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बालक मोहन से मुनि मुदित, महाश्रमण से आचार्य महाश्रमण

Posted: 08 सितंबर 2010



किसी भी परम्परा को सुव्यवस्थित एव युगानुरूप संचालन करने के लिए सक्षम नेतृत्व की जरूरत रहती है ! सक्षम नेतृत्व के अभाव में सगठन शिथिल हो जाता है! और धीमे-धीमे छिन्न भिन्न होकर अपने अस्तित्व को गंवा बैठता है !

तेरापंथ उस क्रान्ति का परिणाम है जिसमे आचार्य भिक्षु का प्रखर पुरुषार्थ , सत्य निष्ठा एवं साधना के प्रति पूर्ण सजगता जुडी हुई है . आचार्य भिक्षु की परम्परा में आचार्य तुलसी एवं दसवे आचार्य महाप्रज्ञ न केवल जैन परम्परा अपितु अध्यात्म जगत के बहुचर्चित हस्ताक्षर थे! उन्होंने जो असाम्प्रदायिक सोच एवं अहिंसा , मानवतावादी दृष्टिकोण दिया है वः एक मिसाल है! आचार्य महाप्रज्ञ प्रेक्षाध्यान साधना पद्धति के प्रणेता, महान दार्शनिक व् कुशल साहित्यकार के रूप में लोक विश्रुत थे!

आचार्य महाप्रज्ञ ने अपने उतराधिकारी के रूप में 35 वर्षीय महाश्रमण मुनि श्री मुदित कुमारजी का मनोयन किया था ! तेरापंथ में युवाचार्य मनोयन का इसलिए विशेष महत्व है की यहा एक आचार्य की परम्परा है! तेरापंथ के भावी आचार्य की नियुक्ति वर्तमान आचार्य का विशेषाधिकार है! इसमें किसी का हस्तक्षेप नही होता है ! आचार्य इस ओर स्वय विवेक से निर्णय लेते है !

तेरापंथ के वर्तमान 11 वे आचार्य महाश्रमण जी उम्र में युवा है , चिन्तन में प्रोढ़ है, ज्ञान में स्थविर है ! तेरापंथ की गोरवशाली आचार्यो की परम्परा में यह एक ओर गोरव जुड़ गया आचार्य श्री महाश्रमण के रूप में ! 22 वर्ष की उम्र में वे पूज्यवर रूप के विधिवत निकट आए फिर एक -एक सीढ़ी आगे बढ़ते गए! आज तेरापंथ के भाग्य विधाता के रूप में मुनि मुदित, आचार्य महाश्रमण के रूप में प्रतिष्ठित है !

आचार्य श्री महाश्रमण मानवता के लिए समर्पित जैन तेरापंथ के उज्जवल भविष्य है। प्राचीन गुरू परंपरा की श्रृंखला में आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा अपने उतराधिकारी के रूप में मनोनीत महाश्रमण विनम्रता की प्रतिमूर्ति है। अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी की उन्होंने अनन्य सेवा की। तुलसी-महाप्रज्ञ जैसे सक्षम महापुरूषों द्वारा वे तराशे गये है।

जन्ममात प्रतिभा के धनी आचार्य महाश्रमण अपने चिंतन को निर्णय व परिणाम तक पहुंचाने में बडे सिद्धहस्त हैं। उसी की फलश्रुति है कि उन्होंने आचार्य महाप्रज्ञ को उनकी जनकल्याणकारी प्रवृतियों के लिए युगप्रधान पद हेतु प्रस्तुत किया। हमारे ग्यारवे आचार्य श्री महाश्रमण उम्र से युवा है, उनकी सोच गंभीर है युक्ति पैनी है, दृष्टि सूक्ष्म है, चिंतन प्रैढ़ है तथा वे कठोर परिश्रमि है। उनकी प्रवचन शैली दिल को छूने वाली है। महाश्रमण की प्रज्ञा एवं प्रशासनिक सूझबूझ बेजोड़ है।

क्रमिक विकास -:
आचार्य महाश्रमणजी में जन्म जात प्रतिभा थी ! उनके भीतर ज्ञान -विज्ञान सैद्धांतिक सूझ-बुझ, तात्विक बोलो की पकड़ , प्रशासनिक योग्यता सहज में संप्राप्त थी!

गणाधिप्ती आचार्य श्री तुलसी, एवं आचार्य श्री महाप्रज्ञ के चिन्तन में इनकी योग्यता के अंकन का उत्स कब हुआ ! यह समय के साथ परत दर परत खुलता रहेगा !

