चिठियो का लिखना बन्द-डाकिया पेट फुला रहे है- लाईफ हो गई झिन्गालाला- ब्लोगियो के फिगर मे इजाफा-बिना डाक-टिकिट, लेटरबॉक्स के चिट्ठे लिखे जा रहे

Posted: 02 फ़रवरी 2009
बिचारे कन्नु का तो कई बार ईन्टरनेटवा का कनैक्सन ही कट चुका है बिल नही भरने के चक्कर मे-"कॉफी विथ कुश " ठेले पर जाकर बिना शक्कर कि कॉफी पिकर आते है-झोला लटकाये जो खडा है वो कुशभाई है -ज्ञान बॉट रहे है वो ज्ञानदत्तजी पाण्डये है- अपने समीरलालाजी है-हॉ! यह अनुप शुक्ला जी है- भाई! ये अपने आपको हरियाणवी ताऊ कहता है,

भाई लोगो का ऐसा कहना , मेरे अकल को स्क्रीन पर कतई डिसप्ले नही होता कि मुए मोबाईल के आ जाने से चिट्ठियॉ लिखने का चलन चोपट हो गया है। ठीक है कि एस एम एस ने सक्षिप्त सन्देशो की ऐसी हेबिट डाल रखी है कि अब दिल के फेफडे खोलकर कोई अपनी खाली-पिली भन्कस नही करेगा। ताऊजी और शास्त्रीजी याद किजिये आपके समय मे जब भी खतवा लिखा जाता था तब भी तो यह वाला जुमला टॉक दिया जाता था-"थोडे लिखे को ज्यादा समझे।" यह सुत्र वाक्य भी आज एस एम एस का बीज मन्त्र है। कुछ भी चेन्ज नही हुऐला है बस लेटरवा लिखने का स्टाईल के मलिका शैरावत के छोटे होते कपडो के माफीक हो गएला है अपुन के खोपडे मे आज भी "सोस्ती सिरी सर्व उपमा जोग से आगाज करके अत्र कुशलम तत्रास्तु" पर विश्राम लेने वाले पत्रो की लिविग (living) यादे शेष बचेली है।

ताऊ कभी ताई को लव-लेटरवा लिखा कै नही ? अपुन तो आज भी अपनी कुवॉरी घरवाली कि चिट्ठई जिनकी गन्घ आज तक मेरे नथुनो मे बरकरार है इनमे लिखा होता था-"लगता है दाल जल रही है , इसलिये अब लेटर लिख्ना बन्द कर रही हु।" या फिर , आपको लेटरवॉ लिखने बैठी ही थी कि दरवाजे कि घन्टी बज गई, कही डैडी ना आ गये हो?, हाय!कहॉ छुपाऊ ?"

म सबको एस एम एस नामक भुतनीका का थैन्कफुलवॉ होना मॉगता है, कम से कम इस तरह के सन्शययुक्त जुमलो के जास्ती भन्कस से मगज का दही नही होता। सचार क्रान्ति के जमाने मे बेचारे डाकिया बैठे बैठे अपने पेट फुला रहे है। बैचारो के साईकिल को हवा भरने वाला भी कोई नही मिल रहा है।

भाई, अब तो बुद्धू बक्से (कप्यूटर) घर घर मे पहुच गये है। {ग्रामीण क्षैत्रो को छोड) बुद्धू बक्से के सामने बैठकर अगले कि लाइफ के असख्य घन्टे किस रास्ते से निकल गये, यह स्वय उस ध्यानस्थ जीवनत्मा को पता नही चलता कि बैचारे कि लाईफ कब झिन्गालाला हो गई ली है। डेस्कटॉप,पॉमटॉप, और लैपटॉप के इस काल मे युवक युवतियो की गोन्दे तो सदा-सर्वदा भरी ही मिलती है। यह मैलिग क्या बला है मेरे ताऊ ? एक होता है मेल दुसरा होता है फिमेल,अरे भाई मेरे यहभी तो लेटरवा का ही नयानवेला भाई है जो बिना फेफडे का और खोपडी का धनचक्कर होता है।

शास्त्री जी सुना है आपके जमाने मे आप लेटरवा(पोस्टकार्ड} लिखने मे बडे ही आलसी हुआ करते थे ? एक दो लाइन लिखते लिखते उबासीयॉ लेने लगते थे ?ओर इस उम्र मे इन्टरनेटवा का प्रयोग करके नई आदतवा कि तरक्की कर डाली। वो जो छोटी-छोटी चिट्ठीयो के जवाब देने से कतराते थे वो आज कल बडे-बडे दनादन चिट्ठे लिखकर रोज लोगो का ब्लोगेरिया से भेजा फ्राई कर डाला है।

अरे भैईया! यह ब्लोगेरिया किस रोग का नाम है ? अपुनके खोपडी मे तुम्हारी बात घुस नही रेहेली है।

