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आखिर 22 -23 साल के युवाओं को गंभीर बीमारी क्यों हो रही है !

Posted: 14 जून 2022



1. दस रू किलो टमाटर  लेकर ताजा चटनी खा सकते हैं,  मगर हम डेढ़ सौ रू किलो टमाटो साँस खाते हैं वो भी एक दो माह पहले बनी हुई बासी, कई प्रकार के केमिकल डला हुआ ।


2. पहले हम एक दिन पुराना घड़े का पानी नहीं पीते थे, घर में रोज सुबह घड़े का पानी बदलते थे, अब तीन माह पुराना बोतल का पानी बीस रू लीटर खरीद कर पी रहे हैं, केमिकल डला हुआ ।


3.  पचास रू लीटर का दूध हमे महंगा लगता हैं और सत्तर रू लीटर का दो महीने पहले बना हुआ कोल्ड ड्रिंक हम पी लेते हैं।इसमें पूरा का पूरा केमिकल डला हुआ ।


4. दो सौ रू पाव मिलने वाला शरीर को ताकत देने वाला ड्राई फ्रुट हमें महंगा लगता है मगर  200  रू. का मैदे से बना पीज्जा शान से खा रहे हैं, इसमे बहुत सारे केमिकल डला हुआ ।


5.  अपनी रसोई का सुबह का खाना हम शाम को खाना पसंद नहीं करते जब कि कंपनियों के छह छह माह पुराने सामान हम खा रहे हैं जबकि हम जानते है कि खाने को सुरक्षित रखने के लिए उसमें प्रिजर्वेटिव मिलाया जाता है।


6. विगत कई  माह के लाँकडाऊन में सबको संभवतः  समझ आ गया होगा कि बाहर के खाने के बिना भी हमारा जीवन चल सकता हैं बल्कि बेहतर चल सकता है।


सोचने योग्य एवं गंभीर विचारणीय विषय है, क्या कारण है कि 22-23 साल के युवा को हार्ट अटैक आ रहा है। हार्ट फेल हो रहा है ।   किडनी खराब हो रही है । लिवर फेल हो रहे है ।

कही यही सब तो कारण नहीं बन रहे है ।


खुद को बढ़ती उम्र के साथ स्वीकारना एक तनावमुक्त जीवन देता है। 

हर उम्र एक अलग तरह की खूबसूरती लेकर आती है  उसका आनंद लीजिये🙏

बाल रंगने है तो रंगिये, 

वज़न कम रखना है तो रखिये, 

मनचाहे कपड़े पहनने है तो पहनिए,

बच्चों की तरह खिलखिलाइये, 

अच्छा सोचिये, 

अच्छा माहौल रखिये, 

शीशे में दिखते हुए अपने अस्तित्व को स्वीकारिये। 


कोई भी क्रीम आपको गोरा नही बनाती, 

कोई शैम्पू बाल झड़ने नही रोकता,

कोई तेल बाल नही उगाता, 

कोई साबुन आपको बच्चों जैसी स्किन नही देता। 

चाहे वो प्रॉक्टर गैम्बल हो या पतंजलि .....सब सामान बेचने के लिए झूठ बोलते हैं। 


ये सब कुदरती होता है। 

उम्र बढ़ने पर त्वचा से लेकर बॉलों तक मे बदलाव आता है। 

पुरानी मशीन को Maintain करके बढ़िया चला तो सकते हैं, पर उसे नई नही कर सकते।


ना किसी टूथपेस्ट में नमक होता है ना किसी मे नीम। 

किसी क्रीम में केसर नही होती, क्योंकि 2 ग्राम केसर भी 500 रुपए से कम की नही होती ! 


कोई बात नही अगर आपकी नाक मोटी है तो,

कोई बात नही आपकी आंखें छोटी हैं तो,

कोई बात नही अगर आप गोरे नही हैं 

या आपके होंठों की shape perfect नही हैं....


फिर भी हम सुंदर हैं, 

अपनी सुंदरता को पहचानिए।


दूसरों से कमेंट या वाह वाही लूटने के लिए सुंदर दिखने से ज्यादा ज़रूरी है, अपनी सुंदरता को महसूस करना।


हर बच्चा सुंदर इसलिये दिखता है कि वो छल कपट से परे मासूम होता है और बडे होने पर जब हम छल व कपट से जीवन जीने लगते है तो वो मासूमियत खो देते हैं 

...और उस सुंदरता को पैसे खर्च करके खरीदने का प्रयास करते हैं।


मन की खूबसूरती पर ध्यान दो।

पेट निकल गया तो कोई बात नही उसके लिए शर्माना ज़रूरी नही।

आपका शरीर आपकी उम्र के साथ बदलता है तो वज़न भी उसी हिसाब से घटता बढ़ता है उसे समझिये।


