जैन:प्राचीन इतिहास-4

Posted: 09 जनवरी 2010
गतांक से आगे........

ऋग्वेद की वातरशना मुनियों के संबंध की ऋचाओं में उन मुनियों की साधनायें ध्यान देने योग्य हैं। एक सूक्त की कुछ ऋचायें देखिये-
मुनयो वातरशनाः पिशंगा वसते मला।
वातस्यानु ध्राजिं यन्ति यद्देवासो अविक्षत ।।
उन्मदिता मौनेयेन वाताँ आतस्थिमा वयम्।
शरीरेदस्माकं यूयं मर्तासो अभि पश्यथ ।।
(ऋग्वेद १०, १३६, २-३)
विद्वानों के नाना प्रयत्न होने पर भी अभी तक वेदों का निस्सन्देह रूप से अर्थ बैठाना संभव नहीं हो सका है। तथापि सायण भाष्य की सहायता से मैं उक्त ऋचाओं का अर्थ इसप्रकार करता हूं :- अतीन्द्रियार्थदर्शी वातरशना मुनि मल धारण करते हैं, जिससे वे पिंगल वर्ण दिखाई देते हैं। जब वे वायु की गति को प्राणोपासना द्वारा धारण कर लेते हैं, अर्थात् रोक लेते हैं, तब वे अपनी तप की महिमा से दीप्यमान होकर देवता स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं। सर्व लौकिक व्यवहार को छोड़कर हम मौनवृत्ति से उन्मत्तवत् (उत्कृष्ट आनन्द सहित) वायु भाव को (अशरीरी ध्यानवृत्ति) को प्राप्त होते हैं, और तुम साधारण मनुष्य हमारे बाह्य शरीर मात्र को देख पाते हो, हमारे सच्चे आभ्यंतर स्वरूप को नहीं (ऐसा वे वातरशना मुनि प्रकट करते हैं)।


ऋग्वेद में उक्त ऋचाओं के साथ `केशी' की स्तुति की गई है-
केश्यग्निं केशी विषं केशी बिभर्ति रोदसी।
केशी विश्वं स्वर्दृशे केशीदं ज्योतिरूच्यते ।।
(ऋग्वेद १०, १३६, १)
केशी, अग्नि, जल तथा स्वर्ग और पृथ्वी को धारण करता है। केशी समस्त विश्व के तत्त्वों का दर्शन कराता है। केशी ही प्रकाशमान (ज्ञान-) ज्योति (केवलज्ञानी) कहलाता है।
केशी की यह स्तुति उक्त वातरशना मुनियों के वर्णन आदि में की गई है, जिससे प्रतीत होता है कि केशी वातरशना मुनियों के वर्णन के प्रधान थे।


ऋग्वेद के इन केशी व वातरशना मुनियों की साधनाओं का भागवत पुराण में उल्लिखित वातरशना श्रमण ऋषि, उनके अधिनायक ऋषभ और उनकी साधनाओं की तुलना करने योग्य है। ऋग्वेद के वातरशना मुनि और भागवत के `वातरशना श्रमण ऋषि' एक ही सम्प्रदाय के वाचक हैं, इसमें तो किसी को किसी प्रकार के सन्देह होने का अवकाश नहीं दिखाई देता। केशी का अर्थ केशधारी होता है, जिसका अर्थ सायणाचार्य ने `केश स्थानीय रश्मियों को धारण करनेवाले' किया है, और उससे सूर्य का अर्थ निकाला है। किन्तु उसकी कोई सार्थकता व संगति वातरशना मुनियों के साथ नहीं बैठती, जिनकी साधनाओं का उस सूक्त में वर्णन है। केशी स्पष्टतः वातरशना मुनियों के अधिनायक ही हो सकते हैं, जिनकी साधना में मलधारण, मौन वृत्ति और उन्माद भाव का विशेष उल्लेख है। सूक्त में आगे उन्हें ही `मुनिर्देवस्य देवस्य सौकृत्याय सखा हितः' (ऋ. १०, १३६, ४) अर्थात् देव देवों के मुनि व उपकारी और हितकारी सखा कहा है। वातरशना शब्द में और मल रूपी वसन धारण करने में उनकी नाग्न्य वृत्ति का भी संकेत है। इसकी भागवत पुराण में ऋषभ के वर्णन से तुलना कीजिये।


