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नींव ही कमजोर पड़ रही है गृहस्थी की..!!

Posted: 23 जुलाई 2022

 इसके मूल कारण और जड़ पर कोई नहीं जा रहा है, जो कि अति संभव है एवं निम्न हैं:--

1, पीहरवालों की अनावश्यक  दखलंदाज़ी।

2, संस्कार विहीन शिक्षा

3, आपसी तालमेल का अभाव 

4, ज़ुबानदराज़ी

5, सहनशक्ति की कमी

6, आधुनिकता का आडम्बर

7, समाज का भय न होना

8, घमंड झूठे ज्ञान का

9, अपनों से अधिक गैरों की राय

10, परिवार से कटना।

 11.घण्टों मोबाइल पर चिपके रहना ,और घर गृहस्थी की तरफ ध्यान न देना। 

12. अहंकार के वशीभूत होना । 

पहले भी तो परिवार होता था,

और वो भी बड़ा।

लेकिन वर्षों आपस में निभती थी!

भय था , प्रेम था और रिश्तों की मर्यादित जवाबदेही भी।

पहले माँ बाप ये कहते थे कि मेरी बेटी गृह कार्य में दक्ष है, 

और अब कहते हैं कि मेरी बेटी नाज़ों से पली है । आज तक हमने तिनका भी नहीं उठवाया।

तो फिर करेगी क्या शादी के बाद ?

शिक्षा के घमँड में बेटी को आदरभाव,अच्छी बातें,घर के कामकाज सिखाना और परिवार चलाने के सँस्कार नहीं देते।

माँएं खुद की रसोई से ज्यादा बेटी के घर में क्या बना इसपर ध्यान देती हैं।

भले ही खुद के घर में रसोई में सब्जी जल रही है ।

मोबाईल तो है ही रात दिन बात करने के लिए।

परिवार के लिये किसी के पास समय नहीं।

या तो TV या फिर पड़ोसन से एक दूसरे की बुराई या फिर दूसरे के घरों में तांक-झांक।

जितने सदस्य उतने मोबाईल।

बस लगे रहो।

बुज़ुर्गों को तो बोझ समझते हैं।

पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन तक नहीं कर सकता।

सब अपने कमरे में।

वो भी मोबाईल पर।

बड़े घरों का हाल तो और भी खराब है।

कुत्ते बिल्ली के लिये समय है।

परिवार के लिये नहीं।

सबसे ज्यादा बदलाव तो इन दिनों महिलाओं में आया है।

दिन भर मनोरँजन, 

मोबाईल,

स्कूटी..कार पर घूमना फिरना ,

समय बचे तो बाज़ार जाकर शॉपिंग करना

और ब्यूटी पार्लर।

जहां घंटों लाईन भले ही लगानी पड़े ।

भोजन बनाने या परिवार के लिये समय नहीं।

होटल रोज़ नये-नये खुल रहे हैं।

जिसमें स्वाद के नाम पर कचरा बिक रहा है।

और साथ ही बिक रही है बीमारी एवं फैल रही है घर में अशांति।

आधुनिकता तो होटलबाज़ी में है।

बुज़ुर्ग तो हैं ही घर में बतौर चौकीदार।

पहले शादी ब्याह में महिलाएं गृहकार्य में हाथ बंटाने जाती थीं।

और अब नृत्य सीखकर।

क्यों कि महिला संगीत में अपनी नृत्य प्रतिभा जो दिखानी है।

जिस महिला की घर के काम में तबियत खराब रहती है वो भी घंटों नाच सकती है।

👌🏻घूँघट और साड़ी हटना तो चलो ठीक है,

*लेकिन बदन दिखाऊ कपड़े ?

बड़े छोटे की शर्म या डर रहा क्या ?

वरमाला में पूरी फूहड़ता।

कोई लड़के को उठा रहा है।

कोई लड़की को उठा रहा है 

और हम ये तमाशा देख रहे हैं, खुश होकर, मौन रहकर।

*माँ बाप बच्ची को शिक्षा तो बहुत दे रहे हैं ,

लेकिन उस शिक्षा के पीछे की सोच ?

ये सोच नहीं है कि परिवार को शिक्षित करें।

बल्कि दिमाग में ये है कि कहीं तलाक-वलाक हो जाये तो अपने पाँव पर खड़ी हो जाये

ख़ुद कमा खा ले।

जब ऐसी अनिष्ट सोच और आशंका पहले ही दिमाग में हो तो रिज़ल्ट तो वही सामने आना ही है।

 साइँस ये कहता है कि गर्भवती महिला अगर कमरे में सुन्दर शिशु की तस्वीर टांग ले तो शिशु भी सुन्दर और हृष्ट-पुष्ट होगा।

मतलब हमारी सोच का रिश्ता भविष्य से है।

बस यही सोच कि - अकेले भी जिंदगी जी लेगी गलत है ।

संतान सभी को प्रिय है।

लेकिन ऐसे लाड़ प्यार में हम उसका जीवन खराब कर रहे हैं।

पहले पुराने समय में , स्त्री तो  छोड़ो पुरुष भी थाने, कोर्ट कचहरी जाने से घबराते थे।

और शर्म भी करते थे।

लेकिन अब तो फैशन हो गया है।

पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ तलाकनामा तो जेब में लेकर घूमते हैं।

पहले समाज के चार लोगों की राय मानी जाती थी।

और अब तो समाज की कौन कहे , माँ बाप तक को जूते की नोंक पर रखते हैं।

सबसे खतरनाक है - ज़ुबान और भाषा,जिस पर अब कोई नियंत्रण नहीं रखना चाहता।

कभी-कभी न चाहते हुए भी चुप रहकर घर को बिगड़ने से बचाया जा सकता है।

लेकिन चुप रहना कमज़ोरी समझा जाता है। आखिर शिक्षित जो हैं।

और हम किसी से कम नहीं वाली सोच जो विरासत में मिली है।

आखिर झुक गये तो माँ बाप की इज्जत चली जायेगी।

गोली से बड़ा घाव बोली का होता है।

आज समाज ,सरकार व सभी चैनल केवल महिलाओं के हित की बात करते हैं।

पुरुष जैसे अत्याचारी और नरभक्षी हों।

बेटा भी तो पुरुष ही है।

एक अच्छा पति भी तो पुरुष ही है।

जो खुद सुबह से शाम तक दौड़ता है, परिवार की खुशहाली के लिये।

खुद के पास भले ही पहनने के कपड़े न हों।

घरवाली के लिये हार के सपने ज़रूर देखता है।

बच्चों को महँगी शिक्षा देता है।

मैं मानता हूँ पहले नारी अबला थी।

माँ बाप से एक चिठ्ठी को मोहताज़।

और बड़े परिवार के काम का बोझ।

अब ऐसा है क्या ?

सारी आज़ादी।

मनोरंजन हेतु TV,

कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन, 

मसाला पीसने के लिए मिक्सी, 

*रेडिमेड  पैक्ड आटा,

पैसे हैं तो नौकर-चाकर,

घूमने को स्कूटी या कार 

फिर भी और आज़ादी चाहिये।

आखिर ये मृगतृष्णा का अंत कब और कैसे होगा ?

घर में कोई काम ही नहीं बचा।

दो लोगों का परिवार।

उस पर भी ताना।।

कि रात दिन काम कर रही हूं।

ब्यूटी पार्लर आधे घंटे जाना आधे घंटे आना और एक घंटे सजना नहीं अखरता।

लेकिन दो रोटी बनाना अखर जाता है।

कोई कुछ बोला तो क्यों बोला ?

बस यही सब वजह है घर बिगड़ने की।

खुद की जगह घर को सजाने में ध्यान दें , तो ये सब न हो।

समय होकर भी समय कम है परिवार के लिये।

ऐसे में परिवार तो टूटेंगे ही।

पहले की हवेलियां सैकड़ों बरसों से खड़ी हैं।और पुराने रिश्ते भी।

आज बिड़ला सीमेन्ट वाले मजबूत घर कुछ दिनों में ही धराशायी। और रिश्ते भी महीनों में खत्म।

इसका कारण है

रिश्तों  मे ग़लत सँस्कार

खैर हम तो जी लिये।

सोचे आनेवाली पीढी।

घर चाहिये या दिखावे की आज़ादी ?

दिनभर बाहर घूमने के बाद रात तो घर में ही महफूज़ होती है।

आप मानो या ना मानो आप की मर्जी मगर यह कड़वा सत्य है।..


सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

आखिर 22 -23 साल के युवाओं को गंभीर बीमारी क्यों हो रही है !

Posted: 14 जून 2022



1. दस रू किलो टमाटर  लेकर ताजा चटनी खा सकते हैं,  मगर हम डेढ़ सौ रू किलो टमाटो साँस खाते हैं वो भी एक दो माह पहले बनी हुई बासी, कई प्रकार के केमिकल डला हुआ ।


2. पहले हम एक दिन पुराना घड़े का पानी नहीं पीते थे, घर में रोज सुबह घड़े का पानी बदलते थे, अब तीन माह पुराना बोतल का पानी बीस रू लीटर खरीद कर पी रहे हैं, केमिकल डला हुआ ।


3.  पचास रू लीटर का दूध हमे महंगा लगता हैं और सत्तर रू लीटर का दो महीने पहले बना हुआ कोल्ड ड्रिंक हम पी लेते हैं।इसमें पूरा का पूरा केमिकल डला हुआ ।


4. दो सौ रू पाव मिलने वाला शरीर को ताकत देने वाला ड्राई फ्रुट हमें महंगा लगता है मगर  200  रू. का मैदे से बना पीज्जा शान से खा रहे हैं, इसमे बहुत सारे केमिकल डला हुआ ।


5.  अपनी रसोई का सुबह का खाना हम शाम को खाना पसंद नहीं करते जब कि कंपनियों के छह छह माह पुराने सामान हम खा रहे हैं जबकि हम जानते है कि खाने को सुरक्षित रखने के लिए उसमें प्रिजर्वेटिव मिलाया जाता है।


6. विगत कई  माह के लाँकडाऊन में सबको संभवतः  समझ आ गया होगा कि बाहर के खाने के बिना भी हमारा जीवन चल सकता हैं बल्कि बेहतर चल सकता है।


सोचने योग्य एवं गंभीर विचारणीय विषय है, क्या कारण है कि 22-23 साल के युवा को हार्ट अटैक आ रहा है। हार्ट फेल हो रहा है ।   किडनी खराब हो रही है । लिवर फेल हो रहे है ।

कही यही सब तो कारण नहीं बन रहे है ।


खुद को बढ़ती उम्र के साथ स्वीकारना एक तनावमुक्त जीवन देता है। 

हर उम्र एक अलग तरह की खूबसूरती लेकर आती है  उसका आनंद लीजिये🙏

बाल रंगने है तो रंगिये, 

वज़न कम रखना है तो रखिये, 

मनचाहे कपड़े पहनने है तो पहनिए,

बच्चों की तरह खिलखिलाइये, 

अच्छा सोचिये, 

अच्छा माहौल रखिये, 

शीशे में दिखते हुए अपने अस्तित्व को स्वीकारिये। 


कोई भी क्रीम आपको गोरा नही बनाती, 

कोई शैम्पू बाल झड़ने नही रोकता,

कोई तेल बाल नही उगाता, 

कोई साबुन आपको बच्चों जैसी स्किन नही देता। 

चाहे वो प्रॉक्टर गैम्बल हो या पतंजलि .....सब सामान बेचने के लिए झूठ बोलते हैं। 


ये सब कुदरती होता है। 

उम्र बढ़ने पर त्वचा से लेकर बॉलों तक मे बदलाव आता है। 

पुरानी मशीन को Maintain करके बढ़िया चला तो सकते हैं, पर उसे नई नही कर सकते।


ना किसी टूथपेस्ट में नमक होता है ना किसी मे नीम। 

किसी क्रीम में केसर नही होती, क्योंकि 2 ग्राम केसर भी 500 रुपए से कम की नही होती ! 


कोई बात नही अगर आपकी नाक मोटी है तो,

कोई बात नही आपकी आंखें छोटी हैं तो,

कोई बात नही अगर आप गोरे नही हैं 

या आपके होंठों की shape perfect नही हैं....


फिर भी हम सुंदर हैं, 

अपनी सुंदरता को पहचानिए।


दूसरों से कमेंट या वाह वाही लूटने के लिए सुंदर दिखने से ज्यादा ज़रूरी है, अपनी सुंदरता को महसूस करना।


हर बच्चा सुंदर इसलिये दिखता है कि वो छल कपट से परे मासूम होता है और बडे होने पर जब हम छल व कपट से जीवन जीने लगते है तो वो मासूमियत खो देते हैं 

...और उस सुंदरता को पैसे खर्च करके खरीदने का प्रयास करते हैं।


मन की खूबसूरती पर ध्यान दो।

पेट निकल गया तो कोई बात नही उसके लिए शर्माना ज़रूरी नही।

आपका शरीर आपकी उम्र के साथ बदलता है तो वज़न भी उसी हिसाब से घटता बढ़ता है उसे समझिये।


सारा इंटरनेट और सोशल मीडिया तरह तरह के उपदेशों से भरा रहता है,

यह खाओ, वो मत खाओ 

ठंडा खाओ, गर्म पीओ, 

कपाल भाती करो,  

सवेरे नीम्बू पीओ,

रात को दूध पीओ

ज़ोर से सांस लो, लंबी सांस लो 

दाहिने से सोइये ,

बाहिने से उठिए,

हरी सब्जी खाओ, 

दाल में प्रोटीन है,

दाल से क्रिएटिनिन बढ़ जायेगा।


अगर पूरे एक दिन सारे उपदेशों को पढ़ने लगें तो पता चलेगा 

ये ज़िन्दगी बेकार है ना कुछ खाने को बचेगा ना कुछ जीने को !!