सारा इंटरनेट और सोशल मीडिया तरह तरह के उपदेशों से भरा रहता है,

यह खाओ, वो मत खाओ 

ठंडा खाओ, गर्म पीओ, 

कपाल भाती करो,  

सवेरे नीम्बू पीओ,

रात को दूध पीओ

ज़ोर से सांस लो, लंबी सांस लो 

दाहिने से सोइये ,

बाहिने से उठिए,

हरी सब्जी खाओ, 

दाल में प्रोटीन है,

दाल से क्रिएटिनिन बढ़ जायेगा।


अगर पूरे एक दिन सारे उपदेशों को पढ़ने लगें तो पता चलेगा 

ये ज़िन्दगी बेकार है ना कुछ खाने को बचेगा ना कुछ जीने को !!

आप डिप्रेस्ड हो जायेंगे।


ये सारा ऑर्गेनिक, एलोवेरा, करेला, मेथी, पतंजलि में फंसकर दिमाग का दही हो जाता है। 

स्वस्थ होना तो दूर स्ट्रेस हो जाता है।


अरे! अपन मरने के लिये जन्म लेते हैं,

कभी ना कभी तो मरना है अभी तक बाज़ार में अमृत बिकना शुरू नही हुआ।


हर चीज़ सही मात्रा में खाइये, 

हर वो चीज़ थोड़ी थोड़ी जो आपको अच्छी लगती है। 


भोजन का संबंध मन से होता है 

और मन अच्छे भोजन से ही खुश रहता है।

मन को मारकर खुश नही रहा जा सकता।

थोड़ा बहुत शारीरिक कार्य करते रहिए,

टहलने जाइये, 

लाइट कसरत करिये,

व्यस्त रहिये,  

खुश रहिये,

शरीर से ज्यादा मन को सुंदर रखिये।



सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

प्राचीन जैन बायोलोजी:-

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 प्राचीन जैन बायोलोजी:-


1892 में Dmitry Ivanousky रशियन साइंस्टिस्ट ने बीमार तंबाकू के झाड़ का रस फिल्टर करके स्वस्थ प्लांट में डाला तो स्वस्थ प्लांट भी बीमार हो गया,तभी से दुनिया को वायरस के बारे में पहली बार पता चला लेकिन....


जैन धर्म में वायरस और बैक्टीरिया के बारे में 2500 साल प्राचीन जीवाभिगम और जीवविचार जैसे कई सूत्रों में वर्णन मिलता है-


1- परमात्मा महावीर के निर्वाण पर सूक्ष्म बैक्टीरिया उत्पन्न होने से साधु-साध्वियों ने अन्न-जल का त्याग कर दिया था।


2- "भद्रबाहुसंहिता" में भी भद्रबाहु स्वामी ने 2000 साल पहले बताया कि महामारी के वक्त संक्रमित व्यक्ति के स्पर्श किए हुए किसी भी वस्तु या लोहे आदि को ना छूए।


3- 17 वे तीर्थंकर कुंथूनाथस्वामी के जन्म के समय कुंथू अथार्त सूक्ष्म जीवो की रक्षा की बात कही गई है।


4-स्त्रिया मासिक धर्म में होती है तब उनके शरीर से निकलने वाली अशुद्धि और पसीने में भी हानिकारक वायरस होते हैं इसीलिए महिलाएं मासिक धर्म के समय self quarantined रहती है।


4- dead body में भी वायरस उत्पन्न होने से डेडबोडी का स्पर्श करने के बाद नहाने और सूतक के नियमों का पालन किया जाता है,जैनधर्म में डेडबोडी का अग्निसंस्कार किया जाता है क्योकि यदि कोरोना जैसे वायरस से ग्रसित मृतशरीर को दफना दिया जाए तो उसके दुष्परिणाम से नए रोग उत्पन्न हो सकते हैं।


 5-प्रभु महावीर ने कहा है-"जहा अंधकार होता है वहां जीवो की उत्पत्ति ज्यादा होती है", इसीलिए सूक्ष्म जीवो की रक्षा के लिए जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन निषेध है। और जब सूर्य की किरणों से सूर्योदय के 48 मिनट के बाद जीवों की उत्पत्ति रुक जाती है तब जैन लोग नवकारशी(दिन का पहला अन्न-जल ग्रहण करना) करते हैं।


5-कंदमूल‌ भी जमीन के नीचे अंधेरे में उगने के कारण उसके कण-कण में अनंत  जीव होते हैं(जैसे एक बीज=एक जीव, वैसे कंदमूल का एक कण=अनंत जीव) जिसकारण जैनधर्म में कंदमूल खाना निषेध है।


