तुम्हारी कविता मे सिर और पैर दोनो मिले, पर प्राण नही मिला,

Posted: 29 सितंबर 2009
"तुम्हारी कविता मे सिर और पैर दोनो मिले, पर प्राण नही मिला,

एक लेखक ने कविता लिखी और सम्पादक के पास  प्रकाश्नार्थ भेज दी। उसमे लिखा -"सम्पादक महोदय! आपके पत्र मे आजकल बहुत सारी कविताए छपती है। मै पढता हू और मेरी धारणा बनी है कि उन कविताओ मे सि‍र-पैर नही होते है। मै जो कविता भेज रहा हू उसमे सिर भी है, पैर भी है। आप पढकर स्वय जान लेगे।" कुछ दिनो बाद सम्पादक ने कविता को लोटाते हुए लिखा-"तुम्हारी कविता मे सिर और पैर दोनो मिले, पर प्राण नही मिला, इसलिए लोटा रहा हू।"
कोरा सिर और पैर काम नही देता, जब प्राण नही होता। हमारी सारी शक्ति का, हमारे स्वास्थ्य का आधार प्राणशक्ति होती है। प्राण नही होता तो सिर पडा रहे, पैर पडे रहे, सारे शरीर का ढाचा पडा रहे तो कुछ नही होता है। प्राण चला गया तो सब कुछ चला गया।  प्राण है तो सब कुछ है। हमारी स्वास्थ्य की धारणा बदलनी चाहिए। शरीर का स्थूल होना, या कोई स्वास्थ्य की अवधारणा नही है। स्वास्थ्य का अर्थ होता है प्राण शक्ती की प्रचुरता। जिस व्यक्ति मे प्राणशक्ति की प्रचुरता होती है वह स्वस्थ्य होता है और जिसकी प्राणशक्ति दुर्बल बन जाती है, वह अस्वस्थ्य बन जाता है।
आचार्य महाप्रज्ञ युवादृष्टि

11 comments:

  1. Udan Tashtari 29 सितंबर, 2009

    बहुत अच्छे वृतांत के साथ समझाया है. आभार.

  2. ताऊ रामपुरिया 29 सितंबर, 2009

    बहुत प्रेरणात्मक आलेख.

    रामराम.

  3. दर्पण साह "दर्शन" 29 सितंबर, 2009

    haan aur un aprakashit karityoon se(sir aur per par bina pran wali) ek blog ban gaya hoga....
    mil jaiye to mujhr batein?

  4. seema gupta 29 सितंबर, 2009

    बेहद प्रेरक प्रसंग आभार
    regards

  5. ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey 29 सितंबर, 2009

    आपकी पोस्टों में सिर-पैर तो होते ही हैं, प्राण का स्पन्दन प्रचुर नजर आता है जी! ऐसी ही पोस्टें लिखते रहें।

  6. राज भाटिय़ा 30 सितंबर, 2009

    आप ने तो एक सुंदर सा चिंतन ही लिख दिया, बहुत सुंदर लेख.
    धन्यवाद

  7. संजय बेंगाणी 30 सितंबर, 2009

    प्राण नहीं तो किस काम का. सही सीख.

  8. चंदन कुमार झा 30 सितंबर, 2009

    इस पोस्ट में बहुत प्राण है :)

  9. Sunita Sharma 01 अक्तूबर, 2009

    प्राण यानि भाव जब किसी रचना में भाव हो तो वह प्रभावशाली नही लगती, शरीर भी एक रचना है उत्कृष्ट वर्णन.........

  10. शरद कोकास 10 अक्तूबर, 2009

    यहाँ तो लोग बिना प्राण की ही कविताये लिखते है इसलिये तो वे जीवित नही दिखाई देती , कवि को उसमे अपने प्राण डालना पड़ता है तब होती है कविता ।

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