आप डिप्रेस्ड हो जायेंगे।


ये सारा ऑर्गेनिक, एलोवेरा, करेला, मेथी, पतंजलि में फंसकर दिमाग का दही हो जाता है। 

स्वस्थ होना तो दूर स्ट्रेस हो जाता है।


अरे! अपन मरने के लिये जन्म लेते हैं,

कभी ना कभी तो मरना है अभी तक बाज़ार में अमृत बिकना शुरू नही हुआ।


हर चीज़ सही मात्रा में खाइये, 

हर वो चीज़ थोड़ी थोड़ी जो आपको अच्छी लगती है। 


भोजन का संबंध मन से होता है 

और मन अच्छे भोजन से ही खुश रहता है।

मन को मारकर खुश नही रहा जा सकता।

थोड़ा बहुत शारीरिक कार्य करते रहिए,

टहलने जाइये, 

लाइट कसरत करिये,

व्यस्त रहिये,  

खुश रहिये,

शरीर से ज्यादा मन को सुंदर रखिये।



सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

किडनी रोग के शीर्ष 6 कारण हैं

Posted:


संयुक्त राज्य अमेरिका में चिकित्सा अधिकारियों ने इसे हर किसी की मदद के लिए भेजा है। कृपया पढ़ें और अपना ख्याल रखें - डॉ. ओकेरे।

जिस दर से युवा किडनी की बीमारी से पीड़ित हो रहे हैं वह चिंताजनक है। मैं एक पोस्ट साझा कर रहा हूं जो हमारी मदद कर सकती है।

कृपया नीचे पढ़ें:


महत्वपूर्ण - किडनी सबसे अच्छी होती है।


बमुश्किल दो (2) दिन पहले, हम सभी को किडनी की बीमारी के कारण नाइजीरियाई अभिनेता के निधन की खबर मिली।

हमारे लोक कार्य मंत्री, माननीय टेको झील वर्तमान में गुर्दे की समस्याओं के साथ जीवन रक्षक प्रणाली पर अस्पताल में हैं। मैं आपको दिखाना चाहता हूं कि किडनी की बीमारी के इस खतरे से कैसे बचा जा सकता है।


तो यहाँ किडनी रोग के शीर्ष 6 कारण हैं:


1. शौचालय जाने में देरी करना। अपने मूत्राशय में अपने मूत्र को बहुत देर तक रखना एक बुरा विचार है। एक भरा हुआ मूत्राशय मूत्राशय को नुकसान पहुंचा सकता है। मूत्राशय में रहने वाला मूत्र बैक्टीरिया को जल्दी से गुणा करता है। एक बार जब मूत्र मूत्रवाहिनी और गुर्दे में वापस आ जाता है, तो विषाक्त पदार्थ गुर्दे में संक्रमण, फिर मूत्र पथ के संक्रमण, और फिर नेफ्रैटिस और यहां तक ​​कि यूरीमिया का कारण बन सकते हैं। जब प्रकृति बुलाती है - जितनी जल्दी हो सके करो।


2. ज्यादा नमक खाना। आपको रोजाना 5.8 ग्राम से ज्यादा नमक नहीं खाना चाहिए।


3. बहुत अधिक मांस खाना। आपके आहार में बहुत अधिक प्रोटीन आपके गुर्दे के लिए हानिकारक है। प्रोटीन पाचन अमोनिया पैदा करता है - एक विष जो आपके गुर्दे के लिए बहुत विनाशकारी है। अधिक मांस अधिक गुर्दे की क्षति के बराबर होता है।


4. बहुत ज्यादा कैफीन पीना। कैफीन कई सोडा और शीतल पेय का एक घटक है। इससे आपका ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है और आपकी किडनी खराब होने लगती है। इसलिए आपको रोजाना पीने वाले कोक की मात्रा कम कर देनी चाहिए।


5. पानी नहीं पीना। हमारे गुर्दे अपने कार्यों को अच्छी तरह से करने के लिए ठीक से हाइड्रेटेड होना चाहिए। यदि हम पर्याप्त मात्रा में नहीं पीते हैं, तो विषाक्त पदार्थ रक्त में जमा होना शुरू हो सकते हैं, क्योंकि गुर्दे के माध्यम से उन्हें निकालने के लिए पर्याप्त तरल पदार्थ नहीं होता है। रोजाना 10 गिलास से ज्यादा पानी पिएं। यह जांचने का एक आसान तरीका है कि क्या आप शराब पी रहे हैं

पर्याप्त पानी: अपने मूत्र के रंग को देखें; रंग जितना हल्का होगा, उतना अच्छा होगा।


6. देर से इलाज। अपनी सभी स्वास्थ्य समस्याओं का ठीक से इलाज करें और नियमित रूप से अपने स्वास्थ्य की जांच करवाएं। आइए अपनी मदद करें...भगवान इस साल आपको और आपके परिवार को हर बीमारी से बचाएंगे।


(३) इन गोलियों से बचें, ये बहुत खतरनाक हैं:

* डी-कोल्ड

* विक्स एक्शन-500

* ऐक्टिफेड 

* कोल्डारिन

* कोसोम

* नाइस 

* निमुलिड 

* सेट्रीजेट-डी

इनमें फेनिल प्रोपेनॉल-एमाइड, पीपीए होता है जो

स्ट्रोक का कारण बनता है और संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रतिबंधित है।


संयुक्त राज्य अमेरिका में डॉक्टरों ने सिल्वर नाइट्रो ऑक्साइड के कारण मनुष्यों में नया कैंसर पाया है।

जब भी आप रिचार्ज कार्ड खरीदें, अपने नाखूनों से खरोंच न करें, क्योंकि इसमें सिल्वर नाइट्रो ऑक्साइड कोटिंग होती है और यह त्वचा के कैंसर का कारण बन सकता है।


इस संदेश को अपने प्रियजनों के साथ साझा करें।


महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सुझाव:

1. बाएं कान से फोन कॉल का जवाब दें।

2. अपनी दवा ठंडे पानी के साथ न लें....

3. शाम 5 बजे के बाद भारी भोजन न करें।

4. सुबह ज्यादा पानी पिएं, रात को कम।

5. सोने का सबसे अच्छा समय रात 10 बजे से सुबह 4 बजे तक है।

6. दवा लेने के बाद या खाने के तुरंत बाद न लेटें।

7. जब फोन की बैटरी लो टू लास्ट बार हो, तो फोन का जवाब न दें, क्योंकि रेडिएशन 1000 गुना ज्यादा तेज होता है।


सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है


अक्षय तृतीया एवं उसका महत्व

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 अक्षय तृतीया जो उसका महत्व क्यों है जानिए कुछ महत्वपुर्ण जानकारी

-🙏 आज  ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था ।

🙏-महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था ।

🙏-माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था 

🙏-द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था ।

🙏- कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था ।

🙏- कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था ।

🙏-सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था ।

🙏-ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था ।

🙏- प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है ।

🙏- वृन्दावन  के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वो वस्त्र से ढके रहते है ।

🙏- इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था ।

🙏- अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है !


सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

जानिये क्या हैं वो 16 सुख

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 👌सोलह सुखों के बारे में सुना था तो जानिये क्या हैं वो सोलह सुख👌

1 पहला सुख निरोगी काया।

2 दूजा सुख घर में हो माया।

3 तीजा सुख कुलवंती नारी।

4 चौथा सुख सुत आज्ञाकारी।


5 पाँचवा सुख सदन हो अपना।

6 छट्ठा सुख सिर कोई ऋण ना।

7 सातवाँ सुख चले व्यापारा।

8 आठवाँ सुख हो सबका प्यारा।


9 नौवाँ सुख भाई औ' बहन हो ।

10 दसवाँ सुख न बैरी स्वजन हो।

11 ग्यारहवाँ मित्र हितैषी सच्चा।

12 बारहवाँ सुख पड़ौसी अच्छा।


13 तेरहवां सुख उत्तम हो शिक्षा।

14 चौदहवाँ सुख सद्गुरु से दीक्षा।

15 पंद्रहवाँ सुख हो साधु समागम।

16 सोलहवां सुख संतोष बसे मन।


16 सोलह सुख ये होते भाविक जन।

जो पावैं सोइ धन्य हो जीवन।।


हालांकि आज के समय में ये सभी सुख हर किसी को मिलना मुश्किल हैं, लेकिन इनमे से जितने भी सुख मिले उससे खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए.


हल्दी_रस्म व फिजूल खर्ची

Posted:

 #हल्दी_रस्म व फिजूल खर्ची


आज कल ग्रामीण परिवेश में होने वाली शादियों में एक नई रस्म का जन्म हुआ है #हल्दी_रस्म।

हल्दी रस्म के दौरान हजारों रूपये खर्च कर के विशेष डेकोरेशन किया जाता है, उस दिन दूल्हा या दुल्हन विशेष पीत (पीले) वस्त्र धारण करते हैं। साल दो साल पूर्व इस हल्दी रस्म का प्रचलन पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में तो ना के बराबर था लेकिन पिछले साल दो साल से इसका प्रचलन बढ़ा है। 


पुराने समय में  जरूर दूल्हे दुल्हन के चेहरे व शरीर की मृत त्वचा हटाने, मुलायम करने व चेहरे को गोरा और चमकदार बनाने के लिए हल्दी, चंदन, आटे, दूध आदि का उबटन बनाकर शरीर पर लगाया जाता था। पुराने समय में ना तो आज की तरह साबुन व शैम्पू थे ना ही ब्यूटी पार्लर। हल्दी के उबटन से घिसघिस कर दूल्हे दुल्हन को गोरा किया जाता था। वो रस्म साधारण तरीके से शादी वाले दिन ज़रूर निभाई जाती रही है, आजकल की हल्दी रस्म मोडिफाइड हो गई है। जिसमें हजारों रूपये खर्च कर डेकोरेशन किया जाता है। महंगे पीले वस्त्र पहने जाते है। और यह पीला ड्रामा किया जाता है।


 आजकल देखने में आ रहा है कि आर्थिक रूप से असक्षम परिवार के लड़के भी इस लोक दिखावा में शामिल होकर परिवार को कर्ज के बोझ में धकेल रहे है। क्योंकि उन्हें अपने छुट भईए नेताओं, चवन्नी छाप दोस्तों को अपना ठरका दिखाना होता है। Insta, फेसबुक, आदि के लिए रील बनानी होती है। बेटे के रील बनाते बनाते बाप बिचारा रेल बन जाता है।

ऐसे ऐसे घरों में फिजूल खर्ची में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिन घरों में घर के नाम पर छप्पर है, घर की किवाड़ी नहीं है, बाप ने पसीने की पाई पाई जोड़ कर मकान का ढांचा खड़ा किया तो छत नहीं है, छत है तो प्लास्टर नहीं, प्लास्टर है तो दरवाजा नहीं है, बाप के पहनने के चप्पल नहीं है मां के ओढ़ने के लिए ढंग की चुनरी नहीं है लेकिन 10 वीं 12 वीं मरते डूबते पास करने वाले छिछोरे मां बाप की हैसियत से विपरीत जाकर अनावश्यक खर्चा जरूर करते हैं। 


ऐसे लड़के 1 रुपए की मजदूरी करना नहीं चाहते और सूखे दिखावे के चक्कर में मां बाप को कर्ज में धकेल देते हैं। ऐसे लड़कों के सैकड़ों ऐसे ही लूखे दोस्त होते हैं जिन्हें ये लोग प्यार से  #ब्रो कहते है। शादी विवाह में अपना स्टेटस बनाने के लिए जिसको ढंग से जानते भी नहीं उन्हें भी शादी में इन्वाइट करेंगे। किसी से सिफारिश लगाकर उपसरपंच, सरपंच, प्रधान, विधायक और नेताओं को बुलाते हैं ताकि गांव में इनका ठरका जमे। बहुत सारी गाडियां घर के आगे खड़ी देखने की उत्कंठा रखते हैं। किसी को बुलाए कोई आपत्ति नहीं लेकिन उन बड़े लोगों के साथ फोटो सेल्फी लेने में और उनके आगे पीछे घूमने में इतने मशगूल हो जाते है कि घर आए जीजा, फूफा, नाना, नानी, बहन , बुआ अड़ोसी पड़ोसी को चाय पानी का भी पूछना उचित नहीं समझते। अपने रिश्तेदारों की इस तरह की नाकद्री ठीक नहीं है। जरूरत पड़ने पर यही लोग सबसे आगे खड़े होते हैं जिन्हें आप हाशिए पर धकेल देते हो।


अन्य बहुत सारी फिजूलखर्ची जैसे डीजे बुक करवाना, लाइट डेकोरेशन करना, वीडियो शूट व ड्रोन कैमरा मंगाना, 15- 17 जोड़ी ड्रेस मंगवाना, 6-7 साफे ,शेरवानी, घोड़ी, पाइप पांडाल, स्टेज, पटाखे , एक वो झाग वाला डबिया (नाम तो मुझे आता नहीं ।) 


जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो उन परिवारों के बच्चों को मां बाप से जिद्द करके इस तरह की फिजूल खर्ची नहीं करवानी चाहिए। आजकल काफी जगह यह भी देखने को मिलता है कि बेटे मां - बाप से कहते है आप कुछ नहीं समझते।  मैं जब भी यह सुनता हूं पांवों के नीचे जमीन खिसक जाती हैं। बड़ी चिंता होती हैं कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। 


   @.....Copy.

सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है- BLOGER


बिखरते परिवार , टूटता समाज और दम तोड़ते रिश्ते.!

Posted:

 🖊️🖊️आज चिंता का विषय है🖊️🖊️ 


शादी के लिए 25 से ज्यादा उमर का ना होने दें

इस तथ्य को थोड़ा गहराई से पढिये ।

जरा सोचिए आज ये सब क्यों हो रहा है.?

👉 एक कटु सत्य..!!!


आजकल माँ-बाप भी जरूरत से ज्यादा लडकियों के घर में हस्तक्षेप करके उसका घर खराब करते हैं!


यह मत भूलो कि शादी के बाद असली माँ बाप उसके सास ससुर होते हैं।


आज जो हालात हैं उसके जिम्मेदार कौन है..?


