अध्यात्म पुरष आचार्य महाप्रज्ञ का छठा महाप्रयाण दिवस आज
प्रखर मेधा के धनी, महायोगी, इस कलयुग में तीर्थंकर स्वरुप, तेरापंथ धर्मसंघ के दसवें नक्षत्र, महामना, महात्मा महाप्रज्ञ जी के षष्ठम महाप्रयाण दिवस पर तेयुप चेन्नई परिवार का शत शत नमन, वंदन ।
महाप्रज्ञप्रवर का पूरा जीवन उपाधियों, उपलब्धियों, सफलताओं और विविध प्रकार के नवोन्मेषी आश्चर्यों से भरपूर रहा है।
साधना में सजगता, जीवन भर पादविहारी, दार्शनिक विचार, मूर्धन्य वक्ता, महान साहित्यकार, प्रेक्षाध्यान के प्रणेता, योग विद्या के महापंडित, आगमों के गहन ज्ञाता और ना जाने कितनी कितनी शक्तियों के उद्घाता, अनेकों लब्धियों के स्वामी, हम सब के मन मंदिर के भगवान् श्री महाप्रज्ञ जी के व्यक्तित्व को शब्दों में बाँधना मुमकिन नहीं है।
उनका पूरा जीवन आज के वैज्ञानिकों एवं ज्योतिर्विदों के लिए गहन शोध का विषय है कि आज के इस युग में एक व्यक्ति अपने अतिसीमित संसाधनों के साथ इतना कुछ कैसे कर सकता है।
युवा शक्ति उनके दिखाए पथ पर चलने और संघ के विकास, संवर्धन और सेवा में सदैव तत्पर रहने के अपने संकल्प को आज और अधिक पुष्ट करती है। उन देवपुरुष के चरणों में पुनः श्रद्धा, आस्था एवं समर्पण से परिपूर्ण भावांजलि अभिव्यक्त करती है।
आचार्य श्री महाप्रज्ञा क़ी आध्यात्मिक यात्रा
90 वर्षीय महाप्रज्ञ के अंतिम दर्शन करने के लिए देशभर से बड़ी संख्या में उनके अनुयायी सरदार शहर पहुंचे। उनकी अंतिम यात्रा में करीब तीन घंटे का समय लगा। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री डा. सीपी जोशी, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, प्रदेश के गृहमंत्री शांति धारीवाल, शिक्षा मंत्री भंवरलाल मेघवाल, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी, राज्यसभा सांसद ललित किशोर चतुर्वेदी, बीकानेर के सांसद अर्जुन मेघवाल सहित देशभर से कई राजनेता और बड़े उद्योगपति एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि उनके अंतिम दर्शन करने सरदार शहर पहुंचे। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भी सरदार शहर आने वाले थे, लेकिन अचानक अन्य कहीं व्यस्त होने के कारण नहीं आ सके।
महाप्रज्ञ के विचारों से पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम बहुत प्रभावित थे और इसी कारण वे उनके अंतिम दर्शन करने पहुंचे। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांघी , क़ी राज्यों के मुख्यमन्त्रियो एवं राज्यपालों सहित , पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, आरएसएस के पूर्व सर संघचालक केसी सुदर्शन, जागो पार्टी के अध्यक्ष दीपक मित्तल सहित अनेक गणमान्य हस्तियों ने संदेश भेजकर उनके निधन पर शोक जताया।
महाप्रज्ञ 25 अप्रेल को अपनी धवल सेना के साथ अंचल के विभिन्न स्थानों पर प्रवचन करते हुए आगामी चातुर्मास प्रवास के लिए पहुंचे थे। रविवार सुबह 9.55 बजे से 10.15 बजे तक उन्होंने श्रद्धालुओं के बीच प्रात:कालीन प्रवचन किया। दोपहर दो बजे सीने में दर्द की शिकायत पर राजकीय चिकित्सालय के डॉक्टरों की टीम मौके पर पहुंची और महाप्रज्ञ का उपचार शुरू किया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। आचार्य महाप्रज्ञ के उत्तराधिकारी युवाचार्य महाश्रमण ने दोपहर बाद तीन बजे आचार्य महाप्रज्ञ के देवलोक गमन की घोषणा की। महाप्रज्ञ के निर्वाण से तेरापंथ समाज स्तब्ध है। संत-मुनियों में भी शोक व्याप्त है।
अहिंसा यात्रा के प्रवर्तक
आचार्य को 3 फरवरी 1969 को तेरापंथ के युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित कर 1978 में महाप्रज्ञ के नाम से अलंकृत किया गया। प्रेक्षाध्यान के आविष्कारक और जीवन विज्ञान का अनूठा प्रयोग करने वाले आचार्य महाप्रज्ञ ने अहिंसा यात्रा के माध्यम से देश को एक नई दिशा दी। महाप्रज्ञ ने तीन सौ से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। जैन योग एवं ध्यान परंपरा के पुनरूद्धारक के साथ जैन आगमों के भी वे संपादक रहे हैं।
विलंब से पहुंचे गहलोत व जोशी
श्रद्धांजलि सभा के समापन के ठीक पहले श्रीसमवसरण पहुंचे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व केन्द्रीय पंचायती राज मंत्री सी.पी. जोशी ने महाप्रज्ञ के अंतिम दर्शन किए और आचार्य महाश्रमण व साध्वी प्रमुखा से चर्चा की। गहलोत हेलीकॉप्टर से सरदारशहर पहुंचे।
आचार्य महाप्रज्ञ के देवलोक गमन पर राज्यपाल शिवराज पाटिल, सीएम गहलोत, विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत तथा केन्द्रीय मंत्री सी.पी. जोशी, पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी ने संवेदना व्यक्त की है। सभी ने कहा है कि उनके योगदान को सदैव याद रखा जाएगा।
आचार्य महाप्रज्ञ का निधन, आडवाणी ने जताया शोक
महाप्रज्ञ के निधन पर भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने शोक जताया है। आडवाणी ने अपने शोक संदेश में कहा है, ''आचार्य महाप्रज्ञ के अचानक निधन की खबर से मुझे और दुनिया के लाखों लोगों को धक्का लगा है।''
आडवाणी ने कहा, ''आचार्य महाप्रज्ञ एक अद्भुत विद्वान और अच्छे वक्ता थे। वह एक जाने-माने लेखक थे। उन्होंने दर्शन, साहित्य, योग और धर्म पर 150 पुस्तकें लिखी है।''
आडवाणी ने कहा, ''इस बात में कोई आश्चर्य नहीं कि कवि रामधारी सिंह दिनकर आचार्य महाप्रज्ञ को देश का दूसरा विवेकानंद कहते थे। उनके निधन से हमने एक महान साधक, मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक खो दिया है। मैं इस महान आत्मा के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।''
सदैव आशीर्वाद रहा- वसुंधरा राजे
"महाप्रज्ञ का आशीर्वाद सदैव मेरे साथ रहा। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और रास्ता भी दिखाया। महाप्रज्ञ की अहिंसा यात्रा और अन्य कार्यक्रम सराहनीय हैं।"- वसुंधरा राजे, पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा राष्ट्रीय महासचिव
अतुल्य सागर महाराज ने जताया शोक
ऋष्ाभदेव। क्षुल्लक श्री 105 अतुल्य सागर महाराज ने आचार्य महाप्रज्ञ के देवलोकगमन पर गहरा शोक व्यक्त किया तथा उनकी आत्मा कि शांति के लिए 2 मिनिट मौन रखा। गुरूकुल परिवार और श्रीफल परिवार ने भी शोक जताया है।
आचार्य महाप्रज्ञ के महाप्रयाण पर जताई संवेदना
आचार्य महाप्रज्ञ के महाप्रयाण पर आर्यिका सुपाश्र्वमति माताजी ने कहा, 'आचार्य महाप्रज्ञ के महाप्रयाण से समाज ने एक युगदृष्टा संत को खोया है। वे विद्वान होने के साथ बेहद विनम्र थे।' अखिल भारतीय दिगंबर जैन जागृति परिषद के अध्यक्ष राजेंद्र सेठी और महामंत्री मानचंद खंडेला ने महाप्रज्ञ के महाप्रयाण को मानव समाज के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
सर्व वैश्य आरक्षण संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष सुनील लोढा के मुताबिक, 'आचार्य महाप्रज्ञ ने मानव समाज को आध्यात्म से राष्ट्रोत्थान का मार्ग दिखाया।' जयपुर शहर जिला कांग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष रमा बजाज ने आचार्य महाप्रज्ञ के देवलोक गमन पर शोक जताते हुए श्रद्धांजलि व्यक्त की है।
राजस्थान पत्रिका के सम्पादक गुलाब कोठरी ने आचर्य महाप्रज्ञा जी के पार्थिव सरीर के दर्शन करने पहुचे. एवं यात्रा मै शामिल हुए.
