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Vacancy

Posted: 04 जून 2022

 Vacancy



तुरंत आवश्यकता है

(1) एक इलेक्ट्रिशियन: जो ऐसे दो व्यक्तियों के बीच कनेक्शन कर सके जिनकी आपस में बातचीत बन्द है।

(2) एक ऑप्टिशियन: जो लोगों की दृष्टि के साथ दृष्टिकोण में भी सुधार कर सके।

(3) एक चित्रकार: जो हर व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान की रेखा खींच सके।

(4) एक राज मिस्त्री: जो दो पड़ोसियों के बीच पुल बनाने में सक्षम हो।

(5) एक माली: जो अच्छे विचारों का रोपण करना जानता हो।

(6) एक प्लम्बर: जो टूटे हुए रिश्तों को जोड़ सके।

(7) एक वैज्ञानिक: जो दो व्यक्तियों के बीच ईगो का इलाज खोज सके।

और सबसे महत्वपूर्ण:

(8) एक शिक्षक: जो एक दूसरे के साथ विचारों का सही आदान प्रदान करना सिखा सके।

(9) एक डॉक्टर जो सब के दिलों में से नफरत, जलन, क्रोध निकाल कर मोहब्बत और भाईचारा ट्रांसप्लांट कर दे ।

(10) एक जज जो धर्म, जाति, पैसा के वर्चस्व को समाप्त कर मानवता और समानता के आधार पर न्याय कर सके ।


आज इन सभी व्यक्तियों की समाज को अत्यन्त आवश्यकता है।✍🏻

क्या आप कंजूस है ? समवेदना और सहानुभूति बॉटने मे ?

Posted: 27 मार्च 2009

चाहे आपने लाखो रुपये दान किये हो, फिर भी मै आपको कंजूस ही कहूगा-यदि आप समवेदना और सहानुभूति बॉटना नही जानते। ये केवल धनिको पर नही, हर किसी पर लागू होती है। दुसरो कि वेदना और क्लेश को कोई ऐसा मसीहा ही अपने उपर ले सकता है: किन्तु अपनी समवेदना से दुसरे के घावो पर मरहम लगाने का प्रयत्न तो आप और हम कर ही सकते है।

माना, आप इस स्थिति मे नही है कि आर्थिक सकन्ट मे घिरे अपने मित्र,रिस्तेदार को उधार दे सके, उसके लिऐ मकान की तलाश कर सके, या उसे कोई अच्छी -सी नोकरी दिला सके। परन्तु अपनी साहनुभूति देकर उसे टूटने से बचा सकते है। बीमार व्यक्ति के लिए दवा खरीदने की स्थिति मे न होते हुए भी आप मीठे बोल और दिलासा का अमृत-पान तो उसे करा ही सकते है।

प सोच रहे होगे, "हे प्रभु" बिन मोसम के विषय पर क्यो डायरी लिख रहे है ? तो मै साफ कर देता हु कि जब मै अमिताभ का ब्लोग पढ रहा था तो मै स्वय पढते-पढते भावुक हो गया। पिछले दिनो मुम्बई मे कैंसर से पीडित प्रमोद नामक किशोर ने अमिताभ से मिलने की इच्छा जाहीर की तो बिग बी खुद मिलने गये। इन दिनो बान्द्रा के माउन्ट मेरी रोड स्थित शांति अवेदना आश्रम मे प्रमोद कि देखभाल कि जा रही है।


"बिग बी ने ब्लोग मे लिखा है कि "मुझे देखकर इस किशोर के चेहरे पर हैरानी और अविश्वास का मिलाजुला भाव था। उसके शरीर का आधा हिस्सा अजीब तरीके से सूजा हुआ था। उसने किसी तरह अपनी नम ऑखो को पोछा और बस वह केवल इतना कह पाया थैक्यू !!! बिग बी ने ब्लोग मे आगे लिखा कि जब उन्होने प्रमोद से पुछा, "क्या उसे अपनी जिन्दगी मे कोई पछतावा है, तो उसने कहा दो बातो का।
"एक तो वह बाहर जाकर अन्य बच्चो के साथ खेलना चाहता था। दुसरा इस बात का कि वह अपने पिता कि देखभाल नही कर सका।" प्रमोद कि दुसरी बात सुनते ही बिग अपनी भावनाओ पर काबू पाने के लिए उसके कक्ष से तुरन्त बाहर निकल आऐ। बिग बी ने लिखा कि "मुझे अपने बीच पाने कि खुशी उनकी ऑखो से झलक रही थी।

यह बात मुझे अन्दर तक झन्झोरकर रख दिया कि मनुष्य सहानुभूति के भुखे होते है। दुख के समय मे प्यार के दो बोल कोई बोल आऐ तो बिमार, संकटग्रस्त मनुष्य फिर से उठ खडा हो जाता है। अमितजी ने हमेशा कि तरह
मनुष्यता का वह फर्ज अदा किया जिसके लिऐ वह जाने जाते है।"


विधान मे भले ही इसका उल्लेख ना हो, मगर शोक-क्लेश के क्षणो मे मित्रो, स्वजनो से सात्वना की आशा करने का सभी को बुनियादी अधिकार है। और अनुभूति के धरातल पर आप भी इस बात को जानते-मानते होगे।

मेरे गाव मे एक वृद्ध है, सबके दुख सुख मे हमदर्दी बॉटते है। किसी के यहॉ बिमारी हो या गमी, वे तुरन्त वहॉ जाते है और उसे सात्वना के दो बोल बॉट आते है।

सहानुभूति टूटते हुए आदमी को सक्षम बनाने वाली सजीवानी -बुटी है, सात्वना हृदय कि धधकती अग्नि को शीतल करने वाली अमोध जल-धारा है। वह व्यक्ती, जिसके प्रति आप सहानुभूति व्यक्त कर रहे है, आपके प्रति गहरी आत्मीयता अनुभव करने लगता है।


तो आज से हम यह शुभ कार्य अपने घर से शुरु करे अपने वृद्ध मॉ बाप कि सेवा करके, उनकी भावनाओ का आदरता पुर्वक निर्वाह करके, उनके साथ कुछ पल बैठकर प्यार से अपना सिर उनकि गोद मे रखकर, उनको
मान सम्मान देकर।




(सभी फोटुओ को बडा करने के लिऐ उसपर चटका लगाऐ)




हे प्रभु यह तेरा-पथ,
मुम्बई-टाईगर,
माई-ब्लोग,
दि फोटु-गेलेरी
पर हिन्दु नव वर्ष एवम गुडी पाडवा कि हार्दीक शुभकामनाऐ समस्त हिन्दी चिठाकारो को,

वचन सम्भारि बोलिये, वचन के हाथ ना पाव। एक वचन ओषद करे एक करेगो घाव॥

Posted: 17 मार्च 2009

वचन सम्भारि बोलिये

मै क्या लिखू ? प्रतिदिन लिखना जरुरी होता है, और सप्ताह मे एक दो सभाओ मे बोलना ही पडता है। बातचीत मे दिन भर बोलता ही रहता हू। लिखना और बोलना-बोलना और लिखना एक आदत जैसी बन गई है। कई मर्तबा लोग पुछते है - " आप क्या व्यापार करते है ? कल मैने एक सभा मै सहज ही कह दिया कि-" शब्दो का व्यापर करता हू अर्थात शब्द बोलता हू, शब्द लिखता हू और शब्द बेचता हू।

रात घर आया- बिस्तर पर जाते ही ,मेरे बोले शब्द मुझे ही काटने लगे थे। कई तरह कि वैचारिक धाराऐ मष्तिष्क को कुरेद रही थी। मेरी खोपडीयॉ मे सैकडो तरह कि बाते सोच ली। मैने स्वय समाधान लेते हुऐ सोचा,

"शब्दो का यह व्यापार क्या मै अकेला करता हू? मेरी तरह हजारो लोगो ने भी तो शब्दो का व्यापार जमा रखा है। अनेक दुकाने है (ब्लोग, पत्र, पत्रिका), अनेक महाजन। अब तक तो मेरे दिमाग मे सभी ब्लोगो मे दुकान कि तस्वीर बना ली, और (पुरुष बन्धू) ता... शा... उ... भा... ज्ञा... अ... सु... शि... अर... द्वे... कु.... (महीला) लाव.... अल..... सुजा रन्ज..... लव.... आदि महाजन के रुप मे दिख रहे थे।

हम सभी के अलग अलग मन्च है, भिन्न भिन्न श्रोता भी है। लच्छेदार भाषण, प्रवचन, शानदार शैली मे लिखे लेख, कविता और कीमती कागज पर पक्की जिल्द तथा नयनभिराम आवरण पृष्ठ की किताबे भी तो शब्दो का व्यापार ही है।शब्दो को ब्रहृमा की सन्ज्ञा दी गई है । शब्द कि शक्ति अनन्त है किन्तु रोजी रोटी, नाम प्रतिष्ठा के लिये शब्दाडम्बर तो शब्दो का व्यापार ही हुआ न ? मेरी १००ग्राम खोपडी के विचारो का अन्त नही। सोचते सोचते पुरे ब्रहृमाण्ड घुम आई। कही शब्दो की प्रशसा और चापलुसी मे उपयोग किया जा रहा है और कही विरोधियो की आलोचना मे शब्दो को अगारे बना कर बरसा रहे है। शब्दो के शिल्पी या कलमजीवी दुसरो की आलोचना एवम बुराईयो की धज्जी उडाने मे भूल जाते है कि धुल उन पर भी छाई हूई है, मल उनके मन एवम आचरण में भी है।

तीन दिन पहले चिठाचर्चा मे पढा,- कि किसी ने लावण्या दीदी पर किस तरह अभद्र तरिके से अपनी दिमागी अशुद्रता का परिचय देते हुऐ घटिया तरिके से टिका कि इससे ज्यादा दुख तो तब हुआ कि महिलाकी अवाज बनी ब्लोग ने उस टीपणी को प्रसारित किया (बाद मे हटा भी ली) क्या टिपणीको प्रसारित करते समय यह जरुरी ना समझा गया कि किसी कों ठेस पहुचाई जा रही है ? मेरा ऐसा मानना है कि टीपणी करने वाला तो सजा के काबील है ही छापने वाला भी उसका हीस्सेदार बने।

किसी खबर को सनी सनी बनाकर, करना, लिखना, एवम छापना यह सिर्फ और सिर्फ भिड को आकर्षित करने का अनुचित तरिक है। जिसे मे व्यापार कहता हू। लावण्याजी आप फाईटर है जिस किसी ने भी आपके परिवार पर

जाति -रन्ग -भेद- धर्म- कर्म पर कटाक्ष कि उससे आप बिल्कुल भी अशान्त न हो क्यो कि पुरा का पुरा

हिन्दी ब्लोगजगत ने इसका जोरदार तरिके से विरोध जता चुकी है। और सम्भवतः सभी ने आपके पक्ष को ही मजबुती प्रदान कि है।

डॉ, बाबा साहेब अम्बेडकर के जिवन मे इस तरह कि मुश्किले कई बार आई, पर उन्होने उसका मुकाबला किया और उन्होने विजय हासिल कि।

दूसरो को नीचा दिखाने या किसी का चरित्र हनन करने के लिये भी शब्दो का दुरउपयोग बहुत होने लगा है।

क्या यह उचित है? क्या इसमे धर्म, जाति समाज, व्यक्ती का कुछ भी भला होता है ? भला होगा ?

शब्द से अधिक शक्ति मोन मे है। प्रचार से ज्यादा शक्तिशाली आचार होता है। हम बोलते है लिखते है लेकिन स्वय को ही पता नही होता कि क्या बोल रहे है ? क्या लिख रहे है? इतनी भावुकता या क्रोध मे लिखते है कि वह केवल स्तुति या निन्दा बन कर रह जाती है। शब्द जीवन व्यवहार का प्रतिबिम्ब होना चाहिऐ!

अतः शब्द कि अनन्त शक्ति को नमन करते हुऐ इनको अपने स्वार्थ, लोभ, बैरभाव, के लिऐ दूषित ना करु।

वचन सम्भारि बोलिये, वचन के हाथ ना पाव।

एक वचन ओषद करे एक करेगो घाव॥



INTERNATIONAL WOMEN'S DAY

Posted: 07 मार्च 2009

मेरी पत्नी का त्योहार।

सुबह - सुबह मेरी सामज सेवी, नारी सेवी, बिवी ने कहा- तुम्हे पत्ता है कल का दिन खास है। हमने चोकते हुए कहा-" क्या फिर से पाकिस्थान पर आतन्की हमला होने वाला ? "ऑतकवादी का तुम्हे फोन तो नही आया, मेरी लाडोजी ?

