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हल्दी_रस्म व फिजूल खर्ची

Posted: 14 जून 2022

 #हल्दी_रस्म व फिजूल खर्ची


आज कल ग्रामीण परिवेश में होने वाली शादियों में एक नई रस्म का जन्म हुआ है #हल्दी_रस्म।

हल्दी रस्म के दौरान हजारों रूपये खर्च कर के विशेष डेकोरेशन किया जाता है, उस दिन दूल्हा या दुल्हन विशेष पीत (पीले) वस्त्र धारण करते हैं। साल दो साल पूर्व इस हल्दी रस्म का प्रचलन पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में तो ना के बराबर था लेकिन पिछले साल दो साल से इसका प्रचलन बढ़ा है। 


पुराने समय में  जरूर दूल्हे दुल्हन के चेहरे व शरीर की मृत त्वचा हटाने, मुलायम करने व चेहरे को गोरा और चमकदार बनाने के लिए हल्दी, चंदन, आटे, दूध आदि का उबटन बनाकर शरीर पर लगाया जाता था। पुराने समय में ना तो आज की तरह साबुन व शैम्पू थे ना ही ब्यूटी पार्लर। हल्दी के उबटन से घिसघिस कर दूल्हे दुल्हन को गोरा किया जाता था। वो रस्म साधारण तरीके से शादी वाले दिन ज़रूर निभाई जाती रही है, आजकल की हल्दी रस्म मोडिफाइड हो गई है। जिसमें हजारों रूपये खर्च कर डेकोरेशन किया जाता है। महंगे पीले वस्त्र पहने जाते है। और यह पीला ड्रामा किया जाता है।


 आजकल देखने में आ रहा है कि आर्थिक रूप से असक्षम परिवार के लड़के भी इस लोक दिखावा में शामिल होकर परिवार को कर्ज के बोझ में धकेल रहे है। क्योंकि उन्हें अपने छुट भईए नेताओं, चवन्नी छाप दोस्तों को अपना ठरका दिखाना होता है। Insta, फेसबुक, आदि के लिए रील बनानी होती है। बेटे के रील बनाते बनाते बाप बिचारा रेल बन जाता है।

ऐसे ऐसे घरों में फिजूल खर्ची में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिन घरों में घर के नाम पर छप्पर है, घर की किवाड़ी नहीं है, बाप ने पसीने की पाई पाई जोड़ कर मकान का ढांचा खड़ा किया तो छत नहीं है, छत है तो प्लास्टर नहीं, प्लास्टर है तो दरवाजा नहीं है, बाप के पहनने के चप्पल नहीं है मां के ओढ़ने के लिए ढंग की चुनरी नहीं है लेकिन 10 वीं 12 वीं मरते डूबते पास करने वाले छिछोरे मां बाप की हैसियत से विपरीत जाकर अनावश्यक खर्चा जरूर करते हैं। 


ऐसे लड़के 1 रुपए की मजदूरी करना नहीं चाहते और सूखे दिखावे के चक्कर में मां बाप को कर्ज में धकेल देते हैं। ऐसे लड़कों के सैकड़ों ऐसे ही लूखे दोस्त होते हैं जिन्हें ये लोग प्यार से  #ब्रो कहते है। शादी विवाह में अपना स्टेटस बनाने के लिए जिसको ढंग से जानते भी नहीं उन्हें भी शादी में इन्वाइट करेंगे। किसी से सिफारिश लगाकर उपसरपंच, सरपंच, प्रधान, विधायक और नेताओं को बुलाते हैं ताकि गांव में इनका ठरका जमे। बहुत सारी गाडियां घर के आगे खड़ी देखने की उत्कंठा रखते हैं। किसी को बुलाए कोई आपत्ति नहीं लेकिन उन बड़े लोगों के साथ फोटो सेल्फी लेने में और उनके आगे पीछे घूमने में इतने मशगूल हो जाते है कि घर आए जीजा, फूफा, नाना, नानी, बहन , बुआ अड़ोसी पड़ोसी को चाय पानी का भी पूछना उचित नहीं समझते। अपने रिश्तेदारों की इस तरह की नाकद्री ठीक नहीं है। जरूरत पड़ने पर यही लोग सबसे आगे खड़े होते हैं जिन्हें आप हाशिए पर धकेल देते हो।