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दुनिया भर के जैन तेरापंथ प्रतिष्ठान बंद रहे
आचार्य महाप्रज्ञजी के शोक में दुनिया भर के जैन तेरापंथ प्रतिष्ठान रविवार कों बंद रहे! होंकोंग , रसिया , अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, नेपाल , ईराक सहित पुरे भूभाग में आचार्य श्री के श्रावको ने अपने गुरु के लिए घ्यान किया व् श्रदांजली अर्पित कि !
महाश्रमण बने धर्मसंघ के 11वें आचार्य
महाप्रज्ञ के बाद अब युवाचार्य महाश्रमण को धर्मसंघ के 11वे आचार्य का दायित्व सौंपा गया है। वयोवृद्ध मुनि बालचंद नेवंदना के साथ उन्हें यह दायित्व सौंपा। 11वें आचार्य का दायिžव सम्भालने वाले आचार्य महाश्रमण मुदित कुमार का जन्म तेरापंथ की राजधानी चूरू जिले के सरदारशहर कस्बे में विक्रम संवत 2019 में हुआ। पिता डूंगरमल दूगड व माता नेमादेवी के घर जन्मे महाश्रमण को 28 वर्ष की आयु में 14 सितम्बर, 1997 को आचार्य महाप्रज्ञ ने गंगाशहर (बीकानेर) में तेरापंथ धर्म संघ के युवाचार्य के पद पर प्रतिष्ठित किया था और उन्होंने संवत 2031 में दीक्षा ली थी।
युवाचार्य श्री महाश्रमण
युवाचार्य श्री महाश्रमण मानवता के लिए समर्पित जैन तेरापंथ के उज्जवल भविष्य है। १३ मई १९६२, सरदारशहर (राजस्थान) में जन्में, सरदारशहर में ही ५ मई १९७४ को दीक्षित तथा प्राचीन गुरू परंपरा की श्रृंखला में आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा अपने उतराधिकारी के रूप में मनोनीत युवाचार्य महाश्रमण विनम्रता की प्रतिमूर्ति है। अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी की उन्होंने अनन्य सेवा की। तुलसी-महाप्रज्ञ जैसे सक्षम महापुरूषों द्वारा वे तराछे गये है। १६ फरवरी १९८६, उदयपुर में महाप्रज्ञ के अंतरंग सहयोगी बने। १३ मई १९८६, ब्यावर में वे अग्रगण्य (ग्रुप लीडर) बने। वे अल्पभाषी है।
९ सितंबर १९८९ को महाश्रमण पद पर आरूढ़ एवं जन्ममात प्रतिभा के धनी युवाचार्य महाश्रमण अपने चिंतन को निर्णय व परिणाम तक पहुंचाने में बडे सिद्धहस्त हैं। उसी की फलश्रुति है कि उन्होंने आचार्य महाप्रज्ञ को उनकी जनकल्याणकारी प्रवृतियों के लिए युगप्रधान पद हेतु प्रस्तुत किया। महाश्रमण उम्र से युवा है, उनकी सोच गंभीर है युक्ति पैनी है, दृष्टि सूक्ष्म है, चिंतन प्रैढ़ है तथा वे कठोर परिश्रमि है। उनकी प्रवचन शैली दिल को छूने वाली है।
महाश्रमण को १४ सितंबर १९९७ को गंगाशहर में युवाचार्य के रूप में मनोनीत किया गया। युवाचार्य की प्रज्ञा एवं प्रशासनिक सूझबूझ बेजोड़ है। गौर वर्ण, आकर्षक मुखमंडल, सहज मुस्कान से परिपूर्ण बाह्म व्यक्तित्व एवं आंतरिक पवित्रता, विनम्रता, दृढ़ता, शालीनता व सहज जैसे गुणों से ओतः प्रोत युवाचार्य महाश्रमण से न केवल तेरपंथ अपितु पूरा धार्मिक जगत् आशा भरी नजरों से निहार रहा है और उनकी महानता को स्वीकार कर रहा है।
आचार्य महाप्रज्ञ पंचतत्व में विलीन एक खबर
आचार्य महाप्रज्ञ पंचतत्व में विलीन सीधा प्रसारण इ टी वी राजस्थान , संस्कार टीवी, सहित दुनिया भर क़ी अखबारों वेब पेजों क़ी खबर बना!
आचार्य महाप्रज्ञ news
आचार्य महाप्रज्ञ का निधन अपूरणीय क्षति
आचार्यश्री पंचतत्व में विलीन,
आज होगा दसवें आचार्य महाप्रग का अंतिम संस्कार
आचार्य महाप्रज्ञ पंचतत्व में विलीन
आचार्य महाप्रज्ञ का अंतिम संस्कार
एक मानव भगवानरुपी व्यक्तित्व की छवि’ / हाफिज अली, मंत्री सुबोधकान्त सहाय की भी संवेदना
नोट - आचार्य श्री महाप्रज्ञा क़ी ७९ वर्षो क़ी आध्याधिमिक यात्रा का विस्तृत लेखा अगले अंक में पढ़ पाएगे.
महावीर बी. सेमलानी
आचार्य महाप्रज्ञा जी कि यादे
क्यों पहले अवतार लिया ?