फिर भी इसकी हल्की पर मजबूत दस्तक देखने को लाडनू (राजस्थान) में 13 मई 1984 को मिली जब आचार्य श्री तुलसी ने अपने निजी कार्य में उन्हें नियुक्त किया ओर लगभग उसी समय प्रथम अंग सूत्र आयारो के संस्कृत भाष्य के लेखन में सहयोगी बने. श्रद्धेय आचार्यवर द्वारा आयारो जैसे आचार शास्त्रीय सूत्र पर प्रांजल भाषा में भाष्य की रचना की गई है. भाष्यकारो की परम्परा में आचार्य महाप्रज्ञ का एक गोरव पूर्ण नाम ओर जुडा हुआ है!

इसी वर्ष आचार्य श्री तुलसी का चातुर्मास जोधपुर था ! चातुर्मासिक प्रवेश 7जुलाई को हुआ ! आचार्यवर ने उन्हें (महाश्रमण ) प्रात: उपदेश देने का निर्देश दिया ! 8 जुलाई से मुनि मुदित कुमारजी (महाश्रमण ) उपदेश देना प्रारंभ किया ! उनकी वक्तृत्व शैली व् व्याख्या करने के ढंग ने लोगो को अतिशय प्रभावित किया ! जोधपुर के
तत्व निष्ठ सुश्रावक श्री जबरमलजी भंडारी ने कहा इनकी व्याख्यान शैली से लगता है ये आगे जाकर महान संत बनेगे ! 1985के आमेट चातुर्मास में भगवती सूत्र के टिपण लेख में भी सहयोगी बने!

अन्तरंग सहयोगी -:
अमृत महोत्सव का तृतीया चरण उदयपुर में माध शुक्ल सप्तमी स: 2042 (16 फरवरी 1986) को मर्यादा महोत्सव के दिन आचार्य श्री तुलसी ने धोषणा की -" मै मुदित कुमार को युवाचार्य महाप्रज्ञ के अन्तरंग कार्य में सहयोगी नियुक्त करता हु !" उस घोषणा के साथ आचार्य तुलसी ने जो भूमिका बाँधी उसमे मुनि मुदित समाज के सामने उभरकर आ गये ! बैसाख शुक्ला 4 स. 2042 (13 मई 1986 ) को आचार्य श्री तुलसी ने ब्यावर में मुनि मुदित को साझपति (ग्रुप लीडर) नियुक्त किया !

अप्रमत्त साधना -:
महाश्रमण पद पर अलंकृत होने के बाद उनकी स्वतन्त्र रूप से तीन यात्राए हुई जो जन सम्पर्क की दृष्टी से बड़ी ही प्रभावशाली रही थी ! माध कृष्णा 10, स.2047 (10 जनवरी 1990) को अपनी सिवांची मालाणी की यात्रा परिसम्पन्न कर सोजत रोड में पुज्यवरो के दर्शन किये तब आचार्य तुलसी ने कहा -" मै इस अवसर पर इतिहास की पुनरावृति करता हुआ तुम्हे अप्रमत्त की साधना का उपहार देता हु ." यदि किसी ने तुम्हारी अप्रमाद की साधना में स्खलन निकाली तो तुम्हे उस दिन खड़े खड़े तीन धंटा घ्यान करना होगा ! ." आज तक आपने ऐसा एक भी अवसर नही आने दिया जिसके कारण आपको प्रायच्श्रित स्वीकार करना पड़ा हो ! यह उनके अप्रमाद का परिणाम है !

