आध्यात्मिक एवं नैतिक विकास हेतु प्रेक्षाध्यान

Posted: 11 दिसंबर 2009


प्रेक्षाध्यानः एक प्रक्रिया

      
आचार्य महाप्रज्ञ ने व्यक्ति के आध्यात्मिक एवं नैतिक विकास हेतु प्रेक्षाध्यान उपक्रम आविष्कृत किया। एक पद्धति को बदलना कठिन है पर व्यक्ति व समाज को बदलना उससे भी अधिक कठिन है। प्रेक्षाध्यान प्रयोग आत्मा शुद्धि की प्रकिया के उपक्रम है। आत्म विश्‍वास, सहिष्णुता, धैर्य एवं भावानात्मक संतुलन के विकास के लिए यह अत्यन्त मूल्यवान्‌ है। प्रेक्षाध्यान व्यक्ति की अनासक्त चेतना को उजागर करता है। प्रेक्षाध्यान के विभिन्न वैज्ञानिक उपक्रम धर्म के एक नये ही स्वरूप को प्रकट करते है और यही व्यक्ति के दैनंदिन जीवन का अनिवार्य अंग होना चाहिये। धार्मिक जगत्‌ में यह कोई चमत्कार से कम नहीं है। इसने एक नया दृष्टिकोण दिया है कि विज्ञान के बिना धर्म लंगड़ा है और लोगों में अनावश्यक विश्‍वास अर्जित नहीं कर सकता।
    
जन साधारण के बीच प्रेक्षाध्यान को विधिवत्‌ प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करने से पूर्व आचार्य महाप्रज्ञ ने स्वयं पर ध्यान के विविध प्रयोग किये। महिनों की एकंता साधना में उन्होंने अपने आपको इसके चिंतन-मनन व संपोषण में नियोजित कर दिया जिससे उनकी आंतरिक ऊर्जा जागृत हो गई। इस कारण ध्यान की गहराइयों में पहुंचे। अपने अनुभवों को अपने गुरू आचार्य तुलसी को निवेदित किया। उन्होंने महाप्रज्ञ को इस अनुपम प्रयोग की प्रेरणा दी। आखिरकार ३ मार्च १९७७ को उन्होंने इसका विधिवत्‌ प्रारंभ किया।  


    
आत्मा की अतल गहराइयों में जाने के लिइ आचार्य महाप्रज्ञ ने प्रेक्षाध्यान के अंतर्गत कई विच्चिष्ट प्रयोग निर्दिष्ट किये हैं। (१) श्वास प्रेक्षा (२) चैतन्य प्रेक्षा (३) शरीर प्रेक्षा (४) लेच्च्या ध्यान रंगों का ध्यान (५) अनुप्रेक्षा स्वतः सूचन। उन्होंने मस्तिष्क के क्षेत्र से परे सोचा और अंतः प्रज्ञा के क्षेत्र में प्रवेश किया। यही चेतना की सहज शक्ति है।



प्रेक्षाध्यानः एक साधन
       
मनुष्य के जीवन में सात स्तर हैं शरीर, श्वास, प्राण ऊर्जा, मस्तिष्क, भाव, आभामंडल एवं चेतना। प्रेक्षाध्यान के माध्यम से निषेधक आभामंडल विधेयक आभामंडल में रूपांतरित किया जा सकता है। यह व्यक्तित्व के परिवर्तन का कारक बनता है। प्रेक्षाध्यान के नियमित प्रयोग से प्रकृतिगत पद्धति सक्रिय बनती है और उसे स्वस्थ एवं प्रसन्न बनाती है।
    
श्वास प्रेक्षा मन की एकाग्रता में वृद्धि करती है। यह मन को अधिक कार्य करने व अधिक उत्पादन बनाने के लिए प्रशिक्षित करता है। श्वास प्रेक्षा से श्वसन सही होता है तथा मन अच्छे व बुरे के बीच विभेद व कारणों को सीखता है।
    
