जैन:प्राचीन इतिहास-14

Posted: 06 फ़रवरी 2010
गातांक से आगे....

सात निन्हव व दिगम्बर-श्वेताम्बर सम्प्रदाय -

ऊपर जिन गणों कुलों व शाखाओं का उल्लेख हुआ है, उनमें कोई विशेष सिद्धान्त-भेद नहीं पाया जाता। सिद्धान्त-भेद की अपेक्षा से हुए सात निन्हवों का उल्लेख पाया जाता है।

पहला निन्हव महावीर के जीवन काल में ही उनकी ज्ञानोत्पत्ति के चौदह वर्ष पश्चात् उनके एक शिष्य जमालि द्वारा श्रावस्ती में उत्पन्न हुआ। इस निन्हव का नाम बहुरत कहा गया, क्योंकि यहां मूल सिद्धान्त यह था कि कोई वस्तु एक समय की क्रिया से उत्पन्न नहीं होती, अनेक समयों में उत्पन्न होती है।

दूसरा निन्हव इसके दो वर्ष पश्चात् तिष्यगुप्त द्वारा ऋषभपुर में उत्पन्न हुआ कहा गया है। इसके अनुयायी जीवप्रदेशक कहलाए, क्योंकि वे जीव के अंतिम प्रदेश को ही जीव की संज्ञा प्रदान करते थे।

अव्यक्त नामक तीसरा निन्हव, निर्वाण से २१४ वर्ष पश्चात् आषाढ़-आचार्य द्वारा श्वेतविका नगरी में स्थापित हुआ। इस मत में वस्तु का स्वरूप अव्यक्त अर्थात् अस्पष्ट व अज्ञेय माना गया है।

चौथा समुच्छेद नामक निन्हव, निर्वाण से २२० वर्ष पश्चात् अश्वमित्र-आचार्य द्वारा मिथिला नगरी में उत्पन्न हुआ। इसके अनुसार प्रत्येक कार्य अपने उत्पन्न होने के अनन्तर समय में समस्त रूप से व्युच्छिन्न हो जाता है, अर्थात् प्रत्येक उत्पादित वस्तु क्षणस्थायी है। यह मत बौद्ध दर्शन के क्षणिकत्ववाद से मेल खाता प्रतीत होता है।

पांचवां निन्हव निर्वाण के २२८ वर्ष पश्चात् गंग-आचार्य द्वारा उल्लुकातीर पर उत्पन्न हुआ। इसका नाम द्विक्रिया कहा गया है। इस मत का मर्म यह प्रतीत होता है कि एक समय में केवल एक ही नहीं, दो क्रियाओं का अनुभवन संभव है।

छठवां त्रैराशिक नामक निन्हव, छल्लुक मुनिद्वारा पुरमंतरंजिका नगरी में उत्पन्न हुआ। इस मत के अनुयायी वस्तु-विभाग तीन राशियों में करते थे; जैसे जीव, अजीव, और जीवाजीव।

सातवां निन्हव अबद्ध कहलाता है, जिसकी स्थापना वी. निर्वाण से ५८४ वर्ष पश्चात् गोष्ठा माहिल द्वारा दशपुर में हुई। इस मत का मर्म यह प्रतीत होता है कि कर्म का जीव से स्पर्श मात्र होता है, बंधन नहीं होता। इन सात निन्हवों के अनन्तर, वीर निर्वाण के ६०९ वर्ष पश्चात्, बोटिक निन्हव अर्थात् दिगम्बर संघ की उत्पत्ति कही गई है (स्था ७, वि. आवश्यक व तपा. पट्टा.)।

दिगम्बर परम्परा में उपर्युक्त सात निन्हवों का तो कोई उल्लेख नहीं पाया जाता, किन्तु वि. सं. के १३६ वर्ष उपरान्त श्वेताम्बर संघ की उत्पत्ति होने का स्पष्ट उल्लेख (दर्शनसार गा. ११) पाया जाता है। इस प्रकार श्वेताम्बर परम्परा में दिगम्बर सम्प्रदाय की उत्पत्ति के काल में, व दिगम्बर परम्परा में श्वेताम्बर संप्रदाय के उत्पत्तिकाल-निर्देश में केवल ३ वर्षों का अन्तर पाया जाता है। इन उल्लेखों पर से यह अनुमान करना अनुचित न होगा कि महावीर के संघ में दिगम्बर-श्वेताम्बर संप्रदायों का स्पष्ट रूप से भेद निर्वाण से ६०० वर्ष पश्चात् हुआ।
क्रमश .....15
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इसके मूल लेखक है...........
डॉ. हीरालाल जैन, एम.ए.,डी.लिट्.,एल.एल.बी.,
अध्यक्ष-संस्कृत, पालि, प्राकृत विभाग, जबलपुर विश्वविद्यालय;
म. प्र. शासन साहित्य परिषद् व्याख्यानमाला १९६०
भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान

2 comments:

  1. ताऊ रामपुरिया 06 फ़रवरी, 2010

    बहुत सुंदर श्रंखला है, शुभकामनाएं.

    रामराम.

  2. ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey 07 फ़रवरी, 2010

    जानकारी के लिये धन्यवाद।

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