु जब गर्भ मे आये तब उनकि माता ने तेजस्वी सिह का स्वप्न देखा था। स्वामी जी का जन्म मूल नक्षत्र के चोथे पाये मे हुआ।
उनकी जन्म कुण्डली का विवरण गाथाओ मे इस तरह है-
"मीन लग्न, लग्नेतमगुरु रे, तृतीय भ्रृगु पचम रवि बुध्द।
भोम छठे शिखि सप्त मे रे लाल, दशमे चन्द्र एकादशम शनि शुध्द।
मूल ऋष्य तूर्य पाद मे रे, हरष्यो सहु परिवार
भीखण नाम दियो भलो रे लाल, कर उत्सव विस्तार॥"

(शासन प्रभाकर ढा२ गा १४-१५ शासन समुन्द्र ६९)
शाह बल्लुजी ने दो बार शादी की। प्रथम पत्नि का नाम लाछडदे था। उनके पुत्र होलोजी थे। प्रथम पत्नि का वियोग होने पर बल्लुजी ने दुसरी बार शादी दिपादे (दिपाजी) से की। उनके पुत्र भिखणजी थे। बल्लुशाह कि मृत्यु के बाद होलोजी अलग रहने लगे। भिखणजी माता दीपादे के साथ रहने लगे।
स्वामी जी का शरीर दीर्घ,वर्ण श्याम, आखे लाल,और गति श्रेष्ट हाथी के समान थी।अनेक सामुद्रिक शुभ लक्षण थे।
सवतः १८४८ मे आचार्य भिखणजी जयपुर पधारे। उस समय वहा के समुन्द्र-शास्त्र वेता पडित देवकीनन्दनजी बोहरा (ब्राह्मण) ने स्वामीजी के विलक्षण शरीर को देखा ओर कहा-

1. जीवणा पग मे उडद रेखा। (बाया पैर)!
2. जीवणा हाथ मे मच्छ के आकारे रेखा !
3. पोहचा ऊपर नीन रेखा मणिबन्ध की जीवणा हाथ मे !
4. हाथ की दस अगुलियो मे दस चक्र !
5. गुदी नाड री तिण मे तीन रेखा लम्बी !
6. लिलाट मे तीन रेखा लम्बी !
7. कान उपर बाल !
8. पेट के उपर तीन रेखा बराबर की !
9. पेट के उपर धजा को आकार !

नोट- अर्थ है - उपरोक्त शुभ लक्ष्णो वाले व्यक्ति का दो हजार वर्षो तक नाम रहे।
(शा, ७०-७१)
स्वामीजी बचपन से ही बडे निपुण और कुशाग्र बुध्दि के धनी थे। महाजनी हिसाब मे बहुत दक्ष थे। पचायत आदि के कार्य इतने चातुर्य से करते कि जिसका पुर जन पर अच्छा प्रभाव था।
स्वामीजी के गृह्स्थ वास की घटना है कि एक बार कटालिया ग्राम मे किसी व्यक्ति के गहनो कि चोरी हो गई। तब उनके पास के गाव बोरनदी से एक अन्धे कुम्हार को बुलाया गया। वह कुम्हार कहा करता था कि मेरे शरीर मे देवता आते है। अतः उसे गहना चुराने वाले का नाम बताने के लिये बुलाया गया। कुम्हार दिन मे स्वामी जी के पास आया और इधर- उधर की बाते कर चोरी के प्रसग को छेडते हुए पुछने लगा - "यहा किस पर सन्देह किया जाता है ? स्वामीजी ने उसकी ढ्ग बिधा को समझ गये और बोले - "सन्देह तो मजन्ने पर किया जाता है।" रात को चोरी वाले घर लोग एकत्रित हुए। वह कुम्हार भी आया। उसे पुछा गया कि गहने किसने चुराये है ? तब अपने पुर्व निश्चय के अनुसार शरीर को अकडाता हुआ बोला -"डाल दे रे डाल दे गहने डाल दे," मगर इस तरह कहने से गहने कोन डालता। लोगो ने चोर का नाम बताने के लिये कहा तब वह तडकता हुआ बोला- "चोर मजन्ना है, उसी ने गहने चुराए है।"
घर के मालिक ने कहा-"मजन्ना तो मेरे बकरे का नाम है। उस प्र झुठा आरोप क्यो लगाते हो ? यह सुनकर लोग उसके प्रपन्च को समझ गये। स्वामीजी ने दिन मे कुम्हार से हुई बात को सुनाते हुऐ कहा-" तुम लोगो कि बुध्दि कहा गई है, जो आखो वाले से चुराये गये गहनो का पत्ता इस अन्धे आदमी से लगाते हो। अतः वे कैसे मिल सकेगे।" इस तरह स्वामी भिखणजी ने कुम्हार की पोल खोल कर सारे गाव को उसके दम्भ से बचा लिया।
(आचार्य भिक्षु तेरापन्थ धर्म सघ के सस्थापक थे। वे एक क्रान्तिकारी शलाका पुरुष थे। उन्होने जो लकीर खिची, वे अधभुत थी। उनका जीवन और दर्शन अनिर्वचनीय है। उनका उदात चरित्र अपने आप मे एक इतिहास है। उन्होने जिस रुप मे तेरापन्थ धर्म सघ की बुनियाद रखी उसकी विलक्षणता धर्मसस्थाओ के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। भारत के इतिहास-लेखको का ध्यान अभी तक इस और केन्द्रित नही हुआ है। जिस दिन व्यापक दृष्टि से उस इतिहास को लिपिबध्द किया जायेगा, देश कि अनमोल धरोहर से जनता का परिचय होगा। तेरापन्थ के नवम आचार्य थे आचार्य श्री तुलसी जिन्होने राजीव गान्धी एवम सन्त लोन्गोवाल के बिच पन्जाब शान्तिवार्ता करवाने मे अहम भुमिका थी। वर्तमान मे दसम आचार्य श्री महाप्रज्ञजी जो प्रेक्षा प्रेणेता, अहिसा यात्रा के जनक राजस्थान से होते हुऐ गुजरात महाराष्ट्रारा,मध्यप्रदेश,हरियाणा, नई दिल्ली होते हुऐ अहिसा यात्रा हजारो किलोमीटर पैदल चलकर दसम आचार्य श्री महाप्रज्ञजी इस वक्त जयपुर मे चार्तुरमास कर रहे है मेरा मानना है भगवान महावीर ने अहिसा का सुत्रपात्र २६०० वर्ष पुर्व किया था। उसी विचारधारओ को जागृत रखने का काम ३०० वर्ष पुर्व महामना आचार्य श्री भिखक्षु ने किया। वो ही अग्नि को प्रवजलित रखा भारत के राष्ट्रापिता माहत्मा गाधी ने !
क्रमश॥॥॥॥