ज्ञानदतजी: जैन धर्म का सिद्धान्त है- अनेकान्त

Posted: 09 अप्रैल 2009

नेकांत का अर्थ है-प्रत्येक वस्तु को भिन्न्-भिन्न दृष्टिकोण से देखना और स्वीकार करना। इस सिद्धांत मे विश्वास करने वाले किसी प्रसंग मे एकांतिक आग्रह नही कर सकते । सामाजस्य स्थापित करना उनका लक्ष्य बन जाता है। वे प्रत्येक बात मे सामाजस्य स्थापित करने का प्रयास कर सकते है। उनका चिंतन संतुलित होता है।
जै
न दर्शन मे दुराग्रह और मिथ्या अभिनिवेश को हिंसा माना गया है। इस दृष्टि से भी वह त्याज्य है। अनेकांत का सिद्धांत जिन लोगो की समझ मे आ जाता है वे सहज रुप से इससे बच जाते है।
जैन धर्म के अनुशार यह ससार शाश्वत है। इसका कोई कर्ता नही है। पालक नही है।और संहर्ता भी नही है। सब प्राणी अपने कर्मो के अनुशार संसार मे जन्म-मरण लेते है। और सुख दुख का कर्ता प्राणी स्वयं है। जैन धर्म के अनुशार जातिवाद कोई तात्विक बात नही है। जाति के आधार पर किसी को छोटा-बडा या ऊचां-नीचा मानना युक्तिसंगत नही है। मनुष्यता के नाते पूरी मनुष्य जाति एक है। मनुष्य अपने कर्म के आधार पर ऊचां या नीचा बनता है। जब पुरी मनुष्य जाति एक है तब उसे जाति, रंग,वर्ण,आदि के आधार प बंट्ने का औचित्य ही क्या है।
जै
न धर्म आस्तिकवादि दर्शन है। वह आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म आदि बातो मे विश्वास करता है। आत्मा मे परमात्मा बनने की क्षमता स्वीकार करता है। इसी मंतव्य के आधार पर हर व्यक्ति सत्पुरुषार्थ करता है । उनका पुरुषार्थ पूर्णता तक पहुचता है तब आत्मा परमात्मा बन जाता है। जैन धर्म की समग्र साधना परमात्मा बनने के लिऐ है।
जैनाचार्यो ने मनुष्य को धर्मापासना के तरीको से ही परिचित नही कराया उन्हे जीवन शैली से जुडी अनेक बातो को स्पष्ट ता से समझाया। व्यसन मुक्त जीवन स्वस्थ जीवन शैली का एक अंग है। लोक जीवन मे व्याप्त बुराईयो मे से सात प्रकार के दुर्व्यसनो का सकलन जैनचार्यो की अपनी मोलिक देन है। वे सात दुर्व्यसन इस प्रकार है- जुआ, चोरी,मॉस्, मदिरा,शिकार्, वेश्यागमन्, परस्त्रीगमन्। ऐसा होने से जैन धर्म जीवन व्यवाहर के साथ जुडकर अपनी त्रैकालिक प्रांसंगिगता को प्रमाणित कर सकेगा।

बडा करने के लिए किल्क करे

आभार - अमृत कलश-२, साध्वी जिनप्रभा, साध्वी विमलप्रज्ञा, हे प्रभु यह तेरा-पन्थ




Ekanta : Absolutism, one-sidedness, solitary viewpoint
Anekant : Non-absolutism, a relativistic and multi-dimensional approach to reality
Anekant is a basic principle of Jainism dealing with the multiple nature of reality.
It asserts that every real entity is possessed of infinite number of pairs of opposite attributes; hence, the non-absolutism is a synthesis of infinite number of such dualities; thus, every entity is eternal as well as non-eternal, one as well as many, general as well as particular, expressible as well as inexpressible and so on; through syadvada we can express the anekanta nature of reality.
It is the doctrine of
* non-onesidedness, non-absolutis, non solitary view
* the relativistic view in Jain philosophy, that is looking at things from all points of view.
Consequences:
The fundamental principle of Anekantvada is to tolerate others views or beliefs; one should not only try to discover the truth in one’s own views or beliefs, but also in other’s views and beliefs.
We have to accept the truth that there is truth in other’s views too।






7 comments:

  1. ताऊ रामपुरिया 10 अप्रैल, 2009

    बहुत शुक्रिया इस आलेख के लिये.