सर्वाधिक ये आधुनिक शिक्षा के नाम पर संस्कार विहीन बच्चे। 

रिश्ते तो पहले होते थे। अब रिश्ते नही सौदे होते हैं।


किसी भी माँ बाप मे अब इतनी हिम्मत शेष नही बची कि बच्चों का रिश्ता अपनी मर्जी से कर सकें।

पहले खानदान देखते थे। सामाजिक पकङ और सँस्कार देखते थे और अब ....


मन की नही तन की सुन्दरता , नौकरी , दौलत , कार , बँगला। 

लङके वालो को लङकी बङे घर की चाहिए ताकि भरपूर दहेज मिल सके और लङकी वालोँ को पैसे वाला लङका ताकि बेटी को काम करना न पङे।


नौकर चाकर हो। परिवार छोटा ही हो ताकि काम न करना पङे और इस छोटे के चक्कर मे परिवार कुछ ज्यादा ही छोटा हो गया है।

दादा दादी तो छोङो , माँ बाप भी बोझ बन गये हैं। आज परिवार सिर्फ़ मतलब के लिए रह गया.!!

                

परिवार मतलब पति पत्नी और बच्चे बस। जब परिवार इतना छोटा है तो फिर समाज को कौन पूछता है..?

लङका चाहे 20 हजार महीने ही कमाता हो। व्यापारी लङका भले ही दो लाख महीने कमाता हो पहली पसंद नौकरीपेशा ही होगा।


इसका कारण केवल ये है कि नौकरी वाला दूर और अलग रहेगा। नौकरी के नाम पर फुल आजादी मिलेगी , काम का बोझ भी कम। आये दिन होटल मे खाना घूमना।


नौकरीपेशा वालों का समाज से सम्बन्ध भी कम ही मिलेगा ऐसे मे समाज का डर भी नही।


सँयुक्त और बङा परिवार सदैव अच्छा होता है। पाँच मे तीन गलत होंगे तो दो तो सही होंगे क्योंकि पाँचो उँगलियाँ बराबर नही होती। लेकिन एक ही है तो सही हो या गलत भुगतो। 


पहले रिश्तों में लोग कहते थे कि मेरी बेटी घर के सारे काम जानती है और अब....

हमने बेटी से कभी घर का काम नहीं कराया यह  कहने में शान समझते हैं।


आये दिन बायोडाटा ग्रुप खुल रहे हैं। उम्र मात्र 30 से 40 साल। एजुकेशन भी ऐसी कि  क्या कहना..

कई डिग्री धारक रोज सैकङों लङके और लङकियों के बायोडाटा आ रहे हैं लेकिन रिश्ते नही हो रहे हैं। इसका कारण एक ही है..


इन्हें रिश्ता नहीं बेहतर की तलाश है। रिश्तों का बाजार सजा है गाङियों की तरह। शायद और कोई नयी गाङी लांच हो जाये। इसी चक्कर मे उम्र बढ रही है। 

अब तो और भी बायोडाटा ग्रुप बन रहे हैं।

तलाकशुदा ग्रुप

विधवा विधुर ग्रुप 

अजीब सा तमाशा हो रहा है। अच्छे की तलाश में सब अधेङ हो रहे हैं।


अब इनको कौन समझाये कि एक उम्र में जो चेहरे में चमक होती है वो अधेड होने पर कायम नही रहती , भले ही लाख रंगरोगन करवा लो ब्युटिपार्लर में जाकर।


एक चीज और संक्रमण की तरह फैल रही है। नौकरी वाले लङके को नौकरी वाली ही लड़की चाहिये। 


अब जब वो खुद ही कमायेगी तो क्यों तुम्हारी या तुम्हारे माँ बाप की इज्जत करेगी.?

खाना होटल से मँगाओ या खुद बनाओ

बस यही सब कारण है आजकल अधिकाँश तनाव के

एक दूसरे पर अधिकार तो बिल्कुल ही नही रहा। उपर से सहनशीलता तो बिल्कुल भी नहीं। इसका अंत आत्महत्या और तलाक।


घर परिवार झुकने से चलता है , अकङने से नहीं.।

जीवन मे जीने के लिये दो रोटी और छोटे से घर की जरूरत है बस और सबसे जरुरी आपसी तालमेल और प्रेम प्यार की लेकिन.....

आजकल बड़ा घर व बड़ी गाड़ी ही चाहिए चाहे मालकिन की जगह दासी बनकर ही रहे।

एक गरीब अगर प्यार से रानी बनाकर भी रखे तो वो पहली पसंद नही हो सकती। नौकरी पसँद वालों को इतना ही कहूँगा कि अगर धीरुभाई अंबानी भी नौकरी पसँद करता तो आज लाखों नौकर उसके अधीन नही होते।


सोच बदलो.... 

माँ बाप भी आजकल जरुरत से ज्यादा लङकियों के घर मे हस्तक्षेप करके उसका घर खराब करते हैं।

मत भूलो शादी के बाद उसके असली माँ बाप उसके सास ससुर होते हैं। आपके घर तो बस मेहमान थी।


कई सास बहू के सामने बेटी की तारीफ करके अपना खुद का घर खुद खराब करती हैं। बेटी कभी भी बहू नही बन सकती। बेटी की चाहत खून के रिश्ते के कारण है लेकिन बहू अजनबी होकर भी आपकी गृहलक्ष्मी भी है , नौकरानी भी है और कुल चालक भी और आपके और आपके बेटे के मध्य सेतु भी। बहू खुश तो परिवार खुश अन्यथा....


आजकल हर घरों मे सारी सुविधाएं मौजूद हैं.... 

कपङा धोने की वाशिँग मशीन 

मसाला पीसने की मिक्सी

पानी भरने के लिए मोटर 

मनोरंजन के लिये टीवी 

बात करने मोबाइल 

फिर भी असँतुष्ट... 


पहले ये सब कोई सुविधा नहीं थी। पूरा मनोरंजन का साधन परिवार और घर का काम था , इसलिए फालतू की बातें दिमाग मे नहीं आती थी।

न तलाक न फाँसी 

आजकल दिन मे तीन बार आधा आधा घँटे मोबाइल मे बात करके , घँटो सीरियल देखकर , ब्युटिपार्लर मे समय बिताकर। 

मैं जब ये जुमला सुनता हूँ कि घर के काम से फुर्सत नही मिलती तो हंसी आती है। लड़कियों के लिये केवल इतना ही कहूँगा कि पहली बार ससुराल हो या कालेज लगभग बराबर होता है। थोङी बहुत अगर रैगिँग भी होती है तो सहन कर लो।


कालेज मे आज जूनियर हो तो कल सीनियर बनोगे। ससुराल मे आज बहू हो तो कल सास बनोगी।

समय से शादी करो। स्वभाव मे सहनशीलता लाओ। परिवार में सभी छोटे बङो का सम्मान करो। ब्याज सहित वापिस मिलेगा। 


आत्मधाती मत बनो। जीवन मे उतार चढाव आता है। सोचो समझो फिर फैसला लो। बङो से बराबर राय लो। उनके द्वारा बताए अनुभव पर पूरा विश्वास रखो।


समाज के लोगों से बस इतना ही निवेदन है कि समाज मे सही उम्र मे शादी हो। उस दिशा मे काम करें। कम खर्चीली हो। धनी सेठ करोङो रुपए बेवजह शादी मे लुटा देते हैं , उनके अनुसरण मे गरीब पिसते हैं।

🙏निवेदक 🙏

अखिल भारतीय जैन महासंघ


सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

प्राचीन जैन बायोलोजी:-

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 प्राचीन जैन बायोलोजी:-


1892 में Dmitry Ivanousky रशियन साइंस्टिस्ट ने बीमार तंबाकू के झाड़ का रस फिल्टर करके स्वस्थ प्लांट में डाला तो स्वस्थ प्लांट भी बीमार हो गया,तभी से दुनिया को वायरस के बारे में पहली बार पता चला लेकिन....


जैन धर्म में वायरस और बैक्टीरिया के बारे में 2500 साल प्राचीन जीवाभिगम और जीवविचार जैसे कई सूत्रों में वर्णन मिलता है-


1- परमात्मा महावीर के निर्वाण पर सूक्ष्म बैक्टीरिया उत्पन्न होने से साधु-साध्वियों ने अन्न-जल का त्याग कर दिया था।


2- "भद्रबाहुसंहिता" में भी भद्रबाहु स्वामी ने 2000 साल पहले बताया कि महामारी के वक्त संक्रमित व्यक्ति के स्पर्श किए हुए किसी भी वस्तु या लोहे आदि को ना छूए।


3- 17 वे तीर्थंकर कुंथूनाथस्वामी के जन्म के समय कुंथू अथार्त सूक्ष्म जीवो की रक्षा की बात कही गई है।


4-स्त्रिया मासिक धर्म में होती है तब उनके शरीर से निकलने वाली अशुद्धि और पसीने में भी हानिकारक वायरस होते हैं इसीलिए महिलाएं मासिक धर्म के समय self quarantined रहती है।


4- dead body में भी वायरस उत्पन्न होने से डेडबोडी का स्पर्श करने के बाद नहाने और सूतक के नियमों का पालन किया जाता है,जैनधर्म में डेडबोडी का अग्निसंस्कार किया जाता है क्योकि यदि कोरोना जैसे वायरस से ग्रसित मृतशरीर को दफना दिया जाए तो उसके दुष्परिणाम से नए रोग उत्पन्न हो सकते हैं।


 5-प्रभु महावीर ने कहा है-"जहा अंधकार होता है वहां जीवो की उत्पत्ति ज्यादा होती है", इसीलिए सूक्ष्म जीवो की रक्षा के लिए जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन निषेध है। और जब सूर्य की किरणों से सूर्योदय के 48 मिनट के बाद जीवों की उत्पत्ति रुक जाती है तब जैन लोग नवकारशी(दिन का पहला अन्न-जल ग्रहण करना) करते हैं।


5-कंदमूल‌ भी जमीन के नीचे अंधेरे में उगने के कारण उसके कण-कण में अनंत  जीव होते हैं(जैसे एक बीज=एक जीव, वैसे कंदमूल का एक कण=अनंत जीव) जिसकारण जैनधर्म में कंदमूल खाना निषेध है।


6- सूर्यग्रहण के वक्त भी अन्न-पानी ग्रहण करना निषेध कहा गया है वास्तव में सूर्य ग्रहण के कारण अंधकार होने से सूक्ष्म वायरस आदि जीवो की रक्षा हेतु अन्न-जल का त्याग करने को कहा गया है क्योंकि वायरस भोजन में मिलने पर रोग भी उत्पन्न कर सकते हैं।


7- अनंत तारामंडल में चंद्र की गति के अनुसार विशाखा रोहिणी आदि 27 नक्षत्र को माना गया है,22 जून पर आद्रा नक्षत्र शुरू होने पर मौसम आद्र हो जाता है जिसके कारण आम जैसे गीले फलों में बैक्टीरिया उत्पन्न होने शुरू हो जाते हैं   इसलिए जैन लोग 22 जून के बाद आम जैसे फलों का त्याग करते हैं।


8- जैन शास्त्रो अनुसार पानी से ही जीवो की उत्पत्ति होती है इसीलिए जैन धर्म में बासी भोजन का त्याग करने को कहा है, लेकिन वैफर,खाकरा या कोई भी सुखी वस्तु जिसमें पानी का अंश ना हो वह दूसरे दिन भी खाई जा सकती है।


9- जैन शास्त्रों अनुसार दही को जैविक नहीं बल्कि रासायनिक प्रक्रिया से जमाना चाहिए,जिसके लिए नींबू की कुछ बूंदे चांदी,संगमरमर,सुखी लाल मिर्च या सूखे नारियल के टुकड़े पर डालकर हल्के गर्म दूध में मिलाकर जैन रासायनिक विधि से दही जमाया जाना चाहिए।

जैन शास्त्रों में कहा है कि 2 रात के बाद रासायनिक पद्धति से जमाये गये दही में भी जैविक प्रक्रिया शुरू हो जाती है इसलिए 2 रात के बाद का दही खाना जैन धर्म में निषेध हैं।


10-द्विदल- दाल,चने आदि जिनके दाने के दो दल होते हैं वे द्विदल कहलाते हैं, कच्चे दूध,दही में द्विदल का आटा मिक्स किया जाए तो तुरंत ही दो इन्द्रिय वाले जीव उत्पन्न हो जाते हैं। इसीलिए जैन लोग कड़ी बनाते वक्त दही या छाछ को पहले गर्म करते हैं और फिर उसमें बेसन डालते हैं। ताकि जीवोत्पत्ति ना हो।


11- जैन शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य के वात्त,पित्त,मल,मूत्र,थूंक,पसीना वीर्य आदि 48 मिनट में ना सूखे तो उसमें असंख्य समुर्च्छिम सूक्ष्म मनुष्य जीवों की उत्पत्ति होती है।ये अतिसूक्ष्म जीव शुक्राणु की तरह होते हैं,

उनके सिर में आंख,कान,नाक, मुंह,स्पर्श पांचो इंद्रियां होती है,मात्र शरीर की जगह पूंछ होती है,

 इसीलिए जैन साधु इन सूक्ष्म जीवो की रक्षा के लिए स्नान ना करना आदि नियम पालन करते हैं,आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी लैब टेस्ट में यह जैन विज्ञान को 100% सही सिद्ध किया है।


12- जैनशास्त्रों अनुसार शहद,बटर(मक्खन),मांस(meat),शराब ये चारों महाविगई है जिनके प्रत्येक कण में प्रतिपल असंख्य दो इन्द्रिय वाले जीव (जिनके पास शरीर के साथ मात्र भोजन के लिए मुंह है,बाकि आंख,कान,नाक नही है ) ऐसे सूक्ष्म जीवो की उत्पत्ति होती रहती है।

मांसाहार में मात्र एक बडे पंचेन्द्रिय जीव की ही हत्या नहीं होती बल्कि मांस कच्चा हो या पक्का उसमें असंख्य सुक्ष्म दो इंन्द्रिय वाले जीव जिन्हें हम बैक्टीरिया कहते हैं प्रतिपल उत्पन्न होते रहते हैं,मांसभक्षण से उन असंख्य जीवो की भी हत्या होती है।


13-WHO report के अनुसार नोनवेज के कारण 159 अलग-अलग प्रकार की बीमारियों का खतरा रहता है। जिनमें heart disease,B.P.,kidney, strock,आदि मुख्य हैं।


14-   covid,sarc जैसे कई वायरस nonveg से ही पैदा हुए हैं,E.coli & BSE वायरस बीफ याने कि गाय के मांस से, trichinosis पोर्क याने कि सुअर के मांस से, salmonella चिकन से,scrapie मटन याने कि बकरे के मांस से एसे कई जानलेवा वायरस की उत्पत्ति का कारण nonveg ही है।


15- वैज्ञानिकों को यह 1679 में ही पता चला है कि butterfly के अंडे पहले caterpillar यानी की कानखजूरे या ईयल की तरह विकसित होते हैं, बाद में उनके पंख आने पर वे butterfly बन जाते हैं। लेकिन प्राचीन जैन शास्त्रों में लिखा है कि भ्रमर के डर से उसका ध्यान करते हुए ईयल खुद भ्रमर बन जाती है,जो इस वैज्ञानिक तथ्य को तो सिद्ध करता ही है,साथ ही जैनविज्ञान का साइकोलॉजी अप्रोच को भी सिद्ध करता है।


जैन धर्म में एकिन्द्रिय जीव से लेकर पांच इंन्द्रिय वाले मनुष्य तक के समस्त जीवों की मन,वचन,काया से अहिंसा का पालन करने को कहा. गया है।

जैन धर्म अनुसार अहिंसा ही परम धर्म है।

जैन धर्म अनुसार आत्मा ही ब्रह्म है।


सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

नींव ही कमजोर पड़ रही है गृहस्थी की..!!