महाश्रमण पद का सृजन ओर नियुक्ति
आचार्य श्री तुलसी ने संधीय अपेक्षा को ध्यान में रखकर दो पदों का सृजन किया महाश्रमण .. महाश्रमणी ! भाद्र शुक्ल 9 स. 2046 (9 सितंबर 1989) महाश्रमण पद पर मुनि मुदित कुमारजी एवं महाश्रमणी पद पर साध्वी प्रमुखा कनक प्रभाजी की नियुक्ति की! उस समय मात्र 28 वर्ष के थे हमारे वर्तमान आचार्य महाश्रमण ! ये पद अन्तरंग संधीय व्यवस्था में युवाचार्य श्री महाप्रज्ञ के सतत सहयोगी के रूप सृजित किये गये ! दिल्ली में माध शुक्ला सप्तमी , स. 2051 (6 फरवरी 1995) को मर्यादा महोत्सव के अवसर पर गणाधिपती गुरुदेव तुलसी ने मुनि मुदित की इस पद पर नियुक्ति की . उस समय महाश्रमण मुनि मुदित पर अमित वात्सल्य की दृष्टी करते हुए गुरुदेव तुलसी ने कहा-" धर्म संघ में मुनि मुदित का व्यक्तित्व विशेष रूप से उभरकर सामने आया है ! मै इस अवसर पर मुनि मुदितकुमार को "महाश्रमण" पद पर प्रतिष्ठित करता हु. महाश्रमण मुनि मुदितकुमार आचार्य महाप्रज्ञ के गण संचालन के कार्य में सहयोग रहता हुआ स्वय गण- सचालन की योग्यता विकसित करे! महाप्रज्ञ ने अपना आर्शीर्वाद प्रदान करते हुए कहा था -" महाश्रमण मुदितकुमार जैसे सहयोगी को पाकर मै प्रसन्न हु ! महाश्रमण के रूप में आठ वर्ष तक पुज्यवरो की सन्निधि में जो विकास किया वः चतुर्विध धर्मसंध की नजरो में बैठ गया !

युवाचार्य पद पर नियुक्ति
दिल्ली में महाश्रमण पद पर पुन: नियुक्ति के मोके पर गुरुदेव ने जो पत्र दिया था उसकी पक्तिया थी -" इसके लिए अब जो करणीय शेष है उसकी उचित समय आचार्य महाप्रज्ञ धोषणा करेंगे ! वह उचित समय करीब अढाई वर्ष बाद भाद्र पद शुक्ला 12 स. 2054 (14 सिप्तम्बर1997) को गंगाशर बीकानेर (राजस्थान) में आया जब आचार्य महाप्रज्ञ ने एक लाख लोगो की विशाल मानव मेदनी के बीच करीब ११:३० बजे, युवाचार्य पद का नाम लेते हुए कहा -" आओ मुनि मुदितकुमार"! इसके साथ शखनाद , विपुल हर्ष ध्वनी एवं जयकारो के साथ आचार्य श्री की इस घोषणा का स्वागत किया! आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने अपने युवाचार्य का नामाकरण " युवाचार्य महाश्रमण " के रूप में किया! आचार्य श्री ने पिछली दीपावली (10 नवम्बर 1996) को गणाधिपती आचार्य तुलसी के साथ हुए चिन्तन के दोरान लिखे पत्र का वाचन किया साथ ही एक अन्य पत्र भी पढ़ा जो भाद्र पद शुक्ल 8 स. 2054 (10 सितम्बर 1997 ) को ही लिखा था ! इसमें उन्होंने अपने उतराधिकारी के तोर पर महाश्रमण मुदितकुमार का नाम धोषित किया था ! परम्परा के अनुरूप आचार्य श्री ने नव नियुक्त युवाचार्य महाश्रमण मुदितकुमार जी को पछेवडी ओढाई ओर अपने वाम पाशर्व में पट पर बैठने की आज्ञा प्रदान की ! आसान ग्रहण के साथ ही हर्ष से पंडाल गूंज उठा!

जीवन परिचय
राजस्थान के इतिहासिक नगर सरदारशहर में पिता झुमरमल एवं माँ नेमादेवी के घर 13 मई 1962 को जन्म लेने वाला बालक मोहन के मन में मात्र 12 वर्ष की उम्र में धार्मिक चेतना का प्रवाह फुट पड़ा एवं 5 मई 1974 को तत्कालीन आचार्य तुलसी के दिशा निर्दशानुसार मुनि श्री सुमेरमलजी "लाडनू " के हाथो बालक मोहन दीक्षित होकर जैन साधू बन गये !

धर्म परम्पराओ के अनुशार उन्हें नया नाम मिला "मुनि मुदित"
आज तेरापंथ धर्म संध को सूर्य से तेज लिए चाँद भरी धार्मिक,आध्यात्मिक मधुरता लिए 11 वे आचार्य के रूप में आचार्य महाश्रमण मिल गया है ! विश्व के कोने कोने में भैक्षव (भिक्षु) शासन की जय जयकार हो रही है!

