जैन:प्राचीन इतिहास-11

Posted: 25 जनवरी 2010
गतांक से आगे....
गौतम-केशी-संवाद -

महावीर निर्वाण के पश्चात् जैन संघ के नायकत्व का भार क्रमशः उनके तीन शिष्यों-गौतम, सुधर्म और जंबू ने संभाला। इनका काल क्रमशः १२, १२, व ३८ वर्ष = ६२ वर्ष पाया जाता है। यहां तक आचार्य परंपरा में कोई भेद नहीं पाया जाता। इससे भी इन तीनों गणधरों की केवली संज्ञा सार्थक सिद्ध होती है। 


किन्तु इनके पश्चात्कालीन आचार्य परम्पराएं, दिगम्बर व श्वेताम्बर सम्प्रदायों में पृथक् पृथक् पाई जाती है, जिससे प्रतीत होता है कि सम्प्रदाय भेद के बीज यहीं से प्रारम्भ हो गये। इस सम्प्रदाय-भेद के कारणों की एक झलक हमें उत्तराध्ययन सूत्र के `केसी-गोयम संवाद' नामक २३ वें अध्ययन में मिलती है। इसके अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि जिस समय भगवान् महावीर ने अपना अचेलक या निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय स्थापित किया, उस समय पार्श्वनाथ का प्राचीन सम्प्रदाय प्रचलित था।


हम ऊपर कह आए हैं कि स्वयं भगवान् महावीर के माता-पिता उसी पार्श्व सम्प्रदाय के अनुयायी माने गये हैं, और उसी से स्वयं भगवान् महावीर भी प्रभावित हुए थे। उत्तराध्ययन के उक्त प्रकरण के अनुसार, जब महावीर के सम्प्रदाय के अधिनायक गौतम थे, उससमय पार्श्व सम्प्रदाय के नायक थे केशी कुमार श्रमण। इन दोनों गणधरों की भेंट श्रावस्तीपुर में हुई और उन दोनों में यह विचार उत्पन्न हुआ कि सम्प्रदाय एक होते हुए भी क्या कारण है कि पार्श्व-सम्प्रदाय चाउज्जाम धर्म तथा वर्द्धमान का सम्प्रदाय `पंचसिक्खिय' कहा गया है। उसी प्रकार पार्श्व का धर्म `संतरोत्तर' तथा वर्द्धमान का `अचेलक' धर्म है। इस प्रकार एक-कार्य-प्रवृत्त होने पर भी दोनों में विशेषता का कारण क्या है? केशी कुमार के इस संबंध में प्रश्न करने पर, गौतम गणधर ने बतलाया कि पूर्वकाल में मनुष्य सरल किन्तु जड़ (ऋजु जड़) होते थे और पश्चिमकाल में वक्र और जड़, किन्तु मध्यमकाल के लोग सरल और समझदार (ऋजु प्राज्ञ) थे। अतएव पुरातन लोगों के लिए धर्म की शोध कठिन थी और पश्चात्कालीन लोगों को उसका अनुपालन कठिन था। किन्तु मध्यकाल के लोगों के लिए धर्म शोधने और पालने में सरल प्रतीत हुआ। इसी कारण एक ओर आदि व अन्तिम तीर्थंकरों ने पंचव्रत रूप तथा मध्य के तीर्थंकरों ने उसे चातुर्याम रूप से स्थापित किया। उसीप्रकार उन्होंने बतलाया कि अचेलक या संस्तर युक्त वेष तो केवल लोगों में पहचान आदि के लिए नियत किये जाते हैं, किन्तु यथार्थतः मोक्ष के कारणभूत तो ज्ञान, दर्शन और चरित्र हैं। गौतम और केशी के बीच इस वार्तालाप का परिणाम यह बतलाया गया है कि केशी ने महावीर का पंचमहाव्रत रूप धर्म स्वीकार कर लिया। किन्तु उनके बीच वेष के संबंध में क्या निर्णय हुआ, यह स्पष्ट नहीं बतलाया गया। अनुमानतः इस संबंध में अचेलकत्व और अल्पवस्त्रत्व का कल्प अर्थात् इच्छानुसार ग्रहण की बात स्वीकार कर ली गई, जिसके अनुसार हमें स्थविर कल्प और जिनकल्प के उल्लेख मिलते हैं।


स्थविर कल्प पार्श्व-परम्परा का अल्प-वस्त्र-धारण रूप मान लिया गया और जिनकल्प सर्वथा अचेलक रूप महावीर की परम्परा का। किन्तु स्वभावतः एक सम्प्रदाय में ऐसा द्विविध कल्प बहुत समय तक चल सकना संभव नहीं था। बहुत काल तक इस प्रश्न का उठना नहीं रुक सकता था कि यदि वस्त्रधारण करके भी महाव्रती बना जा सकता है और निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है, तब अचेलकता की आवश्यकता ही क्या रह जाती है? इसी संघर्ष के फलस्वरूप महावीर निर्वाण से ६२ वर्ष पश्चात् जंबू स्वामी का नायकत्व समाप्त होते ही संघभेद हुआ प्रतीत होता है। दिगम्बर परम्परा में महावीर निर्वाण के पश्चात् पूर्वोक्त तीन केवली; विष्णु आदि पांच श्रुतकेवली, विशाखाचार्य आदि ग्यारह दशपूर्वो, नक्षत्र आदि पांच एकादश अंगधारी, तथा सुभद्र आदि लोहार्य पर्यन्त चार एकांगधारी आचार्यों की वंशावली मिलती है। इन समस्त अट्ठाइस आचार्यों का काल ६२+१००+१८३+२२०+११८=६८३ वर्ष निर्दिष्ट पाया जाता है।
क्रमश ....12
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इसके मूल लेखक है...........
डॉ. हीरालाल जैन, एम.ए.,डी.लिट्.,एल.एल.बी.,
अध्यक्ष-संस्कृत, पालि, प्राकृत विभाग, जबलपुर विश्वविद्यालय;
म. प्र. शासन साहित्य परिषद् व्याख्यानमाला १९६०
भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान

2 comments:

  1. Udan Tashtari 25 जनवरी, 2010

    बहुत आभार!

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ.

  2. ताऊ रामपुरिया 25 जनवरी, 2010

    बहुत जानकारीपरक श्रंखला. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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