अरे बिटवा! बुद्धू बक्से (कप्यूटर) पर इन्टरनेटवा द्वारा लिखने वाले को चिठाकार कहा जाता है। अपने सिगापुर वाले बडे भाई राज भाटियॉ अपनी अग्रेजीयॉ भाषा मे ईसे ब्लोग कहते है। यह ब्लोग अपनी मुबईयॉ कि १० x १० कि खोलियो के माफिक होते है जहॉ दरवाजे तो होते है पर ताले नही होते। एक खोली मे दस दस लोग रहते है उसी तरह कही कही एक ब्लोग मे दस दस ऑखफोडु चिठाकार एक साथ लोगो के दिमाग का तेल निकालने को लगे हुये है।

रे भाई! दस दस लोग एक साथ क्या घसिटते है ? खाली खोपडी के धनचक्कर, एक थकता है तो दुसरा आ जाता है अपनी घसिटने, ब्लोग लिखना सन्क्रामक बिमारी है यह ब्लोगटाइटिस भी। बतर्ज एक पुराने-से फिल्मी गाने के-लो बचो यारो, इसको तो ब्लोगेरिया हुआ>>>>>> ब्लोगेरिया हुआ,,,,,। इस रोग कि एक खासियत यह है कि यह हप्ते पन्द्राह दिनो मे ही क्रानिक हो जाता है। इसमे बहुत कुछ थोथा भी होता है, सहज ऐतबार ना हो तो अनामदासी पोथाकारो की साइटस पर जाइए।

ब तो हालत यह है कि अखबारो तक ने अपने पाठको के पन्नो वाली स्पेस को इन ब्लोगर्स के नाम आवन्टित कर रखे है। दिनोदिन ब्लोगियो के फिगर मे इजाफा हो रहा है। बिना डाक-टिकिट, लेटरबॉक्स के चिट्ठे लिखे जा रहे है। जवाब आ रहे है। अरे भाई फिर ये लोग कि तो चॉन्दी है, नोट छाप रहेले होगे? अपुन भी इस धन्दे मे घुसना मॉगता है अपनी ट्पोरी गिरी का लोगो को टिप देगा; और अपने ब्लोगिया का नाम भी एकदम धासु सोचेला है- "टपोरी-गुरु, " क्यो भाई है ना झकास ?

रे करमठोक! भेजे के अन्धे, यह कुछ कमाते वमाते कुछ नही है ये तो अपने बाप दादा कि कमाई पे ऐस कर रहे है। यह तो अपना बडा भाई बच्चनवा ने इण्डियॉमा फैसनवा लाकर रख दिया है सभी बैरोजगारो को घन्घे पर बैठा दिया है बिना पगार के। बिचारे कन्नु का तो कई बार ईन्टरनेटवा का कनैक्सन ही कट चुका है बिल नही भरने के चक्कर मे।

रे भाई। अपनी गली के नुकड पर सुना है आप भी ब्लोग लिख रहेले हो ? मेरे बाप! मेरी दिमाग कि वाट मत लगा, यह काम तो मेरे अकल(चाचा) एस एम एस के बिग ब्रदर बाबु ब्लोगानद कर रहे है और उनकी छत्र छाया से बबुआ लव लेटरलाल, चाचा चिट्ठानन्द और मेरे बाप पोथाप्रसाद समेत फैमेली के टोटल मेबर्स कि लाईफ सुरक्षित है,सो चिट्ठी बिटियॉ कि भी।

चल अब दिमाग चाटना बन्द कर और "कॉफी विथ कुश " ठेले पर जाकर बिना शक्कर कि कॉफी पिकर आते है।

(ठेले पर) भाऊ! यह कॉफी के ठेले पर ईतना लाईन क्यो लगेला है ?और वो गले मे थेला लटकाये वो कोन बैठेला है? अरे मेरे काका! वो सभी ब्लोगान्दन जी के दत्तक पुत्र है- झोला लटकाये जो खडा है वो कुशभाई है जो काम धन्धा छोड लोगो को कॉफीवादन करवा रहे है।

देख वो लाईन मे सबसे आगे चशमा पहने लोगो का हाथ कि रेखा देख ज्ञान बॉट रहे है वो ज्ञानदत्तजी पाण्डये है- ये ब्लोगेरिया के जनक है। लोगो कि "मानसिक हलचल" का ईलाज करते करते खुद ईसकी चपेट मे आ गये है।

(कुशके कॉफी ठेले पर समीरलालाजी एव फुरसतियाजी)

