जैन:प्राचीन इतिहास-13

Posted: 03 फ़रवरी 2010
गतांक से आगे.....
प्राचीन ऐतिहासिक कालगणना -


कल्पसूत्र स्थविराबली में उक्त आचार्य परम्परा के संबंध में काल का निर्देश नहीं पाया जाता। किन्तु धर्मघोषसूरि कृत दुषमकाल-श्रमणसंघ-स्तव नामक प्राकृत पट्टावली की अवचूरि में कुछ महत्त्वपूर्ण कालसंबंधी निर्देश पाये जाते हैं। यहां कहा गया है कि जिस रात्रि भगवान् महावीर का निर्वाण हुआ, उसी रात्रि को उज्जैनी में चंडप्रद्योत नरेश की मृत्यु व पालक राजा का अभिषेक हुआ। इस पालक राजा ने उदायी के निःसंतान मरने पर कुणिक के राज्य पर पाटलिपुत्र में अधिकार कर लिया और ६० वर्ष तक राज्य किया। इसी काल में गौतम ने १२, सुधर्म ने ८, और जंबू ने ४४ वर्ष तक युगप्रधान रूप से संघ का नायकत्व किया।


पालक के राज्य के साठ वर्ष व्यतीत होने पर पाटलिपुत्र में नव नन्दों ने १५५ वर्ष राज्य किया और इसी काल में जैन संघ का नायकत्व प्रभव ने ११ वर्ष, स्वयंभू ने २३, यशोभद्र ने ५०, संभूतिविजय ने ८, भद्रबाहु ने १४ और स्थूलभद्र ने ४५ वर्ष तक किया। इस प्रकार यहां तक वीर निर्वाण के २१५ वर्ष व्यतीत हुए। इसके पश्चात् मौर्य वंश का राज्य १०८ वर्ष रहा, जिसके भीतर महागिरि ने ३० वर्ष, सुहस्ति ने ४६ और गुणसुंदर ने ३२ वर्ष जैन संघ का नायकत्व किया। 


मौर्यों के पश्चात् राजा पुष्यमित्र ने ३० वर्ष तथा बलमित्र और भानुमित्र ने ६० वर्ष राज्य किया। इस बीच गुणसुंदर ने अपनी आयु के शेष १२ वर्ष, कालिक ने ४० वर्ष और स्कंदिल ने ३८ वर्ष जैन संघ का नायकत्व किया। इस प्रकार महावीर निर्वाण से ४१३ वर्ष व्यतीत हुए। भानुमित्र के पश्चात् राजा नरवाहन ने ४०, गर्दभिल्ल ने १३ और शक ने ४ वर्ष पर्यन्त राज्य किया और इसी बीच रेवतीमित्र द्वारा ३६ वर्ष तथा आर्य-मंगु द्वारा २० वर्ष जैन संघ का नायकत्व चला। 


इस प्रकार महावीर निर्वाण से लेकर ४७० वर्ष समाप्त हुए। गर्दभिल्ल के राज्य की समाप्ति कालकाचार्य द्वारा कराई गई और उसके पुत्र विक्रमादित्य ने राज्यारूढ़ होकर, ६० वर्ष तक राज्य किया। इसी बीच जैन संघ में बहुल, श्रीव्रत, स्वाति, हारि, श्यामार्य एवं शाण्डिल्य आदि हुए, प्रत्येकबुद्ध एवं स्वयंबुद्ध परम्परा का विच्छेद हुआ, बुद्धबोधितों की अल्पता, तथा भद्रगुप्त, श्रीगुप्त और वज्रस्वामी, ये आचार्य हुए। विक्रमादित्य के पश्चात् धर्मादित्य ने ४० और माइल्ल ने ११ वर्ष राज्य किया, और इस प्रकार वीर निर्वाण के ५८१ वर्ष व्यतीत हुए। तत्पश्चात् दुर्वलिका पुष्पमित्र के २० वर्ष तथा राजा नाहड के ४ (?) वर्ष समाप्त होने पर वीर निर्वाण से ६०५ वर्ष पश्चात् शक संवत् प्रारम्भ हुआ। 


वीर निर्वाण के ९९३ वर्ष व्यतीत होने पर कालकसूरि ने पर्यूषणचतुर्थी की स्थापना की, तथा निर्वाण के ९८० वर्ष समाप्त होने पर आर्यमहागिरि की संतान में उत्पन्न श्री देवर्द्धिगणि क्षमाश्रमण ने कल्पसूत्र की रचना की, एवं इसी वर्ष आनंदपुर में ध्रुवसेन राजा के पुत्र-मरण से शोकार्त होने पर, उनके समाधान हेतु कल्पसूत्र सभा के समक्ष कल्पसूत्र की वाचना हुई। यह बहुश्रुतों की परम्परा से ज्ञात हुआ। इतनी वार्ता के पश्चात् यह `दुषमकाल श्रमणसंघस्तव की अबचूरि' इस समाचार के साथ समाप्त होती है कि वीर निर्वाण के १३०० वर्ष समाप्त होने पर विद्वानों के शिरोमणि श्री बप्पभट्टि सूरि हुए
क्रमश .....14
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इसके मूल लेखक है...........
डॉ. हीरालाल जैन, एम.ए.,डी.लिट्.,एल.एल.बी.,
अध्यक्ष-संस्कृत, पालि, प्राकृत विभाग, जबलपुर विश्वविद्यालय;
म. प्र. शासन साहित्य परिषद् व्याख्यानमाला १९६०
भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान

2 comments:

  1. Udan Tashtari 03 फ़रवरी, 2010

    आभार जानकारी का.

  2. ताऊ रामपुरिया 03 फ़रवरी, 2010

    बहुत बढिया जानकारी.

    रामराम.

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