जैन:प्राचीन इतिहास-16

Posted: 07 फ़रवरी 2010
गातांक से आगे....
पूर्व व उत्तर भारत में धार्मिक प्रसार का इतिहास -
महावीर ने स्वयं विहार करके तो अपना उपदेश विशेष रूप से मगध, विदेह अंग, बंग, आदि पूर्व के देशों, तथा पश्चिम की ओर कोशल व काशी प्रदेश में ही फैलाया था, एवं तत्कालीन मगधराज श्रेणिक बिंबसार व उनके पुत्र कुणिक अजातशत्रु को अपना अनुयायी बनाया था। इसका भी प्रमाण मिलता है कि नंदराजा भी जैन धर्मानुयायी थे।

इ. पू. १५० के लगभग के खारवेल के शिलालेख में स्पष्ट उल्लेख है कि जिस जैन प्रतिमा को नंदराज कलिंग से मगध में ले गए थे, उसे खारबेल पुनः अपने देश में वापस लाए। यह लेख अरहंतों और सिद्धों को नमस्कार से प्रारम्भ होता है, और फिर उसमें खारवेल के कुमारकाल के शिक्षण के पश्चात् राज्याभिषिक्त होकर उनके द्वारा नाना-प्रदेशों की विजय तथा स्वदेश में विविध लोकोपकारी कार्यों का विवरण पाया जाता है। कलिंग (उड़ीसा) में जैनधर्म बिहार से ही गया है, इसमें तो सन्देह ही नहीं; और बिहार का जैनधर्म से संबंध इतिहासातीत काल से रहा है। भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार बिहार से उड़ीसा जाने का मार्ग मानभूम और सिंहभूम जिलों में से था। मानभूम के ब्राह्मणों में एक वर्ग अब भी ऐसा विद्यमान है जो अपने को `पच्छिम ब्राह्मण' कहते हैं, और वे वर्धमान महावीर के वंशज रूप से वर्णन किये जाते हैं। वे यह भी कहते हैं कि वे उस प्राचीनतम आर्यवंश की शाखा के हैं जिसने अति प्राचीन काल में इस भूमि पर पैर रखा।
आदितम श्रमण-परम्परा आर्यों की ही थी, किन्तु ये आर्य वैदिक आर्यों के पूर्व भारत की ओर बढ़ने से पहले ही मगधविदेह में रहते थे, इसमें अब कोई सन्देह रहा नहीं प्रतीत होता। इस दृष्टि से उक्त `पच्छिम ब्राह्मणों' की बात बड़े ऐतिहासिक महत्व की जान पड़ती है। यों तो समस्त मगध प्रदेश में जैन पुरातत्त्व के प्रतीक बिखरे हुए हैं, जिनमें पटना जिले के राजगिर और पावा, तथा हजारीबाग जिले का पार्श्वनाथ पर्वत सुप्रसिद्ध ही हैं। किन्तु इन स्थानों में वर्तमान में जो अधिकांश मूर्तियां आदि पाई जाती हैं, उनकी अपेक्षा मानभूम और सिंहभूम जिलों के नाना स्थानों में बिखरे हुए जैन मन्दिर व मूर्तियाँ अधिक प्राचीन सिद्ध होते हैं। इनमें से अनेक आजकल हिन्दुओं द्वारा अपने धर्मायतन मान कर पूजे जाते हैं। कहीं जैन मूर्तियाँ भैरोंनाथ के नाम से पुजती हैं और कहीं वे पांडवों की मूर्तियाँ मानी जा रहीं हैं। यत्र तत्र से एकत्र कर जो अनेक जैन मूर्तियाँ पटना के संग्रहालय में सुरक्षित हैं, वे ग्यारहवीं शताब्दि से पूर्व की प्रमाणित होती हैं। (देखिये राय चौधरी कृत जैनिजिम इन बिहार)।

चीनी यात्री हुएनत्सांग (सातवीं शताब्दी) ने अपने वैशाली के वर्णन में वहाँ निर्ग्रन्थों की बड़ी संख्या का उल्लेख किया है। उसने सामान्यतः यह भी कहा है कि दिगम्बर और श्वेताम्बर सम्प्रदायों के जैन मुनि पश्चिम में तक्षशिला और गृद्धकूट तक फैले हुए थे, तथा पूर्व में दिगम्बर निर्ग्रन्थ पुण्ड्रवर्धन और समतट तक भारी संख्या में पाये जाते थे। चीनी यात्री के इन उल्लेखों से सातवीं शती में समस्त उत्तर में जैन धर्म के सुप्रचार का अच्छा पता चलता है।