Posted: 04 जून 2022

 सभी से अनुरोध है कि एक बार पढ़ियेगा अवश्य । काफी समय के बाद किसी ने बेहद आवश्यक व वर्तमान सामाजिक परिवेश मे दरकते रिश्ते पर चोट की हैं। 

अपनी प्रतिक्रिया भी दे, हो सकता आपका नजरिया अलग हो, आप सबके साथ अपनी बात रखे।


नींव ही कमजोर पड़ रही है गृहस्थी की..!! 

आज हर दिन किसी न किसी का घर खराब हो रहा है ।

*इसके मूल कारण और जड़ पर कोई नहीं जा रहा है, जो कि अति संभव है एवं निम्न हैं:--

1, पीहरवालों की अनावश्यक  दखलंदाज़ी।

2, संस्कार विहीन शिक्षा

3, आपसी तालमेल का अभाव 

4, ज़ुबानदराज़ी

5, सहनशक्ति की कमी

6, आधुनिकता का आडम्बर

7, समाज का भय न होना

8, घमंड झूठे ज्ञान का

9, अपनों से अधिक गैरों की राय

10, परिवार से कटना।

 11.घण्टों मोबाइल पर चिपके रहना ,और घर गृहस्थी की तरफ ध्यान न देना। 

12. अहंकार के वशीभूत होना । 

पहले भी तो परिवार होता था,

और वो भी बड़ा।

लेकिन वर्षों आपस में निभती थी!

भय था , प्रेम था और रिश्तों की मर्यादित जवाबदेही भी।

पहले माँ बाप ये कहते थे कि मेरी बेटी गृह कार्य में दक्ष है, 

और अब कहते हैं कि मेरी बेटी नाज़ों से पली है । आज तक हमने तिनका भी नहीं उठवाया।

तो फिर करेगी क्या शादी के बाद ?

शिक्षा के घमँड में बेटी को आदरभाव,अच्छी बातें,घर के कामकाज सिखाना और परिवार चलाने के सँस्कार नहीं देते।

माँएं खुद की रसोई से ज्यादा बेटी के घर में क्या बना इसपर ध्यान देती हैं।

भले ही खुद के घर में रसोई में सब्जी जल रही है ।

मोबाईल तो है ही रात दिन बात करने के लिए।

परिवार के लिये किसी के पास समय नहीं।

या तो TV या फिर पड़ोसन से एक दूसरे की बुराई या फिर दूसरे के घरों में तांक-झांक।

जितने सदस्य उतने मोबाईल।

बस लगे रहो।

बुज़ुर्गों को तो बोझ समझते हैं।

पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन तक नहीं कर सकता।

सब अपने कमरे में।

वो भी मोबाईल पर।

बड़े घरों का हाल तो और भी खराब है।

कुत्ते बिल्ली के लिये समय है।

परिवार के लिये नहीं।

सबसे ज्यादा बदलाव तो इन दिनों महिलाओं में आया है।

दिन भर मनोरँजन, 

मोबाईल,

स्कूटी..कार पर घूमना फिरना ,

समय बचे तो बाज़ार जाकर शॉपिंग करना

और ब्यूटी पार्लर।

जहां घंटों लाईन भले ही लगानी पड़े ।

भोजन बनाने या परिवार के लिये समय नहीं।

होटल रोज़ नये-नये खुल रहे हैं।

जिसमें स्वाद के नाम पर कचरा बिक रहा है।

और साथ ही बिक रही है बीमारी एवं फैल रही है घर में अशांति।

आधुनिकता तो होटलबाज़ी में है।

बुज़ुर्ग तो हैं ही घर में बतौर चौकीदार।

पहले शादी ब्याह में महिलाएं गृहकार्य में हाथ बंटाने जाती थीं।

और अब नृत्य सीखकर।

क्यों कि महिला संगीत में अपनी नृत्य प्रतिभा जो दिखानी है।

जिस महिला की घर के काम में तबियत खराब रहती है वो भी घंटों नाच सकती है।

👌🏻घूँघट और साड़ी हटना तो चलो ठीक है,

*लेकिन बदन दिखाऊ कपड़े ?

बड़े छोटे की शर्म या डर रहा क्या ?

वरमाला में पूरी फूहड़ता।

कोई लड़के को उठा रहा है।

कोई लड़की को उठा रहा है 

और हम ये तमाशा देख रहे हैं, खुश होकर, मौन रहकर।

*माँ बाप बच्ची को शिक्षा तो बहुत दे रहे हैं ,

लेकिन उस शिक्षा के पीछे की सोच ?

ये सोच नहीं है कि परिवार को शिक्षित करें।

बल्कि दिमाग में ये है कि कहीं तलाक-वलाक हो जाये तो अपने पाँव पर खड़ी हो जाये

ख़ुद कमा खा ले।

जब ऐसी अनिष्ट सोच और आशंका पहले ही दिमाग में हो तो रिज़ल्ट तो वही सामने आना ही है।

 साइँस ये कहता है कि गर्भवती महिला अगर कमरे में सुन्दर शिशु की तस्वीर टांग ले तो शिशु भी सुन्दर और हृष्ट-पुष्ट होगा।

मतलब हमारी सोच का रिश्ता भविष्य से है।

बस यही सोच कि - अकेले भी जिंदगी जी लेगी गलत है ।

संतान सभी को प्रिय है।

लेकिन ऐसे लाड़ प्यार में हम उसका जीवन खराब कर रहे हैं।

पहले पुराने समय में , स्त्री तो  छोड़ो पुरुष भी थाने, कोर्ट कचहरी जाने से घबराते थे।

और शर्म भी करते थे।

लेकिन अब तो फैशन हो गया है।

पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ तलाकनामा तो जेब में लेकर घूमते हैं।

पहले समाज के चार लोगों की राय मानी जाती थी।

और अब तो समाज की कौन कहे , माँ बाप तक को जूते की नोंक पर रखते हैं।

सबसे खतरनाक है - ज़ुबान और भाषा,जिस पर अब कोई नियंत्रण नहीं रखना चाहता।

कभी-कभी न चाहते हुए भी चुप रहकर घर को बिगड़ने से बचाया जा सकता है।

लेकिन चुप रहना कमज़ोरी समझा जाता है। आखिर शिक्षित जो हैं।

और हम किसी से कम नहीं वाली सोच जो विरासत में मिली है।

आखिर झुक गये तो माँ बाप की इज्जत चली जायेगी।

गोली से बड़ा घाव बोली का होता है।

आज समाज ,सरकार व सभी चैनल केवल महिलाओं के हित की बात करते हैं।

पुरुष जैसे अत्याचारी और नरभक्षी हों।

बेटा भी तो पुरुष ही है।

एक अच्छा पत…

मृत्यु का बदलता पैटर्न

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   मृत्यु का बदलता पैटर्न


          एक बेहतरीन गायक और शानदार शख्सियत कृष्णकुमार कुन्नाथ 'केके' मात्र 53 वर्ष की आयु में आज अचानक उस वक्त अपने फैंस को स्तब्ध छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए शांत हो गए जब वे कोलकाता के एक लाइव कार्यक्रम में मंच पर परफॉर्म कर रहे थे। अपना सबसे पसंदीदा काम करते हुए यानी गाने गाते हुए उन्होंने आखिरी साँसें ली,एक यही बात सोचकर उनके फैंस जरा सी तसल्ली महसूस कर सकते हैं। केके अपने पीछे परिवार में पत्नी व दो छोटे बच्चे छोड़ गए हैं। सोचता हूँ अन्य सेलेब्रिटीज़ की तरह उन्होंने भी आज हैल्दी ब्रेकफास्ट लिया होगा,दैनिक व्यायाम, योगा या जिम वर्कआउट किया होगा। कुछेक लोगों के साथ व्यावसायिक मीटिंग्स की होंगीं। आज के कार्यक्रम के लिए टिपटॉप तैयार होकर मंच पर पहुंचे होंगे जहाँ उन्हें एक यादगार हाई एनर्जी परफॉर्मेंस देनी थी। उनके शेड्यूल में अगले कुछ महीनों के कार्यक्रम पूर्व निर्धारित रहे होंगे। एक तिरेपन वर्षीय हैंडसम सेलेब्रिटी की जिंदगी शायद इससे भी अधिक व्यस्त रही होगी जितना मैं सोच पा रहा हूँ।


        2 सितंबर,2021 को इसी तरह 40 वर्षीय परफैक्टली फिट नजर आनेवाले अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला की हार्ट अटैक से मौत ने भी दर्शकों को चौंका कर रख दिया था। उन्होंने आधी रात को अपनी माँ से सीने में हल्का दर्द होने की शिकायत की और अस्पताल ले जाए जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। 


        कन्नड़ फिल्मों के सुपरस्टार और जानेमाने समाजसेवी 46 वर्षीय पुनीत राजकुमार की 26 अक्टूबर को बैंगलुरू में अचानक उस समय कार्डियक अरैस्ट के कारण मृत्यु हो गई जब वे प्रतिदिन की भाँति जिम में वर्कआउट कर रहे थे। वे कन्नड़ फैंस के दिलों में इस गहराई तक बसे हुए हैं कि आज उनकी मृत्यु के नौ महीने बाद भी हर गली,हर चौराहे पर गोलगप्पे बेचनेवाले से लेकर बड़े बड़े शोरूम वालों ने भी उनकी श्रद्धांजलि में बड़े-2 पोस्टर लगा रखे हैं।


        इन तीनों ही सेलेब्रिटीज़ ने अपने जीवन में हर मुमकिन वह कोशिश की होगी जिससे वे एक लंबा व स्वस्थ, सफल जीवन अपने परिवार के साथ बिता सकें। निस्संदेह ये सभी खानपान के परहेज से लेकर कसरत आदि सभी प्रयासों के द्वारा एक अनुशासित जीवन का पालन करते रहे होंगे। फिर भी किसी को 53,किसी को 46 तो किसी को 40 वर्ष में बहुत भागदौड़ कर कमाई हुई सारी संपत्ति,इतना स्ट्रैस लेकर,तिकड़में भिड़ाकर अर्जित किया हुआ सारा वैभव अचानक ही छोड़कर जाना पड़ा। ऐसा नहीं है कि जीवनभर भागदौड़ करके उन्होंने कोई गलती की। दुख मात्र यह होता है कि ये प्यारे-2 लोग अपनों से यह भी ना कह पाए कि अब चलता हूँ,अपना ख्याल रखना। जाते समय अपने बच्चों को सीने से नहीं लगा पाए,उन्हें आखिरी झप्पी नहीं दे पाए। दो चार दिन बीमार भी नहीं पड़े रहे कि कुछ आभास हो जाता तो माँ,पिता, पत्नी,दोस्तों से आखिरी बार अपने मन की कुछ साध कह लेते। 


       कुछ वर्षों पहले तक जब मैनें अपने बुजुर्गों को अंतिम यात्रा पर जाते देखा था, मुझे याद है वे आराम से हमारे सर पर हाथ रखकर हमें आशीर्वाद हुए,गीता का सोलहवां अध्याय सुनते हुए शांतिपूर्वक अंतिम सांसें लेते थे। कौन सी करधनी किस नातिन को तो कौन सा गुलूबंद किस बहू को देना है, बहुत संतोषपूर्वक मैनें कई को मृत्युशैया पर बताते देखा। गौदान का संकल्प भी होश रहते ले लिया करते थे। आजकल मृत्यु का पैटर्न बदल गया है। अब मृत्यु गीता का सोलहवां अध्याय सुनने सुनाने का सुअवसर नहीं देती। अब बेटे बहू,यार दोस्तों से हँसते बतियाते हुए जाने की साध पूरी होती नहीं देखी जा रही। बहुत से लोग तो इतनी युवावस्था में जा रहे हैं कि बहू,दामाद,नाती,पोतों जैसे सुख और कर्तव्यों का आनंद एक दिवास्वप्न ही रह गया है। 