वर्तमान युग समस्या बहुल युग है। आज युग जितना समस्या से आक्रान्त रहा है। साम्प्रदायिक आग्रह, जातिवाद का आग्रह इन आग्रहों से भी युग आक्रान्त है। भगवान महावीर ने २६०० वर्ष पहले अपनी अन्तर्दृष्टि या अन्तः प्रज्ञा के द्वारा जो कुछ दिया वह आज बहुत प्रासंगिक है। उन्होंने अहिंसा, अनेकान्त और संग्रह की सीमा का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। उस समय उन सिद्धान्तों की इतनी जरूरत नहीं रही होगी जितनी जरूरत आज है। जिस व्यक्ति की जरूरत है, उस व्यक्ति का अवतार आज बहुत प्रासंगिक बनता है। आज महावीर बहुत प्रासंगिक हैं। वे अतीत में हुए किन्तु वर्तमान को मैं सामने रखता हूं तो कह
सकता हूं कि आज उनकी बहुत ज्यादा प्रासंगिकता है। इसका कारण है कि वर्तमान युग पदार्थवादी युग है। पदार्थ के प्रति इतना आकर्षण था तो उसके विकर्षण कि बात भी समझाई जाती, पढाई जाती थी। जब आकर्षण और विकर्षण दोनों चलते हैं तो समस्या गहरी नहीं होती। आज कोरा आकर्षण है पदार्थ के प्रति, धन के प्रति सुविधाओं के प्रति और विकर्षण का कोई सूत्र सामने नहीं है। ऐसा लगता है वह खो गया है, इसलिए समस्या और गहरी होती जा रही है। अंधकार और गहरा होता जा रहा है। उस गहरे तमस् को प्रकाश में बदलने के लिए जरूरत है ऐसे व्यक्तित्व और कर्तृत्व की जिसमें अन्तः प्रज्ञा भी हो और बाह्य प्रज्ञा भी हो। अनेकान्त में दोनों मान्य हैं। हम एक पक्ष के आधार पर कोई निर्णय नहीं कर सकते हैं। महावीर की वाणी है – “जे अज्झत्थं जाणइ से बहिया जाणइ। जे बहिया जाणइ से अज्झत्थं जाणइ।'' जो अध्यात्म को जानता है, वह बाहर को जानता है और जो बाहर को जानता है, वह अध्यात्म को जानता है।
महावीर की प्रतिमा में एक विशेषता देखी। उनकी ध्यान मुद्रा है, पर आंखें बन्द नहीं है। आधी बन्द है और आधी खुली है। उसका तात्पर्य है कि व्यवहार जगत से आखें मत मूंदो और भीतर से भी आंखें मत मूंदों भीतर को भी देखते रहो और बाहर को भी देखते रहो। दोनों को देखते रहो। यह अनेकान्त का दृष्टिकोण आज बहुत आवश्यक है।
भगवान महावीर ने यह समझाने का प्रयत्न किया कि पदार्थ के बिना जीवन नहीं चलता। ये हमारी विवशता है। हम पदार्थ को छोड़ नहीं सकते किन्तु हमारा दृष्टिकोण साफ रहे कि पदार्थ के द्वारा हमारी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, बल्कि समस्या पैदा होती है। उसका समाधान अध्यात्म के द्वारा हो सकता है, आत्मा के द्वारा हो सकता है। हम दोनों दृष्टियों को सामने रख कर चलें। मैंने एक जिज्ञासा की - प्रभो! बताए कि आपने भोगवाद का उपचार कैसे किया? भोगवाद एक बीमारी है। पदार्थ का भोग बीमारी नहीं है किन्तु जब पदार्थ के प्रति अति आसक्ति, मूर्च्छा पैदा हो जाती है, पदार्थ के प्रति एक लालसा पैदा हो जाती है तब वह सचमुच बीमारी है। आज उसके उपचार की जरूरत है। इस बीमारी का कोई मनोचिकित्सक भी उपचार नहीं कर सकता। इस बीमारी का उपचार तुमने कैसे किया? यह हमारी जिज्ञासा है। मुझे नहीं पता, प्रत्यक्ष उत्तर मिलेगा। पर उत्तर बहुत जरूरी है। वर्तमान युग में भोगवाद के स्थान पर त्याग की जरूरत है। अगर भोग और त्याग दोनों का सन्तुलन होता है तो समस्या गहराती नहीं, अन्धकार गहरा नहीं बनता है। भगवान महावीर ने आत्मा के आधार पर जीवन का दर्शन दिया था। जहां आत्मा का प्रश्न है, प्राणि मात्र समानता के स्तर
पर आ जाते हैं, कोई अन्तर नहीं रहता, किन्तु आज तो लग रहा है इस जातिभेद की रूढ़ परम्परा ने मनुष्य को बांट दिया है। बीमारी बढ़ गई है। मैं मानता हूं कि कुछ महापुरुषों के प्रयत्नों द्वारा थोड़ा-थोड़ा दृष्टिकोण बदला है, किन्तु आज भी बीमारी शान्त नहीं है। उसके कीटाणु बराबर काम कर रहे हैं। भगवान महावीर ने मानवीय एकता को जीवित किया था, चेतना के साथ जोड़ा था। जब तक चेतना नहीं बदलती है, कोरा सिद्धान्त काम नहीं कर सकता। जरूरी है चेतना का परिवर्तन हृदय परिवर्तन या भावना का परिवर्तन। हम ध्यान के द्वारा चेतना का रूपान्तरण कर सकते हैं, मानवीय एकता का अनुभव कर सकते हैं।
आज की बड़ी समस्या है साम्प्रदायिक कट्टरता। प्रभो! आपने इस समस्या का अनुभव किया था और कहा था कि सम्प्रदाय का स्थान नम्बर दो पर है। पहला स्थान धर्म का है। धर्म और सम्प्रदाय यह ऐसा विभाजन किया था जो दुर्लभ है। आज बहुत सारे लोग उलझे हुए हैं जो धर्म और सम्प्रदाय को एक साथ देख रहे हैं। जब-जब दोनों को एक ही दृष्टि से, एक साथ देखा जाता है, समस्या गहरी हो जाती है। आज इस बात की अपेक्षा है कि सम्प्रदाय को एक व्यवस्था के साथ जोड़ें और धर्म को चेतना के साथ जोड़ें। जब तक धर्म को चेतना के साथ नहीं जोड़ा जाता, वह एक जाति या सम्प्रदाय, एक संगठन के रूप में ही रहता है तो स्वयं समाधान देने वाला धर्म समस्या बन जाता हे। आज अपेक्षा इस बात कि है कि धर्म के क्षेत्र में विचार क्रान्ति हो। जो धर्म रूढ बन गया है और जो मृत सम्प्रदाय का चीवर आढ कर अपना सौन्दर्य प्रकट कर रहा है, उस धर्म का असली चेहरा, असली मुखाकृति दुनिया के सामने आये, इस बात की बहुत बड़ी अपेक्षा है। मुझे लगता है कि उसके लिए बहुत बड़ी विचार क्रान्ति की जरूरत है। आज धार्मिक क्षेत्र में विचार क्रान्ति ठप्प हो गई है। धार्मिकों पर भी पदार्थ का इतना ज्यादा असर है कि वे धर्म की विचार क्रान्ति को करने तैयार है किन्तु धार्मिक क्षेत्र में विचार करने के लिए तैयार नहीं है। कैसे सुप्त चेतना को जागृत किया जाए? चेतना सुप्त नहीं, मुर्च्छित भी है। अब मुर्च्छित चेतना को कैसे जागृत किया जाए? बहुत कठिन