मथुरा के कंकाली टीले की खुदाई से एक अति प्राचीन स्तूप और एक दो जैन मंदिरों के ध्वंसावशेष मिले हैं। यहाँ पाई गई पुरातत्त्वसामग्री पर से ज्ञात होता है कि ई. पूर्व की कुछ शताब्दियों से लेकर, लगभग दसवीं शताब्दी तक वहाँ जैनधर्म का एक महान् केन्द्र रहा है। मूर्त्तियों के सिंहासनों, आयाग-पट्टों आदि पर जो लेख मिले हैं, उनमें से कुछ में कुषाण राजाओं, जैसे कनिष्क, हुविष्क, वासुदेव आदि नामों और उनके राज्यकाल के अंकों का स्पष्ट उल्लेख पाया गया है, जिससे वे ई. सन् के प्रारम्भिक काल के सिद्ध होते हैं। प्राचीन जैन ग्रन्थों में इस स्तूप का उल्लेख मिलता है, और कहा गया है कि यह स्तूप सुपार्श्वनाथ की स्मृति में निर्माण कराया गया था, तथा पार्श्वनाथ के काल में इसका उद्धार कराया गया था। उसे देव निर्मित भी कहा गया है। आश्चर्य नहीं जो वह प्राचीन स्तूप महावीर से भी पूर्वकालीन रहा हो। हरिषेण कथाकोश के `बैरकुमार कथानक' (श्लोक १३२) में मथुरा के पाँच स्तूपों का उल्लेख आया है। यहाँ से ही संभवतः जैन मुनियों के पंचस्तूपान्वय का प्रारंभ हुआ। इस अन्वय का एक उल्लेख गुप्त संवत् १५९ (सन् ४७८) का पहाड़पुर (बंगाल) के ताम्रपट से मिला है जिसके अनुसार उस समय वट गोहाली में एक जैन विहार था, जिसमें अरहंतों की पूजा के लिये निर्ग्रन्थ आचार्य को एक दान दिया गया। ये आचार्य बनारस की पंचस्तूप निकाय के आचार्य गुहनन्दि के शिष्य कहे गये हैं।


धवला टीका के रचयिता वीरसेन और जिनसेन (८-९ वीं शती) भी इसी शाखा के थे। इसी अन्वय का उल्लेख जिनसेन के शिष्य गुणभद्र ने उत्तरपुराण में सेनान्वय के नाम से किया है। तब से इस अन्वय की सेनगण के नाम से ही प्रसिद्धि लगातार आज तक अविच्छिन्न रूप से उसकी अनेक शाखाओं व उपशाखाओं के रूप में पाई जाती है। मथुरा के स्तूपों की परम्परा मुगल सम्राट् अकबर के काल तक पाई जाती है, क्योंकि उस समय के जैन पंडित राजमल्ल ने अपने जम्बूस्वामी-चरित में लिखा है कि मथुरा में ५१५ जीर्ण स्तूप थे जिनका उद्धार टोडर सेठ ने अपरिमित व्यय से कराया था। ई. पू. प्रथम शताब्दी में जैन मुनिसंघ के उज्जैनी में अस्तित्व का प्रमाण कालकाचार्य कथानक में मिलता है। इस कथानक के अनुसार उज्जैन के राजा गर्दभिल्ल ने अपनी कामुक प्रवृत्ति से एक जैन अर्जिका के साथ अत्याचार किया, जिसके प्रतिशोध के लिए कालकसूरि ने शाही राजाओं से संबंध स्थापित किया। इन्होंने गर्दभिल्ल को युद्ध में परास्त कर, उज्जैन में शक राज्य स्थापित किया। इसी वंश का विनाश पीछे विक्रमादित्य ने किया। इस प्रकार यह घटना-चक्र विक्रम संवत् से कुछ पूर्व का सिद्ध होता है। उससे यह भी पता चलता है कि प्रसंगवश अतिशान्त-स्वभावी और सहनशील जैन-मुनियों का भी कभी-कभी राजशक्तियों से संघर्ष उपस्थित हो जाया करता था।

मथुरा से प्राप्त एक लेख में उल्लेख मिलता है कि गुप्त संवत् ११३ (ई. सन् ४३२) में श्री कुमारगुप्त के राज्यकाल में विधाधरी शाखा के दंतिलाचार्य की आज्ञा से श्यामाढ्य ने एक प्रतिमा प्रतिष्ठापित कराई। कुमारगुप्त के काल (सन् ४२६) का एक और लेख उदयगिरि (विदिशा-मालवा) से मिला है, जिसमें वहाँ पार्श्वनाथ की प्रतिष्ठा का उल्लेख है। गुप्तकाल के सं. १४१ (ई. सन् ४६०) में स्कंदगुप्त राजा के उल्लेख सहित जो शिलालेख कहायूं (संस्कृत ककुभः) से प्राप्त हुआ है उसमें उल्लेख है कि पांच अरहंतों की स्थापना मन्द्र नामके धर्म पुरुष ने कराई थी और शैल-स्तम्भ खड़ा किया था।
क्रमश .....17
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इसके मूल लेखक है...........
डॉ. हीरालाल जैन, एम.ए.,डी.लिट्.,एल.एल.बी.,
अध्यक्ष-संस्कृत, पालि, प्राकृत विभाग, जबलपुर विश्वविद्यालय;
म. प्र. शासन साहित्य परिषद् व्याख्यानमाला १९६०
भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान

2 comments:

  1. AlbelaKhatri.com 09 फ़रवरी, 2010

    jai ho !

    bahut khoob !

  2. Udan Tashtari 09 फ़रवरी, 2010

    बहुत आभार जानकारी देने का.

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