     एक ही आग्रह है कि किसी से रूठकर ना बिछड़ें। किसी को रुलाकर ना सोएं। किसी को अपमानित करके बड़प्पन ना महसूस करें। किसी को दबाकर, किसी की स्थिति का फायदा उठाकर मूँछों पर ताव ना दें। हो सकता है जब तक हमें अपनी गलती महसूस हो तब तक वह जिसके प्रति हमसे अपराध हुआ है,अगर इस संसार को अलविदा कह दे तो हम किससे अपने अपराध क्षमा करवाएंगे,किससे माफी मांगेंगे। हम अपना मन उदार रखें। छोटीछोटी बातों को दिल से ना लगाएं। चोट और धोखा बेशक किसी से ना खाएं पर इतने तंगदिल भी ना हो जाएं कि प्रेम के दो बोल भी हमसे सुनने के लिए हमारे संपर्क में आनेवाले तरस जाएं। तनी हुई भृकुटि में तो हमारी अंतिम तस्वींरें भी सुंदर नहीं आएंगीं। 


           सर्वे भवंतु सुखिनः। 🙏

 साभार -विभिन्न  सोसियल  मीडिया /अज्ञात 

अपने दॉत गिरते देखना

Posted: 16 जुलाई 2009
स्वप्न और फल
सपने दुनिया मे बूढे बच्चे, मर्द, औरत सभी देखते है। कुछ सपने लोग जागती ऑखो से देखते है तो कुछ निन्द मे। कहते है कि मनुष्य सपने चेतन और अचेतन की बीच की अवस्था मे देखते है। प्रात: समय का सपना प्राय सच और सही माना गया है। डरावने सपने अधिकत्तर पेट की गडबडी और गैस बनने के कारण आते है। सपने ऐसे व्यक्ती को बताने चाहिए जो उसका सही-सही फल बता सके। हम "महावीर विचार" पत्रिका के कार्यकारी सम्पादक श्री नन्दलालजी भाटिया से "स्वपन और उसके वास्तविक फल" उनके इस सकलन को "हे प्रभू" के पाठको हेतु प्रस्तुत कर रहे है।
*पहाड का देखना -                     दुश्मन पर सफलता प्राप्त करने का सकेत।
*पानी के अन्दर खडे होना -        स्वास्थय उत्तम होने का सकेत।
*स्वय को पान खाते देखना-      समाज मे प्रतिष्ठा बढने की ओर सकेत।
*गुलाब का लाल फुल देखना -   ऐसे स्वपन से जीवन मे सुख और शान्ति प्राप्त होती है।
*पेड से उतरते  देखना -            असफलता का दोर शुरु होने का चिन्ह।
*अपने दॉत गिरते देखना -       किसी घनिष्ट सम्बन्धी की मृत्यू का समाचार या
                                               स्वय किसी स्मस्या से सामाना करना होगा।
*दही देखना -                           यात्रा का प्रतिक या शुभफलदायक।
*बिच्छू को मार डालना -          दुश्मन को पराजित करने का सकेत।
*सिर के बाल खुले देखना-        स्त्री के विवाह का प्रतिक।
*जगल देखना -                       यात्रा का प्रतिक।
*कैची का देखना -                    मित्र से भेट होना।
*स्वय को सफेद वस्त्र मे देखना       पवित्रता व सुख मिलने का प्रतिक है।
*नदी देखना -                                प्रसिद्धि एवम राहत मिलने का सकेत।
आन्धी या तुफान का देखना -         किसी बडी मुसीबत के आने के चिन्ह।
*विवाह का देखना-                        शोक और कष्ट का प्रतीक है।
*सॉप का देखना-                           दुश्मनका प्रतिरुप है। इस तरह सॉप खतरनाक होता है 
                                                    दुश्मन भी उतना ही खतरनाक होगा।

भाटिया़जी -    'क्या सपनो का फल स्त्री पुरुष के लिए सम्मान फलदायक होता है ?'
उतर- 'जो सपने प्रातकाल आते है और फलदायक होते है वे सपने  स्त्री या पुरुष जिसे भी आऐ वो जातक को प्रभावित करेगा। भगवान जो सकेत देना चाह रहे है वो उस इन्शान को सपने के माध्यम से पहुचा रहे है।'

भाटिया़जी -  'क्या सपनो का कोई वैज्ञानिक स्वरुप भी है।'
उतर- 'करीब तीन हजार वर्ष पुर्व से स्वपन शास्त्र का इतिहास हमारे सामने है। सत्ययुग मे देवी देवताओ और मानवो के बीच की यह साकेतिक भाषाए थी जो टेलिग्राम का काम करती थी। तब भी विज्ञान था। आज से भी उन्नत प्रकार का विज्ञान।

भाटियाजी - 'तब विज्ञान था ? समझा नही।'
उतर - 'रावण  मातासीता जी का अपर्हण करके विमान मे ले जाता है। अर्थ साफ है विमान आज के विज्ञान की देन नही बल्की सदियो पुर्व से है।'

भाटीयाजी - 'अन्तिम सवाल-  प्रातःकाल के सपनो का सत्य असत्य यह क्या जोड है ?'

उत्तर- प्रकृति अपने ढंग से भावी शुभाशुभ संकेत देती है। स्वप्न भी इसका माध्यम होते हैं। स्वप्नों के फलों की विवेचना के संदर्भ में भारतीय ग्रंथों में इनके देखे जाने के समय, तिथि व अवस्था के आधार पर इनके परिणामों का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है।

* शुक्ल पक्ष की षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी तथा कृष्ण पक्ष की सप्तमी तथा चतुर्दशी तिथि को देखा गया स्वप्न शीघ्र फल देने वाला होता है।

* रात्रि के प्रथम, द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ प्रहर के स्वप्नों का फल क्रमशः एक वर्ष, आठ माह, तीन माह व छः दिन में मिलता है।

'शास्त्रो मे कहा गया है की भोर यानी प्रात ४ बजे पुरे लोकजगत मे असुर शक्तीया क्षिण हो जाती है। उनका प्रभाव नकार रहता है । वो समय स्वय भगवान का वास होता है सृष्टि पर, यह समय एक घडी यानी ४८ मिनट तक रहता है। उपरोकत समय मे कोई भी राक्षक्षी गुण वाले देवी देवता किसी प्राणी को सताते नही है अर्थात गलत या असत्य फलकारी सन्देस प्रेषिता नही होते है।
इसमे सभी की अपनी अपनी मान्यता और अपना अपना अध्यन है।' स्वपन शास्त्र के जानकार अब इस ससार से प्राय विलुप्त से है।
 भाटियाजी आपका बहुत बहुत आभार !

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एक विदेशी लेखक की टांगे टूट गयी। उसने स्वप्न में देखा

Posted: 14 जुलाई 2009
स्वप्न और मन

लेखक आचार्य महाप्रज्ञ 
ध्यात्म के लोगों ने इस संसार को दो-तीन उपमाओं में उपमित किया है - 
स्वप्न, इंद्रजाल और मृगमरीचिका संसार स्वप्न - जैसा है। संसार इंद्रजाल के समान है। 
संसार मृगमरीचिका के समान है। भारतीय साहित्य में स्वप्न की बहुत चर्चा प्राप्त है। भारतीय विद्या की अनेक शाखाओं में स्वप्न के विषय में बहुत लिखा गया है। अष्टांगनिमित्त शास्त्र का अंग है - स्वप्नशास्त्र। भारत के लोग स्वप्न में बहुत विश्वास करते रहे हैं। ढाई-तीन हजार वर्ष पुराने साहित्य में स्वप्न-पाठकों का विस्तार से उल्लेख प्राप्त है। स्वप्न-पाठक स्वप्न को सुनकर उसका फल बताते थे। उनका फल-निरूपण अक्षरश: सही होता था। स्त्रियों को गर्भावस्था में स्वप्न आने की बात मिलती है। वे स्वप्न-पाठकों से उस स्वप्नों का फलाफल जान लेती थी। जैन साहित्य, बौद्ध साहित्य में स्वप्न की घटनाएं प्रचुरता से प्राप्त हैं।  नींद और स्वप्न का संबंध है। प्रत्येक व्यक्ति स्वप्न देखता है। वह उसे याद रख सके या नहीं, विश्लेषण कर सके या नहीं, यह दूसरी बात है।
जैन आगमों में स्वप्न संबंधी विस्तृत सी जानकारियां यत्र-तत्र बिखरी पड़ी हैं। आदमी की तीन अवस्थाएं होती हैं - सुप्त अवस्था, निद्रा अवस्था और अर्धनिद्रा अवस्था। आदमी जब आधा जागता है, आधा सोता रहता है तब उसे स्वप्न आते हैं। स्वप्न में वास्तु-दर्शन के आधार पर उसके अनेक प्रकार होते हैं। उनके कुल 72 प्रकार हो जाते हैं। कुछ महास्वप्न होते हैं और कुछ सामान्य स्वप्न। कुछ स्वप्न यथार्थ होते हैं और कुछ अयथार्थ। कुछ स्वप्न सच्चे होते हैं और कुछ स्वप्न झूठे होते हैं। कुछ स्वप्न क्लेश करने वाले होते हैं और कुछ स्वप्न समाधि उत्पन्न करने वाले होते हैं। चित्त-समाधि की प्राप्ति के अनेक कारण हैं। उनमें एक कारण है
स्वप्न। ऐसे स्वप्न आते हैं, जिनसे उलझन सुलझ जाती है।   
विज्ञान की अनेक खोजों के साथ स्वप्न की बात जुड़ी हुई है। वैज्ञानिक को पूरा समाधान नहीं मिल रहा था,। स्वप्न ने उसकी गुत्थी सुलझा दी। सिलाई मशीन की खोज हुई। पूरा समाधान नहीं मिला। स्वप्न में समाधान मिल गया। मनोविज्ञान का पूरा एक विभाग 'स्वप्न-विज्ञान' से जुड़ा हुआ है। विशेषावश्यक भाष्य में बताया गया है कि संस्कारों के कारण स्वप्न आते हैं। मनोविज्ञान मानता है कि दमित इच्छाएं, अवचेतन मन की इच्छाएं, स्वप्न में प्रकट होती हैं। दिन में चेतन मन काम करता है। चेतन में बुद्धि है, तर्क है, काट-छांट करने की शक्ति है। वह दिन में कार्यरत रहता है। जब आदमी सो जाता है तब वह निष्क्रिय हो जाता है और अवचेतन मन सक्रिय हो जाता है।  
स्वप्न श्रुत, दृष्ट या अनुभूत घटना का ही आता है। अश्रुत, अदृष्ट या अननुभूत घटना का कभी स्वप्न नहीं आता। कुछ लोग कहते हैं - हमें ऐसा स्वप्न आया जिसका दृश्य न श्रुत था, न दृष्ट था और न अनुभूत था। यह बात अन्यथा भी नहीं है। इसका भी पुष्ट कारण है। हमारी स्मृति केवल इस मस्तिष्क की स्मृति नहीं है, इससे परे की स्मृति है, पुर्वजन्म के संस्कारों की स्मृति है। इन संस्कारों की परतें हमारे मस्तिष्क में है। संभव है आज का मस्तिष्क-विज्ञानी इसे न जान पाया हो। अभी मस्तिष्क के अनेक रहस्य अज्ञात हैं। हजारों-हजारों वैज्ञानिक मस्तिष्क के अध्ययन में संलग्न हैं, पर आज भी वह रहस्य बना हुआ है।
 तेरापंथ के आठवें आचार्य कालूगणी कहते, जब कभी किसी समस्या का समाधान नहीं मिलता तो मैं उस समय उसको छोड़ देता। रात को स्वप्न में समाधान मिल जाता। ऐसा लगता है कि मानो कोई समाधान प्रस्तुत कर रहा है। कालूगणी को स्वप्न आया। स्वप्न में छोटे-छोटे बछड़े देखे। वह यथार्थ स्वप्न था। उसका फलित यह हुआ था कि शासन में छोटे-छोटे संत बहुत आए। श्रीमायाचार्य और आचार्यश्री तुलसी के अनेक स्वप्न लिखे पड़े हैं। उनकी सच्चाई असंदिग्ध है। उन स्वप्नों से प्रेरित होकर श्रीमायाचार्य ने अनेक कार्य संपादित किये। स्वप्न बहुत प्रेरक होते हैं।
संस्कृत का एक उच्चकोटि का ग्रंथ है - कादम्बरी। उसके लेखक हैं बाणभट्ट। इस ग्रंथ की पूरी कल्पना स्वप्न में ही की गयी थी। कल्पना को विस्तार दिया, महान ग्रंथ बन गया। 


स्वप्न की भाषा सांकेतिक होती है। उसे जो नहीं पकड़ पाता, वह स्वप्न को नहीं जान पाता। वह उसमें उलझ जाता है। उसका रास्ता बहुत टेढ़ा-मेढ़ा होता है। उसके दृश्य विचित्र होते हैं। कल्पना किसे कहते हैं? आदमी ने देश देखा है। आदमी ने आदमी को देखा है। स्वप्न में एक ऐसा प्राणी देखा, जिसका सिर शेर का है और शेष शरीर मनुष्य का। नरसिंह का रूप सामने आ गया। यह है कल्पना। कल्पना और स्वप्न की भाषा सांकेतिक होती है।


          

एक भिखारी भीख के लिए घर-घर घूम रहा था। कुछ मिला नहीं। अंत में एक घर में उसे थोड़े दाने मिले। कुछ दाने खा-पीकर वह सो गया। कुछ दाने शेष रह गये। थका-मांदा था ही। सोते ही नींद आ गयी। सपने में देखा कि एक फरिश्ता आकर उससे भीख मांग रहा है। भिखारी ने शेष बचे दानों में से एक दाना उसे दे दिया। यहां सपना पूरा हो गया। वह प्रात: उठा। उसने देखा उसके पात्र में और दाने वैसे ही पड़े हैं, केवल एक दाना सोने का हो गया। उसने सोचा - यदि मैं सारे दाने उस फरिश्ते को दे देता को आज निहाल हो जाता।


