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सुज्ञजी ने बहुत गहरा प्रश्न करा - सात तत्व नहिं, नौ तत्वो का उल्लेख

Posted: 01 अगस्त 2010
सुज्ञजी ने बहुत गहरा प्रश्न करा कल कि हमारी पोस्ट "जैन दर्शन एवं तत्व -१" कों लेकर जिससे मुझे प्रसन्ता हुए क़ी पाठको में सजगता है ...चुकी जैन इतिहास कों हम कई कड़ीयो में प्रकाशित करते हुए आज ३० वी कड़ी पर पहुचे है >  मूल मकसद है पाठको एवं धर्म जिज्ञासुओ में जानकारियों का आदान प्रदान करना ! इस विशेष पोस्ट कों प्रकाशित करने का मतलब भी यह है कि जानकारियों कों बढाया जाए..आभार !

सुज्ञाजी का यह रहा वः प्रश्न 

प्रश्न १  - सात तत्व नहिं,आगमों में तो नौ तत्वो का उल्लेख है।
प्रस्तूत लेख में पुण्य और पाप को क्यों छोड दिया गया है


हमारा उत्तर - कुछ मान्यताओं में नो तत्व को स्वीकार किया गया है . यह नो तत्व यू है !
१. जीव
२. अजीव
३. पुण्य
४. पाप
५. आश्रव
6. संवर
7. निर्जरा
8. बंध
9. मोक्ष


प्रश्न २  -जैन सम्रदाय की कुछ परम्पराए पुन्य और पाप को तत्व नही मानती हम क्यों मानते है ?
उत्तर - दिगम्बर परम्परा में पुन्य और पाप को तत्व के रूप में स्वीकार नही किया ... वे इन्हें बंध के अंतर्गत मानते है ! जबकि श्वेताम्बर परम्परा में इन्हें स्वतंत्र तत्व के रूप में स्वीकार किया है . मूलत: तत्व  दो है (१) जिव (२) अजीव , शेष दोनों का विस्तार है

श्री सुज्ञजी एवं अन्य प्रश्न करता बन्धु ! आपने कहा वह भी सही है की तत्व नो होते है (जो उपर में मैंने अब लिखे है )
और डा . हीरालालजी जैन के व्यखानो को मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद व्याख्यानमाला १९६० " भारतीयसंस्कृति में जैन धर्म का योगदान " नाम से पूरा जैन साहित्य संजोया है . हो सकता है जैन धर्म में अलग अलग मान्यताओं के अनुशार १९-२० का इतिहास और परम्पराओं में फर्क आ सकता है ... जिसे मुलभुत रूप में ना ले -

हे प्रभु यह तेरापंथ पर जैन इतिहास की प्रस्तुती हो रही है इसके मूल अंश इसी साहित्य से लिए गए है जिसके लेखक श्री डा. हीरालालजी जैन है ! और हम लेखक का  उल्लेख बार बार कर रहे है !

प्रकाशक मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद्, भोपाल क्या कहते है -"
"भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान" परिषद् के उक्त कार्यक्रम के अन्तर्गत ९ वीं पुस्तक है। इसमें संस्कृत, पालि व प्राकृत साहित्य के सुप्रसिद्ध अधिकारी विद्वान् डा. हीरालाल जैन के शोधपूर्ण चार भाषणों का संग्रह है, जिनमें जैन धर्म से संबंधित संस्कृति, इतिहास, साहित्य, दर्शन तथा वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला पर प्रकाश डाला गया है। इन व्याख्यानों का आयोजन दिनांक ७ मार्च १९६० से १० मार्च १९६० तक नवीन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में किया गया था। डा. जैन ने भाषणों को पुस्तक का रूप देने के लिए अपने मूल भाषणों में यथास्थान आवश्यक परिवर्तन-परिवर्द्धन कर दिए हैं और उसे क्रमबद्ध बनाकर पुस्तक को उपयोगी और रोचक बना दिया है, जिसमें सामान्य पाठक के अतिरिक्त, इस विषय के शोधकर्ता को भी पर्याप्त नवीन सामग्री उपलब्ध होगी। इस पुस्तक के सुरुचिपूर्ण प्रकाशन में भी डा. जैन ने अनेक कठिनाइयों के रहते हुए भी अत्यधिक सहायता प्रदान की है। उन्होंने सुविस्तृत ग्रंथ-सूची और शब्द-सूची जोड़कर सोने में सुगन्ध का समावेश कर दिया है। इन सब के लिए हम डा. जैन के आभारी है।

