धर्म वही है जिसमें अहिंसा को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो:-जैन दर्शन

Posted: 05 जून 2009

कल हमने तत्व-ज्ञान -जीव तत्व - के बारे मै पढा आज हम इससे आगे अपने ज्ञानसात करेगे।
जैन दर्शन

अहिंसा -
जीव-जगत् में एक मर्यादा तक अहिंसा की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। पशु-पक्षी और उनसे भी निम्न स्तर के जीव-जन्तुओं में अपनी जाति के जीवों को मारने व खाने की प्रवृत्ति प्रायः नहीं पाई जाती। सिंह, व्याघ्रादि हिंस्र प्राणी भी अपनी सन्तति की तो रक्षा ही करते हैं; और अन्य जाति के जीवों को भी केवल तभी मारते हैं, जब उन्हें भूख की वेदना सताती है। प्राणिमात्र में प्रकृति की अहिंसोन्मुख वृत्ति की परिचायक कुछ स्वाभाविक चेतनाएं पाई जाती हैं, जिनमें मैथुन, संतानपालन, सामूहिक जीवन आदि प्रवृत्तियां प्रधान हैं। प्रकृति में यह भी देखा जाता है कि जो प्राणी जितनी मात्रा में अहिंसकवृत्ति का होता है, वह उतना ही अधिक शिक्षा के योग्य व उपयोगी सिद्ध हुआ है। बकरी, गाय, भैंस, घोड़ा, ऊंट, हाथी आदि पशु मांसभक्षी नहीं हैं, और इसीलिये वे मनुष्य के व्यापारों में उपयोगी सिद्ध हो सके हैं। यथार्थतः उन्हीं में प्रकृति की शीतोष्ण आदि द्वन्द्वात्मक शक्तियों को सहने और परिश्रम करने की शक्ति विशेष रूप में पाई जाती है। वे हिंस्र पशुओं से अपनी रक्षा करने के लिये दल बांध कर सामूहिक शक्ति का उपयोग भी करते हुए पाये जाते हैं। मनुष्य तो सामाजिक प्राणी ही है; और समाज तबतक बन ही नहीं सकता जबतक व्यक्तियों में हिंसात्मक वृत्ति का परित्याग न हो। यही नहीं, समाज बनने के लिये यह भी आवश्यक है कि व्यक्तियों में परस्पर रक्षा और सहायता करने की भावना भी हो। यही कारण है कि मनुष्य-समाज में जितने धर्म स्थापित हुए हैं, उनमें, कुछ मर्यादाओं के भीतर, अहिंसाका उपदेश पाया ही जाता है; भले ही वह कुटुंब, जाति, धर्म या मनुष्य मात्र तक ही सीमित हो। भारतीय सामाजिक जीवन में आदितः जो श्रमण-परम्परा का वैदिक परम्परा से विरोध रहा, वह इस अहिंसा की नीति को लेकर। धार्मिक विधियों में नरबलि का प्रचार तो बहुत पहिले उत्तरोत्तर मन्द पड़ गया था; किन्तु पशुबलि यज्ञक्रियाओं का एक सामान्य अंग बना रहा। इसका श्रमण साधु सदैव विरोध करते रहे। आगे चलकर श्रमणों के जो दो विभाग हुए, जैन और बौद्ध, उन दोनों में अहिंसा के सिद्धान्त पर जोर दिया गया जो अभी तक चला आता है। तथापि बौद्धधर्म में अहिंसा का चिन्तन, विवेचन व पालन बहुत कुछ परिमित रहा। परन्तु यह
सिद्धान्त जैनधर्म में समस्त सदाचार की नींव ही नहीं, किन्तु धर्म का सर्वोत्कृष्ट अंग बन गया। अहिंसा परमो धर्मः वाक्य को हम दो प्रकार से पढ़ सकते हैं-तीनों शब्दों को यदि पृथक्-पृथक् पढ़ें तो उसका अर्थ होता है कि अहिंसा ही परम धर्म है; और यदि अहिंसा-परमो को एक समास पद मानें तो वह वाक्य धर्म की परिभाषा बन जाता है, जिसका अर्थ होता है कि-
धर्म वही है जिसमें अहिंसा को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो। समस्त जैनाचार इसी अहिंसा के सिद्धान्त पर अवलम्बित है; और जितने भी आचार सम्बन्धी व्रत-नियमादि निर्दिष्ट किये गये हैं, वे सब अहिंसा के ही सर्वांग परिपालन के लिये हैं। इसी तथ्य को मनुस्मृति (२, १५९) की इस एक ही पंक्ति में भले प्रकार स्वीकार किया गया है-
अहिंसयैव भूतानां कार्य श्रेयोऽनुशासनम्।
क्रमवार १०जुन को २००९

3 comments:

  1. राज भाटिय़ा 05 जून, 2009

    आप की बात बिलकुल सही है, वही धर्म सही है जो प्यार करना दया करना, भई चारा सिखाता हो, आप के लेख मन मे बस जाते है.
    धन्यवाद

  2. ताऊ रामपुरिया 05 जून, 2009

    धर्म वही है जिसमें अहिंसा को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो।

    जैन धर्म की कुछ सर्वश्रेष्ठ देशनाओं मे से एक है. आप इनका प्रचार प्रसार करके बहुत अच्छा काम कर रहे हैं.

    रामराम.

  3. लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` 08 जून, 2009

    "अहिंसा परमो धर्म"
    जैन धर्म की मजबूत नींव है -
    अच्छा लगा ये आलेख भी
    - लावण्या

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