भाई बहन : छह भाई, दो बहिने ( आचार्य श्री महाश्रमण जी सातवे क्रम में )
गोर वर्ण , आकर्षक मुख मंडल , सहज मुस्कान से परिपूर्ण , विनम्रता , दृढ़ता , शालीनता, व् सहजता जैसे गुणों से ओत:प्रोत आचार्य महाश्रमणजी से न केवल तेरापंथ अपितु पूरा धार्मिक जगत आशा भरी नजरो से निहार रहा है ! तेरापंथ के अधिनायकदेव भिक्षु, अणुव्रत के प्रणेता आचार्य तुलसी एवं श्रेद्धेय जैनयोग
पुनरुद्वारक प्रेक्षा प्रणेता महाप्रज्ञजी के पथ वहाक आचार्य श्री महाश्रमणजी हम सबका ही नही , पूरी मानव जाती का पथदर्शन करते रहेंगे !

700 साधू- साध्वीया, श्रमण- श्रमणीयो, एवं सैकड़ो श्रावक- श्राविकाओं को सम्भालना एवं धर्म संघ एवं आस्था से बांधे रखना बड़ा ही दुर्लभ है! आज के युग में हम एक परिवार को एक धागे में पिरोके नही रख सकते तब तेरापंथ धर्मसंघ के इस विटाट स्वरूप को एक धागे में पिरोकर रखना, वास्तव में कोई महान देव पुरुष ही होगा जो तेरापंथ के आचार्य पद को शुभोषित कर रहे है!

आचार्य महाश्रमण, आचार्य महाप्रज्ञ एवं आचार्य तुलसी के संग तेरापंथ के ११ वे आचार्य के रूप में आचार्य श्री महाश्रमण, युगप्रधान गणाधिपति आचार्यश्री तुलसी, एवं आचार्य महाप्रज्ञ के सक्षम उतराधिकारी हैं। बुद्धि,प्रज्ञा,विनय और समर्पण का उनके जीवन में अद्भुत संयोग है।
आचार्य महाश्रमण का आचार्य पद पर अभिषेक हुआ इसका वीडियो देखे

आचार्य महाश्रमण का पदाभिषेक क़ी गूंज पुरे ब्रह्माण्ड में

Posted: 23 मई 2010
Yuvacharya Mahashraman 01सरदारशहर के गांघी विद्या मन्दिर स्थित इंजनियरिंग कोलेज मैदान में आज सुबह ८:३० तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारवे आचार्य के रूप में आचार्य श्री महाश्रमण का विधिवत आचार्यपट पर अभिषेक हुआ!. सम्पूर्ण धर्म संघ कि ओर से मुनि सुमेरमलजी ने  नव नियुक्त आचार्य महाश्रमण जी कों उत्तरीय (पछेवड़ी)ओढाकर आचार्य पदाभिषेक  परम्परा का निर्वहन किया! साध्वी प्रमुखा कनकप्रभाजी ने नवीन धर्मध्वज रजोहरण व प्रमार्जनी समर्पित कर  गुरु के प्रति आस्था प्रकट क़ी. साध्वी प्रमुखा कनक प्रभाजी एवं मुख्य नियोजिका साध्वी विश्रुतविभा समेत सम्पूर्ण धर्म संघ ने अपने नये गुरु क़ी वन्दना क़ी. समारोह में देश विदेश से करीब ५० हजार लोगो कि उपस्थिति दर्ज हुई. मुंबई से स्पेशल ट्रेन क़ी व्यवस्था कि गई थी. भारत के पूर्व प्रधान मंत्री लालक्रष्ण आडवाणी, श्री राजनाथसिह एवं अनेक सासद मंत्री विधायक भी ईस शुभ अवसर पर उपस्थित रहे!  प्रशानिक अधिकारी पुरे लावलस्कर के साथ व्यवस्था बनाए रखने में योगदान कर रहे थे! पूरा कर्यक्रम पांच चरणों में विभाजित था!
आचार्य तुलसी एवं आचार्य महाप्रज्ञ के संदेशो क़ी कैसेट बजते ही पूरा पंडाल धर्ममय हो गया!  कोलकता के कारीगरों द्वारा ख़ास रूप से तैयार किया गया सूर्य क़ी आकृति  के बिच पट्ट के बीचो बिच संखनाद क़ी मधुर आवाजो एवं मन्त्रो उच्चारण के साथ आचार्य महाश्रमण आचार्य के पट्ट पर बिराजे! इस मुख्य घटना कों टीवी के माध्यम देश विदेश के लाखो लोगो ने देखा एवं नव नियुक्त आचार्य क़ी जय जयकार पुरे ब्रह्माण्ड  में गूंजी..