आशा है कि हिन्दी-जगत् में इस पुस्तक का समुचित समादर होगा और शोध-साहित्य की श्रीवृद्धि करनेवाले विद्वानों को इससे प्रेरणा मिलेगी।

अनन्त मराल शास्त्री,
सचिव,
मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद्,
भोपाल

अब देखे इसके मूल लेखक का परिचय
आमुख
मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद् के आमंत्रण को स्वीकार कर मैंने भोपाल में दिनक ७, ८, ९ और १० मार्च, १९६० को क्रमशः चार व्याख्यान `भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान' विषय पर दिये। चारों व्याख्यानों के उपविषय थे जैन इतिहास, जैन साहित्य, जैन दर्शन और जैन कला। इन व्याख्यानों की अध्यक्षता क्रमशः मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री डा. कैलासनाथ काटजू, म. प्र. विधान सभा के अध्यक्ष पं. कुंजीलाल दुबे, म. प्र. के वित्त मन्त्री श्री मिश्रीलाल गंगवाल और म. प्र. के शिक्षा मन्त्री डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा की गई थी। ये चार व्याख्यान प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रकाशित हो रहे हैं।

पाठक देखेंगे कि उक्त चारों विषयों के व्याख्यान अपने उस रूप में नहीं है, जिनमें वे औसतन एक-एक घंटे में मंच पर पढ़े या बोले जा सके हों। विषय की रोचकता और उसके महत्व को देखते हुए उक्त परिषद् के अधिकारियों, और विशेषतः मध्यप्रदेश के शिक्षा मन्त्री डा. शंकरदयाल शर्मा, जिन्होंने अन्तिम व्याख्यान की अध्यक्षता की थी, का अनुरोध हुआ कि विषय को और अधिक पल्लवित करके ऐसे एक ग्रन्थ के प्रकाशन योग्य बना दिया जाय, जो विद्यार्थियों व जनसाधारण एवं विद्वानों को यथोचित मात्रा में पर्याप्त जानकारी दे सके। तदनुसार यह ग्रन्थ उन व्याख्यानों का विस्तृत रूप है। जैन इतिहास और दर्शन पर अनेक ग्रन्थ व लेख निकल चुके हैं। किन्तु जैन साहित्य और कला पर अभी भी बहुत कुछ कहे जाने का अवकाश है। इसलिये इन दो विषयों का अपेक्षाकृत विशेष विस्तार किया गया है। ग्रन्थ-सूची और शब्द-सूची विशेष अध्येताओं के लिये लाभदायक होगी। आशा है, यह प्रयास उपयोगी सिद्ध होगा।

अंत में मैं मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद्, का बहुत कृतज्ञ हूं, जिसकी प्रेरणा से मैं यह साहित्य-सेवा करने के लिए उद्यत हुआ।

हीरालाल जैन
व्याख्यान - १

जैन धर्म का उद्गम और विकास
व्याख्यान - १
जैन धर्म का उद्गम और विकास

 सुज्ञ जी एवं सभी मित्र गण मेरी बातो से संतुष्ट हुए होगे ..

आत्मा एक ज्योतिपुज है - कोरे दीए के प्रकाश से उस अन्धेरे को नही मिटाया जा सकता,उसके लिए ऑख का प्रकाश चाहिए- आचार्य महाप्रज्ञ