 सारे स्वप्न यथार्थ ही नहीं होते, अयथार्थ भी होते हैं। उन पर भरोसा करने वाला धोखा भी खा जाता हैएक पुजारी ने स्वप्न में देखा कि उसका मंदिर घेवरों से भर गया है। उसने सोचा, अच्छा अवसर है। मैं गांववालों को भोजन करा दूं। सुबह उठा। सारे गांव को न्योता आया। सभी लोग मंदिर पर आ गये। पुजारी सो रहा था। भोजन का समय अतिक्रांत हो गया। एक व्यक्ति ने पुजारी को उठाकर निमंत्रण की बात कही। पुजारी बोला - ठहरो! मैं स्वप्न ले रहा हूं। स्वप्न में जब घेवरों से मंदिर भर जाएगा, तब मैं आपको भोजन करा दूंगा। ये सब स्वप्न के घेवर थे।
स्वप्न के देवता पर, ज्योतिषी और स्वप्न पर पूरा भरोसा करना खतरे से खाली नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं कि मुझे स्वप्न में देवता ने ऐसा कहा है। वह उसके अनुसार काम करता है और फंस जाता है। इसमें एक बात और है कि स्वप्न की भाषा को समझना बहुत कठिन होता है। उसमें दिखता कुछ है और उसका अर्थ कुछ और ही होता है। इसीलिए ये सारी गड़बड़ियां होती हैं।


जैन आगमों में 
तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव और वासुदेव की माताएं गर्भावस्था से पूर्व स्वप्न देखती हैं। वे स्वप्न वस्तुपरक होते हैं। उनमें कलश, छत्र, सरोवर, माला आदि-आदि देखे जाते हैं। उनका अर्थ भिन्न-भिन्न होता है। ये सारे प्रतीक हैं। इन प्रतीकों का सही अर्थ जानना सहज नहीं होता। सभी तीर्थंकरों के प्रतीक चिह्न हैं। किसी का मृग, किसी का शेर, किसी का छत्र और किसी का सर्प। ये सब प्रतीक हैं।
स्वप्न भी प्रतीकात्मक होते हैं। दिन में जो घटनाएं घटती हैं, उनके स्वप्न भी आते हैं। यह पुनरावृत्ति होती है। चेतन मन में जो बात रही, वह अचेतन मन के द्वारा प्रकट हो जाती है। कुछ बातों का पूर्वाभास भी होता है। जो घटना भविष्य में घटित होने वाली है, उसको पहले ही जान लिया जाता है। यह है पूर्वाभास। यह बहुत सही होता है।


आचार्य भिक्षु जब उत्पन्न हुये तब मां ने सिंह का स्वप्न देखा था। वह भविष्य में उनकी शक्ति का प्रतीक था। दीक्षा के अवसर पर मां ने कहा - मैंने सिंह का स्वप्न देखा है। मेरा यह बेटा सिंह की भांति शक्तिशाली होगा। स्वप्न के आधार पर भविष्य को जान लिया।

स्वप्न का संबंध संस्कारों, पूर्व की घटनाओं, सुनी हुई या जानी हुई सूचनाओं से है। यह सूचना अवचेतन मन भी दे सकता है और कोई दिव्यात्मा भी दे सकता है। दिव्यात्माओं के कुछ विषय होते हैं। वे प्रत्यक्ष होकर कुछ नहीं कहते। स्वप्न में कुछ बातें बताते हैं। आपवादिक रूप में ही प्रत्यक्ष कुछ कहते हैं। वे दिव्यात्माएं अमंगल या मंगल की बात बता देती हैं।
स्वप्न के अनेक प्रकार होते हैं। काल के आधार पर भी उनका विभाजन होता है। कुछ स्वप्न दिन में आते हैं और कुछ रात में। कुछ रात के पहले प्रहर में और कुछ दूसरे-तीसरे और चौथे प्रहर में। कौन-सा कल्याणकारी होता है और कौन सा अकल्याणकारी - इसे सब नहीं जानते।  
 स्वप्न शास्त्र के भी अपने नियम हैं। एक नियम है कि कल्याणकारी स्वप्न आने के बाद तत्काल उठकर ईश्वर जाप में लग जाना चाहिए। पुन: नींद नहीं लेनी चाहिए। जो पुन: सो जाते हैं, उनके स्वप्न का इष्ट परिणाम नष्ट हो जाता है। दिन में लिये जाने वाले स्वप्न को दिवास्वप्न कहते हैं। इनमें भी कल्पना होती है। ये यथार्थ भी होते हैं।
स्वप्न के विषय में हमारी जानकारी बहुत ही कम है। यदि पूरी जानकारी हो तो उससे पूरा लाभ उठाया जा सकता है। स्वास्थ्य, संपदा, व्यापार, आध्यात्म विकास आदि के साथ स्वप्न जुड़े हुये होते हैं।
 एक विदेशी लेखक की टांगे टूट गयी। उसने स्वप्न में देखा कि एक फरिश्ता आया है, उसकी टांगे ठीक कर रहा है। प्रात: वह उठा, देखा कि उसकी टांगे ठीक हैं। वह चल-फिर सकता है।   
अध्यात्म-विद्या ने वस्तु की नश्वरशीलता को दिखाने के लिए स्वप्न की उपमा दी गयी है। जैसे स्वप्न की चीजें नश्वर होती हैं, स्वप्न नश्वर होता है, वैसे ही संसार के सभी पदार्थ नश्वर हैं।
 क भिखारी ने स्वप्न देखा कि वह राजा बन गया है। उसके महल हैं, रानियां हैं, हाथी-घोड़े हैं और वह ठाट-बाट से रह रहा है। इतने में ही एक कुत्ता आता है और सिरहाने रखे भिक्षापात्र को चाटने लगता है। भिक्षापात्र फूट जाता है। उसके स्वप्न का राजसी ठाट-बाट भी चुक जाता है। यह है संसार की नश्वरता।   
स्वप्न का बहुत बड़ा विज्ञान है। यह जीवन-दिशा को बदलने वाला, नीरस को सरस बनाने वाला होता है। यदि हम स्वप्न के प्रतीकों को समझ सकें, उसकी सांकेतिक भाषा को जान सकें तो स्वप्न में बहुत लाभान्वित हो सकते हैं।
सचमुच यह गूढ़ विद्या है। स्वप्न अच्छा हो या बुरा, यदि सही जानकारी होती है तो अनिष्ट से बचा जा सकता है और इष्ट को संपादित किया जा सकता है।
 
प्रस्तुति:        ललित गर्ग
सयोजन-     हे प्रभु यह तेरापन्थ 

नैनो का कमाल धमाल है, यह लाख टके का सवाल है।

Posted: 21 मार्च 2009


नैनो कि लोंचिग मे अब कुछ ही घंटे बाकी रहे है। 23 मार्च 2009 सुबह ठीक 9 बजे टाटा समुह के चेयरमेन रतन टाटा स्वय इस बहुप्रतिक्षित प्रयोजना को आम जनता के लिऐ खोल देगे।

एक अनुमान के मुताबिक नैनो कि बुकिंग पॉच लाख गाडीयो तक पहुच सकती है। जो टाटा के मोजुदा उत्पादन क्षमता से कही ज्यादा होगी।

उम्मीद जताई जा रही है कि टाटामोटर्स दुनिया कि सबसे सस्ती कार के लिए सत्तर हजार रुपया बुकिंग डिपोजिट और पॉचसो रुपया बेसिक एप्लिकेशन फीस के रुप मे वसूलेगी। बढिया कीस्मत रखने वाले कुछ ग्राहको का पहला समूह चुनने के लिए 60 दिन वक्त लग सकता है। नैनो का आवन्टन कम्पुटर के जरीए होगा।

*टाटामोटर्स फिलाल पंतनगर और पुणे के कारखानो मे नैनो बना रही है। साणन्द कारखाना तैयार होने तक टाटामोटर्स कि क्षमता पर ब्रेक लगा रहेगा। ऐसे मे ग्राहको को डिलेवरी लेने मे दो से तिन महीने का इन्तजार करना पड सकता है। साणन्द मे हर साल ढाई लाख नैनो तैयार करने कि क्षमता होगी। पहले साल 60 से 70 हजार गाडियो से अधिक नही बन पाऐगी। टाटामोटर्स वास्तविक ग्राहक चाहती है इसलिए बुकिग राशि सत्तर हजार रखने जा रही है।

रतन टाटा का बहुप्रतीक्षित सपना सोमवार को पुरा होने जा रहा है। टाटाश्री ने एक सपना देखा था भारत के लिऐ, भारत कि गरिब जनता के लिऐ, और उन्होने कई मुश्किलो को पार कर उस सपने को साकार रुप प्रदान किया। वास्तव मे टाटाश्री ने भारत निर्माण मे अपना सर्वस लगा दिया। उन्होने अपने कलकारखानो से भारत एवम् भारतीय लोगो के जीवन निर्माण, उनकि ईच्छओ कि पुर्ति हेतु सर्वस लगा दिया। जे आर डी टाटा से लेकर रतन टाटा ने हमेसा ही देश एवम देश के लिऐ सोचा कभी भी उन्होने अपना घर भरने कि सोच नही रखी, बल्कि पुरे भारत को अपना घर समझा।


रतन टाटा एक बार अपनी कार से मुम्बई कि सड़को से जा रहे थे, तभी टाटा श्री ने देखा की दो पहिया पर मॉ पिता बच्चा बारिस मे भीगते हुए जा रहे है, उनके मन मे खयाल आया कि क्या भारत का आम आदमी कार रखने का सपना नही देख सकता है ? उहोने उसी क्षण ठान ली कि वो एक ऐसी सस्ती कार का निर्माण करेगे जो हर भारतीय खरीद सकता है और उनका पुरा परिवार उस कार मे सफर कर सके। आम आदमी का सपना होता है कि वो भी कार मे चले, किन्तु सपना सपना ही बनकर रह जाता है। टाटाश्री ने आम भारतीय के सपने को अपना सपना बना लिया। और उस सपने को नाम दिया नैनो

*पुरी दुनिया के लोग ऑखे लगाऐ बैठे है टाटा के इस सपने के साकार रुप को देखने। बडी बडी सरकारे जो कार्य नही कर सकती वो रतन टाटा ने १०० करोड लोगो के लिऐ कर दिखाया। टाटा ने भारत को अपना समझा भारतीय जनता को अपना परिवार माना। भारत उन कि आत्मा मे रचा बचा है। भारत निर्माण मे उनके इस योगदान मे सरकार को आगे आना चाहिऐ एवम टाटा श्री के साथ जो आम भारतीय ने सपना देखा है उसे पुरा करने मे सहयोग करना चाहिऐ।

मै रतन टाटा के साथ साथ उनके वैन्डर कर्मचारीयो को भी बधाई देता हु जिन्होने टाटा के सपने को साकार करने मे कदम से कदम मिलाया होगा। मै आप सबको सेलियुट करता हु, और मगल कामना करता हु कि आप देश के विकास मे हमेशा कि तरह तत्पर रहे।


TATA Nano features and Nano car specifications:
# 624cc petrol engine
# 33BHP
# 20km per litre mileage, upto 26km per litre on highway
# 30 liter petrol tank
# 4 door, 5-seater
# Rear engine, front boot
# 4 speed manual gear box
# On road price expected to be around Rs. 1 lakh 25 thousand
# front disc brakes and drums in the rear
# Euro 4 compliant
# Top speed 90kmph

# 21% more space than Maruti 800!

Standard model would cost roughly Rs. 1,25,000 onroad



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एक विज्ञापन V/S नारी

Posted: 12 जनवरी 2009

ज महिलाओ के रहन सहन के स्तर मे शिक्षा के प्रसार के साथ परिवेश जनित परिवर्तन आया है, वह प्रशसनीय है। किन्तु वही उसमे कभी कभी अश्लीलता का अनुभव भी हम करते है। यह एक विडम्बना ही है। प्रचार के लिये अधिकाश महिलाओ को माध्यम बनाया जाता है। आज जब भी हम बाहर जाते है तो जगह जगह दीवारो पर, सिनेमाघरो के बाहर, मकानो की छतो तथा चार दीवारी पर,यहा तक की चोराहो और वृक्षो के मोटे तनो पर भी विज्ञापन हेतु लगे हुए गन्दे तथा महिलाओ के अगो का अधिकाधिक प्रदर्शन कराते हुये पोस्टर दिखाई देते है। जिनकी कोई भी सभ्य, सुशिक्षित मनुष्य तो निगाह उठाकर देखने का साहस नही कर सकताओर ना पसन्द ही करता है। इसको दिखने वाले अधिकाशतःकच्ची उम्र के बच्चे, किशोर तथा अशिक्षित हुआ करते है। इसका सर्वाधिक कु:प्रभाव बच्चो, किशोरो एवम अशिक्षितो पर पडता है। उनकी कोमल भावनाये बहकर, उच्छृखल होकर गलत रास्ता अपना लेती है।

हिलाओ द्वारा किसी वस्तु का प्रचार करना कतई बुरा नही है, लेकिन उनको गलत ढग से पेश करना, अधिकाधिक अगो का प्रदर्शन, कम उम्र के बच्चो एव युवाओ पर भी बुरा प्रभाव डालता है। दु:ख एवम आश्चर्य तब होता है,जब हम मात्र आठ-दस वर्ष कि उम्र के बालको को किसी भी उम्र की स्त्री पर फब्तियॉ कसते हुये देखते है या उसके साथ छेडखानी करते हुये देख लेते है।

सोचना यह है कि ऐसा क्यो ओर किस लिये हुआ ? क्या इसके लिये हम जिम्मेदार नही है ? बहुत सी महिलाये जो परिधान धारण करती है जो भडकिले होते है,चुस्त हो, और जिसमे अगो का प्रदर्शन अधिकाधिक हो। ऐसे मे छेडखानी की घटनाये अधिक होती है।बुजुर्ग, प्रोढ,युवक सभी बात करने मे सकोच या लज्जा का अनुभव करते है। स्वय युवतिया भी बात कतने मे शर्म महसुस करती है या कतराती है क्यो कि गलत पहनावा हमारी सभ्यता का घोतक होने के साथ ही अश्लील भी है। आज के प्रगतिशील भारत मे जब महिलाये पुरुषो के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर सम्मान के साथ आगे बढना चाहती है तो अपनी इस प्रदर्शन की प्रवृति पर रोक लगाकर स्वय को हिन ना समझकर अपने स्वाभिमान ओर योग्यता के साथ उन्नति का मार्ग प्रशस्त करना चाहीये।