अन्य बहुत सारी फिजूलखर्ची जैसे डीजे बुक करवाना, लाइट डेकोरेशन करना, वीडियो शूट व ड्रोन कैमरा मंगाना, 15- 17 जोड़ी ड्रेस मंगवाना, 6-7 साफे ,शेरवानी, घोड़ी, पाइप पांडाल, स्टेज, पटाखे , एक वो झाग वाला डबिया (नाम तो मुझे आता नहीं ।) 


जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो उन परिवारों के बच्चों को मां बाप से जिद्द करके इस तरह की फिजूल खर्ची नहीं करवानी चाहिए। आजकल काफी जगह यह भी देखने को मिलता है कि बेटे मां - बाप से कहते है आप कुछ नहीं समझते।  मैं जब भी यह सुनता हूं पांवों के नीचे जमीन खिसक जाती हैं। बड़ी चिंता होती हैं कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। 


   @.....Copy.

सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है- BLOGER


बिखरते परिवार , टूटता समाज और दम तोड़ते रिश्ते.!

Posted:

 🖊️🖊️आज चिंता का विषय है🖊️🖊️ 


शादी के लिए 25 से ज्यादा उमर का ना होने दें

इस तथ्य को थोड़ा गहराई से पढिये ।

जरा सोचिए आज ये सब क्यों हो रहा है.?

👉 एक कटु सत्य..!!!


आजकल माँ-बाप भी जरूरत से ज्यादा लडकियों के घर में हस्तक्षेप करके उसका घर खराब करते हैं!


यह मत भूलो कि शादी के बाद असली माँ बाप उसके सास ससुर होते हैं।


आज जो हालात हैं उसके जिम्मेदार कौन है..?


सर्वाधिक ये आधुनिक शिक्षा के नाम पर संस्कार विहीन बच्चे। 

रिश्ते तो पहले होते थे। अब रिश्ते नही सौदे होते हैं।


किसी भी माँ बाप मे अब इतनी हिम्मत शेष नही बची कि बच्चों का रिश्ता अपनी मर्जी से कर सकें।

पहले खानदान देखते थे। सामाजिक पकङ और सँस्कार देखते थे और अब ....


मन की नही तन की सुन्दरता , नौकरी , दौलत , कार , बँगला। 

लङके वालो को लङकी बङे घर की चाहिए ताकि भरपूर दहेज मिल सके और लङकी वालोँ को पैसे वाला लङका ताकि बेटी को काम करना न पङे।


नौकर चाकर हो। परिवार छोटा ही हो ताकि काम न करना पङे और इस छोटे के चक्कर मे परिवार कुछ ज्यादा ही छोटा हो गया है।

दादा दादी तो छोङो , माँ बाप भी बोझ बन गये हैं। आज परिवार सिर्फ़ मतलब के लिए रह गया.!!

                

परिवार मतलब पति पत्नी और बच्चे बस। जब परिवार इतना छोटा है तो फिर समाज को कौन पूछता है..?

लङका चाहे 20 हजार महीने ही कमाता हो। व्यापारी लङका भले ही दो लाख महीने कमाता हो पहली पसंद नौकरीपेशा ही होगा।


इसका कारण केवल ये है कि नौकरी वाला दूर और अलग रहेगा। नौकरी के नाम पर फुल आजादी मिलेगी , काम का बोझ भी कम। आये दिन होटल मे खाना घूमना।


नौकरीपेशा वालों का समाज से सम्बन्ध भी कम ही मिलेगा ऐसे मे समाज का डर भी नही।


सँयुक्त और बङा परिवार सदैव अच्छा होता है। पाँच मे तीन गलत होंगे तो दो तो सही होंगे क्योंकि पाँचो उँगलियाँ बराबर नही होती। लेकिन एक ही है तो सही हो या गलत भुगतो। 


पहले रिश्तों में लोग कहते थे कि मेरी बेटी घर के सारे काम जानती है और अब....

