यह वसुधा का पैगम्बर है, खोली जटिल ग्रन्थियॉ मन की,पाया अनुपम चिदअम्बर है।

Posted: 22 जून 2009
महाप्रज्ञ के चरण कमल मे श्रद्धा भक्ति पुष्प चढाऊ .।
प्रभुवर पावन प्रज्ञा से मै जीवन मे नित बढता जाऊ॥



इतिहास के झरोखे से

आचार्य महाप्रज्ञजी का जन्म ऐसे स्थान पर हुआ  जहॉ न सर पर छत थी और ना चारो और दीवारे। खुले आसमान के नीचे।






नत्थू से मुनि नथमल,मुनि नथमल से, महाप्रज्ञ, और महाप्रज्ञ से आचार्य महाप्रज्ञ स्वभाव से..... निश्छल, बुद्धि से विनम्र,चरित्र से पारदर्शी और.ज्ञान से सूक्ष्मदर्शी है।
बालक नथमल ढाई वर्ष के थे तब उनके पिता तोलारामजी का निधन हो गया था। 
महाप्रज्ञजी के दीक्षा गुरु अठम आचार्य कालुगूणी थे। 
महाप्रज्ञजी की दीक्षा सरदारशहर (राजस्थान) मे भन्सालीजी के बाग मे मे सवत १९८७ माघ शुक्ल दशमी को हुई थी।























१२ नम्बर १९७८ गगाशहर राजस्थान मे आचार्य श्री तुलसी ने मुनि नथमलजी को "महाप्रज्ञ" अलकरण से विभुषित किया। 
महाप्रज्ञजी की "युवाचार्य" पद पर नियुक्ति ३ फरवरी १९७९ को राजलदेसर गाव मे। 
मुनि नथमलजी को तेरापन्थ धर्म छोडकर अपने साथ आने के लिए भगवान रजनिश ने निमन्त्रण दिया था। 
भारतीय ज्ञानपीठ की प्रखर चयन समिति ने सन १९८७ मे " मुर्ति देवी पुरस्कार" के लिऐ आचार्य महाप्रज्ञजी का नाम चयनित किया। किन्तु महाप्रज्ञजी ने यह कहते हुऐ इसे लेने के लिऐ इन्कार कर दिया की-" व्यक्ती की प्रतिष्ठा पुरस्कार से नही कर्तव्य से होती है। 
राजस्थान विधापीठ के कुल पति ने महाप्रज्ञजी के साहित्यिक अवदान के लिऐ , उन्हे डी,लिट, की मानद उपाघि देने का सकल्प व्यक्त किया, जिसे महाप्रज्ञजी ने अस्वीकार कर दिया।
आचार्य श्री तुलसी ने १८ फरवरी १९९४ को सुजानगढ मे अपने आचार्यपद का विसर्जन कर युवाचार्य महाप्रज्ञजी को आचार्य पदप्रदान किया,  इस प्रकार मुनि नथमलजी बिन्दु से सिन्धु, और शिष्य से सबके सरताज बन गऐ। 
आचार्य माहाप्रज्ञजी ने ११ वर्ष कि बाल उम्र मे अपनी मॉ के साथ तेरापन्थ धर्म सघ मे आठवे आचार्य कालुगुणी के हातो दीक्षा ली। अब तक लाखो किलोमिटर पैदल यात्रा विहार कर चुके तेरापन्थ के दशवे आचार्य महाप्रज्ञजी के शासन मे १००० साधु-साध्वीया लाखो श्रावक अपने जिवन पथ को गुरु के चरणो मे समर्पित।
भारत सरकार के विश्वविधालय अनुदान आयोग ने २२ फरवरी १९८९ को प्राकृत भाषा के पण्डित के रुप मे तीन विद्धवानो  को चयनित किया जिसमे एक आचार्य माहाप्रज्ञजी है ।
विश्व के शीर्षस्थ दार्शनिको की सस्था इन्टरनेशनलसोसायटि फॉर इण्डियन फिलॉसफी" ने आचार्य महाप्रज्ञजी को अपनी कार्यकारणी सदस्यो मे सम्मिलित किया।

4 comments:

  1. ताऊ रामपुरिया 22 जून, 2009

    ित्चरों सहित इतनी सुंदर जानकारी के लिये आभार आपका.

    रामराम.

  2. M.A.Sharma "सेहर" 22 जून, 2009

    Rochak evam shikshaprad sundar jaankaari ka bahut shukria .....

    Achary Mahapragya ji ko naman

  3. राज भाटिय़ा 23 जून, 2009

    सुंदर चित्रो सहित सुंदर जानकारी के लिये धन्यवाद.


    मुझे शिकायत है
    पराया देश
    छोटी छोटी बातें
    नन्हे मुन्हे

  4. लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` 23 जून, 2009

    बिँदु से सिँधु बनकर समस्त मानवता को ज्ञान व सँयम का पाठ पढाते महाप्रज्ञजी को सादर प्रणाम

एक टिप्पणी भेजें

आपकी अमुल्य टीपणीयो के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद।
आपका हे प्रभु यह तेरापन्थ के हिन्दी ब्लोग पर तेह दिल से स्वागत है। आपका छोटा सा कमेन्ट भी हमारा उत्साह बढता है-