6- सूर्यग्रहण के वक्त भी अन्न-पानी ग्रहण करना निषेध कहा गया है वास्तव में सूर्य ग्रहण के कारण अंधकार होने से सूक्ष्म वायरस आदि जीवो की रक्षा हेतु अन्न-जल का त्याग करने को कहा गया है क्योंकि वायरस भोजन में मिलने पर रोग भी उत्पन्न कर सकते हैं।


7- अनंत तारामंडल में चंद्र की गति के अनुसार विशाखा रोहिणी आदि 27 नक्षत्र को माना गया है,22 जून पर आद्रा नक्षत्र शुरू होने पर मौसम आद्र हो जाता है जिसके कारण आम जैसे गीले फलों में बैक्टीरिया उत्पन्न होने शुरू हो जाते हैं   इसलिए जैन लोग 22 जून के बाद आम जैसे फलों का त्याग करते हैं।


8- जैन शास्त्रो अनुसार पानी से ही जीवो की उत्पत्ति होती है इसीलिए जैन धर्म में बासी भोजन का त्याग करने को कहा है, लेकिन वैफर,खाकरा या कोई भी सुखी वस्तु जिसमें पानी का अंश ना हो वह दूसरे दिन भी खाई जा सकती है।


9- जैन शास्त्रों अनुसार दही को जैविक नहीं बल्कि रासायनिक प्रक्रिया से जमाना चाहिए,जिसके लिए नींबू की कुछ बूंदे चांदी,संगमरमर,सुखी लाल मिर्च या सूखे नारियल के टुकड़े पर डालकर हल्के गर्म दूध में मिलाकर जैन रासायनिक विधि से दही जमाया जाना चाहिए।

जैन शास्त्रों में कहा है कि 2 रात के बाद रासायनिक पद्धति से जमाये गये दही में भी जैविक प्रक्रिया शुरू हो जाती है इसलिए 2 रात के बाद का दही खाना जैन धर्म में निषेध हैं।


10-द्विदल- दाल,चने आदि जिनके दाने के दो दल होते हैं वे द्विदल कहलाते हैं, कच्चे दूध,दही में द्विदल का आटा मिक्स किया जाए तो तुरंत ही दो इन्द्रिय वाले जीव उत्पन्न हो जाते हैं। इसीलिए जैन लोग कड़ी बनाते वक्त दही या छाछ को पहले गर्म करते हैं और फिर उसमें बेसन डालते हैं। ताकि जीवोत्पत्ति ना हो।


11- जैन शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य के वात्त,पित्त,मल,मूत्र,थूंक,पसीना वीर्य आदि 48 मिनट में ना सूखे तो उसमें असंख्य समुर्च्छिम सूक्ष्म मनुष्य जीवों की उत्पत्ति होती है।ये अतिसूक्ष्म जीव शुक्राणु की तरह होते हैं,

उनके सिर में आंख,कान,नाक, मुंह,स्पर्श पांचो इंद्रियां होती है,मात्र शरीर की जगह पूंछ होती है,

 इसीलिए जैन साधु इन सूक्ष्म जीवो की रक्षा के लिए स्नान ना करना आदि नियम पालन करते हैं,आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी लैब टेस्ट में यह जैन विज्ञान को 100% सही सिद्ध किया है।


12- जैनशास्त्रों अनुसार शहद,बटर(मक्खन),मांस(meat),शराब ये चारों महाविगई है जिनके प्रत्येक कण में प्रतिपल असंख्य दो इन्द्रिय वाले जीव (जिनके पास शरीर के साथ मात्र भोजन के लिए मुंह है,बाकि आंख,कान,नाक नही है ) ऐसे सूक्ष्म जीवो की उत्पत्ति होती रहती है।

मांसाहार में मात्र एक बडे पंचेन्द्रिय जीव की ही हत्या नहीं होती बल्कि मांस कच्चा हो या पक्का उसमें असंख्य सुक्ष्म दो इंन्द्रिय वाले जीव जिन्हें हम बैक्टीरिया कहते हैं प्रतिपल उत्पन्न होते रहते हैं,मांसभक्षण से उन असंख्य जीवो की भी हत्या होती है।


13-WHO report के अनुसार नोनवेज के कारण 159 अलग-अलग प्रकार की बीमारियों का खतरा रहता है। जिनमें heart disease,B.P.,kidney, strock,आदि मुख्य हैं।


14-   covid,sarc जैसे कई वायरस nonveg से ही पैदा हुए हैं,E.coli & BSE वायरस बीफ याने कि गाय के मांस से, trichinosis पोर्क याने कि सुअर के मांस से, salmonella चिकन से,scrapie मटन याने कि बकरे के मांस से एसे कई जानलेवा वायरस की उत्पत्ति का कारण nonveg ही है।