हमने बेटी से कभी घर का काम नहीं कराया यह  कहने में शान समझते हैं।


आये दिन बायोडाटा ग्रुप खुल रहे हैं। उम्र मात्र 30 से 40 साल। एजुकेशन भी ऐसी कि  क्या कहना..

कई डिग्री धारक रोज सैकङों लङके और लङकियों के बायोडाटा आ रहे हैं लेकिन रिश्ते नही हो रहे हैं। इसका कारण एक ही है..


इन्हें रिश्ता नहीं बेहतर की तलाश है। रिश्तों का बाजार सजा है गाङियों की तरह। शायद और कोई नयी गाङी लांच हो जाये। इसी चक्कर मे उम्र बढ रही है। 

अब तो और भी बायोडाटा ग्रुप बन रहे हैं।

तलाकशुदा ग्रुप

विधवा विधुर ग्रुप 

अजीब सा तमाशा हो रहा है। अच्छे की तलाश में सब अधेङ हो रहे हैं।


अब इनको कौन समझाये कि एक उम्र में जो चेहरे में चमक होती है वो अधेड होने पर कायम नही रहती , भले ही लाख रंगरोगन करवा लो ब्युटिपार्लर में जाकर।


एक चीज और संक्रमण की तरह फैल रही है। नौकरी वाले लङके को नौकरी वाली ही लड़की चाहिये। 


अब जब वो खुद ही कमायेगी तो क्यों तुम्हारी या तुम्हारे माँ बाप की इज्जत करेगी.?

खाना होटल से मँगाओ या खुद बनाओ

बस यही सब कारण है आजकल अधिकाँश तनाव के

एक दूसरे पर अधिकार तो बिल्कुल ही नही रहा। उपर से सहनशीलता तो बिल्कुल भी नहीं। इसका अंत आत्महत्या और तलाक।


घर परिवार झुकने से चलता है , अकङने से नहीं.।

जीवन मे जीने के लिये दो रोटी और छोटे से घर की जरूरत है बस और सबसे जरुरी आपसी तालमेल और प्रेम प्यार की लेकिन.....

आजकल बड़ा घर व बड़ी गाड़ी ही चाहिए चाहे मालकिन की जगह दासी बनकर ही रहे।

एक गरीब अगर प्यार से रानी बनाकर भी रखे तो वो पहली पसंद नही हो सकती। नौकरी पसँद वालों को इतना ही कहूँगा कि अगर धीरुभाई अंबानी भी नौकरी पसँद करता तो आज लाखों नौकर उसके अधीन नही होते।


सोच बदलो.... 

माँ बाप भी आजकल जरुरत से ज्यादा लङकियों के घर मे हस्तक्षेप करके उसका घर खराब करते हैं।

मत भूलो शादी के बाद उसके असली माँ बाप उसके सास ससुर होते हैं। आपके घर तो बस मेहमान थी।


कई सास बहू के सामने बेटी की तारीफ करके अपना खुद का घर खुद खराब करती हैं। बेटी कभी भी बहू नही बन सकती। बेटी की चाहत खून के रिश्ते के कारण है लेकिन बहू अजनबी होकर भी आपकी गृहलक्ष्मी भी है , नौकरानी भी है और कुल चालक भी और आपके और आपके बेटे के मध्य सेतु भी। बहू खुश तो परिवार खुश अन्यथा....


आजकल हर घरों मे सारी सुविधाएं मौजूद हैं.... 

कपङा धोने की वाशिँग मशीन 

मसाला पीसने की मिक्सी

पानी भरने के लिए मोटर 

मनोरंजन के लिये टीवी 

बात करने मोबाइल 

फिर भी असँतुष्ट... 