Posted: 29 अप्रैल 2009

आत्मा एक ज्योतिपुज है - आचार्य महाप्रज्ञ
त्मा एक ज्योतिपुज है। एक बहन ने पुछा-"यदि वह ज्योतिपुज है तो उसका वर्ण कैसा है ?
आत्मा एक ज्योतिपुज है। एक भाई ने पुछा -" यदि वह ज्योतिपुज है तो जलते हुऐ दीपक कि भॉति दिखाई देना चाहिऐ। किन्तु न उसका वर्ण है न वह दीपक की भॉति जलते हूऐ दिखाई देती है।
एक आदमी कमरे मे गया । अन्दर बिजली जल रही थी। कुछा ही क्षण के पश्चात बिजली चली गई। अन्धेरा छा गया। कुछ भी सूझ नही रहा था। कोई भी वस्तू दिखाई नही दे रही थी।
बाहर खडे एक व्यक्ति ने पुछा-"भीतर कोन है ?" उसने कहा -"मै हू।"

"मै हू" यह कैसे देखा ? भीतर अन्धेरा है। कुछ भी दिखाई नही दे रहा है, फिर यह कैसे जाना -"मै हू"। यदि आत्मा ज्योतिपुन्ज नही है, दीपक की भॉति ज्योर्तिरमय नही है तो कैसे दिखा कि " मै हू" । कितना ही सघन अन्धकार हो, व्यक्ती चाहे भूगृह मे खडा हो, किन्तु " मै हू" यह दीप कभी नही बुजता। यह सदा जलता रहता है।
"मै हू" - इतना सा प्रकाश पर्याप्त है यह समझने के लिऐ कि भीतर कोई ज्योतिपुन्ज है।
यदि हमारी यात्रा ज्योतिपुन्ज की दिशा मे चले, हमारी उर्जा उसी और प्रवाहीत हो तो एक दिन उस ज्योतिपुन्ज का साक्षात्कार अवश्य होगा। उसमे वर्ण हो या ना हो, ज्वलन-शीलता हो ना हो , वह साक्षात होगा।


आप धर्म कि धारणाओ को दो भागो मे बॉट दीजिए- आचार्य महाप्रज्ञ

ह साक्षात नही है, फिर भी उसके प्रति हम सशयशील नही है। उसकि कुछ रश्मिया हमे धर्म के रुप मे दिख रही है। पुरा जोतिपुन्ज ऑखो के सामने नही है, किन्तु उसकि कुछ रश्मियो से हम अवगत है। आप धर्म कि धारणाओ को दो भागो मे बॉट दीजिए,

दो दृष्टिकोण से देखिए। एक धर्म की धारणा वह है, जो नियमबद्ध, व्यवस्थाबद्ध है और सगठनबद्ध चलती है। उसका निर्माण मनुष्य ने किया। वह कभी शाश्वत नही हो सकती। हम धार्मिको ने यह मान लिया कि जो नियम एक बार बन गया, वह लोहे की लकीर बन गया। यह कभी सत्य नही हो सकता।नियम बनाने वाला एक व्यक्ति है, फिर चाहे भगवान महावीर् हो, आचार्य भिक्षु,या फिर कोई भी आचार्य, हो , कोई भी हो, बनाने वाले आदमी है, व्यक्ति है और व्यक्ति जो बनाता है, वह कभी त्रिकालिक नही हो सकता, शाश्वत नही हो सकता, वह हमेशा परिवर्तनशील होगा।
किन्तु एक बात और है। वह है अकृत की, जिसे मनुष्य ने नही बनाया है, जिसका निर्माण मनुष्य ने नही किया। सही अर्थ मे धर्म कि धारणा वही से उत्पन्न होती है। जिस धर्म को मोक्ष से सम्बध्द मानते है। उसकी धारणा शाश्वत मे होती है।

ऑख के बिना सारी बाते व्यर्थ हो जाती है।- आचार्य महाप्रज्ञ

जिस धर्म को समाज से सम्बध्द मानते है। उसमे बहुत कुछ बदलाव होगा। मनुष्य जीवन मे बदलाव होगा

जहॉ परिवर्तन नही होता, वहॉ दुनिया के सन्दर्भ का इतिहास भी नही होता है। धर्म का सगठन होता है व्यवस्था का सचालन करने के लिऐ किन्तु घर्म कि धारणा उसी मे जमा हो जाती है, उसी मे निहित हो जाती है और कठीनाइयॉ पैदा हो जाती है। मै इस बात का समर्थन भी करना चाहता हू कि जो धर्म की धारणा समाज के स्तर पर चल रही है, वह सचमुच आज के युग को भटकाने वाली है। सामाजिक विकास का प्रशन, वहॉ धर्म, आत्मा, परमात्मा की बात मुख्य हो जाएगी तो समाज का विकास अवरुद्ध हो जाऐगा। किन्तु यह एक दृष्टिकोण है। जहॉ इस दुनिया मे वस्तु के अनत धर्मो पर विचार करने वाले अनत दृष्टिकोण का सगम है, वहॉ एक को मानकर चलेगे तो भी उलझन आ जाएगी, कठिनाई आएगी।