हर ऑतकवादी अक्सर दुसरे ऑतकवादी से मुऐ मुबाईल से बात करता रहता है। अपने भीतर के ऑतकवाद को अपनी ऑखो मे उतार कर पत्नीजी बोली- देखो, पडोसी के बारे मे ऐसी अशुभ बाते नही करनी चाहिये और इस तरह के सेन्स ऑफ ह्यूमर को "ब्लेक कॉमेडी" कहते है। हमने कहा -लाडोजी, तुमसे कॉमेडी भी तुम्हारे रन्ग के अनुरुप ही करनी चाहिये न!

बहरहाल अब इस एपिसोड को बिना ताने इस प्राइम टाइम मे बता दो कि काल किया है? पत्नी ने स्त्री सुलभ भाव-भगिमाए महिला आरक्षण, त्रिया-चरित्र, दादागिरी(दादागिरी का स्त्रीलिगी शब्द) या शायर लोग बेवकुफी मे जिसे अदाए कहते है, उन सबकी भेल बनाते हुये एक वाक्य प्रस्फुटित किया- "कल महिला दिवस है!" उसके रहस्योदघाटन को फैल करते हुऐ हमने कहा-"वो तो रोज ही होता है, कल भी है क्या? मेरी लाडोजी! इस मामले मे पुरुषो को कम से कम सन्डे को छुटी देनी चाहिए थी।"

पत्नि ने लगभग दहाडते हुऐ कहा-तुम मर्दो को ताने देने के सिवा आता ही क्या है ? पता है कविवर जयशन्कर प्रसाद ने लिखा था- "नारी तुम केवल श्रध्दा हो," और क्या पता किसने लिखा था- कि जिस घर मे नारी का सम्मान नही होता वह घर,घर नही होता।"

हमने कहा,-" इसीलिये भारत मे होटलो या धर्मशालाए कम और घरो कि सख्या ज्यादा है। बेचारे, पुरुष सम्मान के अलावा ओर कर भी क्या सकते है? जयशन्कर प्रसाद भी आखिर पुरुष ही थे! " यह कहते हुये हम घर को सचमुच "घर" बनाते हुए घर से निकल आये।

हो सकता कि निकट भविष्य मे नारी उत्पीडन के विरुद्ध सघर्षरत सस्थाऐ करवा चोथ पर मर्दो को भुखा प्यासा रखकर उनके हाथ मे छलनी थमा दे और कहे कि बेटा, देख इसमे से चॉन्द दिख जाये तभी व्रत तोडना!

अपने देश मे इतनी तरक्की हो चुकी है कि नारी का क्षेत्र अब चुल्हा चोके तक सीमित नही रहा। नारी अब घर से बाहर निकल चुकी है। घर मे रहने वाले पुरुषो के लिये इससे बडी खुशी क्या हो सकती है।

हर कला मे नारी पुरुषो से कन्धा से कन्धा मिलाकर आगे बढ रही है। वैसे भी, भिड-भाड के क्षेत्र मे हर पुरुष कि ईच्छा यही होती है कि महिला उनसे कन्धा से कन्धा मिला ले।पर ज्यादातर पुरुष इसमे मामले मे असफल ही सिद्ध होते होते है। हमे लगता है महिला दिवस पर कुछ महिलाओ को सम्मानित किया जाना चाहिये, कपडो कि बचत के लिये मलिक्का शेरावत,नॉन स्टाप जुबॉन चलाने के लिये राखी सॉवन्त, अपनी कोमल शब्दावली के लिये सम्भावना सेठ, निर्माण से पहले ही नैनो को बन्गाल से गुजरात दोडाने के लिये ममता बेनर्जी और यूपी कि मुलायम सडको को हाथी से रोदनेके लिये बहन मायावतीजी आदि उनमे से चन्द दैदिप्यमान सन्नारिया है। नारी के सम्मान की देश मे पराकाष्ठा यह है- जिन्हे आप भुलवश गुन्डे कहते है वे चुनाव कानुन से ग्रस्त, सजायाप्त, बाहुबली अपनी अपनी सीटो पर खुद न बैठते हुये अपनी पत्नी को खडा करने हेतु मान्यता प्रदान करते लगे है।

कल हर साल की तरह फिर एक बार तमाम सस्थाए महिला दिवस के उपलक्ष मे नारी को खुब ऊचॉ उठाऐगी। इसमे हम और हमारा समाज इतनी उचॉई पा जायेगे कि फिर हमे निचे जमीन पर दि वक्त कि रोटी के लिये जिस्म तक बेचने को मजबुर नारी नही दिखाई देगी। अतः मे मेरा एक सवाल महिला दिवस के बाद बेटे कि अन्धी चाहत मे सोनोग्राफी कर कन्या भ्रूण-हत्या करने वाले माता पिता कि सख्या थोडी ही सही पर क्या कम हो जायेगी?

[वोंदेर्लंद अग्रेजी ब्लॉग की मालकिन Sveta जो सोवियत रुश की है ने वुमन डे पर अच्छी - खासी जानकारी दे रही हैआप सभी लिंक पोस्ट पढ़ सकते है स्वेता ने बहुत ही अच्छी जानकारी दी है]
The very first International Women's Day was launched the following year by Clara Zetkin on 19 March (not 8 March)। The date was chosen because on 19 March in the year of the 1848 revolution, the Prussian king recognized for the first time the strength of the armed people and gave way before the threat of a proletarian uprising. Among the many promise he made, which he later failed to keep, was the introduction of votes for women.
In 1913 International Women's Day was transferred to 8 March and this day has remained the global date for International Wommen's Day ever since.
Men stayed at home with their children for a change, and their wives, the captive housewives, went to meetings.
During International Women's Year in 1975, IWD was given official recognition by the United Nations and was taken up by many governments. International Women's Day is marked by a national holiday in China, Armenia, Russia, Azerbaijan, Belarus, Bulgaria, Kazakhstan, Kyrgyzstan, Macedonia, Moldova, Mongolia, Tajikistan, Ukraine, Uzbekistan and Vietnam.

"नेट यात्रा" पर नेता

Posted: 04 मार्च 2009


रैली से जुडने के लिये रैली, सभा-सम्मेलन,पदयात्रा से लेकर रथयात्रा तक सहारा लेनेवाले राजनेता अब ब्लोगेरिया के चपेट मे आने को आतुर लग रहे है। खास टारगेट यूथ वोटर है। नेता पर्सनल वेबसाईट और ब्लोगस के जरिये आम लोगो से जुडने कि कोशिश कर रहे है। इन्टरनेट की दुनिया का यह सफर सफल होगा या सिफ़र रहेंगा, फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा।

ई दिग्गज राजनेता वेबसाईट और ब्लोगस के जरिए युवा वोटरो को लुभाने लगे है। श्री लालकृष्ण आडवाणी हो या फिर श्री मुरलीमनोहर जोशी, सोसल नेटवर्किग साईट पर श्री राहुल गान्धी का प्रोफाइल हो य फिर श्री ज्योतिरादित्य कि वेबसाइट, इन सभी को अब तक अच्छा रेसपोन्स नही मिल रहा है।नेताओ की इस पहल को जनता ने हाथो-हाथ नही लिया। जैसा ओबामा के मामले मे अमेरिका जनता ने लिया था।

श्री आडवाणी ने पिछले साल नवम्बर मे अपना ब्लोग शुरु किया था तब से अब तक छ: पोस्ट उनकि तरफ से किये गये। इन्टरनेट सेवी लोगो को या तो श्री आडवाणी कि बातो मे दिलचस्पी नही है या वे नेताओ से जुड नही पा रहे है। इसलिये एक पोस्ट पर ओंसतन १०० से १५० टिपणीयो से कभी अधिक नही आई।

जो कि उडन-तस्तरी के श्री समिरलाला के समकक्ष है।

श्री मुरलीमनोहर जोशी ने यह कहकर अपने ब्लोग को खास बनाने कि कोशिश की कि इस फोरम पर वह राजनिति की बात नही करेगे। उन्होने ब्लोग शुरु किया तो चुटकी भी ली कि लालु कि तरह मै अपना ब्लोग बन्द नही करुगा। बल्की लिखता रहुगा।

ब्लोग लिखने का काम श्री लालुप्रसाद यादव ने भी शुरु किया, लेकिन रंग नही जमा पाए।

जम्मु कश्मीर के मुख्यमन्त्री श्री उमर अबदुल्ला ने बडे जोश के साथ अपना ब्लोग शुरु तो किया अमरनाथ मुद्दे पर जब लोगो ने उनकि आलोचना कि तो उन्होने अपना ब्लोगिग सफर को अलविदा कर दिया।


अपनी आखिरी ब्लोग मे उन्होने ने लिखा "हमारे पास कुछ असहिष्णु लोगो का समूह है। हम चाहते है कि दूसरे हमे सुने, लेकिन दूसरो को सुनने का धीरज हममे नही है। हम खुद तो राय रखना चाहते है लेकिन यह नही स्वीकार करना चाहते कि किसी और को भी यह हक है।"


सल इन्टरनेट/ ब्लोग दुतरफा मीडियम है। इस विशाल प्लेटफॉर्म का असली मजा ही दुतरफा कम्यूनिकेशन है। लेकिन हमारे यहॉ नेताओ ने इसे इकतरफा मीडियम ही बना रखा है। मसलन राहुल गान्धी टेक्नोलॉजी के माध्यम से युवाओ को जोडने मे कामियाब नही हो पाए। उनका प्रोफाइल सोशल नेटवर्किग साइट पर है जरुर, लेकिन इन्टरनेट यूजर्स को वह कभी ऑनलाईन मिलते ही नही।

ओबामा से जहॉ ऑनलाइन करीब ३० लाख लोग जुडे थे वहॉ राहुल के प्रोफाईल से १०० से कम लोग जुडे है।

काग्रेसी सासद सचिन पायलट और मिलिन्द देवडा भी सोशल साइट पर है।

वैसे भाजपा नेता शाह नवाज हुसैन इन्टरनेट के जरीए लोगोसे जुडने कि कोशिस से खासे खुश है और लोगो के रेस्पान्स से सन्तुष्ट है। शाह नवाज हुसैन के मुताबिक , उन्हे अपनी वेबसाईट पर चार दिन मे ५६०० मेल मिले, जो अपने आप मे बडी सख्या है।

देश मे करीब ४:५ करोड नेट यूजर्स है और उसमे ३६ फीसदी १८ से २३ साल के है। ये युवा वोटर २००९ के आम चुनावो मे अहम भुमिका निभाएगे। अमेरिका,कनाडा, फिनलैन्ड, इस्त्राइल, मलयेशिया,आदि देशो मे लम्बे समय से पॉलिटिकल ब्लोग राजनीतिक दिशा तय करने मे रोल निभाते रहे है। इस पर होने वाली सार्थक बहसे देश की राजनीति पर असर डालती रही है। इसेमे हमारे नेताओ ने इस तरफ रुजान दिखाया तो स्वागत योग्य है।

मारे देश मे इन्टरनेट कि पहुच पश्चिम के मुकाबले कम है। अमेरिका चुनावो मे इन्टरनेट का इस्तेमाल फण्डिग के लिये किया गया। ओबामा को कुल ६०० मिलयन डॉलर फण्ड मे से करीब २०० मिलयन डॉलर ओनलाइन से ही मिले।

भारत मे वेबसाइट या ब्लोग का असली मकसद नेताओ तक लोगो कि पहुच को आसान बनाना है।

लेकिन जिस तरह नेताओ तक पहुचना आसान नही है, उसी तरह वेबसाइट या ब्लोग भी इकतरफा मिडियम बनकर रह गए है। यानी नेता जो चाहे, सन्देश दे सकते लेकिन जब लोग उन्हे ऑनलाइन मेसेज भेजते है तो अक्सर जवाब नही मिलता । वेबसाइट पर फिडबैक या डिस्कशन फोरम के जो लिन्क दिए गये है, वहॉ क्लिक करना भर नेताओ तक अपनी बात पहुचाने कि गारन्टी नही है। ज्यादातर नेताओ कि वेबसाइटे कम्प्नीयो द्वारा सचालित बताई जाती है। राजनेता कभी कभार समय मिलने पर देखते है और गिने चुने जवाब देते है। ऐसे मे लोग मेल क्यो भेजेगे? दोनो तरह प्रोपर कम्युनिकेशन हो तो असली फायदा होगा। वोटर और नेताओ के बीच ऑनलाइन बॉन्डिग होना चाहिये क्यो कि जब लोग मेल भेजते है तो उन्हे जवाब कि उमीद होती है और ऐसा न होने पर वे निराश हो जाते है। अगर नेताओ ने इसे हल्के मे लिया तो वोटर कि नारजगी उन्हे दिन मे तारे दिखा सकते है, इसलिये सोचसमझ के ही इस ब्लोगेरिया जिवन मे प्रवेश करे।

लेख नव भारत टाईम्स

प्रस्तुती हे प्रभु


सभी चित्रो को बडा करने के लिये ऊपर चटका लगाये


किसका कुत्ता करोडपती ?