मारा दृष्टिकोण महिलाओ के प्रति सम्मान का हो इस लिये आत्मनियन्त्रण रखकर विभिन्न विज्ञापनो, पोस्टरो आदि मे गन्दे तरीके से महिलाओ के इस्तेमाल का महिलाओ द्वारा विरोध किया जा सकता है। और हमे ऐसे काम से साफ इन्कार भी कर देना चाहिये जो हमारी मर्यादाओ के प्रतिकुल ना हो ओर हमारे स्वाभिमान को ठेस पहुचाये।

घपी इसमे कठिनाये बहुत आयेगी,क्योकि प्राचिन युग से ही स्त्री सोन्दर्य को एक हथियार के रुप मे प्रयोग किया जाता रहा है। तथा आर्थिक कारणो के चलते कुछ मजबुरीयो के कारण भी अग प्रदर्शन करने को बाध्य होना पडता है। यह एक विडम्बना ही है किन्तु कुछ समय तक कठिनाइयो का सामना करने के बाद यदि हम अपनी मर्यादा ओर स्वाभिमान की रक्षा करते हुये काम कर सके तो इसमे हमारे बाद आने वाली पीढी अधिक लाभान्वित होगी।

नारी तेरे रुप अनेक

Posted: 07 जनवरी 2009
चिट्ठाजगत
नारी के दु‍र्लभ कार्य क्षेत्रो की चर्चा करते हुए एक सस्कृत श्लोक मे कहा है-
"कार्येषु मन्त्री करणेसु दासी भोज्यषु माता शयनेषु रम्भा
दर्म$नुकूला क्षमया धरित्री भार्या च षाडगुणवतीह दुर्लभ"
माज के दो घटक है-स्त्री और पुरुष। इन दोनो धटको का स्वतन्त्र अस्तित्व है। एक नारी को पुरुष कि जितनी जरुरत है उतनी जरुरत पुरुष को महीला की होती है क्यो कि वे दोनो एक दुसरे के पुरक होते है ।
आचार्य श्री तुलसी के शब्दो मे "दोनो हाथ एक साथ "।
गृहस्थ जीवन मे तीन बाते घर की शोभा है - लक्ष्मी - शिक्षा - शासन, सोभाग्य से ये तोनो ही रुप नारी के है, लक्ष्मी, सरस्वती, ओर दुर्गा। इन तीनो देवियो को ससार पुजता है। समाज मे लक्ष्मी सरस्वती का जितना महत्व है, दुर्गा का भी उससे कम महत्व नही है। वर्तमान मे नारी ने अपनी अलग पहचान बनाई है यह उसी का सुपरिणाम । आज महिलाये ऐसा कोई कार्य नही जो नही कर सकती- चाहे वह समाज से सम्बन्धित हो। घर परिवार, देश, धर्म, राजनिति, एवम विभिन्न कार्य क्षेत्र से हो उसने अपनी दक्षता दिखाई है।
वैज्ञानिक सन्तुलन को बनाये रखने के लिये पुरुष और नारी दोनो का अपना मुल्य है। अपनी अस्मिता है। एक दोनो के बिना दोनो अधूरे है। इसलिये किसी एक का अस्तित्व को नकारने का अर्थ है, सृष्टि के सन्तुलन को नकारना है।
मेरा मानना है, जहॉ मानव का गरिमामय इतिहास प्रारम्भ होता है वही से नारी समाज शास्त्र का प्रथम पृष्ट है नारी समाज का सर्वोपरी श्रृगार है।
मुझे तकलिफ है समाज कि उन्ह कुछ समाननिय महिलाओ से जो अपना खाली समय व्यतित करने के लिये नारीसमाज का उथान्न करने कि दुकाने खोल रखी। मुझे आज तक यह बात समझ नही आई कि, कुछ समाननिय महिलाओ द्वारा, पुरुष सभ्यता और संस्कृति के मामले में यदि महिलाओं को पुरुषों से आगे दिखाने कि होड्ड वाली कुछ बातें स्वाभाविक रूप से अपने मन मे लिये बैठी हुई हैं।
"महिलाये पुरुषो से कम नही," "स्त्री सशक्तीकरण के जोश में पुरुषों कि सभ्यता से होड़ लगाना", यह कैसी प्रतिद्वन्द्विता ?
स्त्री पुरुष की बराबरी क्यों करना चाहती है ? कोनसा क्षेत्र ऐसा है जो नारी के हाथ से छुट गया है ?
मैने पिछले दिन एक महिला ब्लोग पर एक पोस्ट देख रहा था हेडीग था -
"पुरुष अपने वाहियातपने या पतितावस्था को सगर्व स्वीकार क्यों करता है?शर्मिन्दा क्यों नहीं होता? पिछली पोस्ट "क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ने लिया हुआ है?" इस तरह कि बात क्यो ? और कोन कर रहा है ? किसके लिये कर रहा है ?
बिन्दु जो मेरे जेहन मे आ रहे है, कि महिलाये कहॉ-कहॉ क्या है- देखे।
(१) एक महिला महारानी- एलिजाबेथ,अन्य (२) प्रधानमन्त्री - ईन्दराजी, मार्ग्रेट थैचर, बैनजीर, शेख हसिना, अन्य, (३) राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, चन्दिका कैनिया,अन्य (४) विरागनाये- झॉसी कि रानी लक्ष्मी बाई, सहित अनेक, (५) सरकारो मे मुख्यमन्त्री राबडी देवी, जयललिता, मायावती, वसुन्द्राराजे,शीलाजी, सहित कई महिला राज्यपाल, मन्त्रि, सासद, उपसभापति, बिधायक, राजदुत, (६) कई महिला उधोगपति, बैन्को कि मुख्या, चेयरमेन, आई ए एस, आई पी एस आफिसर, (७) महिल सैनिक, महिला पायलॉट, महिलाअधिकारी, महिला बस चालक, महिला ट्र्क चालक, महिला, महिला टैक्सी टैम्पु चालक,कार, स्कुटर, मोटरसाईकल सायकल मे भी महिला सक्षम (८) महिला धर्म प्रवतक (९) महिला अध्यापक, महिला मजदुर, धरो मे महिला बाई (१०) अभिनेत्रि, मॉडल, विश्व सुन्दरी, फिल्म निर्माता भी महिलाये, सम्पादक लेखक, पत्रकार, ब्लोग लेखन मे भी महिलाये। (११) अन्त्रिक्ष यात्रि भी सुनिता विलयम्स, कल्पना चावला आदि, इसके अलावा और भी छोटे से छोटा और बडे से बडा कार्य क्षेत्र मे महिला कि उपस्थिति है।
अगर मेरी गणित सही है तो ससार के अच्छे कर्म क्षेत्र मे महिलाओ ने हर जगह अपना मुकाम बनाया। उपर लिखे कार्यो मे एक आध कार्य क्षेत्र मे महिला के मुकाबले उल्टे पुरुष कि उपस्थिति नगण्य हो सकती है।
ब आप चिन्तन करे पुरुषो से प्रतिद्वन्द्विता कि कुछ महिलाओ का तर्क कहॉ फिट बैठता है ? वो किसको भ्रमित करना चाहती है ? क्या नारी ही नारी का अहित नही कर रही है ? टी वी सिरियलो मे सास द्वारा बहुओ पर अतियाचार को महिलाये बडी ही चाव से देखती है। सभी काम छोडकर इस तरह के सिरियल देखना यह किस चिज का धोतक है ? मजे कि बात यह सिरियल बनाने वाली एकता कपुर जो स्वय एक महिला है, ने तो अपने सिरियलो मे नारि का जो काल्पनिक रुप दिखाया वो डरावना ही नही समाज मे विषमताये पैदा करने वाला है। और महिलाये है जो नारी के इस विभिक्षित रुप को देखने के लिये धारावाहीक आने का इन्तजार करती है। नारि को अपमानित करने वाले धारावाहिक देख तो लगता है नारी ही नारी कि सबसे बडी दुशमन है। प्रतिद्वन्द्विता किससे ? और क्यो ?

मै कई वर्ष पुर्व सावधान सस्था मुम्बई का कार्यकर्ता था। उपरोक्त सस्था के सचालक विनोद जी गुप्ता थे। सावधान सस्था का मुख्य कार्य है वैश्यालयो मे जबरन लाई गई लडकियो को मुक्त कराना, और उसके बाद उनका लालन पालन या उन्हे उनके धर भेजना ! (घरवाले स्वीकारे तो) यह कार्य हम पुलिस कि मदद से और ग्रहाक कि सुचना से करते थे। (एक बार कलकत्ता मे हमारी जान पर बन आई थी ) मुझे आज यह बताते हुये दुख होता है कि मुम्बई कलकत्ता के रेडलाईट ऐरियो मे चकला{वेश्यावृति धन्धा) चलाने वाली ८५% महिलाये मालकिने है (जो नेपाली बन्गाली बाकी अन्य है।)
यह कैसी विसगति है ? कैसे एक महिला महिला का शोषण कर सकती है?
नारी का एक रुप है मॉ! मॉ का सबसे बडा ससार होता है उसकी सन्तान! सन्तान का कोई लिग नही होता है! लडका हो या लडकी मॉ का अभिन्न आत्मीय है! एक ओर मॉ के अन्तस मे उमडता ममता और वात्सलय का ज्वार और दुसरी तरफ खिलने से पहले ही कच्ची कलियो का सहार, भ्रूण हत्या ? लिग परिक्षण के आधार पर कन्या शिशुओ के साथ एक नारी द्वारा यह क्रूरता पुर्ण व्यवहार ? क्या यह दोगलापन नही ?
माज मे कुप्रथाये बहुत है जो आदिकालो से चलती आ रही है। प्रत्येक देश, समाज, परिवार ने अपने अपने ढग से कुप्रथाओ का पोषण किया। यह मानना कि कुप्रथा पुरुषो कि देन है तो मै उसे खारिज करता हु। क्यो कि किसी प्रथा को बिना महिलओ के सहयोग से पुर्ण नही होता। महिला भी इसके लिये जिम्मेदार है। और यह सभी बाते शिक्षा, सस्कार, धर्म पर निर्भर करती है।
पुरानी प्रथाये= सती प्रथा, दहेज प्रथा, बाल विवाह, घुघट प्रथा,विधवाप्रथा, सहित अनेक कुप्रथाये प्रचलन मे थी तो उसका कुक्षल सचालन करने वाली एक सास, एक मॉ, एक बहिन ही होती थी। जो स्वय एक महिला होती है।
ब पाश्चात्य सन्स्कृति के तोर तरीके भारतीय समाज पर हावी होते दिख रहे है। भोतिकता की चकाचोन्ध मे तब से अब तक के सन्दर्भ बदल गये। जिवन शैली बदल गई।वातावरण और परिवेश बदल गया।रिति रीवाज एव रहन-सहन ने भी अनेक रुप धारण कर लिये है। विकास के साथ नई बुराईयो ने भी जन्म लिया है- स्त्री पुरुष ने अपने अपने ढग से बुरायो को पहन लिया है। जैसे भ्रूण हत्या,विकृत खान पान, मर्यादा हीन लोगो के पिछे भागति युवा पीढी,ड्र्ग्स,ओर डान्स मे डुबती इतराती जिन्दगी,शराब, सिगरेट, गन्दे साहित्य, ब्लु फिल्मे, भाषा का बिगडता सन्तुलन, काल्पनिक टिवी शो, बिखरते परिवार,रिस्ते,दायित्व बोध कि धुमिल होती राहे,अभिभावको के प्रति बढती उपेक्षाये, ये सब आज की उपभोक्ता सस्कृति द्वारा प्रदत ऐसे उपहार है जिससे एक आदर्श पुरुष/ महिला समाज के लिये सामुहिक चुनोती है।
सामाजिक जिवन मे कुछ ऐसे प्रसग भी है जो भीतर तक सिहरन पैदा कर देते है। आये दिन तलाक कि घटनाए, अस्त व्यस्त पारिवारिक व्यवस्थाये, सिमटती स्नेहिल सिमाए आदि न जाने कितने मुखोटे आज जीवन शैली धारण करती जा रही है।
आज सडक से ससद भवन तक नारी जागरण की आवाज सुनाई दे रही है। प्रशन उठता है नारी सोई कब थी? अपने कर्तव्य के प्रति आदिकाल से ही सचेत थी ओर सत्य शील की सुरक्षा के गुर उसके पास आज की बनस्पित बीते कल तक ज्यादा मोजुद थे। किताबी शिक्षा भले उसके लिये आकाशी उडान थी पर कलात्मक जीवन से महरुम वह कभी नही थी।
जो महिला पुरुषो कि बराबरी कि बाते करती है वो शायद उनकि मानसिक नारी जाति को पुरुषो के प्रति बरगलाना है।
आज कि नारी कि पुरुषो से तुलना करना शर्म कि बात है क्यो कि बेचारे मर्द अब स्त्रियो से एक दो कदम निचे हो गये है।
आज का सवाल होना चाहिये हम पुरुषो के साथ यह दोगला व्यवाहर क्यो ? हमे भी हक होना चाहिये बच्चे पैदा करने का। और हम पुरुष कोशिश कर रहे है कि हम मॉ बन सके।
मैने लम्बा लिख दिया,
र्थात, पुरुष नारी के सम्बन्धो के बिच COMPETITON - RIVAL - OPPONENT शब्दो को जोडना खराब मानसिकता रखने कि बात पुख्ता होती है । आज अगर नारी कलेकटर बनी है, तो पुरुष ने उसके सपने को साकार रुप करने मे, अपना सहयोग, हाथ ओर उगली पकड कर किया है।
तः मे मुझे याद आ रहा है महर्षि रमण का लिखा वो वाक्य " नारि पति के लिये चरित्र, सतान के लिये ममता, समाज के लिये शील , विश्व के लिये दया और प्राणी के लिये करुणा सजोने वाली महाप्रकृति है"