Yuvacharya Mahashraman - 10th Acharya Mahaprajna - 9th Acharya Tulsi

(आचार्य महाश्रमण, आचार्य महाप्रज्ञ एवं आचार्य तुलसी के संग )
तेरापंथ के ११ वे आचार्य के रूप में पदाभिषेक आचार्य श्री महाश्रमण, युगप्रधान गणाधिपति आचार्यश्री तुलसी, एवं आचार्य महाप्रज्ञ के सक्षम उतराधिकारी हैं। बुद्धि,प्रज्ञा,विनय और समर्पण का उनके जीवन में अद्भुत संयोग है।

यशस्विता के शिखर की और निरंतर बढ़ते हुए मानव मात्र को शान्ति और आनंदमय जीवन जीने का बोध पाठ सुनाते सुनाते लोकमहर्षि आचार्य महाप्रज्ञ ९ मई २०१० को अचानक मोंन  हो गये !

अनुव्रत अनुशास्ता महाप्रज्ञ मूलत: जैन तेरापंथ धर्मसंघ के दसवे आचार्य थे. पद्रह वर्ष के अपने छोटे- से आचार्य काल में महाप्रज्ञ ने अनेक उल्लेखनीय कार्य किये और उनकी ख्याति विश्व के बोद्धिक जगत में व्याप्त हो गई!
तेरह वर्ष पूर्व अपने शिष्य महाश्रमण मुदित को युवाचार्य पद देकर तेरापंथ का भावी आचार्य घोषित कर दिया था ! और अब आचार्य महाश्रमण तेरापंथ के ग्यारवे आचार्य है.

तेरापंथ के प्रवर्तक आचार्य भिक्षु श्रमण परंपरा के महान संवाहक थे। वि.स. १८३२ में आचार्य भिक्षु ने अपने प्रमुख शिष्य भारमलजी को अपना उतराधिकारी घोषित किया। उसी समय संघीय मर्यादाओं का भी निर्माण किया। उन्होंने पहला मर्यादा पत्र इसी वर्ष मार्ग शीर्ष कृष्णा सप्तमी को लिखा। उसके बाद समय समय पर नई मर्यादाओं के निमार्ण से संघ को सुदृढ करते रहे। एक आचार्य में संघ की शक्ति को केन्द्रित कर उन्होंने सुदृढ संगठन की निव डाली। इससे अपने अपने शिष्य बनाने की परंपरा का विच्छेद हो गया। भावी आचार्य के चुनाव का दायित्व भी उन्होंने वर्तमान आचार्य को सौंपा। आज तेरापंथ धर्म संघ अनुशासित - मर्यादित और व्यवस्थित धर्म संघ है, इसका श्रेय आचार्य भिक्षु कृत इन्हीं मर्यादाओं को है।
तेरापंथ धर्म संध के आचार्य पद का महत्व आचार्य भिक्षु ने दो पक्तियों में विस्तृत किया

"तेरापंथ की क्या पहचान ?
एक गुरु और विधान !!"

तात्पर्य स्पष्ट है की पूरा घर्म संघ एक आचार्य के अनुशासन में रहे! ९०० साधू, साध्वीया, श्रमण , श्रमणीया, श्रावक श्राविकाए सभी एक आचार्य के शासन में चले! कोई भी अपने टोले (ग्रुप ) बनाकर धर्ममत विभाजन नही कर सकता! आचार्य के अधिकार में है साधू-साध्वी, श्रमण- श्रमणीयो के शिक्षा, दीक्षा, विहार, चातुर्मास इत्यादि, ...

तेरापंथ धर्म संध की सघीय व्यवस्थाओं को देख मै  दंग रह जाता हु ! इतनी महत्वपूर्ण एवं अनुशासित ढंग से संघ एवं धर्म की पालना करते हुए एक आचार्य सफलता पूर्वक अपने दातित्व का निर्वाह कैसे करते होंगे ?
९०० साधू- साध्वीया, श्रमण- श्रमणीयो, एवं सैकड़ो श्रावक- श्राविकाओं को सम्भालना एवं धर्म संघ एवं आस्था से बांधे रखना बड़ा ही दुर्लभ है! आज के युग में हम एक परिवार को एक धागे में पिरोके नही रख सकते तब तेरापंथ धर्मसंघ के इस विटाट स्वरूप को एक धागे में पिरोकर रखना, वास्तव में कोई महान देव पुरुष ही होगा जो तेरापंथ के आचार्य पद को शुभोषित कर रहे है!