Posted: 25 फ़रवरी 2009


पिछले कुछ वर्षो से पश्चिमी मीडिया मे( खासकर अमेरीका मे) भारत कि आर्थिक प्रगति के बारे मे इतना कुछ कहा जा चुका है कि वहॉ के जनमानस मे इस मूल्क (भारत) की खास तस्वीर बन गई। जहॉ कभी शहरो मे सडको पर गाये, सपेरे और हाथी घुमा करते थे, ऐसे गरीब देश मे हजारो-लाखो के करीब आई टी एक्सपर्टस का होना किसी चमत्कार से कम नही समझा गया।

मुम्बई हमलो के कुछ ही दिनो बाद झोपडपट्टी की जिन्दगी मे गरीबी और बदहाली कि नई परिभाषाए दर्शाती हुई चमक-दमक वाली फिल्म स्लम+डॉग+मिलिनेअर= झुग्गीबस्ती का करोडपती कुत्ता ( फिल्म का हिन्दी नाम यही होता )

झुग्गी-करोडपती शब्दो से तो किसी का विरोध हो नही सकता। पश्चिमी देशो को इन्ह शब्दो से सन्तुष्टी नही मिलती है। हमे दर्द है कुत्ते शब्द से, पश्चिमी देशो का भारत के गरीबो को कुत्ता कहना इतना भाया कि गोरी चमडी के दो टके के लोगो ने ऑस्कार से नवाज कर उनकी अपनी छाती को ठण्डक पहुचाने का काम किया। कलेजा हमारा (भारतीय जनमानस) चीर कर हथेली मे दे दिया। इस फिल्म को अमेरिका, ब्रिटेन के कई शहरो मे रिलीज कर दि गई। जब इस फिल्म को आठ ऑस्कर नामकन मिले एवम ऑस्कर पुरस्कारो से सम्मानित किया गया तो ऐसा लगा जैसे अमेरिकी दिलो मे इण्डिया कि हर चीज के लिये प्यार उमड आया है। हमारी गरीबी और बदहाली के लिये भी।

अब देखते है कि हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप ने कल अपने चिठठे सारथी ने क्या कहा-

जब अंग्रेजों को इस से भी संतुष्टि नहीं हुई तो उन्होंने अपने पालतू कुत्तों को “टीपू” कहना शुरू कर दिया.

आज भी कई साम्राज्यवादी यूरोपीय लोग है जो हिन्दुस्तानियों को कुत्ता समझते हैं, एवं कुत्ता कहते हैं. स्लमडॉग (गली का कुत्ता, सडकछाप कुत्ता) को आज ऑस्कर मिला तो देश भर में यही पागलपन दिख रहा है. विडम्बना की बात यह है कि कम से कम जिन भारतीयों को अंग्रेजी उपन्यास लिखने के लिये विदेशियों ने पुरस्कार नवाजे हैं इन में से कई के उपन्यास भारतविरोधी कथनों से भरे पडे हैं."


खिर इस फिल्म मे कोनसी बात जिसने गोरी चमडी के दर्शको और दीवालिया दिमाग के समीक्षको का मन मोह लिया ? स्लम+डॉग+मिलिनेअर= "झुग्गीबस्ती का करोडपती कुत्ता ।" कहानी है, गरीबी और अमीरी के भेदभाव की। यह कहानी है गरीबी और आपराधिक दुनिया के बिच सम्बन्धो की। यह कहानी है भाई-भाई के बीच धोखेबाजी की। लेकिन यह कहानी एक अनाथ बच्चे की मेहनत या प्रतिभा की उतना नही है जितनी कि एक सयोग कि है। जिसके कारण वह कोन बनेगा करोडपती के सवालो का उत्तर दे पाता है। यह उस जीवट या आत्मविशवास कि कहानी नही है, जिसके लिये सिनेमा हॉल मे तालिया बजे।


"स्लमडॉग"-=(वह निचे पाखाने के गहरे कुण्ड कि ओर देखता है ,नाक दबाकर डुबकी लगा देता है और दुसरी तरफ से से बाहर निकलता है । सिर से पाव तक पाखाने (शिट) से लिपटा हुआ। उसी गन्दगी मे सना वह अमिताभ के सामने जाकर ऑटोग्राफ मागता है।)


"स्लमडॉग" एक निष्ठुर फिल्म है, जिसके निर्देशक गरीब के सपनो का मजाक उडाते हुये अनाथ बालक को पाखाने से भरे कुन्ड (वेल) मे डुबकी मारते हुये दिखाता है। एक दृश्य मे अमिताभ बच्चन के झुग्गी झोपडीयो (कॉलानी) मे हेलिकॉप्टर से उतरने कि खबर बस्ती मे आन्धी कि तरह फैल जाती है । लोग पागलो कि तरह हेलिकॉप्टर कि ओर दोडते है। उसी वक्त बालक जमाल को उसके दोस्त शोचालय (पाखाना) मे बन्द कर देते है। जमाल करे तो क्या करे । वह निचे पाखाने के गहरे कुण्ड कि ओर देखता है ,नाक दबाकर डुबकी लगा देता है और दुसरी तरफ से से बाहर निकलता है । सिर से पाव तक पाखाने (शिट) से लिपटा हुआ। उसी गन्दगी मे सना वह अमिताभ के सामने जाकर ऑटोग्राफ मागता है। जरा सोचिये यह कैसी कल्पना है ?

बालिवुड के पलायनवादी डायरेक्ट्र मनमोहन देसाई ने भी ऐसे सिन कि कभी कल्पना नही कि होगी।

"अपुर-ससार" मे सत्यजित रॉय ने "मेघे ढाका तारा" और " ऋत्विक घटक", और अकुर मे श्याम बेनेगल ने अपनी कलात्मक और तीखी शैली मे गरीबी और सामाजिक अन्याय का गहरा रिस्ता दिखाया था। लिकिन सत्यजित रॉय को उनकी मृत्यू शैया पर पहुचने के बाद ही हॉलिवुड ने ऑस्कर के योग्य समझा।

ब्रिटिश राज के दोरान सामन्य भारतीयो का स्वाभिमान दिखाने वाली बॉलिवुड फिल्म "लगान" भी ऑस्कर के शमियाने मे पहुच नही पाई।

शीशे कि तरह पारदर्शी हृदयहीन फिल्म "स्लमडाग" हमे यह याद दिलाती है कि भारत मे अनाथ बच्चो के लिये एक ही जगह है जहॉ उन्हे अन्धा बनाकर भीख मॉगने के लिये मजबुर किया जाता है। भारत मे पले बढे बच्चे के लिये करोडपति होना सजोग ही हो सकता है।

डेनी बॉयल कि जगह कोई भारतिय डायरेक्टर्स यह फिल्म बनाता तो उसे ऑस्कर के पजायमे का नाडा भी नशीब नही होता जैसे "तारे जमी पे" को बैरन्ग लोटना पडा।

डेनीबॉयल चुकी: विदेशी है, और गोरी चमडी कि मानसिकता वाला है उसने दुनिया को यह कहकर दिखा दिया कि यह "भारतीय गरीब, कुते है"उनके आकाओ के कलेजे मे इस बात कि जोरदार ठण्डक पहुची कि हम भारत को फखिरो मदारियो का देश कहते थे- वो यही है । आस्कर देकर इसबात पर मोहर लगाने एवम मनोवैज्ञानिक “गहन-पैठ” वाली बात चरितार्थ करने कि कोशिश कि गई।

क्या हमे भारत कि इस गरीबी के जश्न मे शामिल होना चाहिये?

अगर फिल्म का नाम होता

"अमेरिकि डॉग मिलेनियर" या ब्रिटीश कुतीया तो क्या उसे ऑस्कर मिलता ???

ऑस्कर का मच गोरी चमडीवालो का या डेनी बॉयल जैसे उनके दलालो का मनोवैज्ञानिक तरीके से अपनी मानसिकता को दुनिया मे परोसना है।

एशिया का सबसे बडा स्लम क्षेत्र धारावी मुम्बई जहॉ"स्लमडॉग" कि सुटी हुई


"समय आ गया है दोस्तों कि हम विदेशियों की मानसिक गुलामी से ऊपर उठकर देशनिर्माण का कार्य करें. इसके लिये पहला काम जो हर देशभक्त को करना है वह है कि इन लोगों की, उनके कृति की, प्रशंसा न करें. उनके प्रचारक न बनें--शास्त्री फिलिप"



न्यु जर्सी से अशोक ओझा का विचार एवम आभार।

शास्त्री फिलिप से प्रेरणा

प्रस्तुती -हे प्रभु !


(सभी फोटुओ को बडा करने के लिये उपर चटका लगाये)


चमक के पीछे कि क्रूरता - चान्दी के वर्क की हकीकत- जैन समाज ध्यान दे

Posted: 21 फ़रवरी 2009

क किलो वर्क तैयार करने के लिये १२५०० पशुओ कि हत्या कि जाती है। हर साल ४० हजार किलो (४० टन) वर्क कि खपत केवल मिठठाईयो मे होती है।

इस उधोग से जुडे लोग उन्मुक्त तरीके से पशुओ कि हत्याओ मे लिप्त है। हृदय से सभी धर्मावलम्बी यह जानते है कि वर्क माशाहारी है, लिकिन लगातार निर्भिकता से सेवन करता है।

बिना क्रूरता सुन्दरता एक श्रमसाध्य कार्य है। पुरे देश मे या पृथ्वी पर ऐसा एक भी वर्क का टुकडा नही है जो मशीन मे बना हो।

[सामाजिक पहलु एवम चेतना, समाज हीत मे हे प्रभु पर ]

भारत मे कानुन है कि हर शाकाहारी खाध पदार्थ को हरे चिन्ह से मॉसाहारी खाध पदार्थ मैरुन चिन्ह से चिन्हित किया जाये। अगर कोई निर्माता अपने उत्पादन मे हेराफेरी करता है तो तो उसे कई साल कि सजा हो सकती है।

तो मिठठाई निर्माता कानुन बनने से अब तक गिरप्तार कैसे नही किये गये ?

दुध को शाकाहारी माना जाता है। लेकिन मिठठाई पर लगे वर्क (सिल्वर फॉयल) को हटाये बिना मिठठाई को शाकाहारी नही कहा जा सकता है।

"ब्युटी विदाउट क्रू अल्टी" नामक पुणे के एक स्वमसेवी सस्था ने खाघ उत्पादो मे मिलाऐ जाने वाले अवयवो पर एक पुस्तिका का प्रकाशन किया था।जो वर्क उधोग के बारे मे बताती है। इस बुक मे वर्क कैसे बनाया जाता है बताया गया है। वर्क निर्माता वधशालाओ मे जाकर पशुओ का चयन करते है। चाहे नर हो या मादा उसका वध करने से पहले यह देखने के लिये उसकी खाल ट्टोली जाती है कि वह मुलायम है कि नही। इसका अर्थ है कि विशेष रुप से इस उधोग के काम मे लाने के लिये भारी सख्या मे भेड, बकरी, और मवेशियो कि हत्या कि जाती है। हत्या के बाद पशुओ की खाल को गन्दगी साफ करने के लिये १२ दिन तक टन्की मे डुबाया रखा जाता है। इसके बाद मजदुर खाल को छीलते है जिसे झील्ली कहा जाता है। खाल की निचली परत केवल एक टुकडे कि हि उतारी जाती है। इन्ह परतो को मुलायम करने के लिये ३० मीनट तक उबाला जाता है बाद मे सूखने के लिये लकडी के तख्तो पर डाल दिया जाता है।

सूख जाने के बाद १९*१५ वर्ग सेन्टीमीटर टुकडो मे काटते है। इन्ही टुकडो से थैली बनाते है जिसे ओजार कहा जाता है। बाद मे यही ढेर एक बडे चमडे के थैले मे भरा जाता है जिसे खोल कहते है। अब इस खोल मे चान्दी या सोने कि बिल्कुल झीनी पत्तिया रखी जाती है।औजार मे रखी जाने वाली चान्दी कि बारीक पत्तियो "अलगा" कहा जाता है।

