जैन:प्राचीन इतिहास-6

Posted: 14 जनवरी 2010
गतांक से आगे.....

वैदिक साहित्य के यति और व्रात्य -

ऋग्वेद में मुनियों के अतिरिक्त' यतियों का भी उल्लेख बहुतायत से आया है। ये यति भी ब्राह्मण परम्परा के न होकर श्रमण-परम्परा के ही साधु सिद्ध होते हैं, जिनके लिये यह संज्ञा समस्त जैन साहित्य में उपयुक्त होते हुए आजतक भी प्रचलित है। 


यद्यपि आदि में ऋषियों, मुनियों और यतियों के बीच ढारमेल पाया जाता है, और वे समानरूप से पूज्य माने जाते थे। किन्तु कुछ ही पश्चात् यतियों के प्रति वैदिक परम्परा में महान् रोष उत्पन्न होने के प्रमाण हमें ब्राह्मण ग्रंथों में मिलते हैं, जहां इन्द्र द्वारा यतियों को शालावृकों (शृगालों व कुत्तों) द्वारा नुचवाये जाने का उल्लेख मिलता है (तैतरीय संहिता २, ४, ९, २; ६, २, ७, ५, ताण्डय ब्राह्मण १४, २, २८, १८, १, ९) किन्तु इन्द्र के इस कार्य को देवों ने उचित नहीं समझा और उन्होंने इसके लिये इन्द्र का बहिष्कार भी किया (ऐतरेय ब्राह्मण ७, २८)। ताण्डय ब्राह्मण के टीकाकारों ने यतियों का अर्थ किया है `वेदविरुद्धनियमोपेत, कर्मविरोधिजन, ज्योतिष्टोमादि अकृत्वा प्रकारान्तरेण वर्तमान' आदि, इन विशेषणों से उनकी श्रमण-परम्परा स्पष्ट प्रमाणित हो जाती है। भगवद्गीता में ऋषियों मुनियों और यतियों का स्वरूप भी बतलाया है, और उन्हें समान रूप से योग साधना में प्रवृत्त माना है। यहां मुनि को इन्द्रिय और मन का संयम करने वाला, इच्छा, भय व क्रोध रहित मोक्षपरायण व सदा मुक्त के समान माना है (भ. गी. ५, २८) और यति को काम-क्रोध-रहित, संयत-चित्त व वीतराग कहा है (भ. गी. ५, २६; ८, ११ आदि) अथर्ववेद के १५ वें अध्याय में व्रात्यों का वर्णन आया है। सामवेद के ताण्डय ब्राह्मण व लाट्यायन, कात्यायन व आपस्तंबीय श्रौतसूत्रों में व्रात्यस्तोमविधि द्वारा उन्हें शुद्ध कर वैदिक परम्परा में सम्मिलित करने का भी वर्णन है। ये व्रात्य वैदिक विधि से `अदीक्षित व संस्कारहीन' थे, वे अदुरुक्त वाक्य को दुरुक्त रीति से, (वैदिक व संस्कृत नहीं, किन्तु अपने समय की प्राकृत भाषा) बोलते थे,' वे `ज्याहृद' (प्रत्यंचा रहित धनुष) धारण करते थे। मनुस्मृति (१० अध्याय) में लिच्छवि, नाथ, मल्ल आदि क्षत्रिय जातियों को व्रात्यों में गिनाया है। 


इन सब उल्लेखों पर सूक्ष्मता से विचार करने से इसमें सन्देह नहीं रहता कि ये व्रात्य भी श्रमण परम्परा के साधु व गृहस्थ थे, जो वेद-विरोधी होने से वैदिक अनुयायियों के कोप-भाजन हुए हैं। जैन धर्म के मुख्य पांच अहिंसादि नियमों को व्रत कहा है। उन्हें ग्रहण करने वाले श्रावक देश विरत या अणुव्रती और मुनि महाव्रती कहलाते हैं। जो विधिवत् व्रत ग्रहण नहीं करते, तथापि धर्म में श्रद्धा रखते हैं, वे अविरत सम्यग्दृष्टि कहे जाते हैं। इसीप्रकार के व्रतधारी व्रात्य कहे गये प्रतीत होते हैं, क्योंकि वे हिंसात्मक यज्ञविधियों के नियम से त्यागी होते हैं। इसीलिये उपनिषदों में कहीं कहीं उनकी बड़ी-प्रशंसा भी पाई जाती है, जैसे प्रश्नोपनिषद् में कहा गया है-व्रात्यस्त्वं प्राणैक ऋषिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः' (२, ११)। शांकर भाष्य में व्रात्य का अर्थ `स्वभावत एव शुद्ध इत्यभिप्रायः' किया गया है। इस प्रकार श्रमण साधनाओं की परम्परा हमें नाना प्रकार के स्पष्ट व अस्पष्ट उल्लेखों द्वारा ऋग्वेद आदि समस्त वैदिक साहित्य में दृष्टिगोचर होती है।
क्रमश .....7
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इसके मूल लेखक है...........
डॉ. हीरालाल जैन, एम.ए.,डी.लिट्.,एल.एल.बी.,
अध्यक्ष-संस्कृत, पालि, प्राकृत विभाग, जबलपुर विश्वविद्यालय;
म. प्र. शासन साहित्य परिषद् व्याख्यानमाला १९६०
भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान

1 comments:

  1. Udan Tashtari 14 जनवरी, 2010

    आभार ज्ञानवर्धन का.

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