    रामराम.

  2. ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey 10 अप्रैल, 2009

    निश्चय ही अनेकान्त आपको सहिष्णु बनाता है। अनेक दैनिक आदान-प्रदान में हम अनेकान्तवादी होते हैं। बहुत से मसले रूढ़ एक पक्षीय न बना कर Open ended रखते हैं। उससे ऊर्जा का क्षरण बचता है।
    अद्वैत के सिद्धान्त को कैसे सोचा जायेगा अनेकान्त के सन्दर्भ में - यह विचार करना शेष है।

  3. Vidhu 10 अप्रैल, 2009

    जैन धर्म आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म आदि बातो मे विश्वास करता है। आत्मा मे परमात्मा बनने की क्षमता स्वीकार करता है। इसी मंतव्य के आधार पर हर व्यक्ति सत्पुरुषार्थ करता है ....जैन आगम लोक कथाएं हमेशा पढ़ती रही हूँ ....इस धर्म के उच्च आदर्शों में सबसे अधिक मुझलगता है ...अहिंसा भाव समस्त जीवों और प्राणियों के प्रति ...ये पोस्ट कुछ और भी जानकारी देती है आभार

  4. संजय बेंगाणी 10 अप्रैल, 2009

    अनेकांतवाद भारतीय दर्शन को जैन धर्म की मौलिक भेंट है.

    बिदासर मेरा पैतृक गाँव है. वहाँ की तस्वीरें देख अच्छा लग रहा है.

  5. श्याम सखा 'श्याम' 10 अप्रैल, 2009

    भगवान महावीर ध्यान योग के प्रकृष्ट साधक थे। उनके शासन मे ध्यान की विशिष्ट विभूतियॉ हो चुकी है। इस सिद्धांत मे विश्वास करने वाले किसी प्रसंग मे एकांतिक आग्रह नही कर सकते ।
    प्रिय भाई !
    मैंने कुछ जैन ग्रंथ पढे हैं-लगभग ३० साल पहले एक जैन[दिगम्बर ]
    परिवार का किराए दार रहा,नर्सिंग होम की शुरूआत के दिनो में,उनसे घनिष्ठता हुई तो उनके चातुर्मास हेतु आये साधुओं से मिलना भी हुआ-जो काफ़ी नामी-गिरामी [राष्ट्रीय सत्र ] के भी थे-
    पर एक बात जो आपने भी लिखी कि जैन मतानुसार यह ब्रह्मांड किसी के द्वारा[ भगवान द्वारा जैसा अन्य कहते हैं] निर्मित नहीं है ,अपितु भगवान है ही नहीं फ़िर भी वे दिगम्बर भी और आप भी श्री महावीर को भगवान कहते मानते हैंव अन्य धर्मावल्म्बियों की तरह उनकी आरती पूजा भी करते हैं ,जब कि श्री महावीर स्वयं इस बात से सहमत नहीं हैं,
    ऐसा क्यों-
    वैसे मुस्लमान भी मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए भी काबा की फ़ोटो घरों में रखते हैं
    सिख बंधु-गुरूग्रंथ साहिब को भगवान सरीखा ही पूजते हैं
    आर्य समाजी- श्री दयानन्द की फ़ोटो घरों दद्फ़तरों मे लगाते हैंं
    तो वे हिन्दू या इसाइयों से अलग कैसे हुए।
    श्याम सखा

  6. Harkirat Haqeer 10 अप्रैल, 2009

    Aapne mere blog pe ek sandesh diya ' chma dan' ka ...aapki bat sar aankhon par ...par agar chma dil se mangi gayi ho aur use apni galti ka ahsas ho... yaha to chma mzak bna kar mangi ja rahi hai...besarmi ki had tak...fir bhi aap sab ka faisala mujhe manya hoga...!!

  7. P.N. Subramanian 17 अप्रैल, 2009

    अनेकान्तवाद पर इस पोस्ट के लिए आभार.

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