भाऊ! वो कोन है जो अन्धेरे मे भी रोशनी पैदा कर रहा है- अरे! छवनी के सिक्के! यह अपने समीरलालाजी है जो ठेठ विदेश से उडन तस्तरी से उडकर कुश के ठेले पर आऐ है यह कुश के कॉफि-ठेले पर ब्लोगेरिया के कीटाणुओ का पाउडर सप्लाई करते है। और जिनके आखो मे बडा सा चश्चमा पडा है वो शुक्ला जी है ये दोनो विदेश से भारत मे ब्लोगेरिया के कीटाणुओ का पाउडर सप्लाई करते है, बहुत बडे डिलर है।

रे भाऊ! देख तो वो कोन सफेद कपडो मे लदा हेडमास्टर कि तरह फुरसत से चलता हुआ आ रहा है। बडा ही शर्मिला शान्त फुरसत वाला ईन्शान लगता है ? हॉ! यह अनुप शुक्ला जी है। हिन्दुस्थान मे ब्लोगेरिया के कीटाणुओ का पाउडर सप्लाई कि फुरसतिया की प्रविष्टियों को पढ़ने के लिए चटकाएँ" href="http://directory.chitthajagat.in/?chittha=http://hindini.com/fursatiya">फुरसतिया नाम से बहुत बडी दुकान है जो पाचवे पायेदान पर है।

भाऊ-भाऊ ! देख महिला मडल भी यहा नारे लगा रही है हमे भी कॉफी पिलाओ, बराबरी का हक चाहिये नही तो यह ठेला नही चलने देगी।

लालबिन्दी वाली कलम वाली बाई रंजना [रंजू भाटिया] , जो टेशन मे सोच रहेली है वो चॉन्द से आई Parulजी, कविता वाचक्नवीजी,के लेख मे नही पढ सकता क्यो कि मै अभी नाबालिग हु। Neelimaजी और सुजाताजी, बात बात पर सडको पर मोर्चा लेकर आ जाती है ये दोनो हम शक्क्ल है (बहने है शायद ) ।

बात बात पर प्राण पखेरु उडाने मे माहीर सुनिताजी शानु भी खडी है कतार मे।

रे भाई ये भैसे पर कोन बैठा है ?, भाई! ये अपने आपको हरियाणवी ताऊ कहता है, जो कुशके ठेले पर दुध कि सप्लाई करता है, और जो भैसे कि पुछ पकड रखी है वो शास्त्रीजी, रविरतलामी,

चिपके हुये सुरेस चिपलुनकर,शिवकुमारजी मिश्रा, अविनाश, बैगाणी, दिनेशजी द्धिवेधी,सुरेश चन्द्र गुप्ताजी, है जो इस देसी ताऊ के खासम खास है।

आलोक
alok [at] chitthajagat [dot] in

लोक कुमार को किसी परिचय की जरूरत नहीं है। ये हिन्दी जाल जगत के आदि पुरूष कहलाते हैं। जी हाँ, ये वही हैं जिन्होंने हिन्दी का पहला चिट्ठा "नौ दो ग्यारह" २००३ में लिखना शुरू किया था, और ब्लॉग का नाम चिट्ठा दिया था। वर्षों से ये अपने जालस्थल "देवनागरी॰नेट" द्वारा दुनिया को अन्तर्जाल पर हिन्दी पढ़ना व लिखना सिखाते आ रहे हैं।

नोट-: (सभी फोटुओ को लार्ज करने के लिये चटका लगाये। किसी कि भावनाओ को आहात करने कि मन्शा नही है- ज्ञानदत्तजी,अनुपजी,ताऊजी, लालाजी, शास्त्रीजी,कुशजी, कन्नुभाई, शास्त्रीजी, रविरतलामी, सुरेस चिपलुनकर,शिवकुमारजी मिश्रा, अविनाश, बैगाणी, दिनेशजी द्धिवेधी,सुरेश चन्द्र। Parulजी, कविता वाचक्नवीजीरंजना [रंजू भाटिया Neelimaजी ,सुजाताजी,सुनिताजी-शानु आप सभी मेरे आदरणीय है कही आपको कही ठेस लगी होतो क्षमा करे।

विशेष ब्लोगेरिया कि अन्तिम कडी मे इसका ईमानदारी से ईलाज लिख रहा हु। ईसके लिये विशेषज्ञो कि साहयता ले रहा हु। एवम जल्दी ही एक सार्वजनिक विज्ञापन द्वारा ब्लोगकर्ताओ से रॉय मागने की ईच्छा रखता हू। आभार आप सभी का )

16 comments:

  1. रंजना [रंजू भाटिया] 03 फ़रवरी, 2009

    आप ने तो पूरी जन्मपत्री लिख दी :) ब्लाग जगत की :) सही है .. अब यह उँगलियाँ की -बोर्ड से बात करते हुए चैन पाती है ...:)

  2. Udan Tashtari 03 फ़रवरी, 2009

    हम धन्य हुए महाराज!!

    फाइनली जाकर कॉफी के ठेले पर जाये के पकड़ाये. :)

    बहुत सही!!