काम है। महावीर जयन्ती का आयोजन किया जाता है, भक्ति-गान और प्रशन्सा का कार्यक्रम चलता है। किन्तु महावीर ने जो किया, उसे हम कैसे आगे बढ़ाएं, उस पर चिंतन प्रायः नहीं होता। ये भारी समस्या है। महावीर जयन्ती भी एक रूढ परमपरा बन गई। दिन आता है और मना लिया जाता है, किन्तु उस दिन कैसे आत्मा-लोचन हो, कैसे नया चिंतन हो, कैसे हम महावीर के अवदान को विश्व के सामने प्रस्तुत कर सके, इन विषयों पर कोई विशेष चिंतन नहीं होता। एक बात की और ज्यादा अपेक्षा मुझे लग रही है कि व्यक्तिगत स्वामित्व ने भारी समस्या पैदा कर दी है। एक व्यक्ति चाहे जितना धन अर्जित कर सकता है और चाहे जैसा दुरूपयोग या भोग कर सकता है। अर्जित धन का एक उपयोग तो करने वाले बहुत कम लोग हैं, किन्तु व्यक्तिगत शान शौकत, एश्वर्य, प्रदर्शन आदि में उसका उपयोग करने वालों की संख्या बहुत बड़ी है। कैसे उसका दृष्टिकोण बदले कि संग्रह का सीमा करण होना चाहिए। व्यक्तिगत स्वामित्व का सीमाकरण शायद कोई कर नहीं पा रहा है। जिनके हाथ में सत्ता है और करना चाहिए, वे स्वयं इस समस्या से मुक्त नहीं है कि समाधान कैसे करेंगे।
महावीर जयन्ती का दिन इस दिशा में मानव समाज की चेतना को जागृत करने का हो। संग्रह का जितना भार होगा आदमी उतना नीचे जाएगा, चेतना उतनी नीचे जाएगी। चेतना को उठाने का और आदमी को उठाने का उपाय है - सीमाकरण। हम त्याग, संयम और सीमाकरण जैसे शब्दों को झुठलाते जा रहे हैं, भुलाते जा रहे हैं। हमारे आर्थिक विकास की अवधारणा में ये शब्द निरर्थक हो गये और ये माना जा रहा है कि आज ये बात प्रासंगिक नहीं है। ये भी प्रश्न होता है आज महावीर की क्या प्रासंगिकता है, आज जैन धर्म की क्या प्रासंगिकता है। मैं सोचता हूं कि यदि कोई समस्या है, सम्प्रदायवाद की समस्या है और असीम अर्थ संग्रह की समस्या है, विषमताएं हैं। एक और प्रबल ऐश्वर्य और दूसरी ओर भूख। इन दोनों में टक्कर है तो फिर महावीर कि प्रासंगिकता है। हम मानें या न मानें, स्वीकार करें या ना करें। रास्ता खोजें तो शायद महावीर का रास्ता मेरी दृष्टि में बहुत सरल सीधा और सबसे ज्यादा निष्कन्टक रास्ता है। महावीर जयन्ती को मनाने का तरीका बदले। केवल प्रशंसा गीतों तक महावीर और महावीर दर्शन को सीमित न करें। हम वर्तमान समस्या के सन्दर्भ में महावीर को प्रस्तुत करें और महावीर को समझने का प्रयत्न करें तो शायद हमें भी कोई रास्ता मिल सकता है और हम भी समस्या के समाधान के आस-पास पहुंच सकते हैं। मुझे नहीं पता कि बहुत ऐश्वर्य के साथ, वैभवपूर्ण तरीके के साथ महावीर को मनाने वाले कहां तक सहमत
होंगे मेरे विचार से। किन्तु सहमत कोई हो या न हो, आखिर जो सच्चाई है उस सच्चाई को सामने रखना ही आवश्यक है और ये सच्चाई है और वर्तमान की सच्चाई है कि अनेकान्त दृष्टि सापेक्ष दृष्टि और समन्वय दृष्टि से विचार किए बिना हम सम्प्रदाय की समस्या को नहीं सुलझा सकते। ये भी सच्चाई है - मैत्री और एकता की चेतना को जागृत किये बिना हम हिंसा को कम नहीं कर सकते, हिंसा की बाढ को रोक नहीं सकते। ये भी सच्चाई है कि धन के असीम संग्रह की जो परम्परा है, उस पर रोक लगाए बिना हम गरीबी भूख और विषमता को भी कम नहीं कर सकते। इन सारी सच्चाइयों को सामने रख कर समस्याओं को सामने रखें और फिर उनका समाधान खोजने का प्रयत्न करें और फिर महावीर की मूर्ति हमारे सामने आ जाए तो एक ही स्वर उच्चारित होगा। एक ही स्वर हमारे कानों तक पहुंचेगा कि समस्या को सुलझाना है तो केवल पदार्थ की दिशा में ही आगे मत बढ़ो, विकास का मानदण्ड इसे मत बनाओ। पदार्थ और चेतना दोनों को आगे रख कर आगे बढ़ो पदार्थ की समस्या चेतना से सुलझाओ और चेतना की कोई समस्या है, अनिवार्यता है, वह पदार्थ के द्वारा सुलझाओ दोनों में हम समन्वय स्थापित कर सकें तो महावीर जयन्ती मनाने का अर्थ बहुत गहरा होगा और मानव जाति के लिए ही नहीं, प्राणी मात्र के लिए पूरे विश्व के लिए कल्याणकारी होगा।
प्रस्तुति - मुनि जयंत कुमार
भगवान् महावीर का जीवन और दर्शन जाने अनजाने वर्तमान युग का जीवन-दर्शन हो रहा है। लोकतंत्र महावीर के अनेकांत के सह अस्तित्व और समन्वय का जीवन्त प्रयोग है। पर्यावरण की सुरक्षा का प्रयत्न उनकी अहिंसा का व्यावहारिक प्रयोग है। जातिवाद और संप्रदाय के प्रति बदला हुआ दृष्टिकोण उनकी धर्मक्रांति का जीवन्त प्रमाण है। शाकाहार का आंदोलन उनकी अहिंसक जीवन शैली का एक सुन्दर निदर्शन है।
इन और इन जैसे अनेक संदर्भों को ध्यान में रखकर मैंने एक पुस्तक लिखी- ‘महावीर का पुनर्जन्म’। पुनर्जन्म का प्रशन सैद्धांतिक दृष्टि से बहुत चौंकाने वाला है पर व्यावहारिक दृष्टि से बहुत सार्थक है।
भगवान् महावीर की जन्म जयंती के अवसर पर हम उनके अनेकांत दर्शन को समझने का, उनकी जीवन शैली को अपनाने का प्रयत्न करें, जन्म जयंती का उत्सव हमारे लिए बहुत श्रेयस्कर होगा।
तुम्हारी कविता मे सिर और पैर दोनो मिले, पर प्राण नही मिला,
यह वसुधा का पैगम्बर है, खोली जटिल ग्रन्थियॉ मन की,पाया अनुपम चिदअम्बर है।
प्रभुवर पावन प्रज्ञा से मै जीवन मे नित बढता जाऊ॥
इतिहास के झरोखे से
नत्थू से मुनि नथमल,मुनि नथमल से, महाप्रज्ञ, और महाप्रज्ञ से आचार्य महाप्रज्ञ स्वभाव से..... निश्छल, बुद्धि से विनम्र,चरित्र से पारदर्शी और.ज्ञान से सूक्ष्मदर्शी है।
बालक नथमल ढाई वर्ष के थे तब उनके पिता तोलारामजी का निधन हो गया था।
महाप्रज्ञजी के दीक्षा गुरु अठम आचार्य कालुगूणी थे।