पहले ये सब कोई सुविधा नहीं थी। पूरा मनोरंजन का साधन परिवार और घर का काम था , इसलिए फालतू की बातें दिमाग मे नहीं आती थी।

न तलाक न फाँसी 

आजकल दिन मे तीन बार आधा आधा घँटे मोबाइल मे बात करके , घँटो सीरियल देखकर , ब्युटिपार्लर मे समय बिताकर। 

मैं जब ये जुमला सुनता हूँ कि घर के काम से फुर्सत नही मिलती तो हंसी आती है। लड़कियों के लिये केवल इतना ही कहूँगा कि पहली बार ससुराल हो या कालेज लगभग बराबर होता है। थोङी बहुत अगर रैगिँग भी होती है तो सहन कर लो।


कालेज मे आज जूनियर हो तो कल सीनियर बनोगे। ससुराल मे आज बहू हो तो कल सास बनोगी।

समय से शादी करो। स्वभाव मे सहनशीलता लाओ। परिवार में सभी छोटे बङो का सम्मान करो। ब्याज सहित वापिस मिलेगा। 


आत्मधाती मत बनो। जीवन मे उतार चढाव आता है। सोचो समझो फिर फैसला लो। बङो से बराबर राय लो। उनके द्वारा बताए अनुभव पर पूरा विश्वास रखो।


समाज के लोगों से बस इतना ही निवेदन है कि समाज मे सही उम्र मे शादी हो। उस दिशा मे काम करें। कम खर्चीली हो। धनी सेठ करोङो रुपए बेवजह शादी मे लुटा देते हैं , उनके अनुसरण मे गरीब पिसते हैं।

🙏निवेदक 🙏

अखिल भारतीय जैन महासंघ


सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

(NSS)” विरार वेस्ट द्वारा -जैन समाज के हितार्थ - सुन्दर एवं आदर्श विवाह का आयोजन

Posted:

 मुम्बई के विरार नगरी में  “नवकार सेवा संस्था, (NSS)” विरार वेस्ट द्वारा,समस्त जैन समाज के हितार्थ - सुन्दर एवं आदर्श विवाह का आयोजन

⭐⭐ शादी के बेहिसाब खर्चो से और फिजूल के दिखावे को कम करने एवं मध्यम एवं निम्नवर्गीय परिवारों की सहूलियत के मद्देनजर,संस्था द्वारा जैन समाज के युवक -युवतियों की शादी करवाने का बीड़ा उठाया है,और वो भी सारा इंतजाम अच्छे हॉल,अच्छे कैटरर्स,और सभी अच्छे इंतजाम के साथ,बैंड बाजा घोड़ी और संगीतमय होगा आपके बच्चो के विवाह का गठबंधन!!!


व्यवस्था की राशि मात्र 1,81,001/-

⭐उपलब्ध सुविधाये🌟


1. शादी के लिए AC हॉल

2. स्टेज सजावट,एवं रिसेप्शन एवं फेरा मंडप

3.  जैन पंडितजी,एवं फेरा सामग्री

4.  साफा - 50 

5.  बैंड बाजा और घोड़ी

6. माइक साउंड सिस्टम

7. 1+1 रूम

8.वरमाला हेतु हार

9.जैन भोजन व्यवस्था

10.सुबह का नाश्ता।

11.दोपहर का भोजन 21 आईटम के साथ

12.शाम हाई टी ।


शादी के इस पैकेज में दोनों पक्षो के मिलाकर 200 मेहमानों की व्यवस्था होगी। आपके परिवार की जरूरत के अनुसार कुछ कार्यक्रमो में बदलाव किया जा सकता है। जिसकी जानकारी संस्था को पहले से देनी होगी । 


जानकारी एवं बुकिंग हेतु सम्पर्क करे:-


🙏🏻 संस्थापक एवम संयोजक


श्री अरविंद जैन -7021674439

श्री आशीष जैन -9820813453

श्री हितेश जैन -  9975331212

 

नवकार सेवा संस्था (NSS) का उद्देश्य-

⭐विवाह में फिजूल खर्चो पर रोक लगेगी ।

 ⭐कम बजट में एक अच्छी शादी का आयोजन


🙏🏻🙏जैन समाज के सभी सदस्यों से निवेदन है की आप अपने contact के सभी ग्रुप में इसे फॉरवर्ड करके इस सामाजिक कार्य मे अपना सहयोग प्रदान करे।


विवाह स्थल:- विरार वेस्ट

नोट:- इस सेवा की शुरुआत विरार से की गई है और इसका विस्तार अधिक से अधिक किया जाएगा ।

नवकार सेवा संस्था (NSS )  विरार वेस्ट.( Please forward this massage to needy)


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