ब इस अलगा को औजार मे रखकर फिर खोल मे भरा जाता है फिर घण्टो तक कारीगर लकडी के हथोडे से पीटते है। जिससे चान्दी का वर्क तैयार होता है । इसी वर्क को मिठाई कि दुकानो मिठाईयो एवम मन्दिरो मे भगवान को सजाने के लिये भेजा जाता है। एक पशु की खाल से केवल २०-२५ टुकडे तैयार होते है हर ढेर मे ३६० थैली होती है। एक ढेर मे ३० हजार वर्क के टुकडे बनते है। जो एक बडी मिठ्ठाई कि दुकान की आपुर्ति के लिये कम ही है।

एक किलो वर्क तैयार करने के लिये १२५०० पशुओ कि हत्या कि जाती है। हर साल ४० हजार किलो (४० टन) वर्क कि खपत केवल मिठठाईयो मे होती है।

ही मिठाई हमसभी खाते है। इस उधोग से जुडे लोग उन्मुक्त तरीके से पशुओ कि हत्याओ मे लिप्त है। हृदय से सभी धर्मावलम्बी यह जानते है कि वर्क माशाहारी है, लिकिन लगातार निर्भिकता से सेवन करता है।

विस्मयकारी है कि सभी प्राणीयो पर सभी प्रकार कि हिन्सा और अमानविय कृत्यो का विरोध करने वाले कत्लखानो से चमडी कि पर मे बने वर्को का धडेल्ले से इस्तेमाल कर रहे है। अनेक लोग झासा देकर खुद को यह समझाने का प्रयास करते है की यह मशीन से बना हुआ है। बिना क्रूरता सुन्दरता एक श्रमसाध्य कार्य है। पुरे देश मे या पृथ्वी पर ऐसा एक भी वर्क का टुकडा नही है जो मशीन मे बना हो।

जालन्धर से एक व्यक्ती ने मेनका गान्धी को मेल भेजकर २००७ मे दावा किया था कि उसके पास जर्मन से बनी स्वसालित मशीन है जो कागज मे कुटकर वर्क बनाती है। मेनका गान्धी ने पता लगाया तो इस तरह कि कोई फैक्ट्री नही मिली।

टना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर और गया, कानपुर मेरठ, और वराणसी, जयपुर ईन्दोर अहमदाबाद और मुम्बई ऐसे मुख्य नगर जहॉ वर्क का बडे पैमाने पर उत्पादन होता है।

दिल्ली, लखनाऊ, आगरा, और रतलाम, कि वधशालाओ से वर्क बनाने के लिये पशुओ कि नरम खाल से बनी थैलियो को इन शहरो मे भेजा जता है।

बजार मे उपलब्ध चान्दी के वर्क जहरीले ही नही कैसर कारक भी है।

आभार प्रेरणा,लेख- मेनका गान्धी

जैन समाज के लिये विशेष प्रस्तुती - हे प्रभू पर

सादर सहयोग राजस्थान पत्रिका, एवम महावीर बी

विशेष सी टी यू पी


कसम से, भगवान तो नही, पर भगवान से कम भी नही

Posted: 16 फ़रवरी 2009
पैसा कमाओ बाप! और देश सेवा किया है ? देश सेवा गई तेल लेने!
आज राजनिति मे पैसा फैक कर देखिये हर नाप का नेता मिलेगा !

ज सारी दुनिया मे पैसे को लेकर हाय-हाय मची है। जब से पैसो का अविष्कार हुआ है उसका महत्व बढता ही गया।ब तो पैसा कमाना ही जिन्दगी बन गया है। चोरी करो, डाका डालो, झुठ बोलो, धोखा दो, कुछ भी करो ,पर पैसा कमाओ। जिसमे पैसा नही वह काम नही करना चाहिये। आर्थिक उदारिकरण का सबसे बडा प्रभाव यही हुआ है। अब हर चीज का मुल्य पैसे मे है। आटे कि किमत पैसे मे / दाल की कीमत पैसे मे /

नमक की कीमत पैसे मे / नमकहलाली की कीमत पैसे मे / नमकहरामी की कीमत पैसे।

गर नमकहलाली की कीमत भी पैसा है और नमकहरामी की कीमत भी पैसा है, तो नमकहलाल और नमकहराम मे फर्क क्या हुआ है ?

र्क है सिर्फ पैसा। पैसा कम हो जाये तो हलाल को हराम होने मे देर नही लगती । विश्वास से बडा है पैसा।

पैसा कमाओ बाप! और देश सेवा किया है ? देश सेवा गई तेल लेने! देश की सेवा ही क्या है,आज तो हमारे देश मे हर सेवा तेल लेने भेज दि गई है। क्यो कि पैसा देश से बडा / पैसा देश भक्त से बडा,

पैसा इन्शान से बडा / पैसा समाज से बडा / पैसा ज्ञान से बडा / पैसा विवेक से बडा / अगर यहॉ कोई चीज न गिनाई गई हो तो आप देख लिजियेगा।, पैसा उससे भी बडा निकलेगा।प्रेम भाईसारा इन्शानियत,सभी बेकार है।जो भी चीज घन्घा नही वो बेकार है।

च्छा हुआ हम १९४७ मे मे आजाद हो गये। अगर स्वतन्त्रता सन्ग्राम आज हुआ होता तो धन्धे की तरह हुआ होता । आन्दोलन करने के पहले नेता हिसाब लगाते-धरना देने मे कितने पैसे ? जेल जाने के कितने ? जनरल डायर को गोली मारने के कितने ? और फॉसी चढने के कितने? क्या आप हिसाब लगा सकते है क्रान्ति का बिगुल बजाने के लिये कितना पैसा मिलना चाहीये। अगर स्वतन्त्रता सन्ग्राम भी घन्धा बन जाता तो हमारे नेता

आजाद हिन्द डिपार्टमेन्टल स्टोर खोल लेते। वैसे जो आजादि मिलने के पहले नही खुला, वह मिलने के बाद खुल गया।आज राजनिति मे पैसा फैक कर देखिये हर नाप का नेता मिलेगा। आपको पता है जैसे गधे घोडो का बाजार लगता है वैसे ही क्रिकेटरो का बजार लगता है ,उनकी बोली लगती है और वो पैसो मे बिक जाते है खरीदने वालो के गुलाम बन जाते है।

लो कहते है कि पैसा हाथ का मैल होता है जानते है इसका असली मतलब क्या होता है- जिसके पास ज्याद पैसे, उसके हाथ ज्यादा मैले। पैसा जरुरत से ज्यादा होता है तो ऐयाशी के काम आता है। रिश्वत खिलाने के काम आता है।सुपारी देने के काम आता है।शिक्षा को नष्ट करने मे काम आता है। पैसे से रोटी मिलेगी उसकी कोई गारन्टी नही, पैसे से भुख नही मिटती। लेकिन मजे कि बात देखो पैसे कि सबसे ज्यादा भुख उन्ही लोगो को है जो भुख से मर नही रहे होते।

गरीब "रुपलो" पैसे वाला बनते ही सेठ रुपचन्दजी हो गया,- देखा ! पैसे मे कितनी ताकत


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छोकरे कि टाई लाल, छोकरी के गाल लाल, रुस कि नाक लाल , चीन कि देह लाल

Posted: 11 फ़रवरी 2009

मै मेरी पत्नि के साथ शादी नही करना चाहता । दुबार मेरी पत्नी के साथ शादी के डर से पहाडो मे जाकर छुप के प्यार का इजाहर करना चाहता हु जहॉ (प्रमोद मुतालिक) नाम का डाकु ढुढते रह जायेगा।
मै गुलाबी रन्ग देख के घबराने लगता हु। शाम को दफ्तर से लोटते समय तब बिल्कुल ठीक रहता है। नार्मल हो जाता हु। लेकिन सुबह ऑफिस के लिये निकलते समय पत्ता नही मुझे क्या हो जाता है- जैसे मुझे कसाईखाने मे ले जाया जा रहा हो। कही भी गुलाबी रन्ग देखते ही मेरी घिग्घी बन्घने लग जाती है।अपनी गुलाबी टाई मुझे फन्दे जैसी लगने लगती है। इस रन्ग के शर्ट से मेने तोबा कर ली है। बेडरुम के पिन्क पर्दे बदल दिये है।कार का कलर चेन्ज कराने का सोच रहा हू। र बालकानी मे लगे गुलाब के पोघे को टोटके की तरह पडोसी को गिफ्ट कर दिया है। मै वेतन भोगी युवक हु।

बेहद मेहनती और अनुशासित। दफ्तर मे हर मोर्चे पर दोनो हाथ जोडे एक खुर पर खडा रहता हु। हमारे वेतन भोगी को रोमान्टिक होने का नैतिक अधिकार नही होता है। तीस दिन के बाद तो हमे चॉन्द दिखाई देता है ओर वह भी दो हफ्ते के भीतर लघु तर होता हुआ लुप्त हो जाता है।फिर ईन्तजार कि राते।
चोर छिपे जब भोर भए, अरु मोर छिपे रृतु फागुन आए>>।" भोर हुई और फागुन भी आ गया, पर ना जाने क्यो, लाल और गुलाबी रन्ग मुझे नही सुहाता। पत्नी ने सोचा शायद कोई चिन्ता लग गई हो।

कई रोज से पत्नि जिद्द कर रही है वैलन्टाइन डे के दिन जुहचोपाटी पर जायेगे। वहॉ पर जाकर रेत मे बैठकर वो मेरे से गुलाबी फुल के साथ प्यार का पुन इजाहर करना चाहती है। उस दिन मेरी पत्नि का जन्म दिन भी है।

गुलाबी फुल देना ? इस बात पर तो मेरे तोते उडने लग गये । क्यो कि बेचारी को पता नही है प्रमोद मुतालिक श्री राम सेना के सेनापती वेलन्टाईन डे पर शादि करायेगे जो भी लडका लडकी साथ मे दिखेगे।(चट मगनी पट्ट ब्याह) वो ताड से शादिया करा देगे। कोई साया नही निकलेगा। कोई जन्म पत्री नही देखी जायेगी। कोई ग्रह नक्षत्र गोत्र नही देखे जायेगे, और मै मेरी पत्नि के साथ शादी नही करना चाहता । दुबार मेरी पत्नी के साथ शादी के डर से पहाडो मे जाकर छुप के प्यार का इजाहर करना चाहता हु जहॉ (प्रमोद मुतालिक) नाम का डाकु ढुढते रह जायेगा।

प्रेम का महादिवस यानी वैलन्टाइन डे आ गया। मुझे देख कर सन्त वैलन्टाइन की आत्मा दुखी होगी। कही भगवा रन्ग वालो ने तो मुझे आन्तकित नही कर रखा है ?
फिर नागार्जुनकी एक कविता याद आ गई- रुस कि नाक लाल , चीन कि देह लाल। लिखते लिखते बाबा यह भी लिख गये है कि - छोकरे कि टाई लाल, छोकरी के गाल लाल। क्या बाबा यह नही जानते थे कि गाल गुलाबी होते है, लाल नही। क्या गुलाबी का खोफ उन जैसे फक्कड कवि पर भी हावी था। यह कोई रहस्य है या गुलाबी कलर का अपमान ? इस रन्ग पर दुसरो ने भी बहुत अनयाय किया है। या तो उस पर लुट ही पडे या फिर उसी के सहारे दुसरो को लुट लिया।
इस कमबख्त आर्थिक स्लोडाउन ने ही मेरा यह हॉल किया है कि गुलाबी रन्ग देखते ही घिग्घी बन्घ जाती है।
२५ हजार कि गुलाबी पगार पहले ही १५ हजार हो गई है चेहरा लाल सुर्ख तो देख ही रहे है फिर गुलाबी गाल कैसे गुलाबी रह सकते है।

