अहिंसा: सिद्धान्त और इतिहास

Posted: 26 नवंबर 2009
अहिंसा मानव-जाति के ऊर्ध्वमुखी विराट् चिंतन का सर्वोतम विकास बिन्दु है। क्या लौकिक और क्या लोकोतर - दोनों ही प्रकार के मंगल जीवन का मूलाधार अहिंसा है। व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्‍व बंधुत्व का जो विकास हुआ है या हो रहा है, उसके मूल में अहिंसा की ही पवित्र भावना काम करती रही है। 


मानव सभ्यता के उच्च आदर्शों का सही-सही मूल्याकंन अहिंसा के रूप में ही किया जा सकता है। अहिंसा की परिधि के अन्तर्गत समस्त धर्म और समस्त दर्शन समेवत हो जाते हैं। यही कारण है कि प्रायः सभी धर्मो ने इसे एक स्वर से स्वीकार किया है और अन्ततोगत्वा इसी का आश्रय लिया है। 


अहिंसा की महता और उपयोगिता के संबंध में कही भी दो मत नहीं हैं। भले ही उसकी सीमाएं कुछ भिन्न-भिन्न हो। पर विश्‍व में जितने भी धर्म दर्शन और सम्प्रदाय हैं उन सभी में अहिंसा के संबंध में चिंतन किया गया। चाहे वैदिक धर्म हो, बौद्ध धर्म हो, यहूदी, फारसी, ताओ, कन्फ्‌यूसियम, ईसाई, इस्लाम, सिंतो, सिक्ख और जैन धर्म हो। सभी में अहिंसा के महत्व को स्वीकार किया गया हैं। अहिंसा की विमल धारा प्रांतवाद, भाषावाद, पंथवाद और सम्प्रदायवाद के क्षुद्र धेरे में कभी आबद्ध नहीं होती और न किसी व्यक्ति विशेष की निजी धरोहर बन सकती है। वह तो विश्‍व का सर्वमान्य सिद्धान्त है। मानव का उज्जवल भाव पृष्ठ है।
    
इसलिए अहिंसा प्रशिक्षण में सर्वप्रथम अहिंसा के सिद्धांत और इतिहास पर विशेष विचार किया गया है। असल में जब दृष्टिकोण सम्यक्‌ बन जाता है तो अहिंसा की ओर प्रयाण शुरू हो जाता है।
    
विश्‍व प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. टायनबी ने धोषणा की है कि यदि विश्‍व को सर्वनाच्च से बचाना है तो अहिंसा की शरण में आना ही होगा।विश्‍व की जितनी हिंसक पशु पक्षियों की प्रजातियां आपस में लडा करती थी, उनकी छः सौ से अधिक प्रजातियां समाप्त हो चुकी है। ठिक इसके विपरित वैसी लगभग सात सौ पशु पक्षियों की प्रजातियां बढ़ रही है। जो आपस में प्रेम और सदभाव से रहती है।
    
अहिंसा का मार्ग व्यक्ति समाज एवं राष्ट्र के लिए वांछनिय है। मात्र आवश्यकता इस बात की है की अहिंसा के पथिक को अपने ऊपर भरोसा होना चाहिए कि वह वातावरण की बुराईयों से अपने आपको मुक्त रख सकता है। तथा संतुलित समाज व्यवस्था जातिय एवं रंग भेद से मुक्ती सम्प्रदायिक सद्भाव मानवीय संबंधों में संतुलन ओर आर्थिक स्पर्द्धा एवं अभाव के बीच सेतु बन सकता है।
    
ऐकांतिक आग्रह या निरपेक्ष दृष्टिकोण भी हिंसा का प्रबल कारण है। इसीलिए अहिंसा प्रशिक्षण में हर धर्म एवं विचार को सापेक्ष दृष्टि से समझाना आवश्यक माना गया है।

5 comments:

  1. Udan Tashtari 26 नवंबर, 2009

    साधुवाद इस आलेख के लिए.

  2. महफूज़ अली 26 नवंबर, 2009

    बहुत ही सुंदर आलेख.....

    बधाई....

  3. ताऊ रामपुरिया 27 नवंबर, 2009

    बहुत बहुत धन्यवाद, इस ज्ञानोपयोगी आलेख के लिये.

    रामराम.

  4. ज्ञानदत्त G.D. Pandey 27 नवंबर, 2009

    अहिंसक होने में हिंसक की अपेक्षा लाख गुना अधिक दृढ़ता और वीरता चाहिये। इसमें मुझे कोई संशय नहीं है।

  5. राज भाटिय़ा 27 नवंबर, 2009

    बहुत सुंदर बात कही आप ने इस लेख मै.
    धन्यवाद

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