15- वैज्ञानिकों को यह 1679 में ही पता चला है कि butterfly के अंडे पहले caterpillar यानी की कानखजूरे या ईयल की तरह विकसित होते हैं, बाद में उनके पंख आने पर वे butterfly बन जाते हैं। लेकिन प्राचीन जैन शास्त्रों में लिखा है कि भ्रमर के डर से उसका ध्यान करते हुए ईयल खुद भ्रमर बन जाती है,जो इस वैज्ञानिक तथ्य को तो सिद्ध करता ही है,साथ ही जैनविज्ञान का साइकोलॉजी अप्रोच को भी सिद्ध करता है।


जैन धर्म में एकिन्द्रिय जीव से लेकर पांच इंन्द्रिय वाले मनुष्य तक के समस्त जीवों की मन,वचन,काया से अहिंसा का पालन करने को कहा. गया है।

जैन धर्म अनुसार अहिंसा ही परम धर्म है।

जैन धर्म अनुसार आत्मा ही ब्रह्म है।


सूचना-: उक्त लेख विभिन्न सोसियल मीडिया के साभार से लिया गया है । अर्थात कॉपी पेस्ट है । और हम इसे प्रमाणित नही करते है अतः केवल जानकारी के आधार पर संग्रहित किया जा रहा है

जीवन विज्ञान विद्यार्थीयों में व्यवहारिक एवं अभिवृति परिवर्तन सूनिशचित करता है

Posted: 04 दिसंबर 2009
जीवन विज्ञान

  


  (आचार्यश्री महाप्रज्ञजी, युवाचार्यश्री महाश्रमनजी, साध्वी प्रमुखाजी, राष्ट्रपति के संग शिक्षा पद्धति पर बात करते हुए) 



आचार्य महाप्रज्ञ ने हमेशk देश की शिक्षा पद्धति को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनका मानना है कि शिक्षा का मूल उद्धेश्य है व्यक्ति का सर्वांगीण विकास तथा नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा एवं सच्चरित्रवान्‌ मनुष्य का निर्माण। उन्होंने जीवन-विज्ञान के अंतर्गत विस्तृत पाठयक्रम प्रदान किया है। जीवन विज्ञान विद्यार्थीयों में व्यवहारिक एवं अभिवृति परिवर्तन सूनिशचित करता है।
     

आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा विद्यार्थियों के लिए जो शैक्षणिक पाठयक्रम एवं प्रयोग संसूचित किए गये हैं वे उसके जीवन में ऐसे महत्पूर्ण जैव-रासायनिक एवं विद्युतीय परिर्वतन करते हैं जिससे उनका संपूर्ण रूप से रूपांतरण हो सके। आचार्य महाप्रज्ञ विश॓ष बल देकर कहते है कि एक विद्यार्थी को विविध आसनों एवं प्रयोगों का अनुगमन करना चाहिए। मूल्य परक जीवन जीने के लिए व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना चाहिए
     

वो कहते हैं सिर्फ उच्च शिक्षा से प्राप्त बौद्धिक विकास के साथ एक व्यक्ति नैतिक भावनात्मक एवं आध्यात्मिक स्तर पर स्वतः विकास नहीं करता। व्यक्ति में सही भावात्मक विकास आवश्यक है जिससे प्रेम, करूणा, सहिष्णुता, धैर्य, संतोष आदि गुण उसमें विकसित हो। इस संदर्भ में आचार्य महाप्रज्ञ ने वैशविक समस्याओं के समाधान हेतु जीवन विज्ञान का उपक्रम प्रस्तुत किया।
     
आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा निर्मित एवं विकसित जीवन विज्ञान राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, बिहार, आदि राज्यों में विद्यार्थियों के लिए पाठयक्रम के रूप में शामिल किया गया है।
     
जीवन विज्ञान का मुख्य उद्धेश्य तीन प्रकार का है (१) ऐसे स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण करना जो शरीरिक, मानसिक, भावात्मक एवं सामाजिक स्वस्थता के मध्य सामंजस्य स्थापित कर सके। (२) एक ऐसे नये समाज का निर्माण करना जो हिंसक उपद्रवों एवं अनैतिकता से मुक्त हो। (३) ऐसी नई पीढी का निर्माण करना जो आध्यात्मिक-वैज्ञानिक व्यक्तित्व हो।
     
औपचारिक शिक्षा पाठसक्रमों में इस पाठयक्रम को सम्मिलित किया गया है। सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास के लिए इस पाठयक्रम के माध्यम से प्रशिक्षित करने हेतु सैकडों विर आयोजित हो चुके है ।


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