महाप्रज्ञजी की दीक्षा सरदारशहर (राजस्थान) मे भन्सालीजी के बाग मे मे सवत १९८७ माघ शुक्ल दशमी को हुई थी।
१२ नम्बर १९७८ गगाशहर राजस्थान मे आचार्य श्री तुलसी ने मुनि नथमलजी को "महाप्रज्ञ" अलकरण से विभुषित किया।
महाप्रज्ञजी की "युवाचार्य" पद पर नियुक्ति ३ फरवरी १९७९ को राजलदेसर गाव मे।
मुनि नथमलजी को तेरापन्थ धर्म छोडकर अपने साथ आने के लिए भगवान रजनिश ने निमन्त्रण दिया था।
भारतीय ज्ञानपीठ की प्रखर चयन समिति ने सन १९८७ मे " मुर्ति देवी पुरस्कार" के लिऐ आचार्य महाप्रज्ञजी का नाम चयनित किया। किन्तु महाप्रज्ञजी ने यह कहते हुऐ इसे लेने के लिऐ इन्कार कर दिया की-" व्यक्ती की प्रतिष्ठा पुरस्कार से नही कर्तव्य से होती है।
राजस्थान विधापीठ के कुल पति ने महाप्रज्ञजी के साहित्यिक अवदान के लिऐ , उन्हे डी,लिट, की मानद उपाघि देने का सकल्प व्यक्त किया, जिसे महाप्रज्ञजी ने अस्वीकार कर दिया।
आचार्य श्री तुलसी ने १८ फरवरी १९९४ को सुजानगढ मे अपने आचार्यपद का विसर्जन कर युवाचार्य महाप्रज्ञजी को आचार्य पदप्रदान किया, इस प्रकार मुनि नथमलजी बिन्दु से सिन्धु, और शिष्य से सबके सरताज बन गऐ।
आचार्य माहाप्रज्ञजी ने ११ वर्ष कि बाल उम्र मे अपनी मॉ के साथ तेरापन्थ धर्म सघ मे आठवे आचार्य कालुगुणी के हातो दीक्षा ली। अब तक लाखो किलोमिटर पैदल यात्रा विहार कर चुके तेरापन्थ के दशवे आचार्य महाप्रज्ञजी के शासन मे १००० साधु-साध्वीया लाखो श्रावक अपने जिवन पथ को गुरु के चरणो मे समर्पित।
भारत सरकार के विश्वविधालय अनुदान आयोग ने २२ फरवरी १९८९ को प्राकृत भाषा के पण्डित के रुप मे तीन विद्धवानो को चयनित किया जिसमे एक आचार्य माहाप्रज्ञजी है ।
विश्व के शीर्षस्थ दार्शनिको की सस्था इन्टरनेशनलसोसायटि फॉर इण्डियन फिलॉसफी" ने आचार्य महाप्रज्ञजी को अपनी कार्यकारणी सदस्यो मे सम्मिलित किया।
आचार्य महाप्रज्ञजी का ९० वॉ जन्म दिवस पर कोटि कोटि वन्दन।
"हे प्रभु यह तेरापन्थ" हिन्दी ब्लोग का आचार्य महाप्रज्ञजी वर्धापन विशेषाक।"
परम श्रेद्धय गुरुदेव आचार्य महाप्रज्ञजी ने पुरुषार्थ परायण जीवन जीया, और जी रहे है। गुरुदेव के
धन्य बनी मॉ बालू, कुक्षि उजाली
चोरडिया कुल को, चमकाया तूने
पाकर तुमको हूऐ निहाल रे॥
अल्पज्ञ तुम महाप्र्ज्ञ कहलाए।
तेरी प्रज्ञा का कोई, पार न पाए
गुरुवर तुलसी की, जाऐ बलिहारी
खोज निकाला गुदडी लाल रे॥
रात दिन ग्रन्थो से, घिरे तुम रहते,
फिर भी निग्रन्थ जैसा जीवन जीते,
पल पल ज्ञानार्जन, आगम का सृजन
जग को दिया प्रेक्षा उपहार रे॥
विनम्र,अभिवदना, नमन एक महामानव के प्रति: ८९ वर्षो की यात्रा पुर्ण कर ९० वे वर्ष मे प्रवेश
विधवान कोन?
विघा और अविघा मे जो अन्तर है, उसे समझ लेना ही जीवन की सर्वोपरि साधना है। साधना केवल योगियो के लिये नही है, जो भी व्यक्ति अपना जीवन शान्तिपूर्वक ढग से बिताना चाहे उन्हे साधना का अवलबन लेना चाहिए। जो सब किछ जानकार भी अपने आपको नही जानता, वह अविघावान है। विघावान वही है, जो दूसरो को जानने से पूर्व अपने आपको भली-भॉति जान ले.
आचार्य महाप्रज्ञ, चिन्तन का परिमल, पृष्ट५१
परिवारिक जीवन और अहिसा
एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ती के साथ सम्बन्ध और व्यवाहर का तात्पर्य है, समाज। मानवीय सम्बन्ध और निश्छल व्यवाहर का प्रशिक्षण सामाजिक स्तर पर अहिसा का प्रशिक्षण है उसकी पहली प्रयोगभूमि है, परिवार। हिसा को, युद्ध और आतकवाद तक सीमित करना हमे इष्ट नही है युद्ध कभी-कभी और किसी भू-भाग मे होने वाली घटना है। पारिवारिक जीवन मे हिसा की घटनाऐ प्रतिदिन या बहुत बार होती रहती है। वे मानसिक शान्ति मे बाधा डालती है, व्यापक हिसा की पृष्टभूमि तैयार करती है। पारिवारिक जीवन मे शान्तिपुर्ण सह-अस्तित्व का होना अहिसा के प्रशिक्षण का महत्वपुर्ण कार्य होगा। असहिष्णुता,असयम और महत्वकाक्षा - ये पारिवारिक जीवन मे अशान्ति का विष घोल देते है। सहिष्णुता और सयम का अभ्यास, महत्वकाक्षा का परिसीमन-ये प्रयोग पारिवारिक जीवन मे होने वाली हिसा का वातावरण बदल देती है।
आचार्य महाप्रज्ञ, विश्वशान्ति और अहिसा,पृष्ट४१
विनम्र,अभिवदना, महामानव के प्रति।
विनम्र,अभिवदना, नमन एक महामानव के प्रति: ८९ वर्षो की यात्रा पुर्ण कर ९० वे वर्ष मे प्रवेश
हमारा सगठन आपका सम्मान करना चाहती है -आचार्य ने पूछा कैसे ?
आचार्य ने पूछा कैसे ? उन्होंने बताया एक प्रसस्ति-पत्र एवं ११ लाख नकद (रुपया ) पुरस्कार से. आचार्य श्री ने कहा- मै जैन साधू हु ,और जैन साधू अपने पास रुपया पैसा नही रखता है, यहाँ तक की दवाई भी रात में श्रावको को सोप देते है । हमे रुपयों की आवश्यकता नही क्यो की हम साधू क्रिया (पंच महाव्रत धारी) का पालन करते है और भिक्षा मांग कर आहर लाते है हमे धन से क्या वास्ता । अगर आपको रुपया देना ही है तो कोई भी सामाजिक सस्था को देदे वो पैसा जन हीत में काम आई। तेरापंथ के आचार्य या साधू को दिए जाने वाले मोमेंटो ईत्यादी तेरापंथ धर्म के सामजिक सगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा ग्रहण किया जाता है अथवा सुर्क्षितरखा जाता है।
आचार्य महाप्रग्य जी को अनेक सरकारी- गैर सरकारी सगठनों द्वारा पुरस्क्रत कर अपने आप में गोरवान्वित महसूस कर रही है। इसमे प्रमुख है भारत सरकार द्वारा प्रदत्त
इन्द्रा गांधी पुरस्कार राष्ट्रीय एकीकरण निमित १९९२ (आचार्य तुलसी)
राष्ट्रीय साम्प्रदायक सदभावना पुरस्कार
नोबल डिक्लेरेशन पुरस्कार
राजस्थान विद्यापीठ द्वारा भारत ज्योति पुरस्कार
मदर टेरेसा नेशनल अवोर्ड पुरस्कार सहित और भी ......