यद्यपि प्रेक्षाध्यान की ये प्रविधियां प्राचीन जैन ग्रंथों से सार रूप में प्रस्तुत है और आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा इसकी पुनर्संरचना की गई है। जाति, वर्ण व धर्म की दिवारों से परे प्रत्येक व्यक्ति के लिए इसकी महता एवं प्रासंगिकता की अनुभुति की जा रही है। विचारों के परिवर्तन, सही भावों के विकास, विधायक चिंतन, मन व शरीर की क्षमता में वृद्धि के क्रम में प्रेक्षाध्यान ने रामबाण औषधि के रूप में प्रमाणित किया है।
    
राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर सैकडों सफल शिविर और सेमिनार आयोजित हो चुके हैं। प्रेक्षाध्यान जैसे अनुपम अवदान की विधियों को स्थापित किया गया। बुद्धिजीवियों, पेशेवर व्यक्तियों, राजपत्रित अधिकारियों, विद्वानों, डाक्टरों, व्यापारियों, राजनेताओं, अध्यापकों ओर अकादमिक सदसयों ने प्रेक्षाध्यान शिविरों में भाग लिया है और उनमें लाभान्वित हुए है।



  प्रेक्षाध्यान एक प्रयोग

     
प्रेक्षाध्यान पेशेवर व्यक्तियों के केरियर के उच्चतम विकास में सहयोग करता है। यह आत्म विश्‍वास उत्पन्न करता है तथा मानसिक एकाग्रता को विकसित करता है। यह प्राण शक्ति को बढ़ाता है तथा गहन ज्ञान, समझ एवं ग्रहणच्चीलता को विकसित करता है। प्रेक्षा के अभ्यास से स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। प्रेक्षाध्यान चेतन मन व अवचेतन मन दोनों को नियंत्रित करता है, परिणामस्वरूप व्यक्ति बहुत बुद्धिसंगत एवं तर्कसंगत हो जाता है। प्रयोगों से एक विधायक व्यक्तित्व का निर्माण होता है और अभीप्सित लक्ष्य की प्राप्ति सुस्पष्ट हो जाती है।
    
प्रेक्षाध्यान हारमोन्स को संयोजित करता है, फलतः व्यक्तित्व उन्नत बनता है।व्यक्तित्व को विनष्ट करने वाले, धृणा, क्रोध, ईर्ष्या आदि निषेधक भाव प्रेम व विन्रमता जैसे विधायक भावों मे बदल जाते हैं। प्रेक्षाध्यान व्यक्ति के भावों को विच्चुद्ध बनाता है तथा व्यावहारिक प्रतिमानों को सुधारता है।
    
किसी भी विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चार सूत्रीय योजना निर्मित की जा सकती है - (१) अभिप्रेरणा (२) एकाग्रता (३) शिथिलीकरण (४) द्रष्टाभाव। चूंकि अवचेतन मन सपनों को पहचानने एवं महत्वाकांक्षाओं की संपूर्ती का काम करता है। अवचेतन मान की शक्तियों को नियोजित करना आवश्यक है। प्रेक्षाध्यान हमारे आत्मा विश्‍वास एवं इच्छा शक्ति को विकसित करने में सहयोग करता है। यह मन की एकाग्रता को बढ़ाता है। यह शरीर को शीथिल करता है और अपने लक्ष्य को देखने में हमें मदद करता है। जिससे उसे प्राप्त किया जा सके।

आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने जो विभिन्न उपाय, प्रक्रिया एवं तकनीक खोजी हैं उन्हें प्रशिक्षण पाठयक्रम में सम्मिलित किया गया है। तेरापंथ समुदाय का समण-समणी वर्ग उसके प्रयोग एवं क्रियान्वयन के लिए समर्पित है। इससे आम आदमी के व्यक्तित्व विकास में परिवर्तन आ रहा है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर पूरे विश्‍व के विभिन्न भागों में प्रशिक्षिण शिविरों के माध्यम से यह वर्ग उल्लेखनीय कार्य रहा है।


