जैन साहित्य इतिहास -25

Posted: 05 मई 2010


३-स्थानांग (ठाणांग) -
यह श्रुतांग दस अध्ययनों में विभाजित है, और उसमें सूत्रों की संख्या एक हजार से ऊपर है। इसकी रचना पूर्वोक्त दो श्रुतांगों से भिन्न प्रकार की है। यहां प्रत्येक अध्ययन में जैन सिद्धान्तानुसार वस्तु-संख्या गिनाई गई है; जैसे प्रथम अध्ययन में कहा गया है-एक दर्शन, एक चरित्र, एक समय, एक प्रदेश, एक परमाणु, एक सिद्ध आदि। उसी प्रकार दूसरे अध्ययन में बतलाया गया है कि क्रियाएं दो हैं, जीव-क्रिया और अजीव-क्रिया। जीव-क्रिया पुनः दो प्रकार की है, सम्यक्त्व-क्रिया और मिथ्यात्व क्रिया। उसी प्रकार अजीव क्रिया भी दो प्रकार की है, इर्यापथिक और साम्परायिक, इत्यादि। इसी प्रकार दसवें अध्ययनमें इसी क्रम से वस्तुभेद दस तक गये हैं। इस दृष्टिसे यह श्रुतांग पालि बौद्धग्रन्थ अंगुत्तर निकाय से तुलनीय है। यहाँ नाना प्रकार के वस्तु-निर्देश अपनी अपनी दृष्टि से बड़े महत्त्वपूर्ण हैं। यथास्थान ऋग्, यजुः, और साम, ये तीन वेद बतलाये गये हैं, धर्म, अर्थ और काम ये तीन प्रकार की कथाएं बतलाई गई हैं। वृक्ष भी तीन प्रकार के हैं, पत्रोपेत, पुष्पोपेत और फलोपेत। पुरुष भी नाना दृष्टियोंसे तीन-तीन प्रकार के हैं-जैसे नाम पुरुष, द्रव्यपुरुष और भावपुरुष; अथवा ज्ञानपुरुष, दर्शनपुरुष और चरित्रपुरुष; अथवा उत्तम पुरुष, मध्यमपुरुष, और जघन्यपुरुष। उत्तमपुरुष भी तीन प्रकार के हैं-धर्मपुरुष, भोगपुरुष और कर्मपुरुष। अर्हन्त धर्मपुरुष हैं, चक्रवर्ती भोगपुरुष हैं, और वासुदेव कर्मपुरुष। धर्म भी तीन प्रकार का कहा गया है-श्रुतधर्म, चरित्रधर्म और अस्तिकाय धर्म। चार प्रकार की अन्त-क्रियाएं बतलाई गई हैं, और उनके दृष्टान्त-स्वरूप भरत चक्रवर्ती, गजसुकुमार, सनत्कुमार व मरुदेवी के नाम बतलाये गये हैं। प्रथम और अन्तिम तीर्थंकरों को छोड़ बीच के २२ तीर्थंकर चातुर्याम धर्मके प्रज्ञापक कहे गये हैं। आजीविकों का चार प्रकार का तप कहा गया है-उग्रतप, घोरतप, रसनिर्यूयणता और जिह्वेन्द्रिय प्रतिसंलीनता। शूरवीर चार प्रकार के बतलाये गये हैं-क्षमासूर, तपसूर, दानशूर और युद्धशूर। आचार्य वृक्षों के समान चार प्रकार के बतलाये गये हैं, और उनके लक्षण भी चार गाथाओं द्वारा प्रगट किये गये हैं। कोई आचार्य और उसका शिष्य-परिवार दोनों शालवृक्षके समान महान् और सुन्दर होते हैं कोई आचार्य तो शाल वृक्षके समान होते हैं, किन्तु उनका शिष्य-समुदाय एरंड के समान होता हैं। किसी आचार्य का शिष्य-समुदाय तो शालवृक्ष के समान महान् होता है, किन्तु स्वयं आचार्य एरंड के समान खोखला; और कहीं आचार्य और उनका शिष्य-समुदाय दोनों एरंड के समान खोखले होते हैं। सप्तस्वरों के प्रसंग से प्रायः गीतिशास्त्र का पूर्ण निरूपण आ गया है। यहां भणिति-बोली दो प्रकार की कही गई है-संस्कृत और प्राकृत। महावीर के तीर्थ में हुए बहुरत आदि सात निन्हवों और जामालि आदि उनके संस्थापक आचार्यों एवं उनके उत्पत्ति-स्थान श्रावस्ती आदि नगरियों का उल्लेख भी आया है। महावीर के तीर्थ में जिन नौ पुरुषों ने तीर्थंकर गोत्र का बंध किया उनके नाम इस प्रकार हैं-श्रेणिक, सुपार्श्व, उदायी, प्रोष्ठिल, दृढ़ायु, शंख, सजग या शतक (सयय), सुलसा और रेवती। इस प्रकार इस श्रुतांग में नाना प्रकार का विषय-वर्णन प्राप्त होता है जो अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

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क्रमश------२६
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डॉ. हीरालाल जैन

1 comments:

  1. Udan Tashtari 05 मई, 2010

    आभार जानकारी के लिए.

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