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मेरे जीवन का रहस्य -आचार्य महाप्रज्ञ
(क्रपया वीडियो देखे)
आज मै उस सत्य को अनावृत करना चाहता हू। उदघाटित करना चाहता हू, जिसके आधार पर व्यक्ति अपनी जीवन शैली का निर्माण करता है, वह स्वय के लिए और दूसरो के लिए बहुत लाभदायी बन सकता है।
अनेकान्त का दृष्टिकोणः-
भाग्य मानु या नियति ? सबसे पहली बात- मुझे जैन शासन मिला। जिन शासन का अर्थ मानता हू-अनेकान्त का दृष्टिकोण मिला। मैने अनेकान्त को जिया है। यदि अनेकान्त का दृष्टिकोण नही होता तो शायद कही ना कहीदलदल मे फस जाता। मुझे प्रसगं याद है दिगम्बर समाज के प्रमुख विद्वान श्री कैलाशचन्द्र शास्त्री आए। उस समय पुज्य गुरुदेव ( आचार्य तुलसी) कानपुर मे प्रवास कर रहे थे।
मेरा ग्रन्थ- "जैन दर्शन:मनन और मीमासा" प्रकासित हो चुका था। पन्डित श्री कैलाशचन्द्र शास्त्री ने कहा-" मुनि नथमलजी( महाप्रज्ञ के मुनीकाल मे नाम था) श्वेताम्बर जैन- दिगम्बर परम्परा के बारे मे जो लिखना था, वो लिख दिया, पर वो हमे अखरा नही, चुभा नही। जिस समन्वय की शैली से लिखा है, वह हमे बहुत अच्छा लगा।
मुझे अनेकान्त का दृष्टिकोण मिला, इसे मै सोभाग्य मानता हू। जिस व्यक्ति को अनेकान्त का दृष्टिकोण जाए,अनेकान्त कि ऑख से दुनिया को देखना शुरु करे तो बहुत सारी समस्याओ का समाधान अपने आप हो जाता है।
अनुशासन का जीवनः-
दुसरी बात मुझे तेरापन्थ (जैन) धर्म सघ मे दीक्षित होने का अवसर मिला। मै मानता हू-वर्तमान मे तेरापन्थ मे दीक्षित होना परम सोभाग्य है और इसलिए है कि, आचार्य भिक्षु (तेरापन्थ के प्रथम आचार्य) ने जो अनुशासन का सूत्र दिया, जो अनुशासन मे रहने की कला और निष्ठा दी, वह देवदुर्लभ है। अन्यत्र देखने को मिलती नही है। मैने अनुशासन मे रहना सीखा। जो अनुशासन मे रहता है, वह आगे बढ जाता है,आत्मानुशासन की दिशा मे गतिशील बन जाता है। तेरापन्थ ने विनम्रता और आत्मानुशासन का जो विकास किया, वह साधु-सस्था के लिए ही नही, पुरे समाज के लिए जरुरी है।
नवीनता के प्रति आकर्षण
अध्ययन का क्षैत्र बढा। सिद्धसेन दिवाकर की जो एक उक्ति थी,उसने मुझे बहुत आकृष्ट किया। उनका जो वाक्य पढा, सीखा या हृदय पटल पर लिखा, वह यह है-"जो अतीत मे हो चुका है,वह सब कुछ हो चुका, ऐसा नही है।"
सिद्धसेन ने बहुत कडी बात लिख दी-"मै केवल अपने अतीत का गीत गाने के लिए नही जन्मा हू।"
मै शायद उस भाषा मे ना भी बोलू। पर मुझे प्रेरणा जरुर मिली-नया करने का हमेशा अवकाश है। हम सीमा न बान्धे की सबकुछ हो चुका है। केवल अतीत के गीत मत गाओ वर्तमान को भी समझने का प्रयत्न करो।
अन्तत पर्याय है। आचार्य हरिभद्र्, जिनभद्र्, गणी क्षमा सागर, आचार्य हेमचन्द्र, आचार्यमलयागिरि, आचार्य कुन्द कुन्द आदि-आदि ऐसे महान जैन आचार्य हुऐ है जिन्हे पढने पर कोई नई बात ध्यान मे आती गई, मै उन सबका सकलन और अपने जीवन मे प्रयोग करता रहा।
निदर्शन निस्पृहता का:-
केवल जैन आचार्यो का नही, आचार्य श्री तुलसी ने ऐसे वातावरण का निर्माण किया था कि मेरा दृष्टिकोण व्यापक बन गया।किस परम्परा का है, किस सम्प्रदाय का है,यह प्रशन गोण हो गया है। मैने वेदिक सन्यासीयो को पढा, देखा। एक सन्यासी की बात करना चाहता हु-"स्वामी विधारण्य, जो पहले जादवपुर युनिवर्सिटी मे गणित के प्रोफेसर थे। एशिया के ग्यारह व्यक्ति चुने गऐ, उनमे एक थे। उन्होने एक पुस्तक लिखी हिन्दु गणित पर। किसी दुसरे के नाम पर छपी है,पर लेखन उनका है। हमारे बहुत निकट सम्पर्क मे रहे। उनकी जो निस्पृहता देखी, उसने मुझे बहुत प्रभावित किया। वे जोधपुर मे आऐ हुऐ थे। हम बाहर शोच के लिए जा रहे थे। वे भी साथ मे थे। मैने पुछ लिया -" स्वामीजी! प्रातराश कर लिया ? दुध पिया? उन्होने कहा- "दुध कहा से आऐ" ? आपके पिछे बडे-बडे प्रोफेसर घूमते रहते है कि आप कुछ बता दे। आपको क्या कमी है?"
वे बोले-"महाप्रज्ञजी! अभी जोधपुर मे हू तब तो सब पीछे-पीछे घूमते है। यहॉ से पुष्कर चला जाऊगा। भिक्षुओ कि पक्ति मे जाक भोजन करुगा। वहॉ दुध कहॉ से आएगा ? वहॉ दुध नही मिलेगा तो दूध का अभ्यास मुझे सताएगा। दूध का सस्कार सताऐगा कि आज दूध नही मिला।"
उनकी और भी जो अनेक बॉते मैए देखी, कि एक सन्यासी कितना निस्पृह और कितना ससार से मुक्त रहना चाहता है। ऐसे सैकडो जैन-अजैन व्यक्ति सम्पर्क मे आऐ, हिन्दु भी मुसलमान भी। बडे बडे लोग मिले। उनको देखा कुछ नई बाते सीखी।
प्रलोभन से अविचलितः-
मेरे सामने भी कितने प्रलोभन आए। कभी-कभी कुछ विरोध चिन्तन करने वालो ने कहा- बसहमे और कुछ नही चाहिऐ, एक मुनि नथमल झुक जाए तो काम हो जाए । ऐसा लगा कि बडा प्रलोभन है सामने। पर लक्ष्य निश्चित था। मेरे सामने मुम्बई के श्रावक रमणीकभाई आया। उसने कहा-आचार्य रजनिश ने कहा है कि मुनि नथमलजी जो काम कर रहे, वे अलग ना करे, वे मेरे साथ मिलकर काम करे। उसने बडे ऊचे सपने दिखाए। मैने कहा-यह हमारा कोई प्रशन नही है। हम जिस लक्ष्य से चल रहे है, हमारा काम हो रहा है। और भी पता नही, कितने लोग आते है, कहते है-उनके साथ यह हो सकता है वो हो सकता है। मैने कहा- मै सपना लेना भी नही जानता। रात को भी कम आते है। हमे तो सपना लेना ही नही है, लक्ष्य के साथ चलना है। इसलिए हम ठीक चल सके। अगर लक्ष्य निश्चित ना होता तो इधर उधर गति हो जाती।
सफलता के साथ जीए:-
मैने जीवन के कुछ रहस्य आज यहॉ बतलाए है। बहुत कम लोग जानते है इन बातो को पास रहने वाले भी कम जानते है। यह जीवन के रहस्य है। आदमी अपनी जीवन-शैली इन रहस्यो के आधार पर बनाऐ। किस प्रकार वह सफल हो सकता है। उन सूत्रो को पकडे तो उनके सहारे वह आगे बढ सकता है।
महाश्रमण( युवाचार्य श्री मुदितकुमारजी) ने एक प्रशन कर दिया इसलिए यह सारा बाताना पडा।अन्यथा अपेक्षा नही थी।
मै मानता हु - जीना मरना - यह तो नियम है। इसमे कोई कठीनाई वाली बात नही। आचार्य भिक्षु के बारे मे मैने लिखा-