प्रेक्षाध्यानः एक चिकित्सा

    
शरीर स्वस्थ है तो मन स्वस्थ है। जन साधारण बाहरी दबावों से प्रभावित होता है और तनाव व संधर्ष की गिरफ्त में आ जाता है। इसका परिणाम मानसिक तथा भावात्मक तनाव के रूप में सामने आता है जो भय, धृणा आदि का कारण है। प्रेक्षाध्यान इन भावों को अभय एवं करूणा के रूप में परिवर्तन कर देता है। यह सुखपूर्ण संसार बनाने में सहयोग करता है जहां लोग पूरे सुख से जी सके। यह बात तथ्यपूर्ण है कि यदि दवा नहीं चाहते तब तुम्हें ध्यान में आवच्च्य लग जाना चाहिये। प्रेक्षाध्यान हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाता है उससे व्यक्ति आजीवन फिट व स्वस्थ बना रह सकता है।
     
 कायोत्यर्ग प्रेक्षाध्यान का एक चरण है जो शिथिलकरण की विधिवत्‌ एवं उन्नतिकारक प्रक्रिया है। कायोत्सर्ग परानुकंपी नाडी तंत्र को सक्रिय बनाता है और तनाव के मूल कारण बदल देता है। कायोत्सर्ग शरीर के अतिरिक्त दबाव को दूर करने में सक्षम है और इससे शरीर व मन को गहन शिथिल स्थित में ले जाया जा सकता है। कार्यात्सर्ग तनाव के दुष्प्रभावों से व्यक्ति को बचाता है।
     
 प्रेक्षाध्यान का मानव शरीर व इसके विभिन्न तंत्रों पर स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। विश्‍व प्रसिद्ध अनुसंधान केन्द्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली (AIIMS) में हृदयरोगियों के लिए एक स्वतंत्र विभाग है। इसके विभागध्यक्ष डा. एस. पी. मनचंदा ने प्रेक्षा प्रयोगों से प्रभावित होकर हृदयरोगियों पर इनके प्रभाव का अध्ययन किया। अध्ययन के सकारात्मक परिणामों के आधार पर शल्य चिकित्सा के बाद के शल्य चिकित्सा से पहले वाले रोगियों के लिए डा. मनचंदा ने यह निर्दिष किया कि वे अध्यात्म साधना केन्द्र मेहरोली (नई दिल्ली) में प्रेक्षा प्रयोग अनिवार्य रूप से करे। कई वर्षो से प्रतिमाह वहां सात-सात दिन के शिविर आयोजित होते हैं। अगले छह-छह माह तक शिविर के लिए संख्या आरक्षित हो जाती है। प्रेक्षाध्यान थेरोपी के रूप में अच्छी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है।
     
इन सब तथ्यों के आधार पर यह प्रत्यक्ष एवं स्पष्ट है कि प्रेक्षाध्यान सिर्फ विचारों के रूपांतरण और क्षमता-वृद्धि का ही साधना नहीं है, मात्र व्यक्तित्व-विकास की प्रविधि ही नहीं है अपितु एक संपूर्ण चिकित्सा भी है। शारीरिक, मानसिक व भावानात्मक स्वास्थ्य के लिए यह प्रभावी पद्धति है।
 

3 comments:

  1. परमजीत बाली 11 दिसंबर, 2009
    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
  2. परमजीत बाली 11 दिसंबर, 2009

    अच्छी ज्ञानवर्धक पोस्ट लिखी है।आभार।

  3. ज्ञानदत्त G.D. Pandey 13 दिसंबर, 2009

    किसी भी विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चार सूत्रीय योजना निर्मित की जा सकती है - (१) अभिप्रेरणा (२) एकाग्रता (३) शिथिलीकरण (४) द्रष्टाभाव।
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    यह तो बहुत काम के सूत्र हैं मित्र वर। आम जीवन में उपयोगी।
    धन्यवाद।

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