"उर्वरित-शरीरमात्र-परिग्रह उन्मत्त इव गगन-परिधानः प्रकीर्णकेशः आत्मन्यारोपिताहवनीयो ब्रह्मावर्तांत् प्रवव्राज। जडान्ध-मूक-बधिर पिशाचोन्मादकवद् अवधूतवेषो अभिभाष्यमाणीऽपि जनानां गृहीतमौनवृतः तूष्णीं बभूव। ........परागवलम्बमानकुटिल-जटिल-कपिश-केशभूरि-भारः अवधूत-मलिन-निजशरीरेण ग्रहगृहीत इवादृश्यत।
(भा. पु. ५, ६, २८-३१)
अर्थात् ऋषभ भगवान के शरीर मात्र परिग्रह बच रहा था। वे उन्मत्त के समान दिगम्बर वेशधारी, बिखरे हुए केशों सहित आहवनीय अग्नि को अपने में धारण करके ब्रह्मावर्त देश से प्रब्रजीत हुए। वे जड़, अन्ध, मूक, बधिर, पिशाचोन्माद युक्त जैसे अवधूत वेष में लोगों के बुलाने पर भी मौन वृत्ति धारण किए हुए चुप रहते थे।..... सब ओर लटकते हुए अपने कुटिल, जटिल,
कपिश केशों के भार सहित अवधूत और मलिन शरीर सहित वे ऐसे दिखाई देते थे, जैसे मानों उन्हें भूत लगा हो।


यथार्थतः यदि ऋग्वेद के उक्त केशी संबंधी सूक्त को, तथा भागवतपुराण में वर्णित ऋषभदेव के चरित्र को सन्मुख रखकर पढ़ा जाय, तो पुराण में वेद के सूक्त का विस्तृत भाष्य किया गया सा प्रतीत होता है। वही वातरशना या गगनपरिधान वृत्ति, केश-धारण, कपिश वर्ण, मलधारण, मौन, और उन्माद-भाव समान रूप से दोनों में वर्णित हैं। ऋषभ भगवान् के कुटिल केशों की परम्परा जैन मूर्ति कला में प्राचीनतम काल से आज तक अक्षुण्ण पाई जाती है। यथार्थतः समस्त तीर्थंकरों में केवल ऋषभ की ही मूर्त्तियों के सिर पर कुटिल केशों का रूप दिखलाया जाता है, और वही उनका प्राचीन विशेष लक्षण भी माना जाता है। इस संबंध में मुझे केसरिया नाथ का स्मरण आता है, जो ऋषभनाथ का ही नामान्तर है। केसर, केश और जटा एक ही अर्थ के वाचक हैं `सटा जटा केसरयोः'। सिंह भी अपने केशों के कारण केसरी कहलाता है। इस प्रकार केशी और केसरी एक ही केसरियानाथ या ऋषभनाथ के वाचक प्रतीत होते हैं। केशरियानाथ पर जो केशर चढ़ाने की विशेष मान्यता प्रचलित है, वह नामसाम्य के कारण उत्पन्न हुई प्रतीत होती है। जैन पुराणों में भी ऋषभ की जटाओं का सदैव उल्लेख किया गया है। पद्मपुराण (३,२८८) में वर्णन है, `वातोद्धता जटास्तस्य रेजुराकुलमूर्तयः' और हरिवंशपुराण (९, २०४) में उन्हें कहा है-`स प्रलम्बजटाभारभ्राजिष्णुः'। इस प्रकार ऋग्वेद के केशी और वातरशना मुनि, तथा भागवत पुराण के ऋषभ और वातरशना श्रमण ऋषि एवं केसरिया नाथ ऋषभ तीर्थंकर और उनका निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय एक ही सिद्ध होते हैं।
क्रमश ....5.
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इसके मूल लेखक है...........
डॉ. हीरालाल जैन, एम.ए.,डी.लिट्.,एल.एल.बी.,
अध्यक्ष-संस्कृत, पालि, प्राकृत विभाग, जबलपुर विश्वविद्यालय;
म. प्र. शासन साहित्य परिषद् व्याख्यानमाला १९६०
भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान

4 comments:

  1. डॉ. मनोज मिश्र 10 जनवरी, 2010

    संग्रहणीय प्रयास,धन्यवाद.

  2. राज भाटिय़ा 10 जनवरी, 2010

    बहुत सुंदर ग्याण की बात बताई आप ने.
    धन्यवाद

  3. ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey 10 जनवरी, 2010

    जैन धर्म के ऋग्वैदिक सन्दर्भ! बन्धुवर मैं तो तन्द्रा से जगा मानो।

  4. ताऊ रामपुरिया 10 जनवरी, 2010

    आपसे इस संदर्भ मे फ़ो पर वार्तालाप हुआ था. और इससे यही सिद्ध होता है कि प्रथम तीर्थंकर एक ही थे. कालांतर मे कौन किससे किस रुप मे अलग हो गया यह एक अलग शोध का विषय हो सकता है. आपने बहुत ही सुंदर विषय पर रोचक तरीके से लिखा है. आभार.

    रामराम.

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