मोत से डरता नही मै मोत मुझसे डर चुकी है
मोत से मरता नही मै, मोत मुझसे मर चुकी है।
आचार्य भिक्षु, आचार्य तुलसी कि ईच्छा मृत्यु हूई थी। मेरे लिऐ भी कई कुण्डलिकार लिखते है - ईच्छा-मृत्यु का वरण करेगे। जीना मरना खास बात नही है। किन्तु हम जब तक जीऐ, सफलता के सूत्रो को लक्ष्य को ध्यान मे रखते हुऐ जीऐ। तो हमारा जीना स्वय के लिए , दूसरो के लिए भी यतकिज्चित लाभकर बन सकता है।
| आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा आचार्य महाप्रज्ञ वर्धापना विशेषाक सहयोग- युवादृष्टि, आभार- सीटीयुपी मुम्बई प्रसारण- हे प्रभु यह तेरा-पथ हिन्दी ब्लोग नोट- आचार्य महाप्रज्ञजी ने आपने आत्मसात मे और क्या कहा आगे के अक मे पढे। |
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बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी: आचार्य महाप्रज्ञजी

सस्कृत वाड्मय का एक सुन्दर सूक्त है। "दैवायत्त कुले जन्म, 'मदायन्त तु पोरुषम" किस कुल मे जन्म लेना, यह भाग्य के अधीन होता है किन्तु पुरुषार्थ करना आदमी के वश की बात है। आचार्य महाप्रज्ञजी ने पुरुषार्थ का जीवन जीया है, और भाग्य ने उनका साथ निभाया है। आचार्य महाप्रज्ञजी के पिता का नाम श्री तोलारामजी चोरडीया और माता का नाम बालुजी था। बालक, नथमल नाम से पहचाना जाने लगा। जीवन के प्रथम वर्ष मे ही पिता क साया से उठ गया, पालन पोषण का सारा जिम्मा मातुश्री बालुजी पर आ गया। मातुश्री बालुजी धार्मिक विचारो वाली महिला थी। प्रतिदिन पश्चिमरात्रि*१ मे जल्दी उठकर सामायिक*२ करती थी। बालक नथमल (आचार्य महाप्रज्ञजी) सोये-सोये माता के भिक्षुस्वामी*३ कि स्तुती एवम जयाआचार्य*४ द्वारा रचित चोबीसी, के सान्गान को सुनते थे। भजनो का बार-बार श्रवण से बालक नथमल के मन मे आचार्य भिक्षु के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो गया। साधु-साधवीयो के योग से बालक और मॉ के मन मे वैराग्य का बीजान्कुर प्रस्फुटित हो गया। दोनो ने सयन्त जीवन जीने का निश्चय किया। निश्चय क्रियान्वित मे परिवर्तित हुआ विक्रम सवत १९८७ माध शुक्ला दशमी को। जैन धर्म के श्वेताम्बर तेरापन्थ सम्प्रादय के तत्कालीन आठवे आचार्य कालूगणी के पास मॉ-बेटा दोनो एक साथ, राजस्थान के चूरु जिले के सरदारशहर ग्राम मे दीक्षित हो गये। बालक नथमल मुनि नथमल बन गया। नवदीक्षित मुनि के शिक्षण-प्रशिक्षण का दायित्त्व मुनि तुलसी ( नवम आचार्य) पर था। उन्होने मुनी नथमल को प्रशिक्षित करने मे अपनी शक्ति को नोयोजित किया।
मुनिश्री नथमल ने अध्यन के क्षेत्र मे अच्छा विकास किया। सस्कृत भाषा का गहन अध्यन किया। हिन्दी भाषा पर अधिकार प्राप्त किया। अग्रेजी एवम प्राकृत भाषा को भी अपने अध्यन का विषय बनाया।
विक्रम सवत २०२२ माध शुक्ला ५ को आचार्य तुलसी ने मुनिश्री नथमलजी को "निकाय सचिव का दायित्व सोपा। जो तेरापन्थ धर्म सध मे गोरिमापुर्ण स्थान था।
विक्रम सवत २०३५ माध शुक्ला सप्तमी, राजलदेसर ग्राम (राज) मे तेरापन्थ धर्म सध के आठवे आचार्य युगप्रधान, अणुव्रत अधिशास्ता, आचार्य तुलसी ने निकाय सचिव मुनिश्री नथमलजी को अपना उतराधिकारी धोषित किया और युवाचार्य (भावीआचार्य) के रुप मे प्रतिष्ठित किया। पन्द्रह वर्षो तक युवाचार्य श्री नथमलजी (महाप्रज्ञजी) द्वारा युवाचार्य पद को सुशोभित करने का मोका मिला। विक्रम सवत २०५० माधशुक्ला सप्तमी को राजस्थान के सुजानगढ नगर मे आचार्य तुलसी ने एक लाख लोगो कि उपस्थिति मे युवाचार्य महाप्रज्ञजी को स्वय का आचार्य पद प्रदान करते हुऐ कहा "भिक्षु स्वामी( तेरापन्थ के निर्माता एवम प्रथम आचार्य) व भारमलजी स्वामीजी( तेरापन्थ के दुसरे आचार्य) साथ-साथ रहे। तुम्हे युवाचार्य बनाऐ १५ वर्ष हो गये है पर पुरा कार्य मै ही कर रहा हू। तुम कार्यक्षम होते हुऐ भी दूसरे कार्यो मे लगे रहे । इसलिए अब मै आचार्यपद तुम्हे सोप रहा हू, हस्तान्तरित कर रहा हू। मै इस दायित्व को तुम्हे सोपकर अपनी साधना और मानवजाति के लिऐ व्यापक कार्यक्रम मे लग रहा हू। "
नवमनोनित जैन श्वेताम्बर तेरापन्थ सघ के ९५० साधु- साध्वीयो-मुमुक्ष -मुमुक्षिकाऐ एवम करोडो श्रावको के दशम आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने अपने गुरु को तत्काल "गणाघिपती" सज्ञा से सज्ञापित किया। जैन धर्म मे भगवान महावीर स्वामी के काल से अब तक मे यह सर्वणीम युग बन गया, जब आचार्य तुलसी "गणाघिपती" पद को सुशोभित कर रहे थे। जैन इतिहास मे यह विरली घटना थी।
गणाधिपति तुलसी के निर्देशानुसार श्री महाप्रज्ञ ने "प्रेक्षा-ध्यान पद्धति",का अनुसधान किया। शिक्षा जगत के लिऐ "जीवन-विज्ञान" का प्रणयन किया। अहिसा एवम शान्ति मे विश्वास रखने वाले व्यक्तियो और सस्थाओ को साथ जोडकर अहिन्सा के कार्यक्रमो को प्रभावी बनाने के लिऐ आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने "अहिसा-समन्वय" प्रारम्भ किया।
| ५ दिसम्बर२००१ सुजानगढ नगर से "अहिसा-यात्रा" का शुभारम्भ किया उसके दो उदेशय निर्धारित किये गऐ- (१) अहिसक चेतना का जागरण, (२) नैतिक मुल्यो का विकास। |
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आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने अध्यन के साथ साहित्य- सृजन का कार्य भी प्रारम्भ कर दिया। पुज्य गुरुदेव गणाधिपति तुलसी के वाचना प्रमुखत्व मे जैन आगमो के सम्पादन का कार्य शुरु किया । यह कार्य काफी कुछ सम्पन्न हो चुका है। इसके अतिरिक्त योग,ध्यान,दर्शन आदि अनेक विषयो पर साहित्य तेरापन्थ धर्म सघ मे प्रचुर मात्रा मे उपल्ब्ध है। आचार्य श्री महाप्रज्ञजी का साहित्य अध्यात्म और विज्ञान का समन्वित रुप है। उनके मोलिक विचारो ने सामान्य जनता को ही नही, देश-विदेश के शीर्षस्थ महानुभवो और अपने अपने धर्म सम्प्रदायो मे विश्वास रखने वालो को प्रभावित किया .