क्या हम अनत धर्मो का प्रतिपादन कर सकते है ? कभी नही कर सकते। हम जो कुछ भी करते है, एक भूमिका से, एक दृष्टि से करते है। एक दृष्टिकोण ही माने, उसे सर्वाग न माने। हमारे जीवन मे अगर कोई सुलझाव लाएगी तो यही बात ला सकती है।

आज के समग्र धार्मिक दृष्टिकोण को इस छोटी-सी घटना से समझ सकते है। आज आत्मा, परमात्मा और धर्म के अस्वीकार की बात क्यो आ रही है ? आज के धार्मिक पर इतना अन्धेरा छा गया कि कोरे दीए के प्रकाश से उस अन्धेरे को नही मिटाया जा सकता,उसके लिए ऑख का प्रकाश चाहिए। लालटेन - आग -दीए -बिजली - सुरज - चॉन्द - का प्रकाश है, पर यदि ऑख का प्रकाश नही है तो सारे प्रकाश अन्धकार मे बदल जाते है। जब तक भीतर की चेतना नही जागती , ध्यान की चेतना नही जागती, ध्यान का प्रकाश प्रस्फुटित नही होता, तो बाहर के प्रकाश, सिध्दान्तो के प्रकाश- ये सारे प्रकाश अन्धकार मे बदल जाते है। चाहे फिर वह महावीर के सिध्दान्त हो, चाहे बुध्द के सिध्दान्त का प्रकाश् हो, चाहे कृष्ण या दुनिया के किसी भी महापुरुष या अवतार का सिध्दान्त का प्रकाश हो। कितना भी बडा सिध्दान्त हो, सुरज हो चॉन्द हो,ऑख के बिना सारी बाते व्यर्थ हो जाती है।

सभार - तेरापन्थ टाइम्स मार्च ०९



भारत के पुर्व राष्ट्रपति डॉ, ए,बी, जे अब्बदुल कलाम,का २५ मार्च को फोन से सवाद मिला- युनान की एक साप्ताहीक पत्रिका उनसे "द फेमिली एण्द नेशन" पुस्तक पर एक इन्टरव्यू लेना चाहती है । डॉ, ए,बी, जे अब्बदुल कलाम ने कहा-" आचार्य महाप्रज्ञजी भी इस पुस्तक के लेखक है। इसलिऐ इन्टरव्यू के लिऐ उनकी स्वीकृति जरुरी है। डॉ, ए,बी, जे अब्बदुल कलाम ने कहा-" वे आचार्य महाप्रज्ञ के मिशन की चर्चा करगे। आचार्यप्रवर ने उनके इस विनम्र अनुरोध को स्वीकृति प्रदान कर दी। उल्लेखनीय है "द फेमिली एण्ड द नेशन बुक को देश विदेश के प्रबुद्ध वर्ग मे खासी लोकप्रियता हासिल कि है। और विदेशो मे इसकी मॉग निरन्तर बढ रही है।
विज्ञप्ती ५-११ अप्रेल २००९



The Family And The Nation
As we talk of rising economic prosperity and a strong and confident nation, this book gently reminds us of the values that make for a truly sustainable society, at the heart of which is the family. For it is not economic growth or military strength alone that make a society strong. Sustainable success comes from values, and these can sustain a society, and a nation, even in times of hardship. The book attempts to express an ideal by which society may prosper, and speaks of how spirituality can help create a noble nation and a better world. It provides a valuable counterpoint to the modern-day emphasis on consumerism and the philosophy of more is better, highlighting the sanctity of the natural world and its great power to evoke human creativity and love.The Family And The Nation
Acharya Mahapragya
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