राजस्थान के इतिहासिक नगर सरदारशहर में पिता झुमरमल एवं माँ नेमादेवी के घर १३ मई १९६२ को जन्म लेने वाला बालक मोहन के मन में मात्र १२ वर्ष की उम्र में धार्मिक चेतना का प्रवाह फुट पड़ा एवं ५ मई १९७४ को तत्कालीन आचार्य तुलसी के दिशा निर्दशानुसार मुनि श्री सुमेरमलजी "लाडनू " के हाथो बालक मोहन दीक्षित होकर जैन साधू बन गये ! धर्म परम्पराओ के अनुशार उन्हें नया नाम मिला "मुनि मुदित"

९ सितम्बर १९८९ को लाडनू शहर में मुनि मुदित को महाश्रमण पद दिया गया! परम्परा के अनुशार जब आचार्य तुलसी नही रहे और आचार्य महाप्रज्ञ विधिवत आचार्य बने तो महाश्रमण मुदित को अपना उतराधिकारी घोषित करते हुए युवाचार्य महाश्रमण नाम दिया ! आज तेरापंथ धर्म संध को सूर्य से तेज लिए चाँद भरी धार्मिक,आध्यात्मिक मधुरता लिए ११ वे आचार्य के रूप में आचार्य महाश्रमण मिल गया है! विश्व के कोने कोने में भैक्षव (भिक्षु) शासन की जय जयकार हो रही है!
Acharya Mahaprajna(10th) - Yuvacharya Mahashraman -  Acharya Tulsi(9th)

आचार्य महाप्रज्ञ एवं  आचार्य तुलसी से शासन प्रसासन के गुण सीखते हुए आचार्य महाश्रमण
आचार्य श्री महाश्रमण मानवता के लिए समर्पित जैन तेरापंथ के उज्जवल भविष्य है। प्राचीन गुरू परंपरा की श्रृंखला में आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा अपने उतराधिकारी के रूप में मनोनीत युवाचार्य महाश्रमण विनम्रता की प्रतिमूर्ति है। अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी की उन्होंने अनन्य सेवा की। तुलसी-महाप्रज्ञ जैसे सक्षम महापुरूषों द्वारा वे तराशे  गये है। १६ फरवरी १९८६, उदयपुर में महाप्रज्ञ के अंतरंग सहयोगी बने। १३ मई १९८६, ब्यावर में वे अग्रगण्य (ग्रुप लीडर) बने। वे अल्पभाषी है।

जन्ममात प्रतिभा के धनी आचार्य महाश्रमण अपने चिंतन को निर्णय व परिणाम तक पहुंचाने में बडे सिद्धहस्त हैं। उसी की फलश्रुति है कि उन्होंने आचार्य महाप्रज्ञ को उनकी जनकल्याणकारी प्रवृतियों के लिए युगप्रधान पद हेतु प्रस्तुत किया। हमारे ग्यारवे आचार्य श्री महाश्रमण उम्र से युवा है, उनकी सोच गंभीर है युक्ति पैनी है, दृष्टि सूक्ष्म है, चिंतन प्रैढ़ है तथा वे कठोर परिश्रमि है। उनकी प्रवचन शैली दिल को छूने वाली है। महाश्रमण की प्रज्ञा एवं प्रशासनिक सूझबूझ बेजोड़ है।

090502-1



जैन  तेरापंथ के आध्यप्रवत्क आचार्य भिक्षु प्रथम आचार्य  बने . ३०० वर्षो में तेरापंथ धर्मसंघ ने एक से एक प्रखर विद्द्वान आचार्यो  का वर्धहस्त मिला है. इसी परम्परा के पूर्व दस आचार्यो कों चित्र के माध्यम से वन्दन करते है!



(मेरा भाग्य रहा है क़ी मुझे समय समय पर आचार्य महाश्रमण जी के दर्शन एवं सेवा का लाभ मिला है. कई बार गुरु से आशीर्वाद स्वरूप ज्ञान भी मिला मार्गदर्शन भी मिला जो मेरे सामाजिक कार्यो में एवं मेरे जीवन उपयोगी रहा! )

(हरियाणा के भिवानी में जब आपश्री का चतुर्मास था तब गुरु चरणों में मुझे अपनी बात रखने का अवसर मिला! )