आज ताज, "वाह ताज" बनने जा रहा

Posted: 20 दिसंबर 2008
चिट्ठाजगत

यह मुम्बईकरो का जीवट ही है कि आतकी हमलो के एक महीने से कम अन्तराल के कम अन्तराल के अन्दर मुम्बई की शान ताज होटल और ट्राइडेन्ट होटल मरम्म्त और फर्निशिग के बाद आज अर्थात २१ दिसम्बर रविवार को पुनः शुरु हो रहे है। सबसे रोचक बात यह है कि री-स्टार्ट के पहले ही दिन उन मेहमानो मे ज्यादा उत्साह है जो आतकी हमले की शाम वहॉ खाना खा रहे थे या ठहरे हुये थे। वे चाहते आज जब इन हॉटलो मे फिर से हलचल लोटे तो उन लम्हो को वे अपनी पलको मे सन्जो सके।
१०० साल से ज्यादा पुराने ताज हॉटल को आज शाम ७-३० बजे दोबारा खोल दिया जायेगा। रेस्टोरेन्ट और बार जैसे शामियाना, मसाला क्राफ्ट, एकुआरिस, सूक, स्टॉरबोर्ड, ला पैटिसायरी और जोडियेक ग्रिल, सभी शुरु हो जायेगे। इन रेस्टोरेन्ट और इटरीज को ऑतकवादियो ने तहसनहस कर दिया था। यह वही नालन्दा बुक स्टॉल है, जिसमे शरण लेकर उस दिन कई मेहमानो ने अपनी जान बचाई थी।
आज ताज ने आतकवादियो को हरा दिया । पुन अपने पैरो पर सीना तान खडा है ताज। अपने सिर पर मुकुट (ताज) धारण कर आतकियो को बता दिया है कि वो इस थोथे हमलो से डरने वाला नही, यह भारत माता का मुकट है, और उसका नाम ताज है। नये ताज मे २६८ कमरे है, जिनका एक रात मे किराया हजारो मे होता है मेहमानो के लिये खोल दिये जायेगे। इन्ह रुम मे ९ सूट और २६ ताज कलब रुम है।
यह एक हेरिटेज इमारत है पर अब यह भारत का ताज बन गया है। ताज अब हमारा गोरव है। सेकडो विदेशीयो ने भारत आकर ताज को सलाम करने कि ईच्छा जता चुके है, जख्मो को अपने प्यार से भरना चाहते।
वेसे तो ताज मे जाने का अवसर बहुत बार मिलता रहा मुझे। हम इन्टरनेशल इवेन्ट आयोजित करते है और हमारे कलाईन्ट विदेशी है। अर्थात हमारी मिटिग का स्थल कभी-कभी यहॉ भी होता है। २२ जनवरी से २५ जनवरी को मेरी कम्पनी इन्टरनेशल फैशन ज्वेलरी का शो NSC ग्राऊन्ड मुम्बई मे करने जा रही है और हमारे बहुत से विदिशी और भारतिय मेहमान भी यहा रुकने वाले है। कहने का मतलब यह है कि व्यापार कि दृष्टि से हॉटल ताज मे जाना होता रहा है, पर कभी भी ताज को खुली ऑखो से नही देखा। कभी कभी शिष्टाचार कि वजह से भी सेवन स्टार हॉटल और सेवन स्टार मेहमान के कारण, मेरे मन को यह सभी देखने करने के लिये रोकना पडता है। आज मेरी ईच्छा है कि मै अकेला ताज जाऊ, उसे देखू । उससे पुछु कैसे हजारो गोलियो का सामना किया ? उसके दर्द को अपने हाथो से सहलाना चाहता हु। मै ताज के लहुलुहान हुये दिल से कहना चाहता हु यह तेरी नही पुरे भारत और भारत कि जनता कि लडाई है । मै कुछ समय रुक कर चाव से ताज को देखना चाहता हू। देखो कब जाना होता है।
ओबेरोय समुह कि ट्राइडेन्ट होटल भी आज ही पुनः शुरु हो रहे है। इस हॉटल मे टिफिन और कन्धार नाम से महसुर रेस्टोरेन्ट भी मरम्मत के बाद आज ही शुरु हो रहे है। यहॉ का कॉफी शॉप भी शुरु हो रहा है। इस पल को ससार देखना चाहता है इस खुशी के माहोल मे दुनियॉ भागिदार होना चाहती है। किन्तु ताज मेनेजमेन्ट ने कल २० दिसम्बर को प्री-ओपनिग पार्टी दि, जिसमे कर्मचारी ही शामिल हुऐ। पुरा स्टाफ रात दिन से जि जान से काम कर रहे है यह उनके कठोर परिश्रम का फल है कि आज ताज, "वाह ताज" बनने जा रहा है ।
आओ आज से नए ताज कि शुरुआत करे,
अतित को भुल नये सिरे से बात करे।
आओ हम नये युग का निर्माण करे,
आओ हम नये क्षितिज का अनुसघान करे,
क्यो कि आज हम भी ताज को सलाम करे॥








शहशाह दुखी- बादशाह भी डरे- आमिर खान आरपार कि लडाई के पक्षधर॥॥

Posted: 06 दिसंबर 2008
चिट्ठाजगत
बादशाह को भी डर
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न्दी सिने जगत के सुपरस्टार बदशाह शाहरुख खान मुम्बई मे हुऐ आतकवादियो के हमले से सहमे हुये है, उन्हे अब डर लगने लगा है, अपने परिवार एवम बच्चो के लिये। बादशा खान आगे कहते है -"देश बडे ही डरावने समय से गुजर रहा है। जनता का गुस्सा स्वभाविक है। यह डर मुझे ही नही पुरे हिन्दुस्थान का है। ऑतकवादियो से कहते है-" तुम भुल गये हो अल्ला के ईस्लाम को, अल्ला के ईस्लाम को जानिये। कुरान बाईबल या गीता किसी मै यह नही लिखा है कि ईन्सानो को मार कर कोई जनत मिलती है। कुरान मे कही भी इस तरह के घिनोने कृत्यको जगह नही दि गई है। दो तीन शाल पहले मै ईस्लाम को ऑतकवाद नही मनता था ,अब मै कहता हु कि जो ऑतकवादी है वो ईस्लामीक नही है। मुझे मेरे देश के लिये अब अधिक समय निकालना है क्यो कि यह बडा प्यारा है। शाहरुखन ने यह बात IBN7 के राजीवसरदेसाई को दिये ईन्टरव्यू मे कही।

राजनीतिक दल है जिम्मेदार_ आमिर खान
मु
झे और मेरे बच्चो को आतकवादी बन्धक बना ले तो मै
अपनी सरकार से यह कहने के लिये मानसिक रुप से तैयार रहुगा
मेरे बच्चो की परवाह न करे, और देश के व्यापक हीत मे आतकवादियो को मार गिराये।-आमिर खान
मुम्बई। आमिर खान का मानना है कि आतकवाद को बढावा देने के लिये सभी राजनीतिक दल जिम्मेदार है और आतकवाद केवल एके ४७ से ही नही फैलाया जाता बल्कि हर वह काम, जिसमे आम आदमी के दिल मे दहशत पैदा हो आतक कि श्रैणी मे आता है। और इसे रोकने के लिये जरुरी है कि आतकवादियो से किसी कि जान के बदले मे कोई सोदा नही किया जाये।
आमिर ने अपने ब्लोग मे लिखा है इस घटना से पहला सबक तो यह मिलता है कि हमे आतकवादियो के साथ कोई सोदे-बाजी नही करनी चाहिये। आतकवादियो को यह स्पष्ट सन्देश दिया जाये कि भारत आतकवादियो से कोई समझोता वार्ता नही करेगा। इसका साफ मतलब है कि भविष्य मे अगर कभी इस तरह के हालात बनते है कि मुझे और मेरे बच्चे को कुछ आतकवादी बन्धक बना ले तो मै अपनी सरकार से यह कहने के लिये मानसिक रुप से तैयार रहुगा मेरे बच्चो की परवाह न करे और देश के व्यापक हीत मे आतकवादियो को मार गिराये।
आमिर खान ने आगे अपने ब्लोग मे लिखा है -"काग्रेस और भाजपा सरकारे आतकवाद से निपटने मे नाकाम रही है। मुम्बई पर आतकी हमले ने काग्रेस नीत युपीए की अक्षमता जाहीर कर दी, जबकि भाजपा शासन काल मे इण्डियन एयरलॉइस के अपहरण कि घटना ने सरकार को लासार बना दिया था।
स घटना मे बन्धको को छुडवाने के लिये राजग सरकार ने जिन्हे रिहा किया वह तीन खतरनाक ऑतकवादि और पाचो अपहरणकर्ता भारत को एक बार फिर निशाना बनाने की तैयारी करने लगे। इससे पहला सबक यह मिलता है कि हमे किसी भी हालत मे आतकवादियो से कोई सोदा नही करना चाहिये। (NBT ४१२२००८)

टुट चुका है बान्ध : अमिताभ
मु
म्बई। बालिवुड क्र दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन ने मुम्बई बम हमलो को लेकर उत्पन्न जनाआक्रोश कि तुलना एक ऐसे बान्ध से कि है जो फूट गया है और उसमे से अनियन्त्रित पानी लगातार बह रहा है।
भिताभ ने अपने ब्लोग मे लिखा है कि इन हमलो से देशवासी बहुत व्यथित और गुस्से मे है। यह व्यथा और गुस्सा किसी न किसी रुप लगातार जाहिर होता जा रहा है। उन्होने लिखा है कि किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था मे निर्वासित प्रतिनिधियो और देश को चलाने के लिये प्रशासन कि जरुरत होती है। आज जो हालात है, उनमे राजनितिज्ञो और प्रशासन दोनो के लिये उदासीनता के भाव है। हर जगह केवल सवाल उठ रहे है। अभिताभ ने आगे अपने ब्लोग मे लिखा है कि विश्वास कि कमी और खिझ दिखाई पड रही है। खिझ का कारण विश्वास टुटना नही है खिझ इसके लिये है क्यो कि समाधान देने वाला कही दिखाई नही दे रहा है।ऐसा लगता है बान्ध टुट चुका है
(NBT 4122008

I want to do something, but what can I do?” करन जोहर

फिल्म निर्मात अपने ब्लोग मे क्या कहते है देखे। वो दुखी है मुम्बई अटैक से। वो कहते है पहले अपने घर परिवार के आपसी रिस्तो मे विश्वास पैदा करना पडेगा। एक दुसरे को समझना पडेगा। हमे एक साथ आतकवाद से मुकाबला करना होगा। देखे वो आगे क्या लिखते है -"I was in New York when news broke that Bombay was under attack.For someone who’s been born and raised in this magnificent city, this is easily one of the most shattering things to hear - and see. And that’s all I could do. Glued to my television in a hotel room far too far away from where this massacre was taking place, I absorbed everything I saw and everything I heard. Everyone had a sound byte. Everyone had to come out and express his or her opinion; The NSG should be applauded. The Media should be praised. Certain politicians should be bashed. I agree with most of what’s already been said. Some have been eloquent and some have sounded like loud, misinformed banshees. Collectively we’re grappling with the ineffectiveness of the system and what was presented to us as information. Politicians, soulless and emotionless, were addressing the country while reading off of Teleprompters. Can you not feeling anything? Can you say nothing to make us feel just a little more secure in your hands? .
I can’t offer a unique perspective on this yet because my grievances at this moment are primarily observations on humanity. The most common thing I hear from people is, “I want to do something, but what can I do?” The answer to this question has resulted in candlelight vigils and sms’s to wear black clothes or light a candle in our windows to show support and solidarity. It’s all very well and good because it is therapeutic. Our natural instincts veer us towards acting out – or at least towards being more active. In times like these, it becomes a challenge to look at the big picture. Terror attacks, massive loss of life – the reality eventually forces you to look at how we react individually and as a collective community.
Our focus has now shifted to something so much bigger than us, but in order to fight this fear, in order to regain confidence as a city, we must strengthen ourselves. We must fix our problems at home before we can tackle attacks from outside

आतकवाद के खिलाफ शास्त्रीजी ने ऊठाई मशाल ए कलम॥।

मैने कल सारथी चिट्ठे पर शास्त्रीजी कि आतकवादियो के खात्मे कि मुहिम को पढा। मै उनकि इस लडाई मै मेरी सहभागिता जताई। फिर सोचा यह तो लिखने लिखाने कि बात रह जायेगी। आतकवादियो के खिलाफ इस मुहिम मे हर व्यक्ति को अपने अपने ढग से योगदान देना चाहिये। क्यो कि आप और हम बन्दुक उठाकर सिमा पार तो जा नही सकते है। हॉ इतना तो जरुर कर सकते है कि पुरे देश मे आतकवादियो के खात्मे कि जन लहर पैदा करे। सरकार को मजबुर करे कि अमेरिका कि नहसियत को मारो गोली और सीधे आक्रमण करो पाक पर, नेस्तोनाबुद कर दो उन्ह ठिकानो को जहॉ से आतकवादि जन्म लेते है। सोनियाजी॥ झॉसी कि रानी बनने के लिये समय अच्छा है उपयोग करो देश याद करेगा आपकोलोगो के मनो मे क्रान्ति कि एक लहर पैदा हो इसलिये उपरोकत विचारो कि प्रस्तुति देकर यह मेरा छोटी सी तमन्ना को पुरा कर रहा हु। शास्त्रीजी आपने जिस कलम को बदुक का रुप धारण कराया है यह हम ब्लोग बिरादरी के लिये फक्र गर्व कि बात है कि हम भी देश कि इस लडाई मे पिछे नही है। महावीर