GeT wElL SoOn.....bLoGeRiYa.....ब्लोगेरिया

Posted: 09 फ़रवरी 2009



एक विज्ञापन:श्री ब्लोगकुमारजी के जन्म से: ब्लोगेरिया

म्माननिय चिठ्ठाकारो,

प जो पढ रहे है वो एक विज्ञापन है। जब से चिठठे लिखने का चलन हुआ तब से लेखन के क्षेत्र मे क्रान्ति का सुत्रपात हुआ है। यह बात स्वीकार करने मे कोई अतिशियोक्ति नही। पुराने समय मे अगर कोई लेखक, साहित्यकार, लिखता था, वो आज से ज्यादा जटिल हुआ करता था. साथ ही साथ लिखने का तरिका बोरिग भी था। ढेर सारी नोटबुको को खराब किया जाता था, कभी पेन ठीक-ठाक काम न करती तो बिच रास्ते मे ही नोट बुक तकिये के निचे दबा कर सो जाते थे। कभी लिखने का मन हुआ तो नोटबुक जगह पर नही मिलती या बच्चे बिच के पन्ने ही फाड डालते। फिर बाजार से नई नोट बुक पेन लाते और चार पॉच-पन्नो को भर देते। ऐसा करते करते एक से अधिक नोट-बुके हो जाती जो आधी से उपर कोरी पडी हुई अपने किस्मत को रोती थी। होली दिवाली पर भाभी, मॉ सफाई करते वक्त तो ऐसी आधी अधुरी लिखि नोट बुके घर के माले पर कचरे के सग पडी मिलती । अक्षर साफ सुन्दर नही होने कि वजह एक भले लेखक कि रचना अखबारो के दफ्पतर मे रद्दी कि टॉकरियो मे घुल चाटती थी। कुल मिलाकर उस जमाने मे विद्वान साहित्यकार लेखक तो एक से एक थे पर यह यन्त्र-तन्त्र कि कमी थी। ईसलिये कई लेखक तो अपने विचारो के साथ ही दफन हो गये। पुराने साहित्यकारो, लेखको, पत्रकारो को एक वर्ग विशेष या जाती विशेष कि तरह देखा जाता था। खादी का कुर्ता पाईजामा, एक पेन उपर के जेब मे, गले मे लम्बा झोला हुआ करता था,पेरो मे चपल और रस्सीयो से बन्धा हुआ चश्चमा गले मे लट्का हुआ होता था। काले कलर के बडे से बेल्ट मे हाथ कि कलाई पर स्वीस घडी होती थी। घडी से उपरोक्त साहित्यकार कि बडे-छोटे होने कि स्थिति का ज्ञान हो जाता था। अमुमन यह सभी लेखको कि वेशभुषा थी। मतलब एक अलग बिरादरी जैसा महसुस होता

था।

ज का लेखक जेन्टलमेन बन गया है । पेरो मे महगे जुते, हाथमे लेबटोप, महगा सेल फोन, ब्लेक चश्चमा, जिन्स पेन्ट वाले लेखक साहीत्यकार भरे पडे है। अक्षर मक्खीयो कि टॉगो जैसे है,पर कम्पुटर ने सुन्दर बना दिया. विचार-दर्शन गुगल कि साईट से मिलते है और कापी-पेस्ट के जरिय रोशन होने के फिराक मे रात रात भर सिगरेटो के धुऐ के गुब्बारो मे खाक छानते कम्पीयूटर द्वारा। भाई जमाना ही बदल गया है। इसे कहते है लेखन-क्रान्ती। खेर इस विषय को यहॉ छोड कर मुख्य बात पर आया जाये।

चिठठे लिखना या उसके माध्यम से अपने विचार प्रकट करना कभी मे गलत नही हो सकता। ना ही चिठठे लिखना कोई ब्लोगेरिया का रोग है। हिन्दी चिठाकारो ने हिन्दि भाषा को दुनिया भर मे आम जन कि भाषा बनाने मे महत्वपुर्ण भुमिका निमाई है। अपनी भावना विचार या टीपणीयो को अब स्वतन्त्र रुप से व्यक्त करने का हमे (हिन्दी चिठाकारो को) सुहनेरा अवसर प्राप्त हुआ है। ना डाक का झझट ना फैक्स ना टेलिप्रिन्ट का सब कुछ सरल हो गया है श्री ब्लोग कुमारजी के जन्म से।

र इसका दुसरा पहलु भी है । अगर आदमी कृष्ण भक्ती कि तरह ब्लोग भक्ती मे लग जाये तो क्या ? रात दिन २४ धन्टा ब्लोग भक्ती! तो कैसा होगा हमारा चिठाकार। ब्लोगेरिया जैसा नही होगा ? जैसे एक आदमी रोज सवेरे उठकर नहा धोकर मन्दिर जाता है भगवान के दर्शन करने, वो एक आध घन्टे मे लोट आता है घर को। अगर वो पुरा-पुरा दिन मन्दिर मे ही बैठकर भजन किर्तन करेगा तो घरपरिवार वाले क्या कहेगे ? भाई यह तो साधु-महात्मा हो गया है।सी तरह ब्लोग लिखने मे समय, उम्र, स्वास्थय, बच्चे, शिक्षा, व्यापार, नोकरी, प्यार, पत्नी, मॉ, ऑखो, का अतिक्रमण होता है तो कैसे व्यक्ती विशेष के लिये "भाला हो रहा है," कहा जा सकता है। हम ऐसे अतिकर्मणीयो को सन्यासी नही ब्लोगेरियासी कहेगे।

प सभी ने मेरी ब्लोगेरिया से सम्बन्धीत तीन पोस्ट को पढा है। लोगो कि कमेन्ट के साथ साथ पीडीत व्यक्तियो के घर परिवार या दोस्त रिस्तेदारो के सैकडो ई-मेल मुझे मिले है जो ऑफ द स्क्रिन थे। और ऐसे मेलकर्ता अपने पुत्र, पति, पत्नि, बेटी, बहु के लिये चिन्तित थे । उदारहण के लिये दो ईमेल का जिक्र कर रहा हू (परिचय को छुपा रहा हु) एक मॉ ने मुझे लिखा-

" आपने सही लिखा है, मेरा २४ वर्ष का बेटा पाच महिने से ब्लोग पर लिखता है जिससे वो रात को २-३ बजे सोता है। छुटि के तो दिन पुरी पुरी समय चिपका रहता है। जिस कारण से पुरा टाईम टेबल खराब हो गया है उसका। मुझे उसके भविष्य कि चिन्ता है।

(इसे कमेन्ट मे साझा नही करे॥॥॥")

क दुसरा ईमेल लेते है -यह भी एक महिला है जो अपने ६५ वर्षिय पति को लेकर चिन्तित थी।

" जब से उसने ब्लोग बनाया उसने अपनी दिनचर्या को ही बदल दिया। अब शाम को वॉक पे नही जाते। सुबह चार बजे उठने वाले सोते है चार बजे। कल ही आखे चेक करा कर लोटे बोले रहे थे कि डॉक्टर ने कहा है चश्चमे का दॉई ऑख मे आधा व बाय ऑख मे भी उससे थोडा ज्यादा नम्बर बढ गया है नया कॉच बनाना पडेगा। रात मे दो तिन बार चाय पि जाते है।अगर ऐसा ही चलता रहा तो बिमारिया उन्हे घेर लेगी। ब्लोगेरिया पर आपने लिखा वो मेने उनको (पति) पढाया, मुझे तो बहुत ही खुशी हुई पढकर कि शायद कोई तो रास्ते निकल जाये।

(प्लिज डू नोट प्रिन्ट)

दोस्तो ऐसे मे चिठाकारो के लिखते समय अनुशान ना रखने कि वजह से कई कठिनाईया आ गई है जैसे चिठे लिखते-समय सिगरेट, चाय- काफी, मावा, गुटका, का सेवन अधिक मात्रा मे होने लगा है। क्यो कि ब्लोगनशे मे पत्ता ही नही चलता कि हम क्या कर रहे है। यह हमारे स्वास्थय से झुडा मसला है- इसे मजाक मे नही लेना चाहीये।


मेरा मानना है कि लोग ब्लोग लिखे, पर नियमबद्ध होकर लिखे। अनुशासन व नियमावलीयो का सख्ती से पालन करे। मेरा ऐसा मानना है कि बच्चे इस चक्कर मे ना पडे, केवल अपने भविष्य को पर ध्यान केन्द्रित करे।

मै चाहता हु कि वरिष्ठ नागरिक ब्लोग लिखे पर समय से वॉक करे, खाना खाये, थोडा समय अपने पोत्रो को दे, आन्टी को दे, दवाई बराबार से ले। डाईबिटीज के मरिज ब्लोग पर महिने मे चार से पाच घन्टा से अधिक ना बैठे क्यो कि ऑखे खराब हो सकती है। ज्यादादेर बैठने से सुगर लेवल बड सकता है। जिससे लिवर किडनी पर असर होने के प्रबल चान्स है। ज्याददेर बैठने से पेरो मे सुजन आ सकती है। ऐसी हजारो कठिनाईया है अधिक समय तक ब्लोग लिखने देखने मे। ऐसे सैकडो सवाल है जो हमारे समक्ष फन फैलाए खडे है।

ब्लोगेरिया से पिडित लोगो के लिये हमारी एक टीम विस्तृत एवम सटीक समाधान ढुढने मे लगी हुई है. भविष्य मे जल्दी ही उसे लोगो के समक्ष लाया जाये ऐसा हमारी भावाना है। पर इससे पहले मै आप सभी सम्मानित ब्लोगकर्तओ से निवेदन कर रहा हु कि आप हमे सिरियसली उपरोक्त बिमारी से पिडीत लोगो के अच्छे स्वास्थय को कैसे बानाये रखे ? के बारे मे सुझाव, ईलाज भेजे जो हमारी टिम के लिये रिपोर्ट बनाने मे साहयक होगी। आपका योगदान देश समाज परिवार एवम ब्लोगजत कि जय विजय के लिये हो ऐसी मे आपसे आशा रखता हु।


ब्लोगेरिया के ईलाज भेजने के निचे दिये नियम को पढे>

आगे बढे>आपके लिये>अपने लोगो के लिये> सहयोग का हाथ बढाये>


अमुन हम सभी ब्लोगेरिया से शिकार है अथवा "हे प्रभु" लोगो कि ईच्छा अनुरुप पर आपके सुझाव आमन्त्रीत कर रही है। आप सभी से अनुरोध है आप इसमे भाग लेकर अपनी बिरादरी के स्वास्थता, लम्बे आयुष, एवम उनकी खुशियो के लिये अपना अमुल्य सुझाव देकर ब्लोगजगत की जयजयकार के हिस्सेदार बने। आपके द्वारा प्रदत ईलाज, नियमावली, सुझाव, दवाई योग क्रिया, खानपान, ईत्यादि हम अपने रिचर्स टीम के हवाले करेगे जो बाद मे यह तय होगा कि चिठाकारो कि असली समस्या क्या है ? लापरवाही के क्या कारण है? कम उम्र के युवाओ को कैसे और कब चिठेजगत से झुडना है। सभी तरह के विचारो को जानने के बाद हम अपनी एक रिपोरट सार्वजनिक तोर पर प्रसारित करेगे। जिसमे ब्लोगजगत कि समस्या एवम निवारण पर सटिक बात हो सकेगी।


इसको समस्या के हल को अच्छा प्रतिसाद मिले इसलिये प्रतियोगता के रुप मे पेश किया जा रहा है।

आपके सुझावो का स्वागत है

GeT wElL SoOn......... bLoGeRiYa
"( गेट वेल सून ब्लोगेरिया ) प्रतियोगता

1st, Prize 2100Rupee
2nd,Prize 1100Rupee
3rd,prize 500Rupee

contact at- HEY PRABHU YEH TERA PATH

BLOG NAME:=: http://ombhiksu-ctup.blogspot.com/

Emill:= ctup.bhikshu@gmail.com

Sponserd by- simco poly tex (india)health and welfare division mumbai, through hey prabhu yeh terapanth hindi blogs india, for Public interest

नियम:-

१ सभी भाग ले सकते है।

२ प्रतियोगता मे ऐसे सुझाव को शामिल क्या जायेगा जो हे प्रभु यह तेरापन्थ के कमेन्ट बोक्स द्वारा भेजेगा।

३ अग्रेजी एवम हिन्दि दोनो भाषा मे कमेन्ट भेज सकते है।

४ आपके कमेन्ट सुझाव ६०० शब्दो से अधिक नही होने चाहिये।

५ प्रतियोगता मे आज से २४ फरवरी २००९ रात्री १२ बजे तक प्राप्त सन्देशो को ही शामिल किया जायेगा।

६ कोई भी सुझाव या कमेन्ट के साथ निचे मे आपका वेलिड ई मेल पता होना चाहिये। ताकि हम आपसे सम्पर्क कर सके।

७ कोई प्रतियोगता मे अपना नाम नही प्रसारित करना चाहता है तो वो mahaveer_b@yahoo.com इस पते पर सुझाव मेल कर सकते है

जो प्रतियोगीता से बाहर रहेगे।

८ all rights reserved by -HEY PRABHU YEH TERA PATH
९ judicial area in mumbai
१० terms & condition अपपल्य

त्रृटी के लिये करबद्ध क्षमा करे।

(सभी फोटु बडा करने के लिये उसपर चटका लगाये।)



चिठियो का लिखना बन्द-डाकिया पेट फुला रहे है- लाईफ हो गई झिन्गालाला- ब्लोगियो के फिगर मे इजाफा-बिना डाक-टिकिट, लेटरबॉक्स के चिट्ठे लिखे जा रहे

Posted: 02 फ़रवरी 2009
बिचारे कन्नु का तो कई बार ईन्टरनेटवा का कनैक्सन ही कट चुका है बिल नही भरने के चक्कर मे-"कॉफी विथ कुश " ठेले पर जाकर बिना शक्कर कि कॉफी पिकर आते है-झोला लटकाये जो खडा है वो कुशभाई है -ज्ञान बॉट रहे है वो ज्ञानदत्तजी पाण्डये है- अपने समीरलालाजी है-हॉ! यह अनुप शुक्ला जी है- भाई! ये अपने आपको हरियाणवी ताऊ कहता है,

भाई लोगो का ऐसा कहना , मेरे अकल को स्क्रीन पर कतई डिसप्ले नही होता कि मुए मोबाईल के आ जाने से चिट्ठियॉ लिखने का चलन चोपट हो गया है। ठीक है कि एस एम एस ने सक्षिप्त सन्देशो की ऐसी हेबिट डाल रखी है कि अब दिल के फेफडे खोलकर कोई अपनी खाली-पिली भन्कस नही करेगा। ताऊजी और शास्त्रीजी याद किजिये आपके समय मे जब भी खतवा लिखा जाता था तब भी तो यह वाला जुमला टॉक दिया जाता था-"थोडे लिखे को ज्यादा समझे।" यह सुत्र वाक्य भी आज एस एम एस का बीज मन्त्र है। कुछ भी चेन्ज नही हुऐला है बस लेटरवा लिखने का स्टाईल के मलिका शैरावत के छोटे होते कपडो के माफीक हो गएला है अपुन के खोपडे मे आज भी "सोस्ती सिरी सर्व उपमा जोग से आगाज करके अत्र कुशलम तत्रास्तु" पर विश्राम लेने वाले पत्रो की लिविग (living) यादे शेष बचेली है।

ताऊ कभी ताई को लव-लेटरवा लिखा कै नही ? अपुन तो आज भी अपनी कुवॉरी घरवाली कि चिट्ठई जिनकी गन्घ आज तक मेरे नथुनो मे बरकरार है इनमे लिखा होता था-"लगता है दाल जल रही है , इसलिये अब लेटर लिख्ना बन्द कर रही हु।" या फिर , आपको लेटरवॉ लिखने बैठी ही थी कि दरवाजे कि घन्टी बज गई, कही डैडी ना आ गये हो?, हाय!कहॉ छुपाऊ ?"

म सबको एस एम एस नामक भुतनीका का थैन्कफुलवॉ होना मॉगता है, कम से कम इस तरह के सन्शययुक्त जुमलो के जास्ती भन्कस से मगज का दही नही होता। सचार क्रान्ति के जमाने मे बेचारे डाकिया बैठे बैठे अपने पेट फुला रहे है। बैचारो के साईकिल को हवा भरने वाला भी कोई नही मिल रहा है।

भाई, अब तो बुद्धू बक्से (कप्यूटर) घर घर मे पहुच गये है। {ग्रामीण क्षैत्रो को छोड) बुद्धू बक्से के सामने बैठकर अगले कि लाइफ के असख्य घन्टे किस रास्ते से निकल गये, यह स्वय उस ध्यानस्थ जीवनत्मा को पता नही चलता कि बैचारे कि लाईफ कब झिन्गालाला हो गई ली है। डेस्कटॉप,पॉमटॉप, और लैपटॉप के इस काल मे युवक युवतियो की गोन्दे तो सदा-सर्वदा भरी ही मिलती है। यह मैलिग क्या बला है मेरे ताऊ ? एक होता है मेल दुसरा होता है फिमेल,अरे भाई मेरे यहभी तो लेटरवा का ही नयानवेला भाई है जो बिना फेफडे का और खोपडी का धनचक्कर होता है।

शास्त्री जी सुना है आपके जमाने मे आप लेटरवा(पोस्टकार्ड} लिखने मे बडे ही आलसी हुआ करते थे ? एक दो लाइन लिखते लिखते उबासीयॉ लेने लगते थे ?ओर इस उम्र मे इन्टरनेटवा का प्रयोग करके नई आदतवा कि तरक्की कर डाली। वो जो छोटी-छोटी चिट्ठीयो के जवाब देने से कतराते थे वो आज कल बडे-बडे दनादन चिट्ठे लिखकर रोज लोगो का ब्लोगेरिया से भेजा फ्राई कर डाला है।

अरे भैईया! यह ब्लोगेरिया किस रोग का नाम है ? अपुनके खोपडी मे तुम्हारी बात घुस नही रेहेली है।

अरे बिटवा! बुद्धू बक्से (कप्यूटर) पर इन्टरनेटवा द्वारा लिखने वाले को चिठाकार कहा जाता है। अपने सिगापुर वाले बडे भाई राज भाटियॉ अपनी अग्रेजीयॉ भाषा मे ईसे ब्लोग कहते है। यह ब्लोग अपनी मुबईयॉ कि १० x १० कि खोलियो के माफिक होते है जहॉ दरवाजे तो होते है पर ताले नही होते। एक खोली मे दस दस लोग रहते है उसी तरह कही कही एक ब्लोग मे दस दस ऑखफोडु चिठाकार एक साथ लोगो के दिमाग का तेल निकालने को लगे हुये है।

रे भाई! दस दस लोग एक साथ क्या घसिटते है ? खाली खोपडी के धनचक्कर, एक थकता है तो दुसरा आ जाता है अपनी घसिटने, ब्लोग लिखना सन्क्रामक बिमारी है यह ब्लोगटाइटिस भी। बतर्ज एक पुराने-से फिल्मी गाने के-लो बचो यारो, इसको तो ब्लोगेरिया हुआ>>>>>> ब्लोगेरिया हुआ,,,,,। इस रोग कि एक खासियत यह है कि यह हप्ते पन्द्राह दिनो मे ही क्रानिक हो जाता है। इसमे बहुत कुछ थोथा भी होता है, सहज ऐतबार ना हो तो अनामदासी पोथाकारो की साइटस पर जाइए।

ब तो हालत यह है कि अखबारो तक ने अपने पाठको के पन्नो वाली स्पेस को इन ब्लोगर्स के नाम आवन्टित कर रखे है। दिनोदिन ब्लोगियो के फिगर मे इजाफा हो रहा है। बिना डाक-टिकिट, लेटरबॉक्स के चिट्ठे लिखे जा रहे है। जवाब आ रहे है। अरे भाई फिर ये लोग कि तो चॉन्दी है, नोट छाप रहेले होगे? अपुन भी इस धन्दे मे घुसना मॉगता है अपनी ट्पोरी गिरी का लोगो को टिप देगा; और अपने ब्लोगिया का नाम भी एकदम धासु सोचेला है- "टपोरी-गुरु, " क्यो भाई है ना झकास ?

रे करमठोक! भेजे के अन्धे, यह कुछ कमाते वमाते कुछ नही है ये तो अपने बाप दादा कि कमाई पे ऐस कर रहे है। यह तो अपना बडा भाई बच्चनवा ने इण्डियॉमा फैसनवा लाकर रख दिया है सभी बैरोजगारो को घन्घे पर बैठा दिया है बिना पगार के। बिचारे कन्नु का तो कई बार ईन्टरनेटवा का कनैक्सन ही कट चुका है बिल नही भरने के चक्कर मे।

रे भाई। अपनी गली के नुकड पर सुना है आप भी ब्लोग लिख रहेले हो ? मेरे बाप! मेरी दिमाग कि वाट मत लगा, यह काम तो मेरे अकल(चाचा) एस एम एस के बिग ब्रदर बाबु ब्लोगानद कर रहे है और उनकी छत्र छाया से बबुआ लव लेटरलाल, चाचा चिट्ठानन्द और मेरे बाप पोथाप्रसाद समेत फैमेली के टोटल मेबर्स कि लाईफ सुरक्षित है,सो चिट्ठी बिटियॉ कि भी।

चल अब दिमाग चाटना बन्द कर और "कॉफी विथ कुश " ठेले पर जाकर बिना शक्कर कि कॉफी पिकर आते है।

(ठेले पर) भाऊ! यह कॉफी के ठेले पर ईतना लाईन क्यो लगेला है ?और वो गले मे थेला लटकाये वो कोन बैठेला है? अरे मेरे काका! वो सभी ब्लोगान्दन जी के दत्तक पुत्र है- झोला लटकाये जो खडा है वो कुशभाई है जो काम धन्धा छोड लोगो को कॉफीवादन करवा रहे है।

देख वो लाईन मे सबसे आगे चशमा पहने लोगो का हाथ कि रेखा देख ज्ञान बॉट रहे है वो ज्ञानदत्तजी पाण्डये है- ये ब्लोगेरिया के जनक है। लोगो कि "मानसिक हलचल" का ईलाज करते करते खुद ईसकी चपेट मे आ गये है।

(कुशके कॉफी ठेले पर समीरलालाजी एव फुरसतियाजी)

भाऊ! वो कोन है जो अन्धेरे मे भी रोशनी पैदा कर रहा है- अरे! छवनी के सिक्के! यह अपने समीरलालाजी है जो ठेठ विदेश से उडन तस्तरी से उडकर कुश के ठेले पर आऐ है यह कुश के कॉफि-ठेले पर ब्लोगेरिया के कीटाणुओ का पाउडर सप्लाई करते है। और जिनके आखो मे बडा सा चश्चमा पडा है वो शुक्ला जी है ये दोनो विदेश से भारत मे ब्लोगेरिया के कीटाणुओ का पाउडर सप्लाई करते है, बहुत बडे डिलर है।

रे भाऊ! देख तो वो कोन सफेद कपडो मे लदा हेडमास्टर कि तरह फुरसत से चलता हुआ आ रहा है। बडा ही शर्मिला शान्त फुरसत वाला ईन्शान लगता है ? हॉ! यह अनुप शुक्ला जी है। हिन्दुस्थान मे ब्लोगेरिया के कीटाणुओ का पाउडर सप्लाई कि फुरसतिया की प्रविष्टियों को पढ़ने के लिए चटकाएँ" href="http://directory.chitthajagat.in/?chittha=http://hindini.com/fursatiya">फुरसतिया नाम से बहुत बडी दुकान है जो पाचवे पायेदान पर है।

भाऊ-भाऊ ! देख महिला मडल भी यहा नारे लगा रही है हमे भी कॉफी पिलाओ, बराबरी का हक चाहिये नही तो यह ठेला नही चलने देगी।

लालबिन्दी वाली कलम वाली बाई रंजना [रंजू भाटिया] , जो टेशन मे सोच रहेली है वो चॉन्द से आई Parulजी, कविता वाचक्नवीजी,के लेख मे नही पढ सकता क्यो कि मै अभी नाबालिग हु। Neelimaजी और सुजाताजी, बात बात पर सडको पर मोर्चा लेकर आ जाती है ये दोनो हम शक्क्ल है (बहने है शायद ) ।

बात बात पर प्राण पखेरु उडाने मे माहीर सुनिताजी शानु भी खडी है कतार मे।

रे भाई ये भैसे पर कोन बैठा है ?, भाई! ये अपने आपको हरियाणवी ताऊ कहता है, जो कुशके ठेले पर दुध कि सप्लाई करता है, और जो भैसे कि पुछ पकड रखी है वो शास्त्रीजी, रविरतलामी,

चिपके हुये सुरेस चिपलुनकर,शिवकुमारजी मिश्रा, अविनाश, बैगाणी, दिनेशजी द्धिवेधी,सुरेश चन्द्र गुप्ताजी, है जो इस देसी ताऊ के खासम खास है।

आलोक
alok [at] chitthajagat [dot] in

लोक कुमार को किसी परिचय की जरूरत नहीं है। ये हिन्दी जाल जगत के आदि पुरूष कहलाते हैं। जी हाँ, ये वही हैं जिन्होंने हिन्दी का पहला चिट्ठा "नौ दो ग्यारह" २००३ में लिखना शुरू किया था, और ब्लॉग का नाम चिट्ठा दिया था। वर्षों से ये अपने जालस्थल "देवनागरी॰नेट" द्वारा दुनिया को अन्तर्जाल पर हिन्दी पढ़ना व लिखना सिखाते आ रहे हैं।

नोट-: (सभी फोटुओ को लार्ज करने के लिये चटका लगाये। किसी कि भावनाओ को आहात करने कि मन्शा नही है- ज्ञानदत्तजी,अनुपजी,ताऊजी, लालाजी, शास्त्रीजी,कुशजी, कन्नुभाई, शास्त्रीजी, रविरतलामी, सुरेस चिपलुनकर,शिवकुमारजी मिश्रा, अविनाश, बैगाणी, दिनेशजी द्धिवेधी,सुरेश चन्द्र। Parulजी, कविता वाचक्नवीजीरंजना [रंजू भाटिया Neelimaजी ,सुजाताजी,सुनिताजी-शानु आप सभी मेरे आदरणीय है कही आपको कही ठेस लगी होतो क्षमा करे।

विशेष ब्लोगेरिया कि अन्तिम कडी मे इसका ईमानदारी से ईलाज लिख रहा हु। ईसके लिये विशेषज्ञो कि साहयता ले रहा हु। एवम जल्दी ही एक सार्वजनिक विज्ञापन द्वारा ब्लोगकर्ताओ से रॉय मागने की ईच्छा रखता हू। आभार आप सभी का )

ताऊ ने कहा-ब्लोगेरिया,रोग हमारे गुरुओं समीरलालजी, डा.अमरकुमारजी, ने दिया , खाद पानी देने का काम ज्ञानदत्तजी पांडे, फ़ुरसतियाजी, मिश्राजी, भाटियाजी

Posted: 27 जनवरी 2009
फुरसतियाजी, जिनसे सबको इन्फेक्शन फैला, ज्ञान जी भी लिस्ट में आने के लिए सफिशियेन्ट बीमार है -समीरलाला
मैने ब्लोगेरिया नामक पोस्ट कुछ दिन पुर्व मे लिखी थी, देश भर से लोगो ने सहमती जताई कि हम ब्लोगेरिया से पिडीत है। इस कारण हमारे जिवन मे काफि बदलाव देखा गया। लोगो ने ब्लोगेरिया बिमारी कि पुष्टि कि एवम लक्षण अपने जिवन मे पाये। कई लोगो ने पोस्ट पढी पर अपना नाम देख इस बिमारी से पल्ला जाडने मे सहजता महसुस कि। जबकि यह सम्भव नही था कि ६००० चिट्ठाकारो को नाम से उलेखित किया जाये। चिट्ठाजगत कार्टुरन कक्ष ने तो "ब्लॉगेरिया से बिमार शास्त्री जी जंगल में" का कार्टुन भी प्रसारित कर हमे अनुग्रहित किया। "ब्लॉगेरिया" शब्द कि रचना जरुर मेने कि आपके समर्थन से हम इस पर विजय पायेगे आज जो पोस्ट प्रसारित कर रहा हु इसमे ब्लॉगेरिया" पोस्ट पर टिप्पनीयो को माध्यम बनाया है टीपणीकर्ताओ से मै इस पोस्ट मे बात कर रहा हु। मै कमेन्ट बोक्स मे ही आपसे बात कर सकता था। ऐसा करने पर विषय के साथ न्याय नही होता, इसलिये मै दोस्तो कि टीपणीयो को विषय का मुल केन्र्द बनाया। चुकी ब्लोगेरिया पर मेरी दो रेगुलर पोस्ट इसी सप्ताह आपके सामने पेश करने कि ईच्छा है
ताऊ रामपुरिया ने कहा… "भाई आपने १३ लक्षण बताये, पर हम तो इन तेरह के अलावा और लक्षण भी खुद मे और हमारे गुरुओं मे देख रहे हैं, हमको तो आपकी इस पोस्ट का पता अभी चला है जब . शाश्त्री जी ने यह लिंक भेजा. और भाई आपसे हाथ जोडकर निवेदन है कि आप ताई को यह सब मत बता देना, कि हम कम्प्यूटर पर आफ़िस का काम नही बल्कि ये ब्लागिंग ब्लागिंग का खेल खेलते हैं, वर्ना हमारा हाल खराब हो जायेगा, और जो ब्लागिवुड मे हमको झेल ्रहे हैं फ़िर वो किसको झेलेंगे?
वैसे ये छुआछुतिया रोग हमे हमारे गुरुओं . समीरलालजी और डा.अमरकुमार जी ने दिया है, इसमे खाद पानी देने का काम . ज्ञानदत्त जी पांडे, फ़ुरसतिया जी, अरविंद मिश्रा जी, राज भाटियाजी...इनहोने किया है. कभी मैं पकडा जाऊं तो ये नाम आपतो बता देना. :)"
हे प्रभु- " ताऊजी ! आपको लोग ताऊ इसीलिये कहते कि आपमे ब्लोग्गेरिया के लक्षण आम चिट्ठाकारो से अधिक पाये गये है। ताऊ! आज मै आपकी मदद नही कर सकता हु क्यो कि मामला अब मेरी श्रीमती के हाथ मे है, कही ताई ने श्रीमतियो के आन्दोलन पर नजर डाल दि तो आपका बचना मुश्किल है। मै भी नही बच पाया। आप तो अभी से सुधर जाओ ताऊजी! नही तो ताई कि बेलन का सामना करने को तैयार हो जाओ। मेरी सलाह मानो ताऊ तो अपना तो वो ही गाये भैसियो को चराने का काम वापिस शुरु कर दो। आपकी और हमारी भालाई ईसीमे है नही तो फिर घर पर बर्तन माझने पडेगे मैने तो शुरु कर ही दिये है।
ज्ञानदत्त जी पांडे, फ़ुरसतिया जी, अरविंद मिश्रा जी, राज भाटियाजी...समीरलालजी और डा.अमरकुमार जी पहले से ही ब्लोगेरिया बिमारे के जन्मदातओ की लिस्ट मे मोस्टवान्टेड है। (आपसे क्षमा मागता हू, मजाक के लिये। मेरे लेख के मुख्यपात्र बनने के लिये मे आपका आभार प्रकट कर रहा हु आपके सम्माननिय व्यक्तित्व के लिये ) "
Udan Tashtari ने कहा… "haa haa!! हा हा!! बहुत मस्त!! क्या सोच है जी!! कोई दवा/ वेक्सीन भी बताते महाराज तो सही रहता. मजा गया. ग्रेट!सबसे बड़े बीमार फुरसतिया जी, जिनसे सबको इन्फेक्शन फैला, वो कहाँ गायब हो गये लिस्ट से? ज्ञान जी भी लिस्ट में आने के लिए सफिशियेन्ट बीमार है भई!!"
हे प्रभु- "Udan Tashtari- जी से मै बात कर रहा हु।शुक्रिया जी!ताऊ और शास्त्रीजी कि जॉस कि रिपोर्ट तो आने दो उनकी डॉक्टरी जॉस मे ब्लोगेरिया के लक्षण कितनी मात्रा मे पाये जाते है उसके बाद ही वैक्सिन बताउगा जी !उपेनजी!पेसेन्ट लिस्ट मे ज्ञानजी का नाम तो है सरकार ! फुरसतियाजी तो खुद भागे भागे फिर रहे है आप भरोसा रखे डाक्टरो कि टीम जल्दी ही उन्हे पकडकर जॉस के बाद इस लिस्ट मे डाल देगी। इन्फेकसन वाली बात भी मजेदार लगी।"
Shastri Philip ने कहा… A very good article. Some news needs to be corrected
. I have left Kochi and I am on holidays for 10 days to get medical attention for my Blogoria
. I spend the days in old palaces and forts with a camera so that my blogoria is cured.
. You will know soon about my health condition
हे प्रभु- "गुरुजी> आपको कर्नाटक मे भी चैन नही। सम्भवत आपसे रहा नही गया और आस पडोस मे पहुच गये ब्लोगेरिया पिडित लोगो का हालचाल देखने ? गुरुजी, इलाज लेने आप अकेले कर्नाटक पहुच गये, आपके शिष्यो का ख्याल नही आया ? मुझे भुल गये वो ठिक है,
आपके प्यारे शिष्य बचारे गुरु राजीवजी को तो यह सुन सदमा ही बैढ जायेगा कि शास्त्रीजी ब्लोगेरिया का ईलाज लेने अकेले ही चल पडे, हम शिष्यो को मझधार मे छोड।
चलो कोई बात नही, एक गुणी शिष्य कि भॉति मगलकामना करता हू,आप वहॉ से लोटे तो ब्लोगेरियॉ से मुक्ति पाकर लोटे। आपकी यह यात्रा यादगार बने, स्वास्थयप्रद बने, घर परिवार मे खुशीयॉ लाये यही मेरी ईश्वर से प्रार्थना है।
हॉ गुरुदेव, एक बात समझना चाहता हु आपने कर्नाटक लिखा और ताऊ भी इन्ह दिनो अपनी गाय भैसो के साथ वहॉ घुमते पाये गये है क्या कोई बडी रणनिति बनारहे इस ब्लोगेरिया से निपटने के लिये ?"
Shiv Kumar Mishra ने कहा "वैसे लक्षण तो जाने-पहचाने हैं. तो ये बीमारी है. आपने नाम बताकर अच्छा किया. ब्लागेरिया का इलाज क्या हो सकता है? वैसे कोई बहुत ख़राब बीमारी नहीं लगती. इसलिए इलाज खोजने की कोई बहुत जल्दी नहीं है. वैसे ये काम डॉक्टर साहब लोग ही कर सकते हैं. चोपड़ा साहब ने भरोसा दिलाया है."
हे प्रभु- " शिव! यानी भागवान शिव! आप तो त्रिलोकिनाथ हो! आप सब जानते हो ! फिर भी अनजान बनने का कारण समझ नही आया प्रभु? प्रभु इस रोग{ब्लोगेरिया}के दो प्रमुख जन्मदाता (शास्त्रीजी ताऊजी) कर्नाटका गये है इलाज का शोध करने, पहले अपने उपर शोध करेगे, इलाज फिट बैठ गया तो आम जनता के लिये खोल दिया जायेगा। चोपड़ा साहब भी कोशिस कर रहे है। आपका यहॉ आना ही हमारे लिये गोरव कि बात है।
Mired Mirage ने कहा "मुझमें अभी भी बहुत से लक्षण नजर नहीं रहे हैं। पूर्णतया रोगग्रस्त होने में समय लगेगा। जब अच्छे से रोग लग जाएगा तो एक पोस्ट लिखकर खबर कर दूँगी। :D वैसे रोगिओं की विशिष्ट सूची में सम्मिलित करने के लिए धन्यवाद।"
हे प्रभु- "आपने समय निकाल कर मुझे सराहा, ईसलिये आप सबका आभार। Mired Mirage- जी के लिये मेरा प्यारा जवाब-:(मै भी मेरी पत्नि से यही कहता रहता हु कि मुझे ब्लोगेरिया नही हुआ, किन्तु वो कहती है " हर बिमार व्यक्ति ऐसी बात करके अपने आपको को झुठी दिलासा देता है। थैन्क गोड! आप ब्लोगेरिया से पिडित नही है।}
-गुरु राजीव ने कहा "हम सबकी पोल खोलने के लिए यानि कि गुरुकुल का नियम तोड़ने के लिए आपको -गुरु की ओर से एक नया ब्लॉग बनाने का दंड दिया जाता है."
हे प्रभु- " राजीवजी, मेरे भगवन! क्या अब घरवाली से पिटवाओगे ? नया ब्लोग बनाने का मतलब मेरी श्रीमतीजी मुझे घर से बैधर कर देगी। क्षमा करे गुरुदेव।
संजय बेंगाणी ने कहा…" इलाज नहीं बताया? प्रेक्षाध्यान करों और बचो :) चिट्ठाकारी में उतरने की बधाई शुभकामनाएं."
हे प्रभु- " बेंगाणीजी! अब तक तो यह लाइलाज है, शायद इस लेख कि आखरी कडी मे स्वास्थता एवम ब्लोगरो के पक्ष कि बात भी जोड पाऊगा। शुक्रिया।
राज भाटिय़ा ने कहा "बहुत खतरनाक बिमारी है, कोई ईलाज हो तो बताना, लेकिन खुद बच के रहना, कही हमे बचाते बचाते खुद ही इस की लपेट मे ना जाना."
हे प्रभु- "सरजी ! मै अपने आपको ब्लोगेरिया से बचा पाये इसका मुझे मलाल जरुर है, पर आप बुजुर्गो कि दि विरासत मे कुछ नेक काम करने कि प्रबल ईच्छा रखता हु आप जुने पुराने ब्लोगेरिया-ब्लोग जन्मदाताओ कि इस विरासत को अच्छे स्वास्थय के रुप मे सजोना चाहता हु आपका सहयोग हुआ तो हम सभी सफल होगे।"
कुश ने कहा "इस बीमारी से तो डॉक्टर लोग भी परेशान है.. इलाज़ कौन करेगा"
हे प्रभु- "भाई, मै तो इस बिमारी का जनक आपको(आपके साथ और भी कुछ महानुभवो) ही मानता हु। ना आप लोगो को शक्कर वाली कॉफी पिलाते ना ही लोग इस महामारी के शिकार कम होते आपके ढेले पर आकर आधा कप कॉफी पिने कि खवाहीस मे हमने भी अपनी ब्लोगिऐ कि दुकान खोल दी, और जकडलिये गये महामारी के जाल मे। अब नैया भी आप ही पार लगा सकतेहै।
ढेले पर कॉफी का प्रोडेक्सन बडाकर एक साथ सभी चिट्ठाकारो को कॉफी पिलाकर मोकला किजिये ताकि लोग काम-धन्धे पर लगे।आपका भी अभिवादन स्वीकार्य हेतु।
seema gupta ने कहा " बीमारी के लक्षण पढ़ कर आज ही पता चला की असली बीमारी क्या है...वैसे ही डॉक्टर के पास समय खराब किया हमने।लेकिन गम नही क्यूंकि हम अकेले नही यहाँ तो इलाज के लिए काफी लम्बी लाइन है .....और इन्तजार है इलाज का....रोचक रहा "
हे प्रभु- "सीमाजी। आपने ब्लोगेरिया होने कि बात स्वीकार की,आपकि इमानदारी पर मै गर्व करता हु। आपकि तरह जिन्होने भी कमेन्ट से इस बात को स्वीकारा वो इमानदार है ब्लोग लिखने वालो के स्वस्थय,परिवार एवम रोजगार को लेकर॥ पर बहुत लोग ईस कतार मे लगने से शर्म महसुस करते है ऐसी बात नही है कि मेरे चिट्ठे मे जिनका नाम लिखा वो ही ब्लोगेरिया से पिडित है वो सभी लोगहै. जो उसके लक्षणो को धारण करते है। यह सम्भव नही था ५००० ब्लोगेरियाओ को आलेख मे सम्मिलित करना इसके लिये क्षमा करे॥
Arvind Mishra ने कहा…" शुक्र है हम तो बचे हैं !'
हे प्रभु- "अरविन्दजी, यार आपको तो लेख कि अतिम कडी के समापान समारोह मे बुलाने वाला हु। सुटकेस तैयार रखे। ( भाग मे)
Vineeta Yashswi ने कहा… "Apne blogriyo ke lakshan bilkul sahi pahchane hai."
Dr.Parveen Chopra ने कहा… "आप ने जो लक्षण लिखे हैं उन के आधार पर तो लगता है कि अपुन को भी यह ब्लोगेरिया लग ही चुका है ठीक है, इस की दवा ढूंढ कर आप को मेल भेजता हूं."
PN Subramanian ने कहा…" सुंदर चित्रण किया है. हम ये जो टीपिया रहे हैं यह भी इस बीमारी के लाक्षण हैं. आभार"
हे प्रभु- "ने कहा-"सुब्रमनियम साहब और विनिताजी चिन्ता नही करे डॉ प्रवीणजी चोपडा साहब ने भरोसा दिलाया है कि इसका इलाज ढुढकर भेजने वाले है
कविता वाचक्नवी ने कहा "वैसे आपने यह वैद्यिकी कहाँ सीखी? कोई औषधि?"
हे प्रभु- "कविताजी!- आपको अन्दर कि बात बता रहा हु यह वैद्यिकी मिने सीखी नही है मेरी श्रीमतीजी ने एक दिन तग आकार कहा "तुम्हे ब्लोगेरिया हो गया है मुझे डाक्टर कि जरुरत है " बस यहॉ से मुझे नया विषय मिला लिखने के लिये।
जितेन्द़ भगत ने कहा "सही डायग्नोसि है जी, यह रोग कमोबेश यहॉं सबको लगी"
हे प्रभु- "भगतजी सहमति के लिये आपका अभिवादन।
रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा… "चलिए हम तो बच गए हैं :)"
हे प्रभु- "रजनाजी! आप खुश मत होईये! दुसरी और तीसरी लिस्ट का ईन्तजार तो करिये। शायद आपका नाम ईस रोग के जन्मदाताओ मे हो ?
mamta ने कहा… "बढ़िया और एकदम मस्त'
हे प्रभु- "ममताजी ! "बढ़िया और एकदम मस्त"- इस तरह लिखना भी ब्लोगेरिया रोग के लक्षण है। कृपया अपने स्वास्थय के प्रती ध्यान दे। शुक्रिया।।
Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा… "वाकई ये ब्लागिंग की बीमारी तो महामारी की तरह फैल रही है."
हे प्रभु- "शर्मासाहब! चिन्ता नही चिन्तन कि जरुरत है। अब तक तो ब्लोग लिखना नशा है पर इसके खराब पहलुओ से भविष्य मे आने वाली दिक्कतो को भी समझना पडेगा।
PD ने कहा-"padhna shuru kiya to ghabra gaya.. kahin ham bhi to iski chapet me nahi hain.. magar hamaraa nam nahi nikla.. jaan me jaan aayi.. :)
हे प्रभु- "PD जी, आप कैसे खुस हो लिये ? PD का मतलब ही होता है "पीडीत डाक्टर" आप भी दुसरी तीसरी लिस्ट का ईन्तजार करे मेरे ब्लोगदादा।
Amit ने कहा… "bahut badhiya.......chaliye hame abhi tak ye rog nahi lagi hai.."
हे प्रभु- "यह गलत फहमी कैसे हो गई अमितजी ? क्या जिसका नाम छपा वो ही ब्लोगेरिया से पिडीत है ?
सीमा सचदेव ने कहा "आपके बताए लक्षणों मे से अभी तीन-चार लक्षण ऐसे है जो अभी तक हमने अपने आप मे नहीं पनपने दिए ( मजबूरी वश ) कीटाणु तो उसके भी मौजूद हैं।
हे प्रभु- "सिमाजी! आपका इस भीड से बचना मुश्किल था। हर कोई लिखना चाहता है, अपनी बात लोगो मै बॉटना चाहता है। ब्लोग लिखना खत लिखने जैसा है। पर जब लोग नाम शोहरत के चक्कर मे, एक दुसरे से आगे निकलने कि लालसा मे इस ब्लोगिग-ब्लोगिग खेल ने अपने आपको परिवारो कि नजर मे रोगि बना दिया। लक्षण जरुरत के मुताबिक भिन्न-भिन्न हो सकते है पर तकलिफदेह है। शायद हम लोग इसके इतने आदि हो गये है कि एक दिन नेट पर नही बैठे तो लगता है शरीर का कोई अग विलुप्त है,ऐसे मे हम सभी इसे रोग तो मानते है पर इमानदारी से कोई यह नही लिखता कि आज से मे सिर्फ सप्ताह मे एक ही दिन यह कार्य करुगा या और कोई प्रतिज्ञा
सिमाजी, इलाज भी स्वय को आवश्यकता अनुशार करना ही पडेगा।
ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя ने कहा "बड़ी गहरी सोच का इस्तेमाल करना पढ़ा होगा आपको...बहुत अच्छी तरह से बताया आपने !!मैं तो आपके लेखन कार्य का पहेले से ही दीवाना रहा हूँ....सच मजा गया!!"
हे प्रभु- "सजयजी! यह हम सभी की वास्तविकता को दर्शाता है। सोच पैदा होती है अपनी आस-पास की घटनाओ से उदारहणतः आप की उम्र है २० वर्ष आप हिन्दुस्थान का दर्द चिट्ठे के मोर्डररेटर है। ईतनी छोटी अवस्था मे आपका ज्यादातर समय ब्लोग को चलाने की सोच मे व्यतीत होता होगा। रास्ते मे चलते च्लते भी आप अपने ब्लोग पर घटीत घटनाओ के बारे मे सोचेगे। एनकेन प्रकार से आपको इस क्षेत्र मे प्रसिध्दि पाने कि ईच्छा को जागृत करती हुई भावना हिलोरे खाती है। कोई भी आवश्यक कार्य हो आप या हम सभी उसे जल्दी से जल्दी निपटा कर कम्पीयूटर-नेट पर पहुचने कि फिराक मे रहते है। यह एक तरह का नशा बन जाता है जो हमारे हमारे भविष्य को चोट पहुचा रहा है। जबकी हमारी हमारे परिवार कि इस समय जरुरत से भिन्न कार्य्र है, यह ब्लोग लिखना। यह अभी तय नही हुआ है कि ब्लोग लिखनेवाले व्यक्ती कोन हो सकता है ? या इस क्षेत्र मे उतरेने मे कोनसी गाईड लाईन को पुरा करता है।
हालही के वर्षो मे ब्लोग कि अवधारणा के मुल उदेश्य ही दर किनारे हो गये है। मेरा मानना है कि डायरी लिखना,ब्लोग उसका आधुनिक रुप है। पुराने समय मे मात्मा गान्धी, जिन्ना, डॉ राजेन्र्द प्रसादजी, नेहरुजी, ईन्दराजी, सहित कई हस्तिया थी जो अपने जीवनचर्या को अपनी डायरी मे लिखते थे। हॉलाकी यह देन भी अग्रेजो द्वारा प्रदत थी। सचार -क्रान्ती, ब्लोग की जन्म का कारण बनी। अमिरो,एवम बडे लोगो के चोचले थे डायरी लिखना।
आन्मा- कथाओ, का लिखने का चलन पुराना है। ब्लोग ऐसी ही एक डायरी है जहॉ आम गरीब व्यक्ती भी अपनी आत्म-कथा लिखकर सन्तुष्टी को प्राप्त करे।
कहना अर्थ है अपने जिवन के खट्टे-मिठ्ठे अनुभवो को अपने स्वय के लिये लिखना। या सजोना अब इसके स्वरुप और मकसद मे भारी बदलाव दिख रहा है।
मेरी यह बात इस लिये पुखता बनती है कि सबसे पहले बुधवार, अप्रैल 23, 2003 09:58 नौ दो ग्यारह नामक एक ब्लोग आलोक जी ने लिखा था पोस्ट का स्वरुप लघु होता था, अपने तक समित होता था।
भुतकाल और वर्तमान काल के चिठ्ठो मे अन्तर के साथ साथ मकसद साफ दिखाई देगा।

आलोक जी ने उसमे क्या लिखा देखे-:
"नमस्ते।
अब तो मुझे चस्का लग चुका है लिखने का। अभी बजे हैं 9:30, देखते हैं अब कितनी देर लगेगी।
कल के लेख में कई जगह की जगह छप गया था, क्योंकि वाली कुञ्जी बी की है और मुझे उसीकी आदत थी।
ब्राउज़र में जब पढ़ते हैं तो ऊपर नीचे वाली पङ्क्तियाँ एक दूसरे से लड़ जाती हैं, ख़ासतौर पर मात्राओं वाली जगह पर। लेकिल नोटपॅड में ऐसा नहीं होता, यहाँ जगह काफ़ी छोड़ी हुई है।
क्योंकि चस्का लगा हुआ है, इसलिये लिख रहा हूँ। पर कितने दिन लगा रहेगा, वह पता नहीं।
कल ही मुझे पता चला कि रीडिफ़ के भी ब्लॉग हैं। लेकिन मुआफ़ करना, एक और ब्लॉग बनाने का माद्दा हममें नहीं है।
अरे इतनी जल्दी 9 2 11 होने का समय गया? 25 मिनट बीत चुके हैं लिखना शुरू किए। फ़िर मिलते हैं। "

शुक्रवार, नवंबर 28, 2003 00:04
समय गया है कि ब्लॉग्स्पॉट को अलविदा कही जाए, वैसे कोई शिकायत तो नहीं है यहाँ, तो मिलते हें इस
नए पते पर।आलोक दà¥�वारा पà¥�रकाशित।
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सोमवार, नवंबर 24, 2003 11:02
ताज़ी ख़बर यह है कि विण्डोज़ का हिन्दी इण्टर्फ़ेस पॅक गया है, बल्कि 11 नवम्बर से आया पड़ा है। पर इसके लिए ऍक्स पी का सर्विस पॅक 1 चाहिए, या फिर होम ऍक्स पी चाहिए। तो कहीं से जुगाड़ा जाए।आलोक दà¥�वारा पà¥�रकाशित।
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नोट-: (आपसे बात चित करने मे या जानकारीयो त्रृटी हुई हो तो मै सविनय क्षमा चाहुगा। चित्र एवम अन्य सुचना आपके चिट्ठो से एवम अन्य माध्यम से आपकि बिनासहमती से लिये गये है। मेरे उदेश्य को आप दृष्टी दे। और आपके सहयोग का आभार। यह पोस्ट लम्बी है सहन करने के लिये आभार क्षमा भी कर देना।)