जैन:प्राचीन इतिहास-8

Posted: 17 जनवरी 2010
गातांक से आगे....

तीर्थंकर पार्श्वनाथ -
तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म बनारस के राजा अश्वसेन और उनकी रानी वर्मला (वामा) देवी से हुआ था। उन्होंने तीस वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर सम्मेदशिखर पर्वत पर तपस्या की। यह पर्वत आजतक भी पारसनाथ पर्वत नाम से सुविख्यात है। उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त कर सत्तर वर्ष तक श्रमण धर्म का उपदेश और प्रचार किया। जैन पुराणानुसार उनका निर्वाण भगवान महावीर के निर्वाण से २५० वर्ष पूर्व और तदनुसार ई. पूर्व ५२७+२५०=७७७ वर्ष में हुआ था। पार्श्वनाथ का श्रमण-परम्परा पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा जिसके परिणामस्वरूप आज तक भी जैन समाज प्रायः पारसनाथ के अनुयाइओं की मानी जाती है। 


ऋषभनाथ की सर्वस्व-त्याग रूप आकिञ्चन मुनिवृत्ति, नमि की निरीहता व नेमिनाथ की अहिंसा को उन्होंने अपने चातुर्याम रूप सामायिक धर्म में व्यवस्थित किया। चातुर्याम का उल्लेख निर्ग्रन्थों के सम्बन्ध में पालि ग्रन्थों में भी मिलता है और जैन आगमों में भी। किन्तु इनमें चार याम क्या थे, इसके संबंध में मतभेद पाया जाता है। 


जैन आगमानुसार पार्श्वनाथ के चार याम इस प्रकार थे - (१) सर्वप्राणातिक्रम से विरमण, (२) सर्व मृषावाद से विरमण, (३) सर्व अदत्तादान से विरमण, (४) सर्व बहिस्थादान से विरमण। पार्श्वनाथ का चातुर्यामरूप सामायिक धर्म महावीर से पूर्व ही सुप्रचलित था, यह दिग., श्वे. परम्परा के अतिरिक्त बौद्ध पालि साहित्य गत उल्लेखों से भलीभांति सिद्ध हो जाता है। मूलाचार (७, ३६-३८) में स्पष्ट उल्लेख है कि महावीर से पूर्व के तीर्थंकरों ने सामायिक संयम का उपदेश दिया था, तथा केवल अपराध होने पर ही प्रतिक्रमण करना आवश्यक बतलाया था। किन्तु महावीर ने सामायिक धर्म के स्थान पर छेदोपस्थापना संयम निर्धारित किया और प्रतिक्रमण नियम से करने का उपदेश दिया (मू. १२९-१३३)। ठीक यही बात भगवती (२०, ८, ६७५; २५, ७, ७८५), उत्तराध्ययन आदि आगमों में तथा तत्त्वार्थ सूत्र (९, १८) की सिद्धसेनीय टीका में पाई जाती है। बौद्ध ग्रंथ अंगु. निकाय चतुक्कनिपात (वग्ग ५) और उसकी अट्ठकथा में उल्लेख है कि गौतम बुद्ध का चाचा `बप्प शाक्य' निर्ग्रन्थ श्रावक था। पार्श्वापत्यों तथा निर्ग्रन्थ श्रावकों के इसी प्रकार के और भी अनेक उल्लेख मिलते हैं, जिनसे निर्ग्रन्थ धर्म की सत्ता बुद्ध से पूर्व भलीभांति सिद्ध हो जाती है।


एक समय था जब पार्श्वनाथ तथा उनसे पूर्व के जैन तीर्थंकरों व जैन धर्म की उस काल में सत्ता को पाश्चात्य विद्वान् स्वीकार नहीं करते थे। किन्तु जब जर्मन विद्वान हर्मन याकोबी ने जैन व बौद्ध प्राचीन साहित्य के सूक्ष्म अध्ययन द्वारा महावीर से पूर्व निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय के अस्तित्व को सिद्ध किया, तबसे विद्वान् पार्श्वनाथ की ऐतिहासिकता को स्वीकार करने लगे हैं, और उनके महावीर निर्वाण से २५० वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्ति की जैन परम्परा को भी मान देने लगे हैं। बौद्ध ग्रन्थों में जो निर्ग्रन्थों के चातुर्याम का उल्लेख मिलता है और उसे निर्ग्रन्थ नातपुत्र (महावीर) का धर्म कहा है, उसका सम्बन्ध अवश्य ही पार्श्वनाथ की परम्परा से होना चाहिये, क्योंकि जैन सम्प्रदाय में उनके साथ ही चातुर्याम का उल्लेख पाया है, महावीर के साथ कदापि नहीं। महावीर, पांच व्रतों के संस्थापक कहे गये हैं। बौद्ध धर्म में जो कुछ व्यवस्थाएं निर्ग्रन्थों से लेकर स्वीकार की गई हैं, जैसे उपोसथ, (महावग्ग २, १, १); वर्षावास (म. ३, १,१) वे भी पार्श्वनाथ की ही परम्परा की होनी चाहिये, तथा बुद्ध को जिन श्रमण साधुओं का समकालीन पालि ग्रन्थों में बतलाया गया है, वे भी पार्श्वनाथ परम्परा के ही माने जा सकते हैं।
क्रमश .....9
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इसके मूल लेखक है...........
डॉ. हीरालाल जैन, एम.ए.,डी.लिट्.,एल.एल.बी.,
अध्यक्ष-संस्कृत, पालि, प्राकृत विभाग, जबलपुर विश्वविद्यालय;
म. प्र. शासन साहित्य परिषद् व्याख्यानमाला १९६०
भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान

1 comments:

  1. ताऊ रामपुरिया 17 जनवरी, 2010

    सुंदर जानकारी के लिये आभार.

    रामराम.

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