  3. विनय 03 फ़रवरी, 2009

    आप सादर आमंत्रित हैं, आनन्द बक्षी की गीत जीवनी का दूसरा भाग पढ़ें और अपनी राय दें!
    दूसरा भाग | पहला भाग

  4. ताऊ रामपुरिया 03 फ़रवरी, 2009

    बहुत अच्छे भतीजे, बिल्कुल सही गाडी पकडी है.पर सोचो ताऊ की भैंस नही होगी तो काफ़ी कैसे बनेगी बिना दुध की. :)

    रामराम.

  5. Vineeta Yashswi 03 फ़रवरी, 2009

    Bhai coffee to hum bhi jarur piyenge.

  6. Shastri 03 फ़रवरी, 2009

    हे प्रभू सारे परेशानी की जड तो यह चिट्ठा है. यदि इस चिट्ठे पर ब्लागेरिया की खोज नहीं की गई होती, लक्षण न बताये गये होते, तो इस रोग से पीडित सारे मरीज अभी भी चैन की बंशी बजा रहे होते.

    खैर जब आपने हमारे रोग को पकड ही लिया है तो हम ने तय कर लिया है कि सही तरीके से बीमार होकर ही बतायेंगे और यह रोग चार लोगों को और फैला कर ही रहेंगी.

    हां, आप भी धीरे धीरे इस रोग ले लक्षण दिखाने लगे हैं !!


    सस्नेह -- शास्त्री

  7. Science Bloggers Association of India 03 फ़रवरी, 2009

    बडा सुन्दर विवेचन किया है आपने, पढकर मजा आ गया।

  8. डॉ .अनुराग 04 फ़रवरी, 2009

    इसे कहते है सटीक निशाना .....

  9. dada 05 फ़रवरी, 2009

    मेरे प्रभु> अपुन तेरे खोपडी का कायल हो गयेला है.झकास. झिन्गालाला

  10. dada 05 फ़रवरी, 2009

    आप जब भी ईलाज लिखो तो मुझे dada131313@gmail.comमेल से सुचित करे.

  11. dada 05 फ़रवरी, 2009

    जब मेने समिरजी और फुर्सतियाजी का फोटु लार्ज किया तो सकते मे आ गया यह लोग चमच से कॉफी पी रहे थे?

  12. Mitali 05 फ़रवरी, 2009

    i was happy to read ur post...i will want to read ur future..posts too..and find the cure to ur blogaria...

  13. ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя 06 फ़रवरी, 2009

    नम्बर एक ब्लॉग बनाने की दवा ईजाद देश,विदेशों में बच्ची धूम!!

    http://yaadonkaaaina.blogspot.com/2009/02/blog-post_7934.html

  14. HEY PRABHU YEH TERA PATH 07 फ़रवरी, 2009

    aap sabka dhanyavaad

  15. HEY PRABHU YEH TERA PATH 07 फ़रवरी, 2009

    Raj Bhatia
    आज दस बार गया आप के ब्लांग पर लेकिन हर बार कोई रुकावट आ जाती ओर आप का लेख पुरा ना पढ पाया, आप का शुक्र आप ने मेल से भेज दिया, बहुत ही सुंदर, पढ कर इतना हंसा कि पेट मे दर्द होने लगा, इसे कहते है लेख. अभी बीबी को सुनाऊगा, उसे ब्लांग की सारी बाते तो नही पता लेकिन अब आप सब के नाप उसे याद हो गये है,
    कृप्या आप जरुर चेक करे अपने ब्लांग को शायद कुछ गलत अटेच हो गया है जो हर बार कोई दिक्कत दिखाता है.
    धन्यवाद, इसे टिपाण्णी के रुप मे ही समझे.
    Raj Bhatia Wed, Feb 4, 2009 at 2:29 AM



    (नोट-: उपरोकत टीप्प्णी राज भाई ने ईमेल से भेजी जो टेक्निकल वजह से प्र्सारित न हो पाई, हे प्रभु स्वय कोपी-पेस्ट के जरिये प्रकाशित कर रही है।)

  16. कविता वाचक्नवी 14 फ़रवरी, 2009

    बीमारी का ईलाज करवाते इतने दिन का विलम्ब हो गया,इसीलिए टिप्पणी अब हो पा रही है।
    यह सीक्रेट है कि ईलाज क्या है। आपके २४ फ़रवरी तक आने वाले उत्तरों की बानगी के बाद मिलान करेंगे।
    बीमारी के लक्षणों की जानकारी के लिए धन्यवाद।

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आपकी अमुल्य टीपणीयो के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद।
आपका हे प्रभु यह तेरापन्थ के हिन्दी ब्लोग पर तेह दिल से स्वागत है। आपका छोटा सा कमेन्ट भी हमारा उत्साह बढता है-