श्री महाप्रज्ञ ने तीन उपासनाओ के द्वारा अपने व्यक्तित्व व कर्तृत्व को मुखर बनाया है। ज्ञानपासना, आनन्दोपासना और शक्त्युपासना। * ज्ञानपासना:- मे उन्होने ज्ञान की अविराम आराधना की है। आगमो, विभिन्न शास्त्रो का अनेक बार स्वाध्याय किया है। और अनेक रत्नो को प्राप्त किया है। इतना ही नही उन प्राप्त रत्नो को निरन्तर बॉटने का प्रयत्न भी कर रहे है। *स्वाध्याय और ध्यानः- के द्वारा भी महाप्रज्ञ ने जिस आनन्द को प्राप्त किया है अथवा आनन्द की उपासना की है, वह दुर्लभ है। *श्री महाप्रज्ञ ने शक्ती की उपासना और साधना के लिऐ दीर्धकाल तक अनेक मन्त्रो कि साधना की और अभी भी कर रहे है। जीवन मे शक्ति का बहुत महत्व होता है । शक्तिशाली व्यक्ति ही दुनिया को कुछ दे सकता है। शक्ति की उपासना सर्वत्र और काम्य होती है। |
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श्री महाप्रज्ञ का सोम्य एवम शान्त स्वभाव तथा मृदुतापूर्ण व्यवहार उनकी विशिष्ट सन्तता का परिचायक है, और अहिसामय प्रशासन का एक निदर्शन है। उनके नेतृत्व मे तेरापन्थ धर्म-सन्घ ने एक विशिष्ट पहचान बनाई है। ऐसे महापुरुष की छत्र्-छाया प्राप्त कर सघ धन्यता का अनुभव कर रहा है।
श्री महाप्रज्ञ एक बहु-आयामी व्यक्तित्व के घनी है। उनसे जनता को जीवनौपयोगी पथदर्शन प्राप्त हो रहा है और लम्बे काल तक प्राप्त होता रहे।
नोटः- जैन साधुओ-साध्वीयो का समस्त यात्रा पैदल होती है। मात्राओ-शब्दो- वचनो के लिखाई मे त्रुटी हो तो मै क्षमा चाहता हु। |
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जैन शासन के युग प्रधान आचार्यो की श्रृखला मे एक नाम आचार्य महाप्रज्ञ का है।
(नवम आचार्य श्री तुलसी ने महाप्रज्ञ का, आचार्य पद पर मनोयन करते हुऐ)
( भारत के राष्ट्र्पति श्री कलाम आचार्य महाप्रज्ञ से मिलने उदयपुर पहुचे)
जैन योग मे ध्यान का विशेष महत्व है । भगवान महावीर ध्यान योग के प्रकृष्ट साधक थे। उनके शासन मे ध्यान की विशिष्ट विभूतियॉ हो चुकी है। जैन शासन के युग प्रधान आचार्यो की श्रृखला मे एक नाम आचार्य महाप्रज्ञ का है। ध्यान योग की विलुप्तप्राय परम्परा का पुनरुदधार करने का श्रेय आचार्य महाप्रज्ञ को है। अध्यन मनन प्रयोग और अनुभव की चतुष्पदोसे उन्होने जो कुछ पाया, उसकी निष्पति है प्रेक्षाध्यान।
आचार्य तुलसी द्वारा युवाचार्य के रुप मे मनोनीत और तेरापन्थ के दशम आचार्य के रुप अभिषिक्त आचार्य महाप्रज्ञ अहिसा यात्रा के माध्यम से जन जन मे अहिसक चेतना के जागरण और नैतिक मुल्यो के विकास हेतु निरन्तर पुरुषार्थ कर रहे है। ऐसे महान प्रतापी आचार्य के १४ वर्ष पुर्ण होने के उपलक्ष मे "हे प्रभु यह तेरापन्थ" हिन्दी ब्लोग पर अभिवन्दना विशेषाक प्रसारित कर रहे है। यह श्रृखला बद्ध तरीके से आचार्य श्री के व्यक्तित्त्व मे अवगाहन करने के लिए अपने पाठको के सामने प्रचुर और ठोस सामग्री प्रस्तुत कर सकु यही अभीष्ट है।
आचार्य महाप्रज्ञ |
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दर्शन क्षेत्र मे कोई आचार्य महाप्रज्ञ की तुलना विवेकानन्द से करते है तो कोई सर्वपल्ली राधाकृष्ण्न से। किन्तु प्रबधन के क्षेत्र मे आचार्य महाप्रज्ञ की तुलना सम्भव नही, आपका प्रबन्धन कोशल अद्वितीय है, अनुपमेय है। |
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ज्ञान-दर्शन और चरित्र की आराधना के द्वारा समूचे सघ को अध्यात्म निष्ठ बनाने और उसकी आत्म चेतना के सन्दर्भ मे समुन्न्त करने के लिऐ मेरी सारी शक्ती सघ को समर्पित रहेगी। -आचार्य महाप्रज्ञ |
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मेरी कलम से
महावीर बी सेमलानी जीवन के कई रन्ग है। कब कोनसा चट्क रन्ग प्रभावित कर जाता है। पता ही नही चलता। आज से चार वर्ष पुर्व चाणोद तेरापन्थ युवक परिषद मुम्बई का मन्त्री पद का दायित्व भार सभालने का अवसर प्राप्त हुआ। इसके पुर्व मैने तेरापन्थ टाइम्स को लुणकरणजी छाजेड बीकानेर के सग मिलकर आचार्यश्री तुलसी की कृपा दृष्टी पाकर १९८४ मे शुरु किया था। आज तेरापन्थ टाइम्स देश विदेश मे तेरापन्थ धर्म सध का मुख्य अखबार है जो पढा जाता है। मै महाराष्ट्रा ब्योरो प्रमुख था। पत्र पत्रिकाओ मे लिखने का मुझे मोका मिला। हे प्रभु तेरापन्थ ब्लोग का सफर को अभी एक वर्ष भी पुर्ण नही हुआ है पर आपके प्यार ने मेरे होसले मे कई गुना वृद्धि कर दी। चुकी है प्रभु तेरापन्थ ब्लोग का उदभव इसी मन्शा से हुआ था कि धार्मिक-आध्यात्मिक- विचारोतेजक लेखो का सशक्त माध्यम रहे,= "हे प्रभु"। जिसके समुचित परिचय व पहचान का सामर्थय न तो शब्दो मै है नही किसी और भुमिका मे। " किसी भी दर्शन को बुद्धिगम्य करने के लिए साहित्य की अहम भुमिका होती है और साहित्य का सहज माध्यम है- ॰ चिठ्ठाजगत। गतिशील चिठ्ठा और साहित्य की एकमात्र पहचान है- "परिवर्तन"।परिवर्तन" आज "हे प्रभु" ब्लोग पर हम परिवर्तन करने जा रहे है। इसके जन्म के समय हमारा जो मुल मकसद था उसे पाने